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सिविल कानून

मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति दावों का निर्णय करना

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 24-Sep-2026

स्रोत: द हिंदू 

परिचय 

भारत में दुनिया का सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क है, जो लगभग 67 लाख किलोमीटर में फैला हुआ है। यह अमेरिका (65 लाख किलोमीटर) और चीन (54 लाख किलोमीटर) से कहीं आगे है। यद्यपि, सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु की संख्या भी भारत में सबसे अधिक है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की 'भारत में सड़क दुर्घटनाएं 2024' रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में 4,87,707 सड़क दुर्घटनाओं में 1,77,175 लोगों की मृत्यु हुई और 4,71,441 लोग घायल हुए। इसका अर्थ है कि प्रतिदिन लगभग 485 मृत्यु या प्रति घंटे 20 मृत्यु हुईं।  

  • तेज गति से वाहन चलाना, लापरवाही से गाड़ी चलाना, सड़कों का खराब रखरखाव, अपर्याप्त चालक प्रशिक्षण और आपातकालीन एवं आघात देखरेख की कमजोर व्यवस्था के कारण सड़क दुर्घटनाएं एक गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा चिंता का विषय बनी हुई हैं। 
  • सड़क दुर्घटनाओं से भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 3.14% व्यय होने का अनुमान है, और इसका भार उन व्यक्तियों के आश्रितों पर सर्वाधिक पड़ता है, जिनकी मृत्यु हो गई है या जो स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए हैं। 
  • यद्यपि, कई दावेदारों के लिये, न्यायालयों द्वारा प्रतिकर की मात्रा निर्धारित करने और उसे प्रदान करने का तरीका समझना अभी भी मुश्किल है। 

मोटर दुर्घटना दावों के लिये विधिक ढाँचा क्या है? 

  • मोटर यान अधिनियम, 1988 (MV Act) मोटर दुर्घटना प्रतिकर को नियंत्रित करने वाली प्रमुख विधि है। यह दुर्घटना की पूरी श्रृंखला को कवर करने वाली एक सांविधिक योजना बनाती है: विनियमन, चालकों और मालिकों के कर्त्तव्य, बीमा, दायित्व, अन्वेषण और प्रतिकर। 
  • धारा 165 के अधीन, राज्य सरकारें मोटर यान दुर्घटनाओं से उत्पन्न दावों का निपटारा करने के लिये निर्दिष्ट क्षेत्रों के लिये मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACTs) का गठन कर सकती हैं।  
  • धारा 166 के अधीन, घायल व्यक्ति, क्षतिग्रस्त संपत्ति के मालिक, या मृत्यु के मामले में, मृतक के सभी या किसी भी विधिक प्रतिनिधि (LRs) द्वारा दावा दायर किया जा सकता है।  
  • बीमाकर्ता, मालिक और चालक सामान्यतः कार्यवाही में पक्षकार होते हैं, क्योंकि अधिकरण को प्रतिकर की राशि और इसे भुगतान करने के लिये उत्तरदायी पक्ष दोनों का निर्णय करना होता है। 
  • मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) तथ्यों के निर्धारण तथा प्रतिकर प्रदान करने का प्राथमिक मंच है। धारा 173 के अधीन, उच्च न्यायालय में 90 दिनों के भीतर अपील की जा सकती है, जिसके लिए ₹25,000 या अधिनिर्णीत राशि के 50%, जो भी कम हो, की राशि जमा करना आवश्यक है।  
  • दायित्व निर्धारित करने के लिए, अधिकरण सामान्यतः प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) और आरोप-पत्र , स्थल-नक्शा, यांत्रिक निरीक्षण रिपोर्ट, शव-परीक्षण या चिकित्सीय एवं दिव्यांगता संबंधी अभिलेख, बीमा पॉलिसी, तथा प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों और विवेचना अधिकारी के परिसाक्ष्य का परीक्षण करता है। 

आपराधिक मामला और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) दावा स्वतंत्र हैं: 

