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आपराधिक कानून
अभियुक्त आरोपपत्र के दस्तावेज़ों को हस्ताक्षर के औपचारिक सबूत के बिना प्रदर्शित करा सकता है
08-May-2026
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आर. गणेश बनाम तमिलनाडु राज्य "यदि ऐसे दस्तावेज़ पर कोई विवाद नहीं है, तो इसे दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही में उस व्यक्ति के हस्ताक्षर साबित किये बिना पढ़ा जा सकता है, जिसके नाम पर यह दस्तावेज़ होने का दावा करता है।" न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर शामिल थे, ने आर. गणेश बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध दायर विशेष अनुमति याचिका को मंजूर कर लिया, जिसमें अभियुक्तों को धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 330) के अधीन कुछ दस्तावेज़ों को हस्ताक्षरों के औपचारिक सबूत के बिना प्रदर्श के रूप में चिह्नित करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया गया था, जबकि वे दस्तावेज़ पहले से ही अभियोजन पक्ष के अभिलेख और आरोपपत्र का भाग थे।
- न्यायालय ने माना कि जब अभियुक्त द्वारा विश्वास किये जाने वाले दस्तावेज़ की प्रामाणिकता विवाद में नहीं है, तो ऐसे दस्तावेज़ धारा 294(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता की योजना के अनुसार हस्ताक्षर के औपचारिक सबूत की आवश्यकता के बिना प्रदर्शित किये जाने के हकदार हैं।
आर. गणेश बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला अपर सेशन न्यायाधीश के समक्ष लंबित एक दाण्डिक अपील से उत्पन्न हुआ, जिसमें अभियुक्त ने धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन एक आवेदन दायर कर कुछ दस्तावेज़ों - जिनमें खाता खोलने के फॉर्म, बैंक प्रमाण पत्र, आयकर रिटर्न की प्रतियाँ, रिस्क रेटिंग और मूल्य निर्धारण स्कोर शीट शामिल हैं - को हस्ताक्षर के औपचारिक सबूत पर बल दिये बिना प्रदर्श के रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी थी।
- अभियुक्त ने यह तर्क दिया कि ये दस्तावेज़ पहले से ही अभियोजन पक्ष के अभिलेख और आरोप पत्र की सामग्री का भाग थे, और इसलिये किसी औपचारिक सबूत की आवश्यकता नहीं थी।
- विचारण न्यायालय ने आवेदन खारिज कर दिया। अभियुक्त ने मद्रास उच्च न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की, जिसे भी खारिज कर दिया गया।
- उच्च न्यायालय ने पंजाब राज्य बनाम नायब दीन (2001) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया - यह मामला धारा 296 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 332) से संबंधित था - और यह माना कि विचाराधीन दस्तावेज़ औपचारिक प्रकृति के थे और धारा 296 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन शपथपत्र के माध्यम से साबित किये जाने आवश्यक थे।
- इसके बाद अभियुक्त ने उच्चतम न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की, जिसमें यह तर्क दिया गया कि उच्च न्यायालय ने धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दस्तावेज़ों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने से संबंधित आवेदन पर निर्णय लेते समय शपथपत्र के साक्ष्य से संबंधित पूर्व निर्णयों को गलत तरीके से लागू किया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 294 के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता उन दस्तावेज़ों पर लागू होती है जो पहले ही न्यायालय में दाखिल किये जा चुके हैं, जिनमें पक्षकारों को ऐसे दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता स्वीकार करने या अस्वीकार करने के लिये कहा जा सकता है। यदि प्रामाणिकता पर कोई विवाद नहीं है, तो धारा 294(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुसार दस्तावेज़ों को हस्ताक्षरों के औपचारिक सबूत के बिना साक्ष्य के रूप में पढ़ा जा सकता है।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 294 और 296 के बीच अंतर: न्यायालय ने दोनों उपबंधों के बीच स्पष्ट अंतर बताया। धारा 294 दस्तावेज़ी साक्ष्य और पहले से अभिलेख में विद्यमान दस्तावेज़ों को स्वीकार या अस्वीकार करने की प्रक्रिया से संबंधित है। इसके विपरीत, धारा 296 औपचारिक प्रकृति के साक्ष्य से संबंधित है जो साक्षियों द्वारा शपथपत्र के माध्यम से दिये जाते हैं, जिनका परिसाक्ष्य केवल औपचारिक होता है। ये दोनों उपबंध पूरी तरह से भिन्न प्रक्रियात्मक क्षेत्रों में लागू होते हैं और इन्हें एक दूसरे के साथ नहीं मिलाया जा सकता।
