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आपराधिक कानून
ट्रांसजेंडर पीड़ित के मामले में लज्जा भंग का आरोप विधितः संधारणीय है
« »07-Nov-2026
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विशाल इंगले बनाम महाराष्ट्र राज्य “हमले और स्त्री की लज्जा भंग करने के अभिकथन तब भी कायम रखे जा सकते हैं जब पीड़ित ऐसा ट्रांसजेंडर व्यक्ति हो जो स्वयं को स्त्री के रूप में पहचानता है।” न्यायमूर्ति मेहरोज़ पठान |
स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मेहरोज़ पठान ने विशाल इंगले बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) वाद में निर्णय दिया और अभियुक्त को उन्मोचित करने से इनकार कर दिया। उस पर विवाह का वचन देकर एक ट्रांसजेंडर स्त्री के साथ लैंगिक हमला करने का आरोप था।
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जब पीड़ित ऐसा ट्रांसजेंडर व्यक्ति हो जो स्वयं को स्त्री के रूप में पहचानता है, तब धारा 75 भारतीय न्याय संहिता के अधीन अपराध प्रथम दृष्टया गठित होता है। न्यायालय ने यह भी अभिनिर्धारित किया कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के दंडात्मक उपबंध तब भी लागू होते हैं जब अपराध किये जाने के समय पीड़ित के पास पहचान का प्रमाणपत्र नहीं था।
विशाल इंगले बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- आवेदक, विशाल इंगले, 24 वर्ष का है और रुईखेड़, तालुका अकोट, जिला अकोला में निवास करता है। उसने भारतीय सेना में अग्निवीर के रूप में सेवा की है।
- परिवादी एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति है जो स्वयं को स्त्री के रूप में पहचानती है। वह अपनी लैंगिक पहचान के अनुरूप हार्मोन की दवाइयाँ ले रही है।
- उसने अभिकथन किया कि आवेदक ने विवाह का वचन देकर 28 अक्टूबर 2025 और 30 अक्टूबर 2025 को उसके साथ लैंगिक हमला किया।
- पुलिस थाना अकोट (ग्रामीण) ने आवेदक के विरुद्ध निम्नलिखित के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 75 (स्त्री की लज्जा भंग करना, जैसा कि कार्यवाही में वर्णित है),
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 296 (अश्लील कृत्य), और
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के संबंधित उपबंध, जिनमें धारा 18(घ) सम्मिलित है।
- परिवादी को कथित घटनाओं के पश्चात्, 12 फरवरी 2026 को, उसका ट्रांसजेंडर पहचान का प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ।
- आवेदक ने दो आधारों पर उन्मोचन के लिए आवेदन किया:
- धारा 75 भारतीय न्याय संहिता लागू नहीं हो सकती, क्योंकि पीड़ित ट्रांसजेंडर व्यक्ति थी, स्त्री नहीं।
- ट्रांसजेंडर अधिनियम की धारा 18(घ) लागू नहीं हो सकती, क्योंकि कथित अपराध के समय पीड़ित के पास अनिवार्य पहचान का प्रमाणपत्र नहीं था।
उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
- क्या स्त्री के विरुद्ध धारा 75 भारतीय न्याय संहिता के अधीन अपराध तब गठित हो सकता है जब पीड़ित ऐसा ट्रांसजेंडर व्यक्ति हो जो स्वयं को स्त्री के रूप में पहचानता है?
