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आपराधिक कानून
अपराध से प्रत्यक्ष संबंध के अभाव में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के अंतर्गत बैंक खातों का अभिग्रहण नहीं किया जा सकता
14-May-2026
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गीता कंपानी बनाम महाराष्ट्र राज्य, साथ में पराग शाह बनाम गीता कंपानी "अभिगृहीत की गई संपत्ति और कथित रूप से किये गए अपराध के बीच प्रत्यक्ष संबंध होना चाहिये।" न्यायमूर्ति एन.जे. जमादार |
स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एन.जे. जमादार ने गीता कंपानी बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र और पराग शाह बनाम गीता कंपानी (2026) के मामले में अपर मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट के उस आदेश से उत्पन्न दो आपराधिक आवेदनों की सुनवाई की, जिसमें अभियुक्त के बैंक खातों और म्यूचुअल फंड इकाइयों को 6.55 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी प्रस्तुत करने के अधीन डी-फ्रीज करने का निदेश दिया गया था।
- प्रथम परिवादकर्त्ता ने खातों को डीफ़्रीज़ करने के विरुद्ध एक आवेदन दायर किया। दूसरा आवेदन अभियुक्त संख्या 2 ने बैंक गारंटी देने की शर्त को चुनौती देते हुए दायर किया। न्यायालय ने प्रथम परिवादकर्त्ता का आवेदन खारिज कर दिया और अभियुक्त संख्या 2 के आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए खातों को डीफ़्रीज़ करने के लिये लगाई गई शर्त को बैंक गारंटी से बदलकर क्षतिपूर्ति बंधपत्र में परिवर्तित कर दिया।
गीता कंपानी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अभियुक्त ने यह तर्क दिया कि फ्रीज किये गए खातों और कथित अपराधों के बीच कोई संबंध नहीं था।
- यह तर्क दिया गया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 केवल उस संपत्ति को अभिगृहीत करने का अधिकार देती है जिसके अन्वेषण के अधीन अपराध से प्रत्यक्ष संबंध हो, न कि किसी ऐसी संपत्ति को जो केवल ऐसे संबंध के कारण अभियुक्त की हो।
- अपर मुख्य महानगरीय मजिस्ट्रेट ने 6.55 करोड़ रुपए की फ्रीज राशि के समान बैंक गारंटी प्रस्तुत करने की शर्त के अधीन बैंक खातों और म्यूचुअल फंड इकाइयों को डी-फ्रीज करने का निदेश दिया था।
- प्रथम परिवादकर्त्ता और अभियुक्त संख्या 2 दोनों ने भिन्न आधारों पर बॉम्बे उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि यद्यपि बैंक खाते दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के अर्थ में "संपत्ति" हैं, फिर भी उन्हें अभिगृहीत करने की शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब संपत्ति और कथित अपराध के घटित होने के बीच प्रत्यक्ष संबंध हो। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि इस उपबंध में "कोई भी संपत्ति" शब्द का प्रयोग किया गया है, लेकिन अभिगृहीत करने की शक्ति इस शर्त पर निर्भर करती है कि ऐसी संपत्ति चोरी की हुई मानी जाए या संदेह हो, या ऐसी परिस्थितियों में पाई जाए जिससे अपराध घटित होने का संदेह उत्पन्न हो।
- संपत्ति की प्रकृति के संबंध में: न्यायालय ने टिप्पणी की कि धारा 102 के अंतर्गत संपत्ति की प्रकृति पर बल दिया गया है, न कि अपराध में शामिल व्यक्तियों से उसके संबंध पर। केवल चोरी की मानी गई या संदिग्ध संपत्ति, या ऐसी परिस्थितियों में पाई गई संपत्ति जो अपराध का संदेह उत्पन्न करती हो, को ही इस उपबंध के अधीन विधिक रूप से अभिग्रहण किया जा सकता है।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के उद्देश्य पर: न्यायालय ने माना कि धारा 102 का उद्देश्य अन्वेषण और साक्ष्य जुटाने में सहायता करना है। यह परिवादकर्त्ता के लिये वसूली सुनिश्चित करने या अन्वेषण एजेंसी द्वारा वैध स्वामी माने जाने वाले व्यक्ति को संपत्ति सौंपने का तंत्र नहीं है।
- बैंक गारंटी की शर्त पर: न्यायालय ने माना कि अभियुक्त से 6.55 करोड़ रुपए (जमा राशि के समान) की बैंक गारंटी जमा करने की शर्त रखना, खातों को डी-फ्रीज करने के लिये की गई प्रार्थना को अस्वीकार करने के समान है। ऐसी कठोर शर्त खातों को डी-फ्रीज करने के उद्देश्य को विफल कर देती है। न्यायालय ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में केवल उचित शर्तें ही अधिरोपित की जा सकती हैं।
- मामले के तथ्यों पर: न्यायालय ने पाया कि अभिलेख में विद्यमान साक्ष्य प्रथम दृष्टया जमे हुए बैंक खातों और म्यूचुअल फंडों तथा कथित अपराधों के बीच आवश्यक संबंध स्थापित नहीं करते हैं। तदनुसार, न्यायालय ने मजिस्ट्रेट के आदेश में संशोधन करते हुए बैंक गारंटी के स्थान पर क्षतिपूर्ति बंधपत्र प्रस्तुत करने की शर्त पर खातों को मुक्त करने का निदेश दिया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 106 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 106 – कुछ संपत्ति को अभिगृहीत करने की पुलिस अधिकारी की शक्ति:
