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सांविधानिक विधि
सामाजिक सद्भाव को भंग करने वाली धार्मिक प्रथाएँ अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत संरक्षित नहीं हैं
02-May-2026
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असीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य "परीक्षण किसी क्रियाकलाप की धार्मिक प्रकृति नहीं, अपितु उसके सार्वजनिक परिणाम हैं। यद्यपि राज्य को निजी पूजा की अनुमति देनी चाहिये, वहीं वह लोक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली क्रियाकलापों को विनियमित करने के लिये भी उतना ही बाध्य है, चाहे वह सार्वजनिक भूमि पर हो या निजी परिसर में। सांविधानिक प्रणाली में अनुच्छेद 25 और 26 के सुचारू संचालन के लिये यह संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।" न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद शामिल थे, ने असीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य (2026) के मामले में असीन द्वारा दायर एक रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें अधिकारियों को संभल जिले के एक गाँव में भूमि के एक टुकड़े पर नमाज अदा करने के लिये सुरक्षा और अनुमति प्रदान करने का निदेश देने की मांग की गई थी।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी ऐसी धार्मिक प्रथा का आरंभ या विस्तार, जो पहले प्रचलित नहीं थी—विशेषकर जहाँ यह विद्यमान सामाजिक संतुलन को बिगाड़ती है—संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत संरक्षित नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्य को वास्तविक व्यवधान की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है और जहाँ ऐसी क्रियाकलाप से सार्वजनिक जीवन प्रभावित होने की संभावना हो, वहाँ वह उचित निवारक उपाय कर सकता है।
असीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता ने जून 2023 में निष्पादित एक दान विलेख के आधार पर संभल जिले में एक निजी भूमि पर स्वामित्व का दावा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थी अधिकारी उन्हें उक्त भूमि पर नमाज़ अदा करने से रोक रहे हैं, जिससे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अधीन उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। तदनुसार, उन्होंने उच्च न्यायालय में सुरक्षा और उस स्थान पर नमाज़ अदा करने की अनुमति के लिये याचिका दायर की।
- दूसरी ओर, राज्य ने यह तर्क दिया कि विचाराधीन भूमि को आबादी भूमि के रूप में दर्ज किया गया था – अर्थात् सार्वजनिक उपयोग के लिये निर्धारित भूमि - और याचिकाकर्त्ता के पास उस पर कोई वैध स्वामित्व अधिकार नहीं था।
- राज्य ने आगे कहा कि उक्त स्थान पर परंपरागत रूप से नमाज़ केवल ईद के अवसर पर ही अदा की जाती रही है और इस स्थापित प्रथा पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। यद्यपि, याचिकाकर्त्ता गाँव के अंदर और बाहर से लोगों को आमंत्रित करके नियमित रूप से बड़े पैमाने पर सामूहिक नमाज़ शुरू करने का प्रयास कर रहा है, जो एक नई और गैर-पारंपरिक धार्मिक प्रथा की शुरुआत के समान है।
- राज्य ने तर्क दिया कि धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान किया जाना चाहिये, लेकिन स्थापित प्रथाओं से परे किसी भी नई या गैर-पारंपरिक क्रियाकलाप की अनुमति नहीं दी जा सकती है, क्योंकि ऐसा करने से लोक व्यवस्था भंग होगी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि यद्यपि संविधान धर्म का पालन करने के अधिकार की रक्षा करता है, यह अधिकार स्पष्ट रूप से लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। धर्म का पालन करने का अधिकार असीमित नहीं है और इसका प्रयोग इस प्रकार किया जाना चाहिये जिससे दूसरों पर कोई प्रभाव न पड़े या लोक जीवन के सामान्य कामकाज में बाधा न आए।
- विद्यमान बनाम नई धार्मिक प्रथाओं पर: न्यायालय ने विद्यमान वैध धार्मिक प्रथाओं और नई या विस्तारित प्रथाओं के बीच स्पष्ट अंतर किया। न्यायालय ने माना कि विद्यमान वैध धार्मिक प्रथाएँ और लंबे समय से विनियमित व्यवस्थाएँ या सीमित या विशिष्ट उद्देश्यों के लिये दी गई अनुमतियां अपने आप में वैध हो सकती हैं, लेकिन कोई भी नया या एकतरफा दावा केवल धर्म या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर स्थापित नहीं किया जा सकता है।
- निजी धार्मिक क्रियाकलापों के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि निजी प्रार्थनाएँ, पारिवारिक उपासनाएँ और अन्य सीमित धार्मिक क्रियाकलाप सामान्यतः अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता के संरक्षित दायरे में आती हैं। यद्यपि, यह संरक्षण केवल उन क्रियाकलापों तक सीमित है जो वास्तव में निजी, कभी-कभार होने वाली और व्यवधान उत्पन्न न करने वाला हों। यह किसी भी निजी परिसर को वास्तविक सार्वजनिक धार्मिक स्थल में परिवर्तित करने पर लागू नहीं होता है।
