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सांविधानिक विधि
नोएडा अनुच्छेद 12 के अधीन ‘राज्य’ है, किंतु सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के अधीन ‘सरकार’ नहीं है
« »06-Nov-2026
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ओमवीर और 3 अन्य बनाम पारुल तोमर और 3 अन्य “यद्यपि NOIDA भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थांतर्गत ‘राज्य’ की परिभाषा में आता है, तथापि वह न तो राज्य सरकार है और न ही केंद्र सरकार।” न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने ओमवीर और 3 अन्य बनाम पारुल तोमर और 3 अन्य (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि वादी को NOIDA के विरुद्ध वाद संस्थित करने से पूर्व सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 80(1) के अंतर्गत सूचना देना आवश्यक नहीं है, क्योंकि NOIDA भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत ‘राज्य’ होने के बावजूद न तो राज्य सरकार है और न ही केंद्र सरकार।
- न्यायालय ने रिट याचिका स्वीकार कर ली, 18 अगस्त 2026 के विचारण न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया तथा वाद को तत्काल पंजीकृत करने का निदेश दिया।
ओमवीर बनाम पारुल तोमर (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- वादी-याचिकाकर्त्ताओं ने तीन प्राइवेट प्रतिवादियों के विरुद्ध घोषणा एवं स्थायी व्यादेश हेतु वाद दायर किया। NOIDA को प्रतिवादी संख्या 4 बनाया गया।
- मुंसरिम (वादपत्र प्रस्तुत किये जाने के समय उसकी जांच करने वाला न्यायालयीन अधिकारी) ने एक अनुपूरक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया कि NOIDA एक ‘राज्य’ (State) है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, वाद संस्थित किये जाने से पूर्व सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80(1) के अधीन नोटिस देना आवश्यक था।
- सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गौतम बुद्ध नगर ने रिपोर्ट पर आपत्तियाँ आमंत्रित कीं।
- वादियों ने तर्क दिया कि NOIDA राज्य का एक अभिकरण (Instrumentality of the State) है और सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80(1) के प्रवर्तन क्षेत्र से बाहर है।
- विचारण न्यायालय ने आपत्तियों को खारिज कर दिया, मुंसारिम की रिपोर्ट स्वीकार कर ली तथा वाद को पंजीकृत करने से इंकार कर दिया।
- वादियों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करके इस आदेश को चुनौती दी।
पक्षकारों के तर्क:
- याचिकाकर्त्ता: NOIDA, उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 के अधीन सृजित एक सांविधिक निकाय है। यह न तो राज्य सरकार है और न ही केंद्र सरकार; अतः इस पर सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 लागू नहीं होती।
- NOIDA: नोटिस देना अनिवार्य था, क्योंकि NOIDA संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत आने वाला राज्य का एक अभिकरण है।
उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
- क्या NOIDA के विरुद्ध वाद संस्थित करने से पूर्व वादी के लिये सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80(1) के अधीन नोटिस देना अनिवार्य है, जबकि NOIDA संविधान के अनुच्छेद 12 के अधीन एक ‘राज्य’ है?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
NOIDA की प्रकृति के संबंध में:
- NOIDA का गठन वर्ष 1976 में गौतम बुद्ध नगर के सुनियोजित विकास के उद्देश्य से विधानमंडल द्वारा किया गया था।
- राज्य सरकार का NOIDA पर केवल पर्यवेक्षी नियंत्रण है।
- इसलिए नोएडा 'सरकार' की परिभाषा को पूरा नहीं करता।
संविधान के अनुच्छेद 12 के अधीन ‘राज्य’ तथा सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के अधीन ‘सरकार’ के बीच अंतर के संबंध में:
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि NOIDA संविधान के अनुच्छेद 12 के अधीन ‘राज्य’ के अर्थ में सम्मिलित है।
- तथापि, अनुच्छेद 12 के अधीन ‘राज्य’ होना किसी निकाय को राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार नहीं बना देता।
- सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80(1) केवल सरकार अथवा किसी लोक अधिकारी के विरुद्ध वादों पर लागू होती है। इसके अधीन नोटिस देने की अनिवार्य अपेक्षा NOIDA पर लागू नहीं की जा सकती।
अवलंबित न्यायिक पूर्वनिर्णयों के संबंध में:
- U.P.S.E.B. बनाम संत कबीर सहकारी कटाई मिल्स लिमिटेड: उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड राज्य सरकार नहीं है, यद्यपि अनुच्छेद 12 के प्रयोजनों के लिये उसे ‘राज्य’ माना जा सकता है।
- न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की समकक्ष पीठ तथा बॉम्बे उच्च न्यायालय के उन निर्णयों पर भी विश्वास किया, जिनमें सांविधिक निगमों के संबंध में समान दृष्टिकोण अपनाया गया था।
- सिटी म्युनिसिपल काउंसिल, भालकी बनाम गुरप्पा: उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि नगर निगम का कोई अधिकारी सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के अंतर्गत सम्मिलित नहीं है ।
विचारण न्यायालय के आदेश के संबंध में:
- वादियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा के अधीन नोटिस दिए बिना वाद संस्थित करके सही किया था।
- विचारण न्यायालय द्वारा मुंसरिम की अनुपूरक रिपोर्ट स्वीकार करना तथा वाद को पंजीकृत करने से इंकार करना त्रुटिपूर्ण था।
- आपत्तियों को अवैध रूप से खारिज किया गया था।
निर्णय:
- रिट याचिका स्वीकार कर ली गई तथा दिनांक 18 अगस्त 2026 के आदेश को अपास्त कर दिया गया।
- विचारण न्यायालय को वाद तत्काल पंजीकृत करने का निर्देश दिया गया।
- विचारण न्यायालय को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से एक माह के भीतर अस्थायी व्यादेश के आवेदन पर निर्णय करने का भी निदेश दिया गया।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 80 क्या है?
