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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 छद्म रूप से द्वितीय पुनरीक्षण के रूप में प्रयुक्त नहीं की जा सकती
«29-Sep-2026
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रामपाल और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य "जब सेशन न्यायालय पुनरीक्षण अधिकारिता के माध्यम से किसी आदेश की सत्यता का परीक्षण कर चुका हो... तो धारा 528 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन दायर याचिका वस्तुतः एक छद्म द्वितीय पुनरीक्षण याचिका में परिवर्तित हो जाती है, जो प्रक्रिया संहिता (BNSS) के अधीन शाब्दिक और भावना दोनों ही दृष्टि से निषिद्ध है।" न्यायमूर्ति सुमीत गोयल |
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुमीत गोयल ने रामपाल और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ सेशन न्यायालय पुनरीक्षण आदेश की पहले ही परीक्षा कर चुका है, वहाँ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन उच्च न्यायालय के समक्ष आगे की चुनौती "अत्यंत सीमित दायरे" में ही संभव है। न्यायालय ने उपखंड मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें रिसीवर को कैथल जिले में लगभग 514 कनाल भूमि एक समाधि को सौंपने का निदेश दिया गया था।
रामपाल एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद कैथल जिले के गोहाना गाँव में स्थित लगभग 514 कनाल 6 मरला भूमि से संबंधित था।
- याचिकाकर्त्ताओं ने 6 जून 1970 को रजिस्ट्रीकृत पट्टा विलेख के अधीन अपने अधिकारों का दावा किया, जिसे समाध बाबा निहाल गिर के मोहतमिम द्वारा 99 वर्षों (1971 से 2070) के लिये 60,000 रुपए में निष्पादित किया गया था। उन्होंने निरंतर खेती के कब्जे को स्थापित करने के लिये 1972 के उत्परिवर्तन और बाद के जमाबंदी (अधिकार अभिलेख) और खसरा गिरदावरी (कब्जा अभिलेख) पर विश्वास किया।
- याचिकाकर्त्ताओं के अनुसार, उन्हें 2008 में पता चला कि गिरदावरी प्रविष्टियों में समाध के पक्ष में परिवर्तन किया गया था। प्रथम वर्ग के सहायक कलेक्टर ने उनके पक्ष में प्रविष्टियों को सही किया, लेकिन अपील पर मामला वापस भेज दिया गया और अभी भी लंबित है।
- याचिकाकर्त्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थियों ने 18.05.2015 को जबरन कब्जा लेने का प्रयास किया, जिसके बाद उन्होंने व्यादेश के लिये सिविल वाद दायर किया। इसके बाद निजी प्रत्यर्थियों ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 और 146 के अधीन कार्यवाही शुरू की।
- 01.06.2015 को कैथल के SDM ने भूमि को अटैच कर लिया और नायब तहसीलदार को रिसीवर नियुक्त किया। 11.12.2017 को अपर सेशन न्यायाधीश ने इस आदेश को अपास्त कर दिया क्योंकि मजिस्ट्रेट ने धारा 145 के अधीन अपेक्षित संतुष्टि दर्ज नहीं की थी।
- निजी प्रत्यर्थियों द्वारा एक नए आवेदन पर, SDM ने दिनांक 04.01.2018 के आदेश द्वारा रिसीवर को निदेश दिया कि वह समाध बाबा निहाल गिर को उसके महंत के माध्यम से कब्जा सौंप दे।
- कैथल के अपर सेशन न्यायाधीश ने 26.07.2024 को याचिकाकर्त्ताओं की पुनरीक्षण याचिका को यह देखते हुए खारिज कर दिया कि उनका सिविल वाद 29.08.2015 को, उनकी प्रथम अपील 10.01.2023 को खारिज कर दी गई थी, और एक नियमित द्वितीय अपील उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित थी।
- इसके बाद याचिकाकर्त्ताओं ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिया की धारा 528 के अधीन उच्च न्यायालय का रुख किया।
पक्षकारों के तर्क:
- याचिकाकर्त्ता ओं ने तर्क दिया कि SDM पट्टा विलेख, राजस्व प्रविष्टियों और राजस्व अधिकारियों की उन रिपोर्टों पर ठीक से विचार करने में असफल रहे हैं जो निरंतर कब्जे को दर्शाती हैं।
- उन्होंने तर्क दिया कि एक बार जब 2015 के कुर्की आदेश को अपास्त कर दिया गया था, तो कब्जे की सुपुर्दगी का निदेश देने वाला बाद का आदेश अस्थिर था, और 2070 तक चलने वाले मौजूदा पट्टे के अधीन उनके अधिकारों को धारा 145 और 146 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन कार्यवाही के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता था।
- राज्य ने यह तर्क दिया कि विवाद मूलतः निजी प्रकृति का था।
- निजी प्रत्यर्थियों ने तर्क दिया कि SDM के आदेश में कोई अवैधता या धिकारित संबंधी त्रुटि नहीं थी, कि सिविल न्यायालय पहले ही याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध विवाद का निर्णय कर चुका था, और पुनरीक्षण न्यायालय ने राजस्व अभिलेख और सिविल न्यायालय के निर्णय पर विधिवत विचार किया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के दायरे पर:
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग संयम से किया जाना चाहिये, केवल न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने या न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिये ही किया जाना चाहिये।
- इसने दो प्रकार की चुनौतियों के बीच अंतर स्पष्ट किया।