- नायब दीन की अप्रयोज्यता पर: न्यायालय ने माना कि पंजाब राज्य बनाम नायब दीन के मामले का निर्णय धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कार्यवाही पर लागू नहीं होता। चूँकि वह निर्णय धारा 296 दण्ड प्रक्रिया संहिता के संदर्भ में दिया गया था, इसलिये उच्च न्यायालय ने हस्ताक्षरों के औपचारिक सबूत के बिना दस्तावेज़ों को प्रदर्शित करने के आवेदन को अस्वीकार करने के लिये इसे लागू करने में त्रुटी की थी। न्यायालय ने आगे कहा कि धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता की भावना को बनाए रखना न्यायालय का कर्त्तव्य है, और कोई भी आदेश दस्तावेज़ की प्रामाणिकता की स्वीकृति, अस्वीकृति या सबूत के माध्यम से विधिवत सुनिश्चित करने के बाद ही पारित किया जाना चाहिये।
- मामले के तथ्यों पर: न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता द्वारा साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किये जाने वाले दस्तावेज़ आरोपपत्र और स्वयं अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों का भाग थे। ऐसी स्थिति में, उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने से इंकार करना त्रुटिपूर्ण था। यद्यपि, चूँकि अभियोजन पक्ष ने इस संबंध में विवाद उठाया कि क्या दस्तावेज़ वास्तव में अभिलेख का भाग थे, इसलिये मामले को नए सिरे से विचार करने के लिये उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया गया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 330 क्या है?
- बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 330 ऐसे दस्तावेज़ प्रदान करती है जिनके औपचारिक सबूत की आवश्यकता नहीं है।
- पहले यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 294 के अंतर्गत आता था।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 330 के अधीन दो नए परंतुक जोड़े गए हैं।
- धारा 330
- खंड (1) में कहा गया है कि जहाँ अभियोजन या अभियुक्त द्वारा किसी न्यायालय के समक्ष कोई दस्तावेज़ फाइल किया गया है वहाँ ऐसे प्रत्येक दस्तावेज़ की विशिष्टियां एक सूची में सम्मिलित की जाएगी और अभियोजन या अभियुक्त या अभियोजन या अभियुक्त के अधिवक्ता से, यदि कोई हों, ऐसे दस्तावेज़ों की पूर्ति करने के शीघ्र पश्चात् किसी भी दशा में ऐसी पूर्ति के पश्चात् तीस दिन के अपश्चात् ऐसे प्रत्येक दस्तावेज़ का असली होता स्वीकार या इंकार करने की अपेक्षा की जाएगी।
- परंतु न्यायालय अपने विवेक से ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किये जाएं, समय सीमा को शिथिल कर सकेगा:
- परंतु यह और कि किसी विशेषज्ञ को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिये जब तक नहीं बुलाया जाएगा तब तक ऐसे विशेषज्ञ की रिपोर्ट पर विचारण के किसी पक्षकार द्वारा विवाद नहीं किया जाता है।
- खंड (2) में कहा गया है कि दस्तावेज़ों की सूची ऐसे प्ररूप में होगी जो राज्य सरकार नियमों द्वारा उपबंधित कर सके।
- खंड (3) में कहा गया है कि जहाँ किसी दस्तावेज़ का असली होना विवादग्रस्त नहीं है वहाँ ऐसा दस्तावेज़ उस व्यक्ति के जिसके द्वारा उसका हस्ताक्षरित होना तात्पर्थित है, हस्ताक्षर के सबूत के बिना इस संहिता के अधीन किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही में साक्ष्य में पढ़ा जा सकेगा।
- इसमें यह उपबंधित है न्यायालय, स्वविवेकानुसार, यह अपेक्षा कर सकता है कि ऐसे हस्ताक्षर साबित किये जाएं।
- खंड (1) में कहा गया है कि जहाँ अभियोजन या अभियुक्त द्वारा किसी न्यायालय के समक्ष कोई दस्तावेज़ फाइल किया गया है वहाँ ऐसे प्रत्येक दस्तावेज़ की विशिष्टियां एक सूची में सम्मिलित की जाएगी और अभियोजन या अभियुक्त या अभियोजन या अभियुक्त के अधिवक्ता से, यदि कोई हों, ऐसे दस्तावेज़ों की पूर्ति करने के शीघ्र पश्चात् किसी भी दशा में ऐसी पूर्ति के पश्चात् तीस दिन के अपश्चात् ऐसे प्रत्येक दस्तावेज़ का असली होता स्वीकार या इंकार करने की अपेक्षा की जाएगी।
बीएनएसएस की धारा 332 क्या है?