बारे में:
- सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के अधीन सरकार अथवा किसी लोक अधिकारी के विरुद्ध वाद संस्थित करने से पूर्व पूर्ववर्ती नोटिस देना अनिवार्य है।
- धारा 80 (1): सरकार के विरुद्ध अथवा किसी लोक अधिकारी द्वारा उसकी पदीय हैसियत में किये गए किसी कार्य के संबंध में उसके विरुद्ध तब तक कोई वाद संस्थित नहीं किया जाएगा, जब तक कि निम्नलिखित प्राधिकारियों को लिखित नोटिस दिये जाने के पश्चात् दो माह की अवधि व्यतीत न हो जाए:
- केंद्र सरकार के मामले में, उस सरकार के सचिव को (रेलवे के विरुद्ध वाद की स्थिति में महाप्रबंधक को),
- राज्य सरकार के मामले में, उस सरकार के सचिव अथवा जिले के कलेक्टर को,
- लोक अधिकारी के मामले में, संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अथवा उसके कार्यालय में।
- नोटिस में वाद-हेतुक, वादी का नाम, विवरण एवं निवास-स्थान तथा मांगे गए अनुतोष का उल्लेख होना चाहिये। वादपत्र में यह कथन भी होना चाहिये कि नोटिस परिदत्त कर दिया गया है अथवा संबंधित प्राधिकारी के कार्यालय में छोड़ दिया गया है।
- धारा 80(2): अत्यावश्यक अथवा तत्काल अनुतोष की मांग करने वाला वाद न्यायालय की अनुमति से नोटिस दिये बिना भी संस्थित किया जा सकता है। तथापि, जब तक सरकार अथवा लोक अधिकारी को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का युक्तियुक्त अवसर प्रदान नहीं कर दिया जाता, तब तक न्यायालय कोई अनुतोष, चाहे वह अंतरिम हो अथवा अन्यथा, प्रदान नहीं करेगा। यदि न्यायालय यह पाता है कि मामले में कोई तात्कालिकता नहीं है, तो वह वादपत्र लौटा देगा, जिससे नोटिस दिये जाने के पश्चात् उसे पुनः प्रस्तुत किया जा सके।
- धारा 80(3): केवल नोटिस में किसी त्रुटि अथवा कमी के आधार पर वाद खारिज नहीं किया जाएगा, यदि:
- नोटिस में वादी के नाम, विवरण एवं निवास-स्थान की पहचान की गई हो,
- नोटिस समुचित प्राधिकारी अथवा अधिकारी को परिदत्त किया गया हो, और
- नोटिस में वाद-हेतुक एवं मांगे गए अनुतोष का सारतः उल्लेख किया गया हो।
- उद्देश्य: नोटिस का उद्देश्य सरकार को अपनी विधिक स्थिति पर पुनर्विचार करने तथा न्यायिक कार्यवाही के बिना दावे का निपटारा करने का अवसर प्रदान करना है।
भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 12 के अधीन 'राज्य' क्या है?
