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सांविधानिक विधि
अन्य पिछड़ा वर्ग की क्रीमी लेयर संबंधी निर्णय से पूर्ववर्ती आवंटनों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा
«07-Nov-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
11 मार्च, 2026 को उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 1993 के उस कार्यालय ज्ञापन (OM) को बरकरार रखा, जिसके अंतर्गत अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की गैर-क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिये प्रयुक्त आय/संपत्ति परीक्षण (Income/Wealth Test) में माता-पिता के वेतन तथा कृषि आय को अपवर्जित किया गया था। इसके पश्चात्, केंद्र सरकार ने कई आवेदन प्रस्तुत करते हुए यह चेतावनी दी कि निर्णय को भूतलक्षी प्रभाव से लागू करने पर पूर्ण हो चुकी चयन प्रक्रियाएँ प्रभावित होंगी। उच्चतम न्यायालय ने अब स्पष्ट किया है कि उक्त निर्णय केवल उसके समक्ष उपस्थित पक्षकारों के अधिकारों का निर्धारण करता है। यह पूर्ववर्ती चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों अथवा सेवा आवंटनों को पुनः खोलने का आधार नहीं बनता है।
क्रीमी लेयर की अवधारणा क्या है?
- उच्चतम न्यायालय ने इंद्रा साहनी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (1992) के मामले में क्रीमी लेयर की अवधारणा प्रतिपादित की। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) के सामाजिक रूप से उन्नत सदस्यों को आरक्षण के लाभों से अपवर्जित किया जाना चाहिये।
- इस निर्णय को कार्यान्वित करने के लिये कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने 8 सितंबर, 1993 को एक कार्यालय ज्ञापन (OM) जारी किया। उक्त ज्ञापन में अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत क्रीमी लेयर की पहचान करने के मानदंड निर्धारित किये गए है।
- इन मानदंडों में से एक आय/संपत्ति परीक्षण (Income/Wealth Test) है। वर्ष 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अंतर्गत, इस परीक्षण को लागू करते समय वेतन से प्राप्त आय तथा कृषि भूमि से प्राप्त आय की गणना नहीं की जाती है।
- क्रीमी लेयर के लिये आय की अधिकतम सीमा में कई बार संशोधन किया गया है। वर्तमान में यह सीमा ₹8 लाख प्रतिवर्ष है।
- अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का संवैधानिक आधार निम्नलिखित उपबंधों में निहित है:
- अनुच्छेद 15(4): सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिये विशेष उपबंध, और
- अनुच्छेद 16(4): राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न रखने वाले पिछड़े वर्गों के लिये नियुक्तियों अथवा पदों में आरक्षण।
11 मार्च, 2026 का निर्णय क्या था?
- उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 1993 के कार्यालय ज्ञापन को बरकरार रखा, जिसके अंतर्गत अन्य पिछड़ा वर्ग की गैर-क्रीमी लेयर स्थिति (Non-Creamy Layer Status) निर्धारित करने के लिये आय/संपत्ति परीक्षण में माता-पिता के वेतन तथा कृषि आय को अपवर्जित किया गया था।
- सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2025 का परिणाम इस निर्णय से पाँच दिन पूर्व, अर्थात् 6 मार्च, 2026 को घोषित किया गया था।
केंद्र सरकार ने स्पष्टीकरण क्यों मांगा?
- आवेदनों की एक शृंखला में, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से प्रस्तुत केंद्र सरकार ने यह आशंका व्यक्त की कि निर्णय को भूतलक्षी प्रभाव से लागू करने पर निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैं:
- पूर्ण हो चुकी चयन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, और
- पहले ही चयनित अभ्यर्थियों के हित प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
- सरकार ने तर्क दिया कि इस निर्णय का संभावित प्रभाव पिछले 10 वर्षों के दौरान विभिन्न सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थानों में भरी गई 6.69 लाख से अधिक आरक्षित रिक्तियों पर पड़ सकता है, जिनमें अन्य पिछड़ा वर्ग की 3.7 लाख रिक्तियाँ सम्मिलित हैं।
- सरकार ने इसके अतिरिक्त निम्नलिखित पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की ओर भी संकेत किया:
- वरिष्ठता,
- वेतन,
- पदोन्नति की संभावनाएँ, और
- सिविल सेवा परीक्षा-2025 के अभ्यर्थियों का आधारभूत पाठ्यक्रम ।
- सॉलिसिटर जनरल ने सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2025 का उदाहरण प्रस्तुत किया, क्योंकि उसका परिणाम उक्त निर्णय से ठीक पहले घोषित किया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने क्या स्पष्टीकरण दिया?