- जब प्रथम दृष्ट्या न्यायालय या प्राधिकरण के किसी आदेश के विरुद्ध सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जाती है, तो उच्च न्यायालय के पास विकृति या अवैधता की परीक्षा करने के लिये व्यापक दायरा होता है। वहीं, जब सेशन न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण में पारित किसी आदेश को चुनौती दी जाती है, तो उच्च न्यायालय की जांच का दायरा कहीं अधिक सीमित होता है।
धारा 528 को एक छद्म द्वितीय पुनरीक्षण के रूप में:
- न्यायालय ने कहा कि पुनरीक्षण अधिकारिता स्वयं स्पष्ट अवैधता, प्रक्रियात्मक अनुचितता, अधिकारिता संबंधी त्रुटि और न्याय के स्पष्ट उल्लंघन तक ही सीमित है।
- अतः, पुनरीक्षण आदेश के विरुद्ध धारा 528 के अंतर्गत दी गई कोई भी चुनौती प्रभावी रूप से एक परोक्ष पुनरीक्षण बन जाती है, जिस पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता द्वारा वर्जित है।
- न्यायालय ने कहा: "परिणामस्वरूप, ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप करने के लिये याचिकाकर्त्ता पर न्याय की घोर विफलता या अधिकारिता संबंधी स्पष्ट दोष को साबित करने का अत्यधिक भार होता है।"
तथ्यों के विवादित प्रश्नों पर:
- न्यायालय ने आगे कहा कि यह प्रतिबंध उस स्थिति में और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है जहाँ विवाद कब्जे, स्वामित्व और पट्टा विलेख के विधिक प्रभाव के जटिल और विवादास्पद प्रश्नों पर आधारित होता है, जो "संक्षिप्त कार्यवाही के लिये अनुपयुक्त" होते हैं।
लंबित सिविल कार्यवाही के संबंध में:
- न्यायालय ने कहा कि विवाद अब केवल राजस्व अभिलेख तक सीमित नहीं रह गया है। याचिकाकर्त्ताओं का सिविल वाद और प्रथम अपील दोनों खारिज हो चुकी हैं, और द्वितीय अपील लंबित है। याचिकाकर्त्ता निरस्त करने की याचिका के माध्यम से पक्षकारों के अधिकारों का पूर्ण पुनर्निर्णय नहीं मांग सकते।
वर्ष 2017 के पूर्ववर्ती आदेश और पट्टा विलेख पर:
- न्यायालय ने माना कि ASJ का 11.12.2017 का आदेश याचिकाकर्त्ताओं के लिये सहायक नहीं था, क्योंकि यह उस समय विद्यमान सामग्री और परिस्थितियों पर आधारित था। न्यायालय ने यह भी माना कि इस स्तर पर रजिस्ट्रीकृत पट्टा विलेख को कब्जे का निश्चायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश पर:
- न्यायालय ने पाया कि पुनरीक्षण न्यायालय ने याचिका को निरर्थक रूप से खारिज नहीं किया था, अपितु सिविल और राजस्व कार्यवाही सहित बाद के घटनाक्रमों पर विचार किया था। याचिकाकर्त्ता यह साबित करने में असफल रहे कि यह तर्क गलत था या किसी महत्त्वपूर्ण दस्तावेज या सांविधिक उपबंध की अनदेखी की गई थी।
निष्कर्ष:
- कोई असाधारण परिस्थिति न पाते हुए, जिसके कारण हस्तक्षेप उचित हो, न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां किसी भी सिविल, राजस्व या अपील मंच के समक्ष लंबित पक्षकारों के किसी भी मौलिक अधिकार या दावे पर राय की अभिव्यक्ति नहीं थीं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को सुरक्षित रखती है। यह दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 के अनुरूप है।
- यह उपबंध कोई नई शक्ति प्रदान नहीं करता; यह उच्च न्यायालय को एक उच्च न्यायालय के रूप में निहित शक्तियों को मान्यता देता है, जिनका प्रयोग असाधारण मामलों में किया जाना है।
उपबंध:
धारा 528 में कहा गया है:
- इस संहिता में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी बनाने के लिये, या किसी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये, या अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिये आवश्यक आदेश देने हेतु उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित करता हो।
वे उद्देश्य जिनके लिये अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है:
- संहिता के अंतर्गत किसी भी आदेश को प्रभावी बनाना।
- किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये।
- न्याय के उद्देश्यों को सुनिश्चित करने के लिये।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन द्वितीय पुनरीक्षण पर क्या प्रतिबंध है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 438 (दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 397 के अनुरूप) उच्च न्यायालय और सेशन न्यायाधीश को किसी अधीनस्थ आपराधिक न्यायालय के किसी भी निष्कर्ष, दण्ड या आदेश की शुद्धता, वैधता या औचित्य की परीक्षा करने के लिये समवर्ती पुनरीक्षण अधिकारिता प्रदान करती है।
धारा 438(3):
- यदि इस धारा के अंतर्गत किसी व्यक्ति द्वारा उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश के समक्ष आवेदन किया गया है, तो उसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई और आवेदन उनमें से किसी एक द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा।
- यह खंड एक ही व्यक्ति द्वारा द्वितीय बार पुनरीक्षण याचिका दायर करने को वर्जित करता है। न्यायालयों ने सर्वसम्मत रूप से यह माना है कि प्रक्रिया के दुरुपयोग या न्याय के उल्लंघन से जुड़े असाधारण मामलों को छोड़कर, उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग इस रोक को दरकिनार करने के लिये नहीं किया जा सकता है।