बारे में:
- संविधान का पार्ट III फंडामेंटल राइट्स की गारंटी देता है। इन अधिकारों की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी 'स्टेट' की है, और आर्टिकल 12 इस शब्द को बताता है।
- आर्टिकल 12: जब तक संदर्भ से कुछ और ज़रूरी न हो, 'राज्य' में ये शामिल हैं:
- भारत सरकार और संसद (संघीय कार्यपालिका और विधायिका),
- प्रत्येक राज्य की सरकार और विधानमंडल (राज्य कार्यपालिका और विधानमंडल), और
- भारत के क्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण में सभी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण।
- यह परिभाषा समावेशी है, न कि संपूर्ण अथवा परिसीमित।
भारत सरकार और संसद:
- इसमें संघ की कार्यपालिका एवं संसद सम्मिलित हैं।
- इसमें उनके नियंत्रणाधीन सरकारी विभाग एवं संस्थाएँ भी सम्मिलित हैं, जैसे आयकर विभाग।
- राष्ट्रपति भी अपनी पदीय हैसियत में कार्य करते समय इसके अंतर्गत सम्मिलित होते हैं।
प्रत्येक राज्य की सरकार और विधानमंडल:
- इसमें प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका एवं राज्य विधानमंडल सम्मिलित हैं।
- इसमें संघ राज्यक्षेत्र भी सम्मिलित हैं।
स्थानीय प्राधिकारी:
- साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 3(31) स्थानीय प्राधिकारी को ऐसी नगरपालिका समिति, जिला बोर्ड, पत्तन आयुक्तों का निकाय या अन्य प्राधिकारी के रूप में परिभाषित करती है, जो नगरपालिका या स्थानीय निधि के नियंत्रण या प्रबंधन का विधिक रूप से हकदार है, या जिसे सरकार द्वारा उसका नियंत्रण या प्रबंधन सौंपा गया है।
- उदाहरणों में नगरपालिकाएँ, जिला बोर्ड, पंचायतें और खनन बस्ती बोर्ड सम्मिलित हैं।
- भारत संघ बनाम आर.सी. जैन (1981): उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि कोई निकाय 'स्थानीय प्राधिकारी' है यदि वह:
- पृथक् विधिक अस्तित्व रखता है,
- किसी परिभाषित क्षेत्र में कार्य करता है,
- स्वयं निधि जुटाने की शक्ति रखता है,
- स्वायत्तता (स्वशासन) प्राप्त है, और
- विधि द्वारा उसे वे कृत्य सौंपे गए हैं जो सामान्यतः नगरपालिकाओं को सौंपे जाते हैं।
अन्य प्राधिकरण:
- 'अन्य अथॉरिटीज़' शब्द को कहीं भी डिफाइन नहीं किया गया है, और इसके मतलब पर ज्यूडिशियल राय समय के साथ बदल गई है।
- मद्रास विश्वविद्यालय बनाम शांता बाई (1950): मद्रास उच्च न्यायालय ने ejusdem generis (समान प्रकृति के) के नियम को लागू किया। उसने अभिनिर्धारित किया कि 'अन्य प्राधिकारी' में केवल वे निकाय आते हैं जो सरकारी या संप्रभु कृत्यों का निर्वहन करते हैं, न कि प्राकृतिक या विधिक व्यक्ति, जैसे अनुदान-रहित विश्वविद्यालय।
- उज्जम बाई बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1961): उच्चतम न्यायालय ने इस संकीर्ण दृष्टिकोण को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि ‘अन्य प्राधिकारी’ की व्याख्या करने के लिये Ejusdem Generis का नियम लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि अनुच्छेद 12 में उल्लिखित निकायों में कोई सामान्य वर्ग (Common Genus) विद्यमान नहीं है।
राज्य के अभिकरण अथवा साधन की कसौटी:
- रमना दयाराम शेट्टी बनाम इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (1979): न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने यह निर्धारित करने के लिये पाँच सूत्रीय कसौटी प्रतिपादित की कि कोई निकाय राज्य का अभिकरण अथवा साधन है या नहीं:
- वित्तीय संसाधन : राज्य वित्तपोषण का प्रमुख स्रोत हो, उदाहरणार्थ, सरकार के पास निकाय की संपूर्ण अंश पूँजी (Share Capital) हो।
- राज्य का उस निकाय पर गहन एवं व्यापक हो।
- कार्यात्मक स्वरूप: निकाय के कार्य मूलतः शासकीय प्रकृति के हों अथवा लोक महत्त्व के हों।
- किसी सरकारी विभाग का निगम को हस्तांतरण किया गया हो।
- राज्य द्वारा एकाधिकार की स्थिति (Monopoly Status) प्रदान की गई हो अथवा संरक्षित की गई हो।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह कसौटी केवल उदाहरणात्मक है, निर्णायक नहीं; अतः इसे अत्यधिक सावधानी एवं सतर्कता के साथ लागू किया जाना चाहिये।