- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
होम / करेंट अफेयर्स
सिविल कानून
वाणिज्यिक फसल की खेती वन अधिकार नहीं है
«07-Nov-2026
|
ए. जॉन कैनेडी बनाम तमिलनाडु राज्य " वाणिज्यिक फसल की नियोजित खेती की अवधारणा, प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाली लघु वनोपज की अवधारणा के पूर्णतः विपरीत है।" न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
स्रोत: उच्चतम न्यायायल
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने ए. जॉन कैनेडी एवं अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि सिल्क कॉटन जैसी वाणिज्यिक फसल की खेती को ऐसे वन अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती जो किसी वन क्षेत्र में कब्जा करने या निवास करने को न्यायोचित ठहराए।
- न्यायालय ने तमिलनाडु के मेगामलाई क्षेत्र में वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अधीन दाखिल दावों का पर्यवेक्षण और संवीक्षा करने के लिये भारत के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की अध्यक्षता में एक विशेष समिति भी नियुक्त की।
ए. जॉन कैनेडी बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह वाद तमिलनाडु के मेगामलाई वन क्षेत्र में अतिक्रमणों से संबंधित था। यह क्षेत्र श्रीविल्लिपुथुर-मेगामलाई बाघ अभयारण्य और अगस्त्यमलाई भू-परिदृश्य का भाग है।
- राज्य सरकार के शपथ-पत्र के अनुसार 4,594 व्यक्ति 5,072.64 हेक्टेयर वन भूमि पर काबिज थे। इसमें से 3,637.83 हेक्टेयर पर सिल्क कॉटन की खेती की जा रही है।
- राज्य ने कब्जाधारियों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया:
- श्रेणी I: 1,595 व्यक्ति जो वन क्षेत्र में स्थायी रूप से निवास करते हैं और वहाँ भूमि पर खेती करते ।
- श्रेणी II: 232 व्यक्ति जो वन क्षेत्र में भूमि पर खेती करते हैं और वहाँ केवल अस्थायी रूप से निवास करते हैं।
- श्रेणी III: 2,767 व्यक्ति जो वन सीमा के बाहर निवास करते हैं किंतु उसके भीतर भूमि पर खेती करते हैं।
- राज्य ने तर्क दिया कि सिल्क कॉटन की खेती को वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत परंपरागत लघु वनोपज के रूप में न्यायोचित ठहराया जा सकता है। उसने कहा कि:
- सरकारी प्राधिकारियों ने ऐतिहासिक रूप से सिल्क कॉटन की खेती को प्रोत्साहित किया था, और
- जब खेती आरंभ हुई, तब ये क्षेत्र अपने वर्तमान अधिसूचित स्वरूप में आरक्षित वन नहीं थे।
- राज्य ने न्यायालय को यह भी बताया कि लगभग 40 ग्राम सभाओं का गठन किया जा चुका है और लगभग 1,600 दावे प्राप्त हुए हैं।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
- क्या सिल्क कॉटन जैसी वाणिज्यिक फसल की खेती को वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अधीन वन अधिकार के रूप में मान्यता दी जा सकती है?
- क्या वे व्यक्ति जो वन में केवल अस्थायी रूप से निवास करते हैं, या जो वन सीमा के बाहर निवास करते हैं, केवल वन भूमि पर खेती करने के कारण वनवासी के रूप में अर्हता प्राप्त कर सकते हैं?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
लघु वनोपज के रूप में सिल्क कॉटन के संबंध में:
- न्यायालय ने राज्य के तर्क को अस्वीकार कर दिया। उसके समक्ष उपलब्ध सामग्री से यह सिद्ध नहीं हुआ कि सिल्क कॉटन को, एक कृषित वाणिज्यिक फसल के रूप में, वन अधिकार अधिनियम या किसी अन्य वन विधि के अधीन लघु वनोपज के रूप में मान्यता दी गई थी।
- न्यायालय ने उल्लेख किया कि अधिनियम की धारा 3(1)(ग) ग्राम की सीमाओं के भीतर या बाहर परंपरागत रूप से एकत्र की जाने वाली लघु वनोपज को एकत्र करने, उपयोग करने और उसका व्ययन करने के अधिकार को मान्यता देती है।
- उसने वनोपज के परंपरागत संग्रहण और नियोजित वाणिज्यिक खेती के बीच भेद किया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि वाणिज्यिक फसल की नियोजित खेती, प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाली लघु वनोपज की अवधारणा के विपरीत है।
- न्यायालय ने कहा कि वन क्षेत्रों में वाणिज्यिक फसलों को उगाने की अनुमति देने से वन का मूल स्वरूप ही परिवर्तित हो जाएगा।
- उसने अभिनिर्धारित किया कि वाणिज्यिक फसल की खेती को ऐसे वन अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती जो किसी वन क्षेत्र में कब्जा करने या निवास करने को न्यायोचित ठहराए।
- न्यायालय ने कहा कि राज्य का यह दावा कि बड़े वाणिज्यिक उद्यम सिल्क कॉटन की खेती को वित्तपोषित या निर्देशित नहीं कर रहे हैं, गहन परीक्षण की अपेक्षा रखता है।
वन अधिकार अधिनियम के तहत पात्रता पर:
- न्यायालय ने पुनः दोहराया कि वनवासी अनुसूचित जनजातियों (FDST) और अन्य परंपरागत वन निवासियों (OTFD) को अधिनियम में उल्लिखित शर्तों को पूरा करना होगा। इनमें वन में प्राथमिक निवास और अपनी आजीविका के लिये वन भूमि पर निर्भरता सम्मिलित है।