- निवारक राज्यीय कार्रवाई के संबंध में: न्यायालय ने अभिमत व्यक्त किया कि विधि प्राधिकरणों को वास्तविक विघटन के घटित होने की प्रतीक्षा करने के लिये बाध्य नहीं करती। जहाँ कोई क्रियाकलाप लोक-व्यवस्था को प्रभावित करने की संभावना रखती है, वहाँ राज्य अग्रिम रूप से कार्रवाई करने का अधिकार रखता है। न्यायालय ने यह भी बलपूर्वक कहा कि परीक्षण का मानदंड क्रियाकलाप का धार्मिक स्वरूप नहीं, अपितु उसके सार्वजनिक परिणाम होते हैं।
- पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत पर: न्यायालय ने अभिमत व्यक्त किया कि यह दृष्टिकोण पंथनिरपेक्षता के सांविधानिक सिद्धांत के अनुरूप है, जो सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार तथा विधि के समान अनुप्रयोग की अपेक्षा करता है। यद्यपि राज्य को निजी उपासना की अनुमति प्रदान करनी होती है, तथापि वह उन क्रियाकलापों को विनियमित करने हेतु समान रूप से बाध्य है जो लोक-व्यवस्था को प्रभावित करती हैं, चाहे वे सार्वजनिक भूमि पर संपन्न हों अथवा निजी परिसरों में।
- वर्तमान मामले के गुण-दोष पर: न्यायालय ने पाया कि विचाराधीन भूमि सार्वजनिक भूमि के रूप में दर्ज है और याचिकाकर्त्ता का स्वामित्व का दावा केवल अस्पष्ट सीमा विवरणों पर आधारित है। यदि भूमि को निजी भी मान लिया जाए, तो भी न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्त्ता अनुतोष पाने का हकदार नहीं है, क्योंकि वह किसी विद्यमान धार्मिक प्रथा की रक्षा करने के बजाय एक नई धार्मिक प्रथा को लागू करने का प्रयास कर रहा था। अभिलेखों से पता चलता है कि नमाज़ पहले केवल ईद जैसे विशिष्ट अवसरों पर ही अदा की जाती थी, और याचिकाकर्त्ता द्वारा इसे नियमित सामूहिक सभाओं तक विस्तारित करने का प्रयास - जिसमें गाँव के भीतर और बाहर के लोग शामिल हों - संरक्षित क्षेत्र से बाहर था और विनियमन के अधीन था। कोई भी लागू करने योग्य विधिक अधिकार न पाते हुए, न्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 क्या हैं?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 25:
- यह अनुच्छेद अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि-
- (1) लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा।
- (2) इस अनुच्छेद की कोई बात किसी ऐसी विद्यमान विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या राज्य को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी।
- धार्मिक आवरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निबंधन करती है।
- सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए या सार्वजनिक प्रकार की हिन्दुओं को धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के सभी वर्गों और अनुभागों के लिये खोलने का उपबंध करती है।
- धार्मिक आवरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निबंधन करती है।
- स्पष्टीकरण 1 - कृपाण धारण करना और लेकर चलना सिक्ख धर्म के मानने का अंग समझा जाएगा।
- स्पष्टीकरण 2 - खंड (2) के उपखंड (ख) में हिंदुओं के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत सिक्ख, जैन या बौद्ध धर्म के मानने वाले व्यक्तियों के प्रत्ति निर्देश है और हिंदुओं की धार्मिक संस्थाओं के प्रति निर्देश का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा।
- इसमें न केवल धार्मिक विश्वास अपीति धार्मिक रीति-रिवाज भी शामिल हैं।
- ये अधिकार सभी व्यक्तियों को उपलब्ध हैं —नागरिकों के साथ-साथ गैर-नागरिकों को भी।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 26:
- अनुच्छेद 26 धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए, प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को यह अधिकार होगा-
(क) धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिये संस्थाओं की स्थापना और पोषण का;
(ख) अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का;
(ग) जंगम और स्थावर संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का, और;
(घ) ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का अधिकार होगा। - यह अनुच्छेद सामूहिक धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
- अनुच्छेद 26 द्वारा प्रत्याभूत अधिकार किसी संगठित निकाय जैसे धार्मिक संप्रदाय या उसके अनुभागों का अधिकार है।
- उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी धार्मिक संप्रदाय को निम्नलिखित तीन शर्तों को पूरा करना होगा:
- यह ऐसे व्यक्तियों का समूह होना चाहिये जिनकी मान्यताओं की एक ऐसी प्रणाली हो जिसे वे अपने आध्यात्मिक कल्याण के लिये अनुकूल मानते हों।
- इसका एक समान संगठन होना चाहिये।
- इसे एक विशिष्ट नाम से नामित किया जाना चाहिये।
सिविल कानून
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 13-क
02-May-2026