- यह धारा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के अनुरूप है।
- कोई भी पुलिस अधिकारी चोरी की संपत्ति होने का आरोप या संदेह होने पर, या अपराध किये जाने का संदेह उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों में पाई गई संपत्ति को अभिगृहीत कर सकता है।
- यदि अभिग्रहण करने वाला अधिकारी थाने के भारसाधक अधिकारी के अधीन है, तो उसे तुरंत उस अधिकारी को अभिग्रहण की सूचना देनी होगी।
- अभिग्रहण करने वाले अधिकारी को बिना किसी विलंब के संबंधित मजिस्ट्रेट को अभिग्रहण की सूचना देनी होगी।
- जहाँ अभिगृहीत की गई संपत्ति को न्यायालय तक आसानी से नहीं ले जाया जा सकता है, या अभिरक्षा में रखना मुश्किल है, या निरंतर पुलिस अभिरक्षा अनावश्यक है, तो अधिकारी इसे किसी भी व्यक्ति को जमानत पर सौंप सकता है, जिसमें यह वचन दिया जाए कि वह आवश्यकतानुसार इसे न्यायालय के समक्ष पेश करेगा।
- यदि अभिगृहीत की गई संपत्ति शीघ्र ही क्षयशील होने वाली हो, स्वामी अज्ञात हो या अनुपस्थित हो, और उसका मूल्य ₹500 से कम हो, तो पुलिस अधीक्षक के आदेशानुसार उसकी नीलामी की जा सकती है; नीलामी से प्राप्त शुद्ध आय पर धारा 503 और 504 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू होंगी।
इस उपबंध का विधिक इतिहास: कुछ संपत्ति को अभिगृहीत करने की पुलिस अधिकारी की शक्ति
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संहिता |
वर्ष |
धारा |
प्रमुख विशेषताएँ |
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दण्ड प्रक्रिया संहिता |
1882 |
धारा 523 |
इसमें धारा 51 के अंतर्गत अभिगृहीत संपत्ति, अथवा कथित/संदिग्ध रूप से चोरी की गई संपत्ति, या संदेहास्पद परिस्थितियों में प्राप्त संपत्ति के अभिग्रहण को समाविष्ट किया गया था। मजिस्ट्रेट को तत्काल प्रतिवेदन प्रस्तुत करना आवश्यक था। मजिस्ट्रेट को उस व्यक्ति को संपत्ति सुपुर्द करने का अधिकार प्राप्त था जो उसके कब्जे का विधिसम्मत अधिकारी हो, अथवा यदि ऐसे व्यक्ति का निर्धारण न हो सके, तो संपत्ति के संरक्षण एवं प्रस्तुतिकरण संबंधी आदेश पारित करने की शक्ति प्राप्त थी। पुलिस अधिकारी को अभिग्रहण की कोई स्वतंत्र शक्ति स्पष्ट रूप से प्रदान नहीं की गई थी। |
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दण्ड प्रक्रिया संहिता |
1898 |
धारा 550 |
कथित अथवा संदिग्ध रूप से चोरी की गई संपत्ति, या संदेहास्पद परिस्थितियों में प्राप्त संपत्ति के संबंध में किसी भी पुलिस अधिकारी को अभिग्रहण की शक्ति स्पष्ट रूप से प्रदान की गई थी। अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों के लिये यह अनिवार्य किया गया था कि वे अभिग्रहण की सूचना तत्काल थाने के भारसाधक अधिकारी को प्रेषित करें। इस स्तर पर मजिस्ट्रेट को प्रतिवेदन प्रस्तुत करने अथवा अभिरक्षा बंधपत्र संबंधी कोई प्रावधान नहीं था। |
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दण्ड प्रक्रिया संहिता |
1973 |
धारा 102 |
इसके अतिरिक्त, अभिरक्षा बंधपत्र की व्यवस्था प्रारंभ की गई, जिसके अनुसार जहाँ संपत्ति को न्यायालय तक ले जाना असुविधाजनक हो, उसके संरक्षण हेतु समुचित व्यवस्था करना कठिन हो, अथवा अन्वेषण के प्रयोजनों के लिये पुलिस अभिरक्षा आवश्यक न हो, वहाँ किसी व्यक्ति से बंधपत्र निष्पादित कराकर संपत्ति उसकी अभिरक्षा में दी जा सकती है, इस शर्त के अधीन कि वह न्यायालय के समक्ष संपत्ति प्रस्तुत करेगा। साथ ही, ₹500 से कम मूल्य की नाशवान संपत्ति के संबंध में एक परंतुक जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत पुलिस अधीक्षक को तत्काल नीलामी द्वारा विक्रय करने की अनुमति प्रदान की गई। ऐसे विक्रय से प्राप्त शुद्ध आय का विनियमन दण्ड प्रक्रिया संहिता की धाराओं 457 एवं 458 के अधीन किया जाना निर्धारित किया गया। |
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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता |
2023 |
धारा 106 |
यह उपबंध अपने समस्त तीनों उपबंधों एवं परंतुक सहित दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के उपबंध का मूलतः प्रतिरूप है। अभिग्रहण की मूल शक्ति, प्रतिवेदन प्रस्तुत करने संबंधी दायित्त्व तथा अभिरक्षा बंधपत्र की व्यवस्था यथावत रखी गई है। केवल परिवर्तन यह किया गया है कि क्षयशील संपत्ति संबंधी परंतुक में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धाराओं 457 एवं 458 के स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराओं 505 एवं 506 का संदर्भ प्रतिस्थापित किया गया है, जो नवीन संहिता के अंतर्गत धाराओं के पुनः क्रमांकन को परिलक्षित करता है। |
सांविधानिक विधि
अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत बालक के मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार को संरक्षण प्राप्त है
14-May-2026
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पदम मेहता और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य "अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में अपना मानक आधार पाता है, क्योंकि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रत्याभूति में अनिवार्य रूप से सार्थक और बोधगम्य रूप में सूचना प्राप्त करने का अधिकार सम्मिलित है।" न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता शामिल थे, ने पदम मेहता और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले में राजस्थान राज्य को राज्य भर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में शुरू करने और उपलब्ध कराने के लिये ठोस कदम उठाने और साथ ही इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में उपयोग करने की सुविधा प्रदान करने का निदेश दिया।
- न्यायालय ने निर्णय कि किसी बालक को अपनी पसंद की भाषा में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित है और इस जनादेश को लागू करने में राजस्थान राज्य की निरंतर निष्क्रियता संविधान के भाग 3 के अधीन प्रत्याभूत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने का जोखिम उत्पन्न करती है।
पदम मेहता और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी ?
- यह याचिका राजस्थान राज्य द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिये पर्याप्त कदम उठाने में विफलता के कारण दायर की गई थी कि बालकों को राजस्थानी में या कम से कम उनकी पसंद की भाषा में शिक्षा मिले, जो कि मातृभाषा आधारित शिक्षा पर केंद्र सरकार की नीति के अनुरूप है।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य ने न तो स्कूलों में राजस्थानी को एक विषय के रूप में शामिल किया है और न ही इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में उपयोग करने की सुविधा के लिये पर्याप्त उपाय किये हैं, जिससे बच्चे एक सुबोध भाषा में शिक्षा तक सार्थक पहुँच से वंचित रह गए हैं।
- राज्य की निष्क्रियता की जांच करने पर उच्चतम न्यायालय ने जनादेश को लागू करने में विफलता की आलोचना की और इसके निवारण के लिये निदेश जारी किये।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अनुच्छेद 19(1)(क) और मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार पर: न्यायालय ने माना कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित है। वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रत्याभूति में सार्थक और बोधगम्य रूप में सूचना प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है। इस स्वतंत्रता का वास्तविक मूल्य केवल संवाद करने की क्षमता में नहीं, अपितु सूचना को समझने, आत्मसात करने और संसाधित करने की क्षमता में निहित है जिससे सोच-समझकर निर्णय लिये जा सकें।
- शिक्षा में मातृभाषा की भूमिका पर: न्यायालय ने पाया कि शिक्षा, ज्ञान के प्रसार का प्राथमिक माध्यम होने के नाते, यथासंभव उस भाषा में दी जानी चाहिये जिसे बालक सबसे अच्छी तरह समझता हो। मातृभाषा या पसंद की भाषा में शिक्षा देने से शिक्षार्थी की अवधारणात्मक स्पष्टता मजबूत होती है, गहन संज्ञानात्मक जुड़ाव सुनिश्चित होता है और ज्ञान तक सार्थक पहुँच का सांविधानिक वचन पूरा होता है।
- कर्नाटक राज्य बनाम एसोसिएटेड मैनेजमेंट ऑफ इंग्लिश मीडियम प्राइमरी एंड सेकेंडरी स्कूल्स के मामले में, न्यायालय ने इस पूर्व निर्णय का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया था कि अनुच्छेद 19(1)(क) प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के माध्यम के संबंध में बालक को चुनाव की स्वतंत्रता प्रदान करता है। महत्त्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने दोहराया कि राज्य किसी बालक पर मातृभाषा में शिक्षा थोप नहीं सकता, भले ही यह लाभकारी हो, क्योंकि चुनाव की स्वतंत्रता बालक में निहित है।
- राजस्थान की निष्क्रियता पर: न्यायालय ने पाया कि मातृभाषा आधारित शिक्षा के विवाद्यक पर केंद्र सरकार की नीति स्पष्ट है। न्यायालय ने राजस्थान राज्य की इस बात के लिये आलोचना की कि वह बालक की पसंद की भाषा या कम से कम क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा सुनिश्चित करने के लिये उचित कदम उठाने में विफल रहा है। न्यायालय ने कहा कि इस तरह की निरंतर निष्क्रियता न केवल सांविधिक और नीतिगत निर्देशों को कमजोर करती है, अपितु संविधान के भाग 3 के अधीन प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का भी खतरा उत्पन्न करती है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) क्या है?