- अन्य परंपरागत वन निवासियों को यह भी सिद्ध करना होगा कि उन्होंने 13 दिसंबर 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढ़ियों, अर्थात् 75 वर्षों, तक भूमि पर कब्जा रखा था।
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि श्रेणी II के व्यक्ति (जो वन में केवल अस्थायी रूप से निवास करते हैं) और श्रेणी III के व्यक्ति (जो वन सीमा के बाहर निवास करते हैं) केवल खेती के आधार पर FDST या OTFD के रूप में अर्हता प्राप्त नहीं कर सकते।
- उसने निर्देश दिया कि दोनों श्रेणियों को वन अधिकार अधिनियम के अधीन विचार से अपवर्जित किया जाए।
सांविधिक प्रक्रिया में विलंब के संबंध में:
- न्यायालय ने वन अधिकार अधिनियम के अधीन सांविधिक प्रक्रिया को पूर्ण करने में राज्य द्वारा किये गए विलंब पर चिंता व्यक्त की।
निर्देश:
- भारत के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की अध्यक्षता में एक विशेष समिति गठित की गई, जिसकी सहायता केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) का एक अधिकारी और तमिलनाडु के प्रधान मुख्य वन संरक्षक करेंगे। यह समिति अधिनियम के अधीन दावों का पर्यवेक्षण और संवीक्षा करेगी।
- शेष ग्राम सभाओं का गठन 30 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए, और दावों की प्रक्रिया उनके गठन के पाँच माह के भीतर पूर्ण की जानी चाहिये।
- विशेष समिति को दावों के विनिश्चय की बाह्य सीमा के पश्चात् दो माह के भीतर अपनी संवीक्षा पूर्ण करनी होगी, और अपनी रिपोर्ट मुहरबंद लिफाफे में न्यायालय को प्रस्तुत करनी होगी।
- राज्य को मासिक प्रगति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
- केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति से यह परीक्षण करने और अपना मत देने को कहा गया कि क्या सिल्क कॉटन को अधिनियम के अधीन लघु वनोपज के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
- मामला अंतरिम स्थिति रिपोर्ट के लिए 1 फरवरी 2027 को सूचीबद्ध है।
वन अधिकार अधिनियम, 2006 क्या है?
बारे में:
- इसका पूरा नाम अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 है।
- यह वनवासी अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को वन अधिकारों को मान्यता देता है और उनमें निहित करता है, जो पीढ़ियों से वनों में निवास करते आए हैं किंतु जिनके अधिकार कभी अभिलिखित नहीं किये गए।
- इसका उद्देश्य वनवासी समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय का निवारण करना है, साथ ही उन्हें सतत उपयोग, जैव विविधता के संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण के प्रति उत्तरदायी बनाना है।
मुख्य परिभाषाएँ:
- धारा 2(ग) – वनवासी अनुसूचित जनजातियाँ: अनुसूचित जनजातियों के ऐसे सदस्य या समुदाय जो मुख्यतः वनों या वन भूमियों में निवास करते हैं और अपनी वास्तविक आजीविका की आवश्यकताओं के लिये उन पर निर्भर हैं। इस पद में अनुसूचित जनजाति के पशुचारक समुदाय सम्मिलित हैं।
- धारा 2(झ) – लघु वनोपज: पादप मूल की समस्त काष्ठेतर वनोपज, जिनमें बाँस, झाड़-झंखाड़, ठूँठ, बेंत, तसर, कोया, शहद, मोम, लाख, तेंदू या केंदू पत्ते, औषधीय पादप और जड़ी-बूटियाँ, जड़ें और कंद सम्मिलित हैं।
- धारा 2(थ) – अन्य परंपरागत वन निवासी: कोई ऐसा सदस्य या समुदाय जो 13 दिसंबर 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढ़ियों से मुख्यतः वन या वन भूमि में निवास करता रहा है और अपनी वास्तविक आजीविका की आवश्यकताओं के लिए उस पर निर्भर रहा है। स्पष्टीकरण के अधीन, एक पीढ़ी का अर्थ 25 वर्ष की अवधि है।
मुख्य उपबंध:
- धारा 3(1)(क): वन भूमि को व्यष्टिक या सामूहिक कब्जे के अधीन, निवास के लिये या आजीविका हेतु स्वयं खेती के लिये धारण करने और उसमें निवास करने का अधिकार।
- धारा 3(1)(ग): ग्राम की सीमाओं के भीतर या बाहर परंपरागत रूप से एकत्र की जाने वाली लघु वनोपज का स्वामित्व, उसे एकत्र करने, उपयोग करने और उसका व्ययन करने की पहुँच का अधिकार।
- धारा 4(3): वन अधिकार केवल वहीं मान्य और निहित किये जाते हैं जहाँ वन भूमि पर 13 दिसंबर 2005 से पूर्व कब्जा रहा हो।
- धारा 4(6): धारा 3(1)(क) के अधीन भूमि पर अधिकार वास्तव में कब्जे वाले क्षेत्र तक, अधिकतम चार हेक्टेयर तक, सीमित हैं।
- धारा 6 – प्राधिकरण और प्रक्रिया:
- ग्राम सभा व्यष्टिक या सामुदायिक वन अधिकारों की प्रकृति और विस्तार का अवधारण करने की प्रक्रिया आरंभ करती है।
- उपखंड स्तरीय समिति ग्राम सभा के संकल्प का परीक्षण करती है और वन अधिकारों का अभिलेख तैयार करती है।
- जिला स्तरीय समिति वन अधिकारों के अभिलेख को अंतिम अनुमोदन प्रदान करती है।