धारा 332 बीएनएसएस — शपथपत्र पर औपचारिक प्रकृति के साक्ष्य
यह क्या प्रदान करता है:
- किसी भी व्यक्ति की गवाही, जिसका साक्ष्य औपचारिक प्रकृति का हो, मौखिक परीक्षा के बजाय शपथ पत्र के माध्यम से दी जा सकती है।
- ऐसे हलफनामे के साक्ष्य को बीएनएसएस के तहत किसी भी जांच, मुकदमे या अन्य कार्यवाही में पढ़ा जा सकता है, बशर्ते सभी उचित अपवाद लागू हों।
बुलाने की शक्ति:
- न्यायालय स्वयं ही हलफनामे में उल्लिखित तथ्यों के संबंध में ऐसे व्यक्ति को तलब कर उससे पूछताछ कर सकता है।
- यदि अभियोजन पक्ष या आरोपी द्वारा आवेदन किया जाता है तो न्यायालय ऐसे व्यक्ति को तलब करेगा और उसकी जांच करेगा।
आपराधिक कानून
अनुशासनात्मक प्राधिकारी नए कारण बताओ नोटिस के बिना कर्मचारी को दण्डित नहीं कर सकता
08-May-2026
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डॉ. निगम प्रकाश नारायण बनाम राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और अन्य "कार्यकारी समिति नए कारण बताओ नोटिस जारी किये बिना और/या डॉ. नारायण को विचाराधीन नए/वैकल्पिक आरोप का जवाब देने का उचित और तर्कसंगत अवसर दिये बिना दण्ड अधिरोपित नहीं कर सकते थे।" न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की एक पीठ जिसमें न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे, ने डॉ. निगम प्रकाश नारायण बनाम नेशनल मेडिकल कमीशन और अन्य (2026) के मामले में एक सेवानिवृत्त बाल रोग विशेषज्ञ द्वारा दायर अपील को मंजूर कर लिया, जिसे तीन महीने के लिये भारतीय मेडिकल रजिस्टर से प्रतिबंधित कर दिया गया था।
- न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि एक बार जब किसी दोषी कर्मचारी ने अपने विरुद्ध लगाए गए मूल आरोप से सफलतापूर्वक प्रतिरक्षा कर ली हो, तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी नए कारण बताओ नोटिस के अभाव में उसे किसी अन्य या नए आरोप पर दण्डित नहीं कर सकता। ऐसा करना अनुशासनात्मक प्रक्रिया में एक गंभीर कमी है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
डॉ. निगम प्रकाश नारायण बनाम राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता, जो एक सेवानिवृत्त बाल रोग विशेषज्ञ हैं, ने पटना मेडिकल कॉलेज में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के निरीक्षण के दौरान एक संकाय घोषणा पत्र प्रस्तुत किया था। उन्होंने इस पत्र में यह प्रकटन नहीं किया कि वे पहले किसी अन्य संस्थान में संकाय सदस्य के रूप में कार्यरत थे।
- उन्हें फर्जी संकाय घोषणा पत्र जमा करने के आरोप में नोटिस जारी किया गया था। उन्होंने नीतिशास्त्र समिति के समक्ष इस आरोप से सफलतापूर्वक प्रतिरक्षा की।
- जब मामले को पुनर्विचार के लिये वापस भेजा गया, तो नैतिकता समिति ने उन्हें लोप के एक कृत्य का दोषी पाया - यह आरोप फर्जी घोषणा प्रस्तुत करने के मूल आरोप से काफी भिन्न था।
