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आपराधिक कानून

अनुच्छेद 311 के अधीन प्रतिबंध समान पदक्रम वाले प्राधिकारी द्वारा पद से हटाए जाने पर लागू नहीं होता

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 25-Sep-2026

भारत संघ और अन्य बनाम रामधनी प्रसाद 

"अनुच्छेद 311(1) में निहित सांविधानिक निषेध केवल वहीं लागू होता है जहाँ बर्खास्तगी या निष्कासन का आदेश उस प्राधिकरण के अधीनस्थ/अधिकारी द्वारा पारित किया जाता है जिसके द्वारा कर्मचारी को नियुक्त किया गया था।" 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने भारत संघ और अन्य बनाम रामधनी प्रसाद (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन केवल तभी होता है जब किसी सिविल सेवक को उसके नियुक्तिकर्ता से अधीनस्थ अधिकारी द्वारा बर्खास्त या हटाया जाता है। जहाँ हटाने वाला अधिकारी नियुक्तिकर्ता के समान पद का हो और नियमों के अनुसार दण्ड अधरोपित के लिये सक्षम हो, वहाँ सांविधानिक प्रतिबंध लागू नहीं होता।  

भारत संघ और अन्य बनाम रामधनी प्रसाद (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी को मई 1979 में गोरखपुर स्थित रेलवे सुरक्षा विशेष बल (RPSF) के कमांडेंट से एक आमंत्रण पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें उन्हें रक्षक पद के लिये प्रारंभिक प्रशिक्षण हेतु उपस्थित होने का निदेश दिया गया था। पत्र में उनकी नियुक्ति को स्पष्ट रूप से प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने पर सशर्त बताया गया था।   
  • प्रशिक्षण के बाद, सहायक कमांडेंट ने दिसंबर 1979 में एक बटालियन आदेश जारी कर उन्हें और अन्य रंगरूटों को रक्षक नियुक्त किया और उन्हें उनकी बटालियनों में तैनात कर दिया। फरवरी 1980 में जारी एक बाद के बटालियन आदेश ने इस नियुक्ति की पुष्टि की।     
  • इसके बाद प्रत्यर्थी ने स्वीकृत अवकाश से 72 दिन अधिक समय तक सेवा में रहने का उल्लंघन किया। उन पर रेलवे सुरक्षा बल नियम, 1959 के नियम 44 के अधीन आरोप पत्र दायर किया गया और एकपक्षीय विभागीय जांच के बाद, सहायक अधिकारी ने उन्हें मार्च 1983 में सेवा से बर्खास्त कर दिया। उनकी विभागीय अपील 1984 में खारिज कर दी गई। 
  • इसके बाद उन्होंने एक सिविल वाद दायर किया, जिसमें दावा किया गया कि उन्हें कमांडेंट/मुख्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा 1979 के कॉल लेटर के माध्यम से नियुक्त किया गया था, और अधीनस्थ अधिकारी एडजुटेंट द्वारा उनकी बर्खास्तगी अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन थी। 
  • विचारण न्यायालय ने वाद खारिज कर दिया। प्रथम अपील न्यायालय ने इस निर्णय को पलट दिया और निष्कासन को असांविधानिक करार दिया, और इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2023 में द्वितीय अपील में उस दृष्टिकोण की पुष्टि की। 
  • भारत सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

वास्तविक नियुक्ति आदेश की पहचान करने पर: 

  • न्यायालय ने नियुक्ति पत्र और बटालियन आदेश के बीच के अंतर को निर्णायक माना। न्यायालय ने कहा कि नियुक्ति पत्र में "यह स्पष्ट रूप से घोषित नहीं किया गया था कि प्रत्यर्थी को नियमित रक्षक के रूप में नियुक्त किया गया है" और इसके बजाय प्रस्तावित नियुक्ति को प्रशिक्षण पूरा करने पर सशर्त बनाया गया था।  
  • इसके विपरीत, बटालियन आदेश में विशेष रूप से यह दर्ज किया गया था कि प्रशिक्षण पूरा करने पर रंगरूटों को रक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। 
  • न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि बटालियन आदेश मात्र एक तैनाती आदेश था। न्यायालय ने कहा कि "एक आदेश नियुक्ति आदेश और तैनाती आदेश दोनों के रूप में वैध रूप से कार्य कर सकता है।" 
  • निष्कर्ष यह निकला कि प्रत्यर्थी को नियमित रक्षक के रूप में सहायक कमांडेंट द्वारा नियुक्त किया गया था, न कि कमांडेंट/मुख्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा। 

नियुक्ति और बर्खास्तगी की सांविधिक योजना पर: 

  • रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम, 1957 की धारा 6 और 9 के साथ-साथ रेलवे सुरक्षा बल नियम, 1959 के नियम 20 और 43 और अनुसूची 1 और 2 की जांच करने के बाद, न्यायालय ने माना कि मुख्य सुरक्षा अधिकारी को नियुक्तियों पर समग्र नियंत्रण प्राप्त है। 
  • यद्यपि, धारा 6 का परंतुक स्पष्ट रूप से अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को नियुक्ति शक्तियां प्रयोग करने की अनुमति देता है। नियमों में सहायक सुरक्षा अधिकारी को रक्षकों और वरिष्ठ रक्षकों की नियुक्ति और बर्खास्तगी दोनों का अधिकार भी स्पष्ट रूप से दिया गया है। 

भारत संघ बनाम चंद्र पाल पांडे मामले पर निर्भरता: 

  • न्यायालय ने इस निर्णय पर विश्वास किया, जिसमें यह माना गया कि धारा 6 में "shall rest" वाक्यांश केवल समग्र नियंत्रण को दर्शाता है। यह नियुक्ति की शक्ति को विशेष रूप से मुख्य सुरक्षा अधिकारी में निहित नहीं करता है। 

कृष्णा कुमार बनाम डिविजनल असिस्टेंट इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के मामले पर निर्भरता: 

  • इस सिद्धांत को लागू करते हुए कि नियुक्ति शक्ति का प्रत्यायोजन करने से प्रत्यायोजित व्यक्ति के पदानुक्रमिक पद में परिवर्तन नहीं होता है, न्यायालय ने माना कि सहायक कमांडेंट, जिसने प्रत्यर्थी को नियुक्त किया था, पद में एडजुटेंट के अधीन नहीं था। 
  • अनुसूची II के अधीन एडजुटेंट को निष्कासन की दण्ड देने का भी अधिकार था। अतः अनुच्छेद 311(1) का आवश्यक तत्त्व अनुपस्थित था, और सांविधानिक प्रतिबंध कभी लागू नहीं हुआ। 

प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर: 

  • न्यायालय ने इस दावे को खारिज कर दिया कि एकपक्षीय जांच त्रुटिपूर्ण थी। प्रत्यर्थी ने आरोप पत्र स्वीकार कर लिया था, उसका जवाब दे दिया था और उसे जांच की तारीख की सूचना भी दे दी गई थी, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ। निष्कासन आदेश पारित होने से पहले कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था। 
  • न्यायालय ने कहा कि "विभागीय जांच को केवल इस आधार पर दूषित नहीं माना जा सकता कि यह एकपक्षीय रूप से आगे बढ़ी।" 

निष्कर्ष: 

  • न्यायालय ने माना कि प्रथम अपील न्यायालय और उच्च न्यायालय ने 1979 के आमंत्रण पत्र को नियुक्ति आदेश मानकर गलती की थी। न्यायालय ने दोनों निर्णयों को अपास्त कर दिया, वाद को खारिज करने वाले विचारण न्यायालय के निर्णय को बहाल किया और प्रत्यर्थी को सेवा से हटाने के आदेश को बरकरार रखा। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 311 क्या है? 

बारे में: 

  • भारत के संविधान, 1950 का अनुच्छेद 311 संघ या राज्य के अधीन नागरिक पदों पर कार्यरत व्यक्तियों की बर्खास्तगी, निष्कासन या पद में कमी से संबंधित है। 
  • यह संविधान के भाग 14 (संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं) के अंतर्गत आता है। 
  • यह सिविल सेवकों को मनमानी बर्खास्तगी, पद से हटाने या पदोन्नति में कमी के विरुद्ध सांविधानिक सुरक्षा प्रदान करता है, और अनुच्छेद 310 के अधीन प्रसादपर्यंत के सिद्धांत' पर एक सीमा के रूप में कार्य करता है। 

उपबंध: 

अनुच्छेद 311 में कहा गया है: 

खंड (1): 

  • "किसी व्यक्ति को जो संघ की सिविल सेवा का या अखिल भारतीय सेवा का या राज्य की सिविल सेवा का सदस्य है अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई सिविल पद धारण करता है, उसकी नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी द्वारा पदच्युत नहीं किया जाएँगा या पद से नहीं हटाया जाएगा।" 

खंड (2): 

  • "यथापूर्वोक्त किसी व्यक्ति को, ऐसी जांच के पश्चात् ही, जिसमें उसे अपने विरुद्ध आरोपों की सूचना दे दी गई है गई है और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया है, पदच्युत किया जाएगा या पद से हटाया जाएगा या पंक्ति में अवनत किया जाएगा, अन्यथा नहीं।" 
  • परंतु जहाँ ऐसी जांच के पश्चात् उस पर ऐसी कोई शास्ति अधिरोपित करने की प्रस्थापना है वहाँ ऐसी शास्ति ऐसी जांच के दौरान दिये गए साक्ष्य के आधार पर अधिरोपित की जा सकेगी और ऐसे व्यक्ति को प्रस्थापित शास्ति के विषय में अभ्यावेदन करने का अवसर देना आवश्यक नहीं होगा। 