- न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने अभिनिर्धारित किया कि केंद्र सरकार की यह धारणा गलत थी कि उक्त निर्णय का भर्ती, सेवा एवं संवर्ग आवंटन (Cadre Allocation), वरिष्ठता तथा उच्चतर शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।
- न्यायालय ने कहा कि उक्त निर्णय की व्याख्या इस प्रकार नहीं की जा सकती कि वह पूर्ववर्ती भर्ती वर्षों में किये गए सेवा आवंटन अथवा वरिष्ठता की सामान्य समीक्षा करने का निर्देश देता है।
- उक्त निर्णय उन व्यक्तियों को व्यक्तिगत अनुतोष भी प्रदान नहीं करता, जो मूल कार्यवाहियों में पक्षकार नहीं थे।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया है, जिसके द्वारा गैर-पक्षकारों के अधिकारों को प्रभावित करते हुए भूतलक्षी प्रभाव से पूर्ण हो चुकी चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों अथवा सेवा आवंटनों को पुनः खोला जाए।
- न्यायमूर्ति महादेवन ने स्पष्ट किया कि 11 मार्च के निर्णय में केवल उन अभ्यर्थियों के अधिकारों का विनिश्चय किया गया था, जिन्होंने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
सिविल सेवा परीक्षा 2025 के संबंध में:
- सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2025 का परिणाम 6 मार्च को घोषित किया गया था, किंतु सफल अभ्यर्थियों को अभी तक सेवाओं का आवंटन नहीं किया गया था।
- चूँकि सेवा आवंटन की प्रक्रिया अभी लंबित थी, इसलिये न्यायालय ने 11 मार्च के निर्णय के कार्यान्वयन को स्थगित करने का कोई युक्तियुक्त औचित्य नहीं पाया।
- अतः उक्त निर्णय में की गई व्याख्या के अनुसार क्रीमी लेयर का सिद्धांत, सिविल सेवा परीक्षा 2025 के माध्यम से चयनित अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अभ्यर्थियों को सेवाओं के आवंटन को नियंत्रित करेगा।
केंद्र की नीति-निर्माण संबंधी शक्ति के संबंध में:
- न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार संविधान के अनुरूप आरक्षण तथा क्रीमी लेयर के संबंध में नीति बनाने के लिये स्वतंत्र है।
निष्कर्ष
यह स्पष्टीकरण 11 मार्च के निर्णय और पूर्ण हो चुके चयनों तथा नियुक्तियों के संरक्षण की आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित करता है। निर्णय को उसके समक्ष उपस्थित पक्षकारों तक सीमित करके, न्यायालय ने पिछले दशक में भरी गई लाखों आरक्षित रिक्तियों, तथा उनसे संलग्न वरिष्ठता और सेवा-अधिकारों को अस्थिर करने से परिवर्जित किया। निर्णय को CSE 2025 के आबंटन पर लागू करके, जो अभी लंबित है, उसने सुनिश्चित किया कि निर्णय वहाँ प्रभावी हो जहाँ प्रक्रिया अभी खुली है। यह आदेश इस सुस्थापित सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है कि न्यायिक विनिश्चयों से उन व्यक्तियों के समाप्त हो चुके अधिकार अस्थिर नहीं होने चाहिये जो न्यायालय के समक्ष नहीं थे, जबकि केंद्र को सांविधानिक सीमाओं के भीतर क्रीमी लेयर नीति निर्मित करने के लिये स्वतंत्र छोड़ा गया है।