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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के पश्चात् संज्ञान लिये जाने की स्थिति में पूर्व-संज्ञान सुनवाई अनिवार्य है
«30-Sep-2026
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उमर और अन्य. बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य "हम Annexure P26 के आदेश को इस सीमा तक अपास्त करते हैं कि उसमें ‘प्रथमदृष्टया मामला पाया गया तथा संज्ञान लिया गया’ कहा गया है, और इसे केवल ‘साधारण समन’ तक सीमित करते हैं।" न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उमर और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह निर्णय दिया कि जहाँ मजिस्ट्रेट न्यायिक विवेक का प्रयोग करता है और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रवर्तन में आने के पश्चात् ही प्रथमदृष्टया मामला पाता है, वहाँ यह माना जाएगा कि संज्ञान उसी तारीख को लिया गया है। अतः अभियुक्त को संज्ञान लिये जाने से पूर्व सुनवाई का अवसर दिया जाना आवश्यक है, जैसा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223(1) के प्रथम परंतुक द्वारा अपेक्षित है, भले ही परिवाद दण्ड प्रक्रिया संहिता व्यवस्था के अधीन दायर किया गया हो।
उमर एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 7 जून 2022 को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी और पुलिस ने 6 अगस्त 2022 को मामले को बंद करने की रिपोर्ट दाखिल की थी।
- परिवादकर्त्ता ने 14 अक्टूबर 2022 को विरोध याचिका दायर की और 29 नवंबर 2022 को न्यायालय ने धारा 173(8) दण्ड प्रक्रिया संहिता (अब धारा 193(9) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन आगे के अन्वेषण का आदेश दिया।
- 14 फरवरी 2023 को दूसरी क्लोजर रिपोर्ट दर्ज की गई, जिसके बाद 28 अप्रैल 2023 को दूसरी विरोध याचिका दायर की गई।
- परिवाद पर 11 अक्टूबर 2023 को सुनवाई शुरू हुई। न्यायालय ने जांच को उचित पाया और परिवादकर्त्ता को धारा 200 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन साक्ष्य के लिये पेश करने का निदेश दिया।
- 6 मार्च 2024 को परिवादकर्त्ता (PW1), उसके पति (PW2) और एक डॉक्टर (PW3) के कथन अभिलिखित किये गए।
- लगभग दो वर्षों तक कोई और आदेश पारित नहीं किया गया। 3 जून 2026 को, आज़मगढ़ के विशेष न्यायाधीश (अनुसूचित जनजातीय/अनुसूचित जनजातीय अत्याचार निवारण अधिनियम) ने प्रथम दृष्टया मामला पाया और अभियुक्तों के विरुद्ध कार्यवाही शुरू की।
- अभियुक्तों ने उच्चतम न्यायालय का रुख करते हुए तर्क दिया कि धारा 223 के अधीन अनिवार्य पूर्व-संज्ञान सुनवाई के बिना, 1 जुलाई 2024 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के लागू होने के बाद, 3 जून 2026 को संज्ञान लिया गया था।
- परिवादकर्त्ता ने तर्क दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के समक्ष संज्ञान लिया जा चुका था, जब परिवाद को न्यायालय की फाइलों में स्वीकार किया गया था, और यह दिखाने के लिये किसी औपचारिक आदेश की आवश्यकता नहीं थी कि संज्ञान लिया गया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
विरचित किये गए विवाद्यक पर:
- न्यायालय ने प्रश्न को इस प्रकार परिभाषित किया कि क्या धारा 200 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर विरोध याचिका पर संज्ञान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के 1 जुलाई 2024 से प्रभावी होने से पहले लिया गया था या बाद में।
रिलायंस ऑन सी.आर.ई.एफ. फाइनेंस लिमिटेड बनाम श्री शांति होम्स (पी.) लिमिटेड:
- न्यायालय ने इस सिद्धांत पर ध्यान दिया कि अपराध का संज्ञान लिया जाता है, न कि अपराधी का।
- एक बार जब न्यायालय का समाधान हो जाता है कि मामले में कोई अपराध प्रकट होता है और आगे की कार्यवाही करने का निर्णय लेता है, तो यह माना जाना चाहिये कि उसने संज्ञान ले लिया है।
- संज्ञान एक अनिश्चित अर्थ वाला शब्द है, और इसका अर्थ सांविधिक आवश्यकता पर निर्भर करता है।
जुनैद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले पर निर्भरता:
