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करेंट अफेयर्स और संग्रह
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सिविल कानून
मध्यस्थ के अधिकारिता संबंधी निर्णय को धारा 34/37 के अधीन पृथक् रूप से चुनौती नहीं दी जा सकती
01-May-2026
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मेसर्स एम.सी.एम. वर्ल्डवाइड प्राइवेट लिमिटेड बनाम मेसर्स कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल "धारा 16 के अधीन दायर आवेदन पर मध्यस्थ के निर्णय से पीड़ित पक्ष के पास मध्यस्थता कार्यवाही के समापन तक प्रतीक्षा करने और फिर अंतिम पंचाट के विरुद्ध धारा 34 के अधीन आवेदन के माध्यम से उस विवाद्यक को उठाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मेसर्स एम.सी.एम. वर्ल्डवाइड प्राइवेट लिमिटेड बनाम मेसर्स कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल (2026) के मामले में अपील मंजूर करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया। न्यायालय ने कहा कि माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 16 के अधीन अधिकारिता संबंधी याचिका को माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा नामंजूर किये जाने को अधिनियम की धारा 34 के अधीन आवेदन या धारा 37 के अधीन अपील के माध्यम से स्वतंत्र रूप से चुनौती नहीं दी जा सकती। ऐसी चुनौती केवल माध्यस्थम् कार्यवाही समाप्त होने के बाद, धारा 34 के अधीन अंतिम पंचाट को चुनौती देकर ही पोषणीय है।
मेसर्स एम.सी.एम. वर्ल्डवाइड प्राइवेट लिमिटेड बनाम मेसर्स कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- प्रत्यर्थी ने माध्यस्थम् अधिकरण के समक्ष अधिकारिता संबंधी आक्षेप उठाया, जिसमें यह तर्क दिया गया कि अधिकरण के पास विवाद का निर्णय करने की अधिकारिता नहीं है।
- मध्यस्थ ने परिसीमा के आधार पर याचिका खारिज कर दी, जिससे अधिनियम की धारा 16 के अधीन अधिकारिता संबंधी चुनौती को नामंजूर कर दिया गया।
- इससे व्यथित होकर प्रत्यर्थी ने अधिनियम की धारा 34 के अधीन जिला न्यायाधीश के समक्ष एक आवेदन दायर किया, जिसे भी गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दिया गया।
- इसके बाद प्रत्यर्थी ने धारा 37 के अधीन दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दायर की, जिसने अपील को स्वीकार कर लिया और गुण-दोष के आधार पर अधिकारिता संबंधी चुनौती को मान लिया।
- अपीलकर्त्ता ने इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- धारा 34 के अधीन पोषणीयता पर: न्यायालय ने माना कि धारा 16 के अधीन मध्यस्थ द्वारा पारित कोई आदेश, जिसमें अधिकारिता की कमी के अभिवचन को नामंजूर कर दिया गया हो, अधिनियम की धारा 34 के अधीन आवेदन के माध्यम से स्वतंत्र रूप से चुनौती योग्य नहीं है। चूँकि आवेदन स्वयं पोषणीय नहीं था, इसलिये उस निर्णय के विरुद्ध धारा 37 के अधीन अपील पर विचार करने का प्रश्न ही नहीं उठता।
- धारा 16 की भूमिका पर — न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अधिनियम की धारा 16, जिसका शीर्षक ' माध्यस्थम् अधिकरण की अपनी अधिकारिता पर निर्णय लेने की क्षमता' है, स्पष्ट रूप से माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी अधिकारिता पर निर्णय लेने का अधिकार देती है, जिसमें माध्यस्थम् करार के अस्तित्व या वैधता से संबंधित आक्षे भी शामिल हैं। अधीनस्थ न्यायालय ने इस प्रावधान की अनदेखी करते हुए अधिकारिता के विवाद्यक के गुण-दोष के आधार पर परीक्षा करने में त्रुटी की।
- निचले न्यायालयों की त्रुटि पर: न्यायालय ने माना कि न तो जिला न्यायाधीश और न ही दिल्ली उच्च न्यायालय धारा 34 और 37 के अधीन उनके समक्ष लाए गए मामलों पर विचार करने में सही थे। जबकि जिला न्यायाधीश द्वारा आवेदन खारिज करना सही था, दोनों न्यायालयों ने मामले की सुनवाई गुण-दोष के प्रारंभिक विवाद्यक पर निर्णय लेने के बजाय अधिकारिता के प्रश्न पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने में त्रुटि की।
- प्रत्यर्थी के लिये उपलब्ध उपचार: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रत्यर्थी के पास उपचार का अभाव नहीं है। अंतिम पंचाट पारित होने के बाद, अधिनियम की धारा 34 के अधीन आवेदन के माध्यम से प्रत्यर्थी मध्यस्थ के उस आदेश की वैधता का परीक्षण कर सकता है जिसमें उसकी अधिकारिता संबंधी अभिवचन को खारिज कर दिया गया है।
माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 16 क्या है?
धारा 16 — माध्यस्थम् अधिकरण की अपनी अधिकारिता के बारे में विनिर्णय करने की सक्षमता:
धारा 16 सक्षमता-सक्षमता (Kompetenz-Kompetenz) सिद्धांत को संहिताबद्ध करती है, जिसका अर्थ है कि माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी अधिकारिता पर निर्णय लेने की शक्ति है।
मुख्य प्रावधान:
- उपधारा (1): अधिकरण अपनी अधिकारिता पर निर्णय ले सकता है, जिसमें माध्यस्थम् करार के अस्तित्व या वैधता पर आक्षेप भी शामिल हैं। माध्यस्थम् खंड को मुख्य संविदा से स्वतंत्र एक करार के रूप में माना जाता है – इसलिये यदि संविदा को शून्य घोषित कर दिया जाता है, तब भी माध्यस्थम् खंड प्रभावी रहता है।
- उपधारा (2): अधिकारिता संबंधी आक्षेप बचाव पक्ष का कथन प्रस्तुत करने के तुरंत बाद उठाया जाना चाहिये। केवल मध्यस्थ की नियुक्ति करना या उसकी नियुक्ति में भाग लेना किसी पक्षकार को ऐसी आक्षेप उठाने से नहीं रोकता है।
- उपधारा (3): अधिकरण द्वारा अपनी अधिकारिता से बाहर जाने का अभिवचन कार्यवाही के दौरान जैसे ही उसकी अधिकारिता से बाहर होने का आरोप लगाया जाता है, उठाया जाना चाहिये ।
- उपधारा (4): न्यायाधिकरण किसी भी दलील को उठाने में हुई देरी को माफ कर सकता है यदि देरी
- उपधारा (5): यदि अधिकरण अधिकारिता संबंधी अभिवचन को अस्वीकार करता है, तो वह कार्यवाही जारी रखता है और एक पंचाट पारित करता है।
- उपधारा (6): ऐसे पंचाट से व्यथित पक्षकार धारा 34 के अधीन इसे चुनौती दे सकता है - जिसका अर्थ है कि अधिकारिता संबंधी आक्षेप को कार्यवाही के मध्य में स्वतंत्र रूप से चुनौती नहीं दी जा सकती; उसे अंतिम पंचाट की प्रतीक्षा करनी होगी।
पारिवारिक कानून
“पृथक निवास” का अर्थ केवल अलग-अलग रहना नहीं है, अपितु वैवाहिक कर्त्तव्यों का समापन (अंत) भी है
01-May-2026
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कुमारी वागीशा बनाम कुमार संगम "पृथक निवास” का अर्थ यह है कि पक्षकार पति-पत्नी के रूप में साथ नहीं रह रहे हों, भले ही उनका भौतिक निवास एक ही स्थान पर क्यों न हो। इसके लिये अनिवार्य शर्त यह है कि याचिका दायर करने से ठीक पहले निरंतर एक वर्ष की अवधि के लिये वैवाहिक दायित्त्वों का पूर्णतः समापन तथा पुनः सहवास आरंभ न करने का स्पष्ट अभिप्राय हो।" न्यायमूर्ति नानी टैगिया और न्यायमूर्ति आलोक कुमार पांडे |
स्रोत: पटना उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
पटना उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति नानी तागिया और न्यायमूर्ति आलोक कुमार पांडे शामिल थे, ने कुमारी वागीशा बनाम कुमार संगम (2026) के मामले में प्रधान न्यायाधीश, कुटुंब न्यायालय, शिवहर के उस आदेश के विरुद्ध दायर एक विविध अपील को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13ख के अधीन दायर पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद के लिये संयुक्त याचिका को नामंजूर कर दिया गया था।
- न्यायालय ने माना कि धारा 13ख के अंतर्गत "पृथक् निवास" अभिव्यक्ति का तात्पर्य केवल शारीरिक पृथक्करण से नहीं है, अपितु वैवाहिक दयित्त्वो की पूर्ण समाप्ति और सहवास पुनः शुरू न करने के आशय से है। चूँकि पति ने सांविधिक एक वर्ष की अवधि के भीतर वैवाहिक संबंध पुनः शुरू करने की बात स्वीकार कर ली थी, इसलिये सांविधिक आवश्यकता पूरी नहीं हुई।
कुमारी वागीशा बनाम कुमार संगम (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता और प्रत्यर्थी का विवाह 28.04.2021 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। इस विवाह से 19.03.2022 को एक बच्ची का जन्म हुआ। वैवाहिक कलह के कारण दोनों पक्ष मार्च 2022 से पृथक् रहने लगे और पारस्परिक सम्मति से से विवाह भंग करने का निर्णय लिया।
- अधिनियम की धारा 13ख के तहत 11.05.2023 को एक संयुक्त याचिका दायर की गई, जिसके साथ एक विस्तृत समझौता करार भी संलग्न था। समझौते के अनुसार, पति ने स्थायी निर्वाह-व्यय के रूप में 20 लाख रुपए और बच्चे के भरण-पोषण के लिये 2 लाख रुपए फिक्स्ड डिपॉज़िट के माध्यम से देने पर सहमति व्यक्त की, जबकि अवयस्क बच्चे की अभिरक्षा माता के पास ही रहेगी। दोनों पक्षकारों ने सभी लंबित दाण्डिक मामलों को वापस लेने और भविष्य में कोई मुकदमा न चलाने पर भी सहमति जताई।
- यद्यपि, कार्यवाही के दौरान पति (AW-1) ने स्वीकार किया कि उसने 15.03.2023 को अपीलकर्त्ता के साथ दांपत्य संबंध फिर से शुरू कर दिये थे - संयुक्त याचिका दायर करने से दो महीने से भी कम समय पहले। इस स्वीकृति पर विश्वास करते हुए, कुटुंब न्यायालय ने माना कि याचिका से ठीक पहले पक्षकारों के कम से कम एक वर्ष तक पृथक् रहने की सांविधिक आवश्यकता पूरी नहीं हुई थी, और याचिका खारिज कर दी।
- उच्च न्यायालय के समक्ष, अपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि कुटुंब न्यायालय ने दोनों पक्षकारों द्वारा एक वर्ष से अधिक समय से पृथक् रहने के संबंध में दायर किये गए अभिवेदनों और शपथपत्रों पर विचार किये बिना केवल पति के कथन पर विश्वास करके त्रुटी की। यह भी तर्क दिया गया कि न्यायालय अपीलकर्त्ता के कथन को दर्ज करने में विफल रहा और उसने दोनों पक्षकारों के बीच हुए समझौते को ठीक से नहीं समझा।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- "पृथक् निवास" के अर्थ पर: न्यायालय ने माना कि धारा 13ख के अंतर्गत "पृथक् रहने" अभिव्यक्ति का तात्पर्य केवल शारीरिक पृथक्करण से नहीं है। पक्षकार एक ही छत के नीचे रह सकते हैं लेकिन विधिक रूप से पृथक् हो सकते हैं, या भिन्न स्थानों पर रह सकते हैं लेकिन वैवाहिक संबंध बनाए रख सकते हैं। आवश्यक शर्त यह है कि याचिका प्रस्तुत करने से ठीक पहले निरंतर एक वर्ष की अवधि के लिये वैवाहिक दायित्त्वों का पूर्ण रूप से समाप्त होना और सहवास पुनः आरंभ न करने का आशय होना चाहिये।
- सांविधिक आवश्यकता पर: न्यायालय ने पाया कि पति द्वारा 15.03.2023 को दांपत्य संबंध पुनः स्थापित करने की बात स्वीकार करना धारा 13ख के अंतर्गत आवश्यक शर्त के बिल्कुल विपरीत था। इस प्रकार के आचरण से स्पष्ट रूप से सांविधिक अवधि के भीतर वैवाहिक संबंधों की निरंतरता का संकेत मिलता है, और कुटुंब न्यायालय ने सही निष्कर्ष निकाला था कि एक वर्ष तक "पृथक् निवास" की शर्त पूरी नहीं हुई थी।
- नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता पर: 17.02.2026 को अपील लंबित रहने के दौरान दायर की गई संयुक्त समझौता याचिका पर ध्यान देते हुए, न्यायालय ने पक्षकारों को चार सप्ताह के भीतर कुटुंब न्यायालय के समक्ष धारा 13ख के अधीन एक नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी, और निदेश दिया कि इस पर पूर्व के निर्णय से प्रभावित हुए बिना, विधि के अनुसार नए सिरे से निर्णय लिया जाए।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13ख क्या है?
धारा 13ख — पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद:
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13ख पारस्परिक सम्मति से दो चरणों वाली प्रक्रिया के माध्यम से विवाह विच्छेद को उपबंधित करती है:
उपधारा (1) — प्रथम प्रस्ताव (संयुक्त याचिका): दोनों पक्षकार विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा विवाह विच्छेद के लिये जिला न्यायालय के समक्ष संयुक्त रूप से याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं, बशर्ते:
वे एक वर्ष या उससे अधिक समय से पृथक् रह रहे हैं ;
- वे एक साथ रहने में असमर्थ रहे हैं ; और
- उन्होंने पारस्परिक सम्मति से विवाह भंग करने का निर्णय लिया है।
यह उपबंध विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 से पूर्व और पश्चात् में संपन्न हुए विवाहों पर लागू होता है।
उपधारा (2) — द्वितीय याचिका (विवाह-विच्छेद की डिक्री): संयुक्त याचिका प्रस्तुत किए जाने के बाद, न्यायालय तलाक का आदेश तभी पारित करता है जब:
- दोनों पक्षकार प्रथम याचिका की तारीख के छह महीने से पहले और अठारह महीने से बाद में कोई प्रस्ताव नहीं रखते हैं ;
- इस बीच याचिका वापस नहीं ली गई है; और
- न्यायालय ने दोनों पक्षकारों की बात सुनने और अपनी इच्छानुसार जांच करने के बाद यह पाया कि विवाह अनुष्ठित हुआ था और याचिका में किये गए कथन सत्य हैं।
इस आदेश के अनुसार विवाह उस तारीख से समाप्त हो जाएगा जिस दिन यह आदेश जारी किया गया था ।