परंतु यह और कि यह खंड वहाँ लागू नहीं होगा—  

(क) जहाँ किसी व्यक्ति को ऐसे आचरण के आधार पर पदच्युत किया जाता है या पद से हटाया जाता है या पंक्ति में अवनत किया जाता है जिसके लिये आपराधिक आरोप पर उसे सिद्धदोष ठहराया गया है; या 

(ख) जहाँ किसी व्यक्ति को पदच्युत करने या पद से हटाने या पंक्ति में अवनत करने के लिये सशक्त प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि किसी कारण से, जो उस प्राधिकारी द्वारा लेखबद्ध किया जाएगा, यह युक्तियुक्त रूप से साध्य नहीं है कि ऐसी जांच की जाए; या 

(ग) जहाँ, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल का यह समाधान हो जाता है कि राज्य की सुरक्षा के हित में यह समीचीन नहीं है कि ऐसी जांच की जाए।" 

खंड (3): 

  • "यदि, यथापूर्वोक्त किसी व्यक्ति के संबंध में यह प्रश्न उठता है कि खंड (2) में निर्दिष्ट जांच करना युक्तियुक्त रूप से साध्य है या नहीं तो उस व्यक्ति को पदच्युत करने या पद से हटानें या पैंक्ति में अवनत करने के लिये सशक्त प्राधिकारी का उस पैर विनिश्चय अंतिम होगा।" 

अनुच्छेद 311 के अंतर्गत आने वाले व्यक्ति: 

यह संरक्षण निम्नलिखित पर लागू होता है: 

  • संघ की सिविल सेवा के सदस्य; 
  • अखिल भारतीय सेवा के सदस्य; 
  • किसी राज्य की सिविल सेवा के सदस्य; और 
  • संघ या राज्य के अधीन सिविल पद धारण करने वाले व्यक्ति। 

अनुच्छेद 311 के अंतर्गत सुरक्षा उपाय: 

अधीनस्थ प्राधिकारी द्वारा निष्कासन से सुरक्षा (खंड 1): 

  • किसी सरकारी कर्मचारी को उसके नियुक्तिकर्ता से अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा बर्खास्त या पद से हटाया नहीं जा सकता। 
  • यह सुरक्षा उपाय केवल बर्खास्तगी और पद से हटाने पर लागू होता है। यह पद में कमी पर लागू नहीं होता। 

जांच का अधिकार (धारा 2): 

  • किसी भी सरकारी कर्मचारी को बिना जांच के बर्खास्त, पद से हटाया या पदावनत नहीं किया जा सकता। 
  • उस जांच में, उसे अपने विरुद्ध लगे आरोपों की जानकारी दी जानी चाहिये और उन आरोपों पर अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिये। 

दंड के संबंध में पृथक सुनवाई नहीं (खंड 2 का प्रथम परंतुक): 

  • जांच पूरी हो जाने के बाद, जांच के दौरान प्रस्तुत किये गए साक्ष्य के आधार पर दंड अधिरोपित किया जा सकता है। 
  • कर्मचारी को प्रस्तावित दंड के संबंध में अभ्यावेदन करने का कोई अतिरिक्त अवसर दिया जाना आवश्यक नहीं है। 

जांच की आवश्यकता के अपवाद (धारा 2 का दूसरा परंतुक): 

खंड (2) के अंतर्गत जांच निम्नलिखित तीन स्थितियों में आवश्यक नहीं है: 

  • आपराधिक आरोप में दोषसिद्धि: जहाँ दंड उस आचरण के आधार पर अधिरोपित किया जाता है, जिसके कारण संबंधित व्यक्ति को किसी आपराधिक आरोप में दोषसिद्ध किया गया है। 
  • जांच कराना युक्तियुक्त रूप से साध्य न होना: जहाँ अनुशासनिक प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट है कि जांच कराना युक्तियुक्त रूप से साध्य नहीं है तथा इसके कारणों को लिखित रूप में अभिलिखित करता है। 
  • राज्य की सुरक्षा: जहाँ राष्ट्रपति या राज्यपाल इस बात से संतुष्ट हैं कि जांच कराना राज्य की सुरक्षा के हित में समीचीन नहीं है। 

निर्णय की अंतिमता (खंड 3): 

  • जहाँ यह प्रश्न उठता है कि जांच कराना युक्तियुक्त रूप से साध्य है अथवा नहीं, वहाँ उस प्राधिकारी का निर्णय अंतिम होगा, जिसे संबंधित व्यक्ति को पदच्युत, सेवा से हटाने या पदावनत करने की शक्ति प्राप्त है।