- क्या अपराध के समय पहचान के प्रमाणपत्र का अभाव ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के दंडात्मक उपबंधों को लागू होने से रोकता है?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
ट्रांसजेंडर स्त्री के प्रति भारतीय न्याय संहिता की धारा 75 की प्रयोज्यता के संबंध में:
- न्यायालय ने उल्लेख किया कि परिवादी स्वयं को स्त्री के रूप में पहचानती है और उसने कथित रूप से उस पहचान के अनुरूप हार्मोन उपचार करवाया है।
- प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में यह प्रत्यक्ष अभिकथन है कि आवेदक ने परिवादी की लज्जा भंग की।
- इस आधार पर, न्यायालय ने पाया कि धारा 75 भारतीय न्याय संहिता के अधीन अपराध प्रथम दृष्टया गठित होता है।
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि हमले और स्त्री की लज्जा भंग करने के अभिकथन तब भी कायम रखे जा सकते हैं जब पीड़ित ऐसा पारलैंगिक व्यक्ति हो जो स्वयं को स्त्री के रूप में पहचानता हो।
पहचान के प्रमाणपत्र की अपेक्षा के संबंध में:
- न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि पारलैंगिक अधिनियम की धारा 18(घ) इसलिए लागू नहीं होती क्योंकि पीड़ित के पास पहचान का प्रमाणपत्र नहीं था।
- उसने अधिनियम की धारा 2(ट) पर अवलंब लिया। उस उपबंध के अधीन, कोई व्यक्ति पहचान के प्रमाणपत्र के बिना भी स्वयं को ट्रांसजेंडर व्यक्ति के रूप में, जिसमें ट्रांसजेंडर पुरुष या ट्रांसजेंडर स्त्री सम्मिलित है, पहचान सकता हैं।
- न्यायालय ने कहा कि अधिनियम की धारा 5 केवल एक सक्षमकारी तंत्र है। यह किसी व्यक्ति को पहचान के प्रमाणपत्र के लिये जिला मजिस्ट्रेट को आवेदन करने में समर्थ बनाती है।
- प्रमाणपत्र 12 फरवरी 2026 को जारी किया गया था, और कथित हमले 28 और 30 अक्टूबर 2025 को हुए थे। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अपराध के समय धारा 6 के अधीन प्रमाणपत्र का न होना, स्वयं में, अधिनियम के दंडात्मक उपबंधों का आश्रय लिये जाने में बाधक नहीं है।
- प्रथम सूचना रिपोर्ट के अवलोकन के पश्चात्, न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 18(घ) का आश्रय उचित रूप से लिया गया था और अभिकथन प्रथम दृष्टया आवेदक के विरुद्ध आरोपित उपबंधों को आकृष्ट करते हैं।
निर्णय:
- उन्मोचन आवेदन अस्वीकार किया गया।
- आवेदक को आरोपित अपराधों के लिए विचारण का सामना करना होगा।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 75 क्या है?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 75 लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित है। यह भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354क के संगत है।
- यह भारतीय न्याय संहिता के अध्याय 5, "स्त्री और बालक के विरुद्ध अपराधों के विषय में", के अंतर्गत आती है।
धारा 75(1): कोई पुरुष, जो निम्नलिखित में से कोई कृत्य करता है, लैंगिक उत्पीड़न का दोषी है:
- (i) शारीरिक संपर्क और अग्रक्रियाएँ, जिनमें अवांछनीय और स्पष्ट लैंगिक प्रस्ताव अंतर्वलित हों,
- (ii) लैंगिक अनुग्रह की मांग या अनुरोध,
- (iii) स्त्री की इच्छा के विरुद्ध अश्लील साहित्य दिखाना,
- (iv) अश्लील टिप्पणी करना।
दण्ड :
- धारा 75(2): खंड (i), (ii) या (iii) में वर्णित कृत्यों के लिय: तीन वर्ष तक का सश्रम कारावास, या जुर्माना, या दोनों।
- धारा 75(3): खंड (iv) में वर्णित कृत्य के लिये: एक वर्ष तक की अवधि के लिये किसी भाँति का कारावास, या जुर्माना, या दोनों।
संबंधित उपबंध: : स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग धारा 74 भारतीय न्याय संहिता के अधीन दण्डनीय है, जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354 के संगत है ।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 296 क्या है?
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 296 अश्लील कृत्यों और गानों को दण्डित करती है। यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 294 के संगत है।
- यह ऐसे किसी भी व्यक्ति पर लागू होती है, जो दूसरों को क्षोभ कारित करते हुए:
- (क) किसी लोक स्थान में कोई अश्लील कृत्य करता है, या
- (ख) किसी लोक स्थान में या उसके समीप कोई अश्लील गाना, गाथागीत या शब्द गाता, सुनाता या उच्चारित करता है।
- दण्ड : तीन माह तक की अवधि के लिये किसी भाँति का कारावास, या एक हजार रुपए तक का जुर्माना, या दोनों।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 क्या है?
बारे में:
- यह अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान को मान्यता प्रदान करता है और शिक्षा, नियोजन, स्वास्थ्य सेवा, संपत्ति तथा अन्य क्षेत्रों में उनके विरुद्ध विभेद का प्रतिषेध करता है।
- यह उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) बनाम भारत संघ (2014) के पश्चात् अधिनियमित हुआ, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अपने लिंग की स्वयं पहचान करने के अधिकार को मान्यता दी गई थी।
मुख्य उपबंध:
- सेक्शन 2(ट) – “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा: ऐसा व्यक्ति जिसका लिंग जन्म के समय उसे सौंपे गए लिंग से मेल नहीं खाता। इसमें सम्मिलित हैं:
- ट्रांस-पुरुष और ट्रांस- स्त्रियाँ, चाहे उन्होंने लिंग-परिवर्तन शल्यक्रिया, हार्मोन चिकित्सा, लेज़र चिकित्सा या कोई अन्य चिकित्सा करवाई हो या नहीं,
- अंतरलैंगिक विभिन्नताओं वाले व्यक्ति,
- जेंडरक्वीयर व्यक्ति, और
- किन्नर, हिजड़ा, अरावानी और जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति।