- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
होम / करेंट अफेयर्स
आपराधिक कानून
अभिरक्षा संबंधी विवादों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण के दुरुपयोग के विरुद्ध संरक्षणात्मक उपाय
«25-Sep-2026
|
आर' बनाम 'ई' और अन्य "लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन मामला दर्ज होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिये कि आरोप सत्य है।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन |
उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 'आर' बनाम 'ई' और अन्य (2026) के मामले में वैवाहिक और बाल अभिरक्षा विवादों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के दुरुपयोग को रोकने के लिये सुरक्षा उपाय निर्धारित किये। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच में आरोपों को अविश्वसनीय पाए जाने के बाद न्यायालय ने अवयस्क लड़की के साथ उसके पिता द्वारा लैंगिक हमले के आरोप वाली FIR को भी रद्द कर दिया।
'आर' बनाम 'ई' और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- जिन पक्षकारों को 'आर' (पिता) और 'ई' (माता) के रूप में संदर्भित किया गया है, उनका विवाह 2011 में हुआ था। उनकी पुत्री 'एम' का जन्म 2015 में हुआ था।
- शादी टूटने के बाद, माता 2018 में बच्चे के साथ वैवाहिक घर छोड़कर चली गई। इसके कारण लंबे समय तक विधिक कार्यवाही चली, जिसमें अभिभावकत्व याचिका, माता के विरुद्ध FIR, तलाक की कार्यवाही और अभिरक्षा का विवाद शामिल है।
- मार्च 2022 में, कुटुंब न्यायालय ने माता को बच्चे की अभिरक्षा पिता को सौंपने का निदेश दिया। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने जनवरी 2023 में माता के लिये मुलाक़ात के अधिकारों के अधीन इस निदेश को बरकरार रखा, और उच्चतम न्यायालय ने मार्च 2023 में माता की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी। जून 2023 में बच्चे की अभिरक्षा पिता को सौंप दी गई।
- बाद में पिता ने मुलाक़ात के अधिकारों (visitation rights) में संशोधन करने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
- इसी बीच, माता ने पिता के विरुद्ध FIR दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उसने दो मौकों पर बच्ची के साथ लैंगिक हमला किया और बच्ची द्वारा इसका प्रकटन करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी।
- FIR में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10, किशोर न्याय (देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 75 और भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 323, 504 और 506 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2), 352 और 351) का आह्वान किया गया है।
- अप्रैल 2026 में, उच्चतम न्यायालय ने अन्वेषण CBI को सौंप दी, जिसे उप महानिरीक्षक से कम रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता वाली एक समिति और एक महिला मनोवैज्ञानिक द्वारा संचालित किया जाना था। न्यायालय ने निदेश दिया कि अन्वेषण के दौरान किसी भी पक्षकार के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
- CBI समिति में दो पुलिस अधीक्षक और NIMHANS के दो विशेषज्ञ शामिल थे, जिनमें से एक बाल और किशोर मनोचिकित्सा में और दूसरा नैदानिक मनोविज्ञान में था।
- समिति ने बच्चे के कक्षा शिक्षक, ट्यूशन शिक्षक, स्कूल काउंसलर, घरेलू नौकरानी और पड़ोसियों सहित साक्षियों से पूछताछ की और पिता के घर से CCTV फुटेज का विश्लेषण किया। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि आरोप सिद्ध नहीं हुए और मामला अभियोजन के योग्य नहीं है।
- मनोचिकित्सीय मूल्यांकन में आरोपों के अनुरूप चिंता या आघात के कोई लक्षण नहीं पाए गए। इसमें यह भी पाया गया कि माता-पिता के बीच लंबे समय से चल रहे झगड़े, चल रहे वाद में, आरोपों पर बार-बार चर्चा और पारिवारिक कहानियों के संपर्क में आने से बालक के कथन पर प्रभाव पड़ सकता है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