- न्यायालय ने दर्ज किया कि धारा 173 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन पुलिस रिपोर्ट प्राप्त होने पर मजिस्ट्रेट के पास तीन विकल्प होते हैं:
- कार्यवाही को रद्द करना;
- पुलिस के निष्कर्ष से बाध्य हुए बिना संज्ञान लेना और प्रक्रिया जारी करना; या
- मूल परिवाद पर धारा 190(1)(क) दण्ड प्रक्रिया संहिता (अब धारा 210(1)(क) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन संज्ञान लेना और धारा 200 दण्ड प्रक्रिया संहिता (अब धारा 223 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन परिवादकर्त्ता और साक्षियों से शपथ पर परीक्षा करना।
परविंदर सिंह बनाम प्रवर्तन निदेशालय पर निर्भरता के संबंध में:
- न्यायालय ने इस बात पर ध्यान दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन संज्ञान लेना न्यायिक विवेक का प्रयोग मात्र है, और जब तक ऐसा न्यायिक विवेक प्रयोग नहीं किया जाता, तब तक किसी जांच को प्रारंभ नहीं माना जा सकता है।
- इसमें पाया गया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन भी यही स्थिति है, लेकिन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता न्यायिक विवेक का प्रयोग करने से पहले अभियुक्त की सुनवाई की एक अतिरिक्त आवश्यकता जोड़ता है।
जब वास्तव में संज्ञान लिया गया था:
- न्यायालय ने कहा कि इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि न्यायालय ने पुलिस रिपोर्ट या विरोध परिवाद पर किस प्रकार कार्रवाई की।
- विरोध याचिका पर पूर्व के आदेश की परीक्षा करते हुए, न्यायालय ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने केवल जांच को उचित समझा था और परिवादकर्त्ता के साक्ष्य मांगे थे। इसलिये उस स्तर पर संज्ञान नहीं लिया गया था।
- न्यायिक विवेक का प्रयोग केवल 3 जून 2026 के आदेश में किया गया और प्रथम दृष्टया मामला पाया गया। इस प्रकार, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के लागू होने के बाद, उस तिथि को संज्ञान लिया गया माना गया।
- परिणामस्वरूप, संज्ञान लेने से पहले न्यायालय को अभियुक्त को समन करना और उसकी बात सुनना आवश्यक था।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने 3 जून 2026 के उस आदेश को इस हद तक रद्द कर दिया कि उसमें प्रथम दृष्टया मामला बनता पाया गया और संज्ञान लिया गया, और इसे केवल एक साधारण समन तक सीमित कर दिया।
- अभियुक्तों को एक महीने के भीतर विचारण न्यायालय के समक्ष पेश होने का निदेश दिया गया, जिसके बाद मामले की सुनवाई होगी और उचित आदेश पारित किये जाएंगे।
- अपील मंजूर कर ली गई, और न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसके निर्णय का मामले की गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 223 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 किसी परिवाद पर अपराध का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट द्वारा परिवादकर्त्ता की परीक्षा से संबंधित है।
- यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अध्याय 16 (मजिस्ट्रेटों को परिवाद) के अंतर्गत आता है।
- यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 200 के अनुरूप है, लेकिन इसमें एक नया सुरक्षा उपाय जोड़ा गया है: परिवाद पर संज्ञान लेने से पहले अभियुक्त को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिये।
उपबंध :
धारा 223 में कहा गया है:
उपधारा (1):
- "किसी अपराध का संज्ञान लेते समय, परिवादकर्त्ता और उपस्थित साक्षियों (यदि कोई हो) से शपथ पर परीक्षा करने का अधिकार रखने वाला मजिस्ट्रेट ऐसा करेगा, और ऐसी परीक्षा का सार लिखित रूप में अभिलिखित किया जाएगा और उस पर परिवादकर्त्ता और साक्षियों के साथ-साथ मजिस्ट्रेट द्वारा भी हस्ताक्षर किये जाएंगे।"
- परंतु कि मजिस्ट्रेट द्वारा किसी अपराध का संज्ञान अभियुक्त को सुनवाई का अवसर दिये बिना नहीं लिया जाएगा:
- इसके अलावा, जब परिवाद लिखित में किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट को परिवादकर्त्ता और साक्षियों की परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती है।
(क) यदि किसी लोक सेवक ने अपने आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का आशय रखते हुए परिवाद किया हो या किसी न्यायालय ने परिवाद किया हो; या
