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सिविल कानून
पंजीकरण से पूर्व नामंजूर किए गए वादपत्रों को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 4 नियम 2 के अधीन अभिलिखित किया जाना चाहिये
« »06-Nov-2026
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पझानिवेल बनाम एस. तिलागवती “विचारण के पश्चात् वाद खारिज होने की संभावना, न्यायालय को विचारण से पूर्व वादपत्र नामंजूर करने का आधार प्रदान नहीं करती है।” न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरका |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने जी. पझानिवेल बनाम एस. तिलागवती (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने विचारण न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के समवर्ती आदेशों को अपास्त कर दिया, जिनके द्वारा वादी के वाद को पूर्व-पंजीकरण अवस्था में ही नामंजूर कर दिया गया था तथा वाद को उसकी मूल पत्रावली पर पुनः बहाल कर दिया ।
- न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि जब भी कोई विचारण न्यायालय वाद को पंजीकृत किये जाने से पूर्व सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन वादपत्र नामंजूर करे, तो ऐसी नामंजूरी को संहिता के आदेश 4 नियम 2 के अधीन संधारित रजिस्टर में अभिलिखित किया जाना अनिवार्य होगा।
जी. पझानिवेल बनाम एस. तिलागवती (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- विवाद पक्षकारों के बीच हुए एक ऋण संव्यवहार से उत्पन्न हुआ था।
- वादी प्रतिवादी के पति का ऋणी था। ऋण को प्रतिभूत करने के लिए वादी ने प्रतिवादी के पक्ष में एक विक्रय-विलेख निष्पादित किया (यहाँ प्रतिवादी प्रत्यर्थी है)।
- वादी का वाद यह था कि वह दस्तावेज़ वास्तव में विक्रय-विलेख के रूप में अभिव्यक्त एक बंधक था।
- जब वादी ऋण चुकाने में समर्थ हो गया, तब प्रतिवादी ने बंधक के मोचन से बचाव किया और संपत्ति उसे पुनः अंतरित नहीं की।
- तत्पश्चात् वादी ने निम्नलिखित अनुतोष की मांग करते हुए सिविल वाद दायर किया:
- संपत्ति पर स्वामित्व की घोषणा, और
- प्रतिवादी को संपत्ति पर उसके शांतिपूर्ण कब्जे में विघ्न डालने से प्रतिबंधित करने वाली स्थायी व्यादेश।
- विचारण न्यायालय ने वादपत्र को पंजीकरण-पूर्व चरण में ही संक्षेपतः नामंजूर कर दिया। उसने कहा कि वादी के पक्ष में पुनः विक्रय का कोई उपबंध नहीं है, और आदेश 7 नियम 11 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने का कोई कारण नहीं दिया।
- वादी ने उच्च न्यायालय में अपील की, जिसने विचारण न्यायालय के आदेश को बनाए रखा।
- तत्पश्चात् वादी ने उच्चतम न्यायालय में अपील की।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
- क्या विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय का आदेश 7 नियम 11 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वादपत्र को नामंजूर करना उचित था, जबकि वादपत्र में वाद-कारण प्रकट होता था?
- रजिस्ट्रीकरण से पूर्व नामंजूर किये गए वादपत्रों को किस प्रकार अभिलिखित किया जाना चाहिये?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
पूर्व-पंजीकरण अवस्था में वादपत्र की नामंजूरी के संबंध में:
- न्यायालय ने पुनः दोहराया कि आदेश 7 नियम 11 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वादपत्र को उसके रजिस्ट्रीकृत किये जाने से पूर्व भी नामंजूर किया जा सकता है।
- तथापि, ऐसी अस्वीकृति को समुचित रूप से अभिलिखित किया जाना आवश्यक है।
रजिस्ट्रीकरण से पूर्व नामंजूर वादपत्रों का अभिलेख रखने के संबंध में:
- न्यायालय ने निर्देश दिया कि जब कभी कोई विचारण न्यायालय किसी वादपत्र को रजिस्ट्रीकृत करने से पूर्व आदेश 7 नियम 11 के अधीन नामंजूर करे, तो यह तथ्य संहिता के आदेश 4 नियम 2 के अधीन इस प्रयोजन के लिये रखे गए रजिस्टर में अभिलिखित किया जाना चाहिये।
- न्यायालय ने इसका कारण स्पष्ट किया। यदि वादपत्र को नामंजूर करने वाले आदेश को अपील में चुनौती दी जाती है और विचारण न्यायालय का अभिलेख मंगाया जाता है, तो अपंजीकृत या अनंकित वादपत्र का अभिलेख विद्यमान होना चाहिये। ऐसा अभिलेख यह भी दर्शाता है कि वादी ने कार्यवाही पूर्वतर समय पर आरंभ की थी।
- यदि संबंधित सिविल मैनुअल या लागू नियमों में ऐसा कोई उपबंध नहीं है, तो उच्च न्यायालय संहिता की धारा 122 के अधीन अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए समुचित कदम उठा सकते हैं।