वैवाहिक विवादों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के बढ़ते दुरुपयोग पर:
- गेड्डम झांसी बनाम तेलंगाना राज्य, अचिन गुप्ता बनाम हरियाणा राज्य , ईश्वर चंद शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सुहारा बनाम मुहम्मद जलील मामले में केरल उच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए, न्यायालय ने पति-पत्नी द्वारा अभिरक्षा विवादों में लाभ प्राप्त करने या बेहतर समझौते हासिल करने के लिये मिथ्या लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण परिवाद दर्ज करने की चिंताजनक प्रवृत्ति पर ध्यान दिया।
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 22 की अपर्याप्तता पर:
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि यद्यपि धारा 22 मिथ्या परिवादों को दण्डित करती है, "धारा 22 लागू होने तक मिथ्या आरोप के शिकार पक्ष को काफी नुकसान हो चुका होगा।" इस प्रकार का नुकसान लंबे कारावास या लंबित अभिरक्षा या संरक्षकता कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव के रूप में हो सकता है।
- इसमें कहा गया है कि "विधि के दायरे में रहते हुए, अभियुक्त को इस प्रकार की हानि से बचाने के लिये कुछ सावधानियां बरतनी चाहिये।"
संतुलन स्थापित करने पर:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी सावधानी अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत नहीं होनी चाहिये या ऐसे अपराधों के प्रति गंभीरता को कम नहीं करनी चाहिये। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को अधिनियम की कठोरता को बनाए रखने और अभियुक्त को अपूरणीय क्षति से बचाने के बीच संतुलन के रूप में वर्णित किया।
सुरक्षा उपायों को लागू करने की सीमा शर्तों पर:
ये सुरक्षा उपाय तभी लागू होते हैं जब निम्नलिखित दोनों शर्तें पूरी होती हैं:
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अपराध कथित तौर पर बच्चे के साथ एक ही छत के नीचे रहने वाले माता-पिता या परिवार के सदस्य द्वारा किया गया है; और
- बच्चे के माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद मौजूद है, जो संभवतः तनावपूर्ण संबंधों का संकेत देता है।
परिवाद प्राप्त करने वाले पुलिस अधिकारी का यह कर्त्तव्य है कि वह सत्यापित करे कि क्या वास्तव में ऐसा कोई वैवाहिक विवाद विद्यमान है।
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण मामलों में गिरफ्तारी पर:
- जहाँ निर्धारित शर्तें पूरी होती हैं, वहाँ अन्वेषण अधिकारियों को जल्दबाजी में कार्रवाई नहीं करनी चाहिये या FIR दर्ज होने के तुरंत बाद अभियुक्त को गिरफ्तार नहीं करना चाहिये।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35 का हवाला देते हुए, न्यायालय ने कहा कि गिरफ्तारी की शक्ति एक सांविधिक विवेकाधिकार है और FIR दर्ज करने का स्वतःस्फूर्त परिणाम नहीं है।
- गिरफ्तारी की शक्ति का अस्तित्व और उस शक्ति के प्रयोग का औचित्य अलग-अलग बातें हैं, और गिरफ्तारी केवल इसलिये नहीं की जा सकती क्योंकि यह विधिक रूप से अनुमेय है।
अन्वेषण में विशेषज्ञों की भागीदारी के संबंध में:
अन्वेषण अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस यूनिट (SJPU) को गिरफ्तारी के उद्देश्य से यह तय करने से पहले कि क्या अभियुक्त ने अपराध किया है, बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा या नैदानिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ की नियुक्ति अनिवार्य है। केवल असाधारण मामलों में ही लिखित रूप में कारण अभिलिखित करके इस आवश्यकता से छूट दी जा सकती है।
न्यायालय ने विशेषज्ञ रिपोर्ट पर दो सीमाएँ लगाईं:
- अन्वेषण अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस यूनिट विशेषज्ञ के निष्कर्षों से बाध्य नहीं है, क्योंकि रिपोर्ट केवल विवेकाधिकार के प्रयोग में सहायता करती है; और
- यह रिपोर्ट आरोप पत्र या समापन रिपोर्ट दाखिल करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती।
विशेष न्यायालय के समक्ष निजी परिवादों पर:
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 33 के अधीन सीधे विशेष न्यायालय के समक्ष दायर किये गये परिवादों के लिये भी वही प्रारंभिक शर्तें लागू होती हैं।
- विशेष न्यायालय को संज्ञान लेने और समन जारी करने का निर्णय लेने से पहले बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा या नैदानिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ को शामिल करना होगा, सिवाय उन असाधारण मामलों के जिनमें कारण लिखित रूप में अभिलिखित किये गए हों।
अभिरक्षा की कार्यवाही में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण प्रथम सूचना रिपोर्ट के प्रभाव पर:
- न्यायालय ने कहा कि "लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन मामला दर्ज होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आरोप सत्य है।" अभिरक्षा या अभिभावकत्व से संबंधित मामलों से निपटने वाले न्यायालयों को आरोपों की निराधारता के संबंध में स्वतंत्र रूप से प्रथम दृष्ट्या निर्णय लेना होगा।
सुरक्षा उपायों की प्रयोज्यता पर:
- ये सुरक्षा उपाय निर्णय की तारीख को लंबित FIR-आधारित अन्वेषण और धारा 33 के अधीन उन निजी परिवादोंयेपर लागू होते हैं जिनमें अभी तक समन जारी नहीं किए गए हैं।
निदेश जारी किये गए:
न्यायालय ने निम्नलिखित निदेश दिये:
- जिला बाल संरक्षण यूनिटों को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण नियम, 2020 के नियम 5 के अधीन अपने विशेषज्ञ रजिस्टरों को अद्यतन करना होगा जिससे उनमें बाल और किशोर मनोचिकित्सा या नैदानिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञों को शामिल किया जा सके।
- ऐसे मामलों में रिमांड और जमानत से संबंधित मामलों को निपटाने वाले न्यायालयों को यह परीक्षा करनी चाहिये कि क्या अन्वेषण अधिकारी ने सुरक्षा उपायों का पालन किया है।
- निर्णय की एक प्रति सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को वितरण और अनुपालन के लिये भेजी जाए।
मामले के तथ्यों पर:
- CBI की जांच के निष्कर्षों को स्वीकार करते हुए, न्यायालय ने पिता के विरुद्ध दर्ज FIR को रद्द कर दिया और कहा कि कार्यवाही जारी रखना प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा। न्यायालय ने कहा कि CBI द्वारा मामले को सुनवाई योग्य न पाए जाने के कारण, बालक की अभिरक्षा के लिये माता के दावे का मूल आधार ही धराशायी हो गया है।
- रोजी जैकब बनाम जैकब ए. चक्रमक्कल (1973) मामले में बालक के कल्याण के सिद्धांत को लागू करते हुए, न्यायालय ने निर्णय दिया कि विधिक अभिरक्षा और संरक्षकता पिता के पास होनी चाहिये।
- चूँकि मार्च 2023 से बच्चे की शारीरिक अभिरक्षा माता के पास ही थी, इसलिये न्यायालय ने बालक को पिता के साथ पुनः मिलाने के लिये मामले को कुटुंब न्यायालय को वापस भेज दिया। इस प्रक्रिया का मार्गदर्शन विशेषज्ञों की एक समिति करेगी, जिसमें जांच में शामिल CBI के दो अधिकारी और NIMHANS के दो डॉक्टर शामिल होंगे। यह समिति अंतरिम अभिरक्षा व्यवस्था पर भी निर्णय लेगी।
- न्यायालय ने पिता द्वारा माता के विरुद्ध दर्ज कराई गई FIR को भी रद्द कर दिया और दोनों पक्षकारों तथा बालक को 28 सितंबर 2026 को कुटुंब न्यायालय में उपस्थित होने का निदेश दिया।
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 क्या है?
|
क्र. सं. |
पहलू |
जानकारी |
| 1. |
शीर्षक |
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 |
|
2. |
अधिनियम संख्या |
अधिनियम संख्या 32, 2012 |
|
3. |
अधिनियमन की तारीख |
19 जून, 2012 |
|
4. |
प्रवर्तन की तारीख |
14 नवंबर, 2012 |
|
5. |
स्थानीय विस्तार |
संपूर्ण भारत पर लागू |
| 6. |
उद्देश्य |
लैंगिक हमला, लैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य के अपराधों से बालकों का संरक्षण करने और ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना तथा उनसे संबंधित या आनुषंगिक विषयों के लिये उपबंध करने के लिये अधिनियम करना। |
|
7. |
संरचना |
कुल धाराएँ: 46 |
|
8. |
महत्त्वपूर्ण संशोधन |
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019 अधिनियमन की तारीख: 5 अगस्त, 2019 |