- भारतीय चिकित्सा परिषद ने नैतिकता समिति के आदेश को बरकरार रखा। इससे असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ता ने पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की।
- एकल न्यायाधीश ने रिट याचिका को उनके पक्ष में मंजूर कर लिया; यद्यपि, खंडपीठ ने एक अंतर-न्यायालय अपील में इस निर्णय को पलट दिया, जिसके कारण अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- नए आरोप पर दण्ड देने पर रोक: रवि ओरांव बनाम झारखंड राज्य (2025) के मामले पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि एक बार जब कोई दोषी कर्मचारी सफलतापूर्वक अपने ऊपर लगे आरोप का बचाव कर लेता है, तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी, नए कारण बताओ नोटिस के अभाव में, उसे किसी ऐसे पूर्णतः भिन्न आरोप पर दण्डित नहीं कर सकता जो मूल रूप से कभी लगाया ही नहीं गया था। आचार समिति द्वारा अपीलकर्त्ता को लोप के नए आरोप पर - बिना नया कारण बताओ नोटिस जारी किये – दण्डित करने का निर्णय गंभीर विधिक त्रुटि से ग्रस्त माना गया।
- प्रतिरक्षा का अवसर प्रदान करने की आवश्यकता पर: न्यायालय ने माना कि उचित और तर्कसंगत जवाब देने का अवसर प्राकृतिक न्याय का एक अनिवार्य नियम है। यदि कोई नया या वैकल्पिक आरोप विचाराधीन है, तो दोषी कर्मचारी को उस आरोप के विरुद्ध अपनी प्रतिरक्षा करने का अलग से अवसर दिया जाना चाहिये। इस प्रकार का अवसर दिये बिना दण्ड देना अग्राह्य है, चाहे मूल आचरण कितना भी गंभीर क्यों न हो।
- अपीलकर्त्ता के आचरण पर: प्रक्रियात्मक कमियों के होते हुए भी, न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता यह समझाने में विफल रहा कि प्रपत्र में गलत घोषणा क्यों की गई थी। न्यायालय ने टिप्पणी की कि जानबूझकर की गई गलत घोषणा का स्पष्टीकरण न दे पाना स्वतः ही इसे कदाचार मानने का आधार बन जाता है, जिसे कार्यकारी समिति क्षमा नहीं कर सकती थी।
- अनुच्छेद 142 के अधीन शक्ति का प्रयोग: अपीलकर्त्ता की 76 वर्ष की उन्नत आयु को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने मूल दण्ड को बरकरार रखने से इंकार कर दिया। संविधान के अनुच्छेद 142 के अधीन अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग करते हुए, न्यायालय ने दण्ड को तीन महीने के लिये भारतीय चिकित्सा रजिस्टर से नाम हटाने से घटाकर निंदा/चेतावनी जारी करने में बदल दिया। तदनुसार, अपील को इन शर्तों पर मंजूर कर लिया गया।
कारण बताओ नोटिस क्या होता है?
- कारण बताओ नोटिस एक औपचारिक संसूचना है जो किसी न्यायालय, सरकारी अभिकरण या अन्य प्राधिकारी निकाय द्वारा किसी व्यक्ति या संस्था को जारी किया जाता है, जिसमें उनसे उनके कार्यों, निर्णयों या व्यवहार को स्पष्ट करने या उचित ठहराने के लिये कहा जाता है।
- कारण बताओ नोटिस का उद्देश्य प्राप्तकर्ता को विशिष्ट चिंताओं या कथित उल्लंघनों के संबंध में प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण प्रदान करने का अवसर देना है।