बारे में:
- भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 19(1)(क) में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निहित है ।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सार सरकार द्वारा प्रतिशोध, निर्बंधन या दमन के भय के बिना स्वतंत्र रूप से सोचने और बोलने तथा प्रकाशनों और सार्वजनिक चर्चा के माध्यम से दूसरों से जानकारी प्राप्त करने की क्षमता है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क):
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में कहा गया है कि सभी नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा।
- इस अनुच्छेद के पीछे का दर्शन संविधान की उद्देशिका में निहित है, जहाँ सभी नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का दृढ़ संकल्प लिया गया है।
- अनुच्छेद 19(1)(क) में निम्नलिखित पहलू शामिल हैं:
- प्रेस की स्वतंत्रता
- वाणिज्यिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- प्रसारण का अधिकार
- सूचना का अधिकार
- आलोचना करने का अधिकार
- राष्ट्रीय सीमाओं से परे अभिव्यक्ति का अधिकार
- न बोलने का अधिकार या मौन रहने का अधिकार
भारत के संविधान (COI) के अनुच्छेद19(1)(क) के आवश्यक तत्त्व:
- यह अधिकार केवल भारत के नागरिक को ही प्राप्त है, विदेशी नागरिकों को नहीं।
- इसमें किसी भी विषय पर अपने विचारों एवं मतों को किसी भी माध्यम, जैसे— मौखिक अभिव्यक्ति, लेखन, मुद्रण, चित्र, चलचित्र, फिल्म आदि के द्वारा अभिव्यक्त करने का अधिकार समाविष्ट है।
- तथापि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है और यह सरकार को युक्तियुक्त निर्बंधन अधिरोपित करने के लिये विधि बनाने की अनुमति देता है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(2):
- यद्यपि, इस अधिकार का प्रयोग अनुच्छेद 19(2) के अधीन अधिरोपित किये गए कुछ प्रयोजनों के लिये युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है ।
- अनुच्छेद 19 (2) में कहा गया है कि खंड (1) के उपखंड (क) में कोई बात किसी भी मौजूदा कानून के संचालन को प्रभावित नहीं करेगी, या राज्य को कोई विधि बनाने से नहीं रोकेगी, जहाँ तक ऐसी विधि भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता के हित में या न्यायालय की अवमानना, मानहानि या अपराध के लिये उकसाने के संबंध में उक्त उपखंड द्वारा प्रदत्त अधिकार के प्रयोग पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाता है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(क) का महत्त्व:
- सामाजिक हित : बिना किसी बाधा के, और विशेष रूप से दण्ड के भय के बिना, विचारों और राय को व्यक्त करने की स्वतंत्रता किसी विशेष समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- आत्म-विकास : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति के आत्म-विकास और आत्म-पूर्ति के अधिकार का अभिन्न अंग है। निर्बंधन हमारे व्यक्तित्व और उसके विकास में बाधा डालते हैं।
- लोकतांत्रिक मूल्य : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक सरकार का आधार स्तंभ है। यह स्वतंत्रता लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सुचारू संचालन के लिये आवश्यक है क्योंकि यह लोगों को सरकार की आलोचना करने की अनुमति देती है। लोकतंत्र में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विवाद्यकों पर स्वतंत्र चर्चा के मार्ग खोलती है।
- बहुलतावाद सुनिश्चित करें : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहुलतावाद को प्रतिबिंबित और मजबूत करती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि विविधता को मान्यता दी जाए और एक विशेष जीवनशैली का पालन करने वालों के आत्मसम्मान को बढ़ावा मिले।