- न्यायालय ने निर्देश दिया कि निर्णय की एक प्रति उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरलों तथा राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को परिचालन और अनुवर्ती कार्रवाई हेतु भेजी जाए।
वादपत्र को समग्र रूप से पढ़ने के संबंध में:
- न्यायालय ने पाया कि वादपत्र को समग्र रूप से पढ़ने पर उसमें वाद-हेतुक प्रकट होता था। विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय, दोनों ने इसकी अनदेखी की थी।
- विचारण न्यायालय ने वादपत्र में किए गए विभिन्न प्रार्थनाओं पर ध्यान नहीं दिया। उसने वाद को, भूल से, केवल विक्रय-विलेख के रूप में अभिव्यक्त बंधक-विलेख के मोचन हेतु वाद माना।
- न्यायालय वादपत्र के तात्त्विक अभिकथनों की अनदेखी नहीं कर सकता, और वह वादपत्र को समग्र रूप से पढ़ने से इनकार नहीं कर सकता।
- चूँकि वादपत्र में वाद-कारण प्रकट करने वाले और अनेक अनुतोषों की मांग करने वाले विनिर्दिष्ट अभिवचन थे, अतः उसे संक्षेपतः अस्वीकृत नहीं किया जा सकता था।
वाद के विफल होने की संभावना के संबंध में:
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि आदेश 7 नियम 11 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने का विनिश्चय करते समय यह विचार प्रासंगिक नहीं है कि वादी के अंततः सफल होने की संभावना है या नहीं।
- यह धारणा कि वाद विचारण के पश्चात् खारिज हो जाएगा, वादपत्र को नामंजूर करने का आधार नहीं हो सकती, विशेषकर तब जब कोई वाद-हेतुक प्रकट होता हो।
- यदि वादपत्र में वाद-कारण प्रकट होता है, और वादपत्र के कथनों से यह प्रतीत नहीं होता कि वाद किसी विधि द्वारा वर्जित है, तो वाद का विचारण होना ही चाहिये।
निर्णय :
- अपील स्वीकार की गई, और विचारण न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के समवर्ती आदेश अपास्त कर दिये गए।
- वाद को उसकी मूल फाइल पर पुनर्स्थापित किया गया, जिससे उसका विधि के अनुसार निर्णय किया जाए।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 7 नियम 11 क्या है?
बारे में:
- सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 7 वादपत्र से संबंधित है। नियम 11 उन आधारों को निर्धारित करता है जिन पर न्यायालय वादपत्र को नामंजूर करेगा।
- आदेश 7 नियम 11: वादपत्र निम्नलिखित दशाओं में नामंजूर किया जाएगा:
- (क) जहाँ वह वाद-हेतुक प्रकट नहीं करता है,
- (ख) जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन कम किया गया है और वादी मूल्यांकन को ठीक करने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर जो न्यायालय ने नियत किया है, ऐसा करने में असफल रहता है,
- (ग) जहाँ दाषाकृत अनुतोष का मूल्यांकन ठीक है किंतु वादपत्र अपर्याप्त स्टाम्प-पत्र पर लिखा गया है और वादी अपेक्षित स्टाम्प पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर, जो न्यायालय ने नियत किया है, ऐसा करने में असफल रहता है,
- (घ) जहाँ वादपत्र में के कथन से यह प्रतीत होता है कि बाद किसी विधि द्वारा वर्जित है,
- (ङ) जहाँ यह दो प्रतियों में फाइल नहीं किया जाता है,
- (च) जहाँ वादी आदेश 7 नियम 9 के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता हैः है।
- परंतुक: मूल्यांकन को सही करने या स्टांप-पत्र प्रदान करने के लिये नियत समय तब तक नहीं बढ़ाया जाएगा जब तक न्यायालय का यह समाधान न हो जाए कि किसी असाधारण कारण ने वादी को अनुपालन करने से रोका था, और समय-विस्तार से इंकार करने पर वादी के प्रति गंभीर अन्याय होगा।
- आदेश 7 नियम 13: इनमें से किसी भी आधार पर वादपत्र की नामंजूरी, स्वयं में, वादी को उसी वाद-हेतुक पर नया वादपत्र प्रस्तुत करने से नहीं रोकती।
- वादपत्र की अस्वीकृति सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2(2) के अंतर्गत डिक्री है, अतः उसके विरुद्ध अपील की जा सकती है।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 4 नियम 2 क्या है?
आदेश 4 – वादों का संस्थित किया जाना:
- आदेश 4 नियम 1: वाद, वादपत्र को दो प्रतियों में न्यायालय या उसके द्वारा नियुक्त अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करके संस्थित किया जाता है। प्रत्येक वादपत्र को आदेश 6 और 7 का अनुपालन करना होगा, और वादपत्र तब तक सम्यक् रूप से संस्थित नहीं माना जाता जब तक वह इन अपेक्षाओं को पूरा न करे।
- आदेश 4 नियम 2 (वादों का रजिस्टर): न्यायालय प्रत्येक वाद के विवरण को इस प्रयोजन के लिये रखी गई एक पुस्तक में प्रविष्ट करेगा, जिसे सिविल वादों का रजिस्टर कहा जाता है। प्रविष्टियाँ प्रत्येक वर्ष उस क्रम में अंकित की जाएंगी जिस क्रम में वादपत्र ग्रहण किये जाते हैं।