(ख) यदि मजिस्ट्रेट धारा 212 के अधीन मामले को जांच या विचारण के लिये किसी अन्य मजिस्ट्रेट को सौंप देता है:
- यह भी उपबंधित किया गया है कि, यदि मजिस्ट्रेट परिवादकर्त्ता और साक्षियों की परीक्षा करने के बाद धारा 212 के अधीन मामले को किसी अन्य मजिस्ट्रेट को सौंप देता है, तो बाद वाले मजिस्ट्रेट को उनकी पुन:परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होगी।
उपधारा (2):
- किसी लोक सेवक के विरुद्ध उसके आधिकारिक कार्यों या कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान कथित रूप से किये गए किसी अपराध के लिये मजिस्ट्रेट तब तक संज्ञान नहीं लेगा जब तक कि—
(क) ऐसे लोक सेवक को उस परिस्थिति के संबंध में दावे प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है जिसके कारण कथित घटना घटी; और
(ख) ऐसे लोक सेवक से वरिष्ठ अधिकारी से घटना के तथ्यों और परिस्थितियों से संबंधित एक रिपोर्ट प्राप्त होती है।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 200 के अंतर्गत संबंधित उपबंध:
- किसी परिवाद पर अपराध का संज्ञान लेने वाला मजिस्ट्रेट परिवादकर्त्ता और उपस्थित साक्षियों (यदि कोई हो) से शपथ पर परीक्षा करेगा, और ऐसी परीक्षा Aका सार लिखित रूप में अभिलिखित किया जाएगा और उस पर परिवादकर्त्ता और साक्षियों के साथ-साथ मजिस्ट्रेट द्वारा भी हस्ताक्षर किये जाएंगे।
- परंतु, जब परिवाद लिखित में किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट को परिवादकर्त्ता और साक्षियों की परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती है।
(क) यदि किसी लोक सेवक ने अपने आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का आशय रखते हुए परिवाद किया हो या किसी न्यायालय ने परिवाद किया हो; या
(ख) यदि मजिस्ट्रेट धारा 192 के अधीन मामले को जांच या विचारण के लिये किसी अन्य मजिस्ट्रेट को सौंप देता है:
- इसमें यह भी उपबंधित किया गया है कि, यदि मजिस्ट्रेट परिवादकर्त्ता और साक्षियों की परीक्षा करने के बाद धारा 192 के अधीन मामले को किसी अन्य मजिस्ट्रेट को सौंप देता है, तो बाद वाले मजिस्ट्रेट को उनकी पुनः परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होगी।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 द्वारा किये गए प्रमुख परिवर्तन:
अभियुक्त की पूर्व-संज्ञान सुनवाई (उपधारा 1 का पहला परंतुक):
- दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन, परिवाद पर संज्ञान लेने से पहले अभियुक्त को सुनवाई का कोई अधिकार नहीं था।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन, अभियुक्त को सुनवाई का अवसर दिये बिना किसी भी परिवाद पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता है।
उपधारा (1) का शब्द-विन्यास:
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 200 में मजिस्ट्रेट द्वारा "संज्ञान लेने" का उल्लेख है, जबकि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 में मजिस्ट्रेट द्वारा "संज्ञान लेते समय अधिकारिता रखने" का उल्लेख है।
लोक सेवकों के लिये अतिरिक्त सुरक्षा उपाय (उपधारा 2):
- यह एक नया उपबंध है जिसका दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 200 में कोई समकक्ष नहीं है।
- किसी लोक सेवक के विरुद्ध आधिकारिक कर्त्तव्यों के दौरान किये गए कृत्यों के संबंध में परिवाद का संज्ञान लेने से पहले, मजिस्ट्रेट को लोक सेवक को कथित घटना की परिस्थितियों को स्पष्ट करने का अवसर देना होगा, और लोक सेवक के वरिष्ठ अधिकारी से तथ्यों पर एक रिपोर्ट प्राप्त करनी होगी।
परिवादकर्त्ता की परीक्षा के अपवाद (उपधारा 1 के द्वितीय और तृतीय परंतुक):
- ये उपबंध दण्ड प्रक्रिया संहिता से लिये गए हैं। जहाँ लिखित परिवाद किसी लोक सेवक द्वारा आधिकारिक क्षमता में किया गया हो या किसी न्यायालय द्वारा किया गया हो, या जहाँ मामला धारा 212 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (पूर्व में धारा 192 दण्ड प्रक्रिया संहिताA) के अधीन किसी अन्य मजिस्ट्रेट को सौंपा गया हो, वहाँ परिवादकर्त्ता और अक्षियों की परीक्षा आवश्यक नहीं है।