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रिलायंस एमिनेंट ट्रेडिंग एंड कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण "जहाँ न्यायालय को लगता है कि दावा या बचाव इतना कमजोर है कि प्रथम दृष्टया उसमें सफलता की कोई संभावना नहीं दिखती, वहाँ पक्षकारों को पूर्ण विचारण की कठिनाइयों से गुजारना न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। इस प्रकार, यह उपबंध न्यायालय को ऐसी कार्यवाही को प्रारंभिक अवस्था में ही रोकने का अधिकार देता है, जिससे न्यायिक समय और संसाधनों के अनावश्यक उपयोग को रोका जा सके।" न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर शामिल थे, ने रिलायंस एमिनेंट ट्रेडिंग एंड कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण (2026) के मामले में एक वाणिज्यिक अपील को मंजूर करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 13-क के अधीन धन वसूली वाद का संक्षिप्त निपटारा करने से इंकार करने को अपास्त कर दिया।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि जहाँ मूलभूत तथ्य निर्विवाद हों, मौखिक साक्ष्य की आवश्यकता न हो, और प्रतिवादी प्रतिरक्षा में सफलता की वास्तविक संभावना वाला कोई तर्क प्रस्तुत करने में असफल रहे, वहाँ न्यायालयों को संक्षिप्त निर्णय देने में संकोच नहीं करना चाहिये। न्यायालय ने आगे आदेश 13-क सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अधिकारिता के प्रयोग को नियंत्रित करने के लिये गैर-विस्तृत दिशानिर्देश भी निर्धारित किये।
रिलायंस एमिनेंट ट्रेडिंग एंड कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) द्वारा 2007 में नई दिल्ली के जसोला में एक व्यावसायिक भूखंड के लिये आयोजित सार्वजनिक नीलामी से उत्पन्न हुआ। अपीलकर्त्ता ने उच्चतम बोली लगाकर 164 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया, जिसके बाद 2008 में एक हस्तांतरण विलेख निष्पादित किया गया।
- बाद में, पूर्व स्वामी द्वारा दायर मुकदमे के बाद भूमि के स्वामित्व पर संदेह उत्पन्न हो गया। यह पाया गया कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 24(2) के अधीन अधिग्रहण की प्रक्रिया समाप्त हो गई थी। समय दिये जाने के बावजूद, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) भूमि का पुनः अधिग्रहण करने में विफल रहा।
- स्वामित्व अमान्य हो जाने और कब्ज़ा खो जाने के बाद, अपीलकर्त्ता ने ब्याज सहित भुगतान की गई पूरी राशि की वापसी की मांग करते हुए एक वाणिज्यिक वाद दायर किया। न्यायालयों के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या पूर्ण विचारण के बिना, आदेश 13-क सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वाद का संक्षिप्त निपटारा किया जा सकता है।
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने वाद का संक्षिप्त निपटारा करने से इंकार कर दिया, जिसके कारण उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह अपील दायर की गई है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- संक्षिप्त निर्णय के उद्देश्य पर: न्यायालय ने माना कि आदेश 13-क के अधीन संक्षिप्त निर्णय एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रियात्मक तंत्र है जिसका उद्देश्य वाणिज्यिक विवादों में दक्षता को बढ़ावा देना और अनावश्यक विचारणों को रोकना है। इसने न्यायालयों को काल्पनिक या निराधार प्रतिरक्षा के आधार पर मुकदमेबाजी को जारी रखने की अनुमति न देने की चेतावनी दी।
- निर्णय देने के मानदंड पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संक्षिप्त निर्णय तभी दिया जाना चाहिये जब बचाव पक्ष का तर्क मात्र काल्पनिक हो या उसकी सफलता की कोई वास्तविक संभावना न हो, और जब पूर्ण विचारण का कोई सार्थक उद्देश्य न हो। जहाँ मूलभूत तथ्य निर्विवाद हों और मौखिक साक्ष्य की आवश्यकता न हो, वहाँ न्यायालयों को वाणिज्यिक वादों का संक्षिप्त निपटारा करने में संकोच नहीं करना चाहिये।
- प्रत्यर्थी के विरोध पर: न्यायालय ने त्वरित निपटारे के लिये दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के विरोध को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि ऐसे तर्क मुकदमे को लंबा खींचने और पहले से तय विवाद्यकों को फिर से उठाने का मात्र प्रयास थे। यह पाया गया कि अपीलकर्त्ता ने प्रथम दृष्टया सफलता की वास्तविक संभावना दर्शाने का भार पूरा कर लिया था, जबकि प्रत्यर्थी केवल महत्त्वहीन आधार उठाकर इसका खंडन करने में विफल रहा, जिन पर पूर्ण विचारण के माध्यम से निर्णय की आवश्यकता नहीं थी।
- निर्देशों पर: न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की त्वरित निपटान की याचिका को मंजूर कर लिया और दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को 12 जुलाई 2007 से 7.5% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित ₹164.91 करोड़ की राशि आठ सप्ताह के भीतर वापस करने का निदेश दिया।
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 13-क के अंतर्गत कौन-कौन से दिशानिर्देश निर्धारित किये गए हैं?
न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 13-क के अधीन सारांश निर्णय के लिये आवेदन पर विचार करते समय पालन किये जाने वाले निम्नलिखित गैर-विस्तृत दिशानिर्देश निर्धारित किये:
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 13-क के अधीन प्रक्रियात्मक आदेशों का कठोरता से पालन किया जाना चाहिये।
- न्यायालय को इस बात पर विचार करना होगा कि क्या वादी के दावे या विवाद्यक पर सफल होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है, या क्या प्रतिवादी के दावे या विवाद्यक की सफलतापूर्वक प्रतिरक्षा करने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है।
- न्यायालय को इस बात पर भी विचार करना चाहिये कि क्या ऐसा कोई अन्य कारण नहीं है जिसके चलते मामले या विवाद्यक को विचारण के लिये आगे बढ़ने की अनुमति दी जानी चाहिये।
- उपरोक्त बातों की पुष्टि करते समय, न्यायालय को हर बात को सच नहीं मानना चाहिये, लेकिन उसे लघु विचारण भी नहीं करना चाहिये।
- न्यायालय को ऐसे वाद या प्रतिरक्षा के बीच अंतर करना होगा जिसमें सफलता की वास्तविक संभावना हो, और ऐसे वाद या प्रतिरक्षा में जो काल्पनिक हो।
- संक्षिप्त निर्णय संबंधी आवेदनों से निपटते समय न्यायालय को गंभीरता से विचार करना चाहिये और विधि और निर्वचन के संक्षिप्त बिंदुओं पर निर्णय लेना चाहिये।
- न्यायालय को न केवल अपने समक्ष विद्यमान साक्ष्यों को ध्यान में रखना चाहिये, अपितु उन साक्ष्यों को भी ध्यान में रखना चाहिये जिनकी विचारण के दौरान पेश किये जाने या उपलब्ध होने की यथोचित रूप से अपेक्षा की जा सकती है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 13-क के अधीन दी गई शक्ति असाधारण है, क्योंकि यह विचारण की प्रक्रिया को छोटा कर देती है, और इसका प्रयोग केवल वहीं किया जाना चाहिये जहाँ मौखिक साक्ष्य और पूर्ण विचारण की आवश्यकता नहीं होती है।
- यह निर्धारित करने के लिये कि क्या पूर्ण विचारण आवश्यक है, न्यायालय को यह विचार करना होगा कि क्या न्याय के हित में साक्ष्यों का मूल्यांकन करने, साक्षियों की विश्वसनीयता का आकलन करने या साक्ष्यों से उचित निष्कर्ष निकालने के लिये विचारण की आवश्यकता है।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 13-क क्या है?
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 13-क — संक्षिप्त निर्णय:
दायरा (नियम 1):
- कोई न्यायालय वाणिज्यिक विवाद में किसी भी "दावे" का निर्णय मौखिक साक्ष्य के बिना कर सकता है।
- "दावा" में संपूर्ण दावा, दावे का एक भाग या प्रतिदावा शामिल है।
- आदेश 37 के अंतर्गत संक्षिप्त वादों को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया है, क्योंकि वे पहले से ही संक्षिप्त प्रकृति के होते हैं। तथापि, यदि किसी संक्षिप्त वाद को वाणिज्यिक वाद में परिवर्तित किया जाता है, तो आदेश 13-क लागू होता है।
आवेदन का प्रक्रम (नियम 2):
- प्रतिवादी को समन तामील किये जाने के बाद और विवाद्यकों के विरचित किये जाने से पहले संक्षिप्त निर्णय के लिये आवेदन दायर किया जा सकता है।
- एक बार विवाद्यक विरचित हो जाने के बाद, विचारण के लिये आगे बढ़ता है और यह प्रावधान लागू होना बंद हो जाता है।
मंजूरी के आधार (नियम 3)
दो अनिवार्य और संयुक्त आधारों को पूरा किया जाना चाहिये:
- वादी या प्रतिवादी में से किसी के भी दावे में सफल होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है; और
- मौखिक साक्ष्य अभिलिखित करने से पहले दावे का निपटारा न करने का कोई अन्य ठोस कारण नहीं है।
दोनों आधारों का सह-अस्तित्व होना आवश्यक है—कोई भी अकेला आधार पर्याप्त नहीं है।