  • एक ही दुर्घटना दो अलग-अलग कार्यवाही को जन्म दे सकती है: उतावलापन या उपेक्षापूर्ण ड्राइविंग जैसे अपराधों के लिये एक आपराधिक मामला, और प्रतिकर के लिये मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) का दावा।  
  • रीना बनाम प्रबंध निदेशक, केएसआरटीसी (2026) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि आपराधिक मामले में दोषमुक्त होने से मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) की कार्यवाही पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि दोनों अलग-अलग विधिक क्षेत्रों में काम करते हैं और साक्ष्य के अलग-अलग मानकों को लागू करते हैं। 

प्रतिकर देने के लिये कौन उत्तरदायी है? 

दायित्व सर्वप्रथम उपेक्षापूर्ण वाहन चालक पर अधिरोपित होता है तथा प्रतिनिधिक दायित्व के आधार पर, दोषकारक वाहन के स्वामी पर भी अधिरोपित होता है। 

जहाँ वाहन का बीमा किया गया हो, वहाँ सामान्यतः बीमाकर्ता अधिनिर्णय की राशि का भुगतान करता है। धारा 146 तृतीय-पक्ष बीमा (Third-Party Insurance) को अनिवार्य बनाती है तथा धारा 150 बीमाकर्ताओं को तृतीय-पक्ष जोखिमों (Third-Party Risks) से उत्पन्न अधिनिर्णयों की पूर्ति करने के लिये बाध्य करती है। 

धारा 150(2) के अधीन बीमाकर्ता की देयता सीमित प्रतिरक्षा के अधीन है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: 

  • निर्दिष्ट नीति शर्तों का भंग  
  • वाहन का अनधिकृत उपयोग 
  • वैध लाइसेंस के बिना वाहन चलाना 
  • पॉलिसी प्राप्त करने के दौरान जानकारी छिपाना या गलत जानकारी देना 

भुगतान और वसूली का सिद्धांत: 

  • यदि प्रतिरक्षा पक्ष का पक्ष सिद्ध भी हो जाता है, तो भी न्यायालय बीमाकर्ता को पहले पीड़ित या मृतक के परिजनों को भुगतान करने और फिर स्वामी या चालक से राशि वसूल करने का निदेश दे सकती हैं। 

दोषरहित दायित्व: 

  • एक अलग नो-फॉल्ट लायबिलिटी रूट के अधीन उपेक्षा साबित करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। 
  • 2019 के संशोधन के बाद, इसमें मृत्यु के लिये 5 लाख रुपए और घोर उपहती के लिये 2.5 लाख रुपए का प्रतिकर देने का प्रावधान है, जिसका भुगतान स्वामी या अधिकृत बीमाकर्ता द्वारा किया जाएगा। 

दुर्घटना में हुई मृत्यु के मामलों में प्रतिकर की गणना कैसे की जाती है? 

  • मोटर यान अधिनियम की धारा 168 के अधीन अधिकरण को "उचित" प्रतिकर प्रदान करना अनिवार्य है। 
  • सरला वर्मा बनाम डीटीसी (2009) और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी (2017) के माध्यम से, उच्चतम न्यायालय ने इस जनादेश को प्रभावी बनाने के लिये मानकीकृत सूत्र और सिद्धांत विकसित किये हैं। 
  • एक बार उतावलेपन एवं उपेक्षापूर्ण वाहन चालन स्थापित हो जाने पर, प्रतिकर की राशि तीन चरणों में निर्धारित की जाती है: मूलभूत तथ्यों का निर्धारण, उन्हें निर्धारित मदों पर लागू करना तथा निर्धारित राशियों का समुच्चयन (Aggregation) करना। 

चरण 1: मूलभूत तथ्यों की स्थापना 

अधिकरण सबसे पहले तीन तथ्यों का निर्धारण करता है: दुर्घटना के समय मृतक की आयु, उनकी वार्षिक आय और आश्रितों की संख्या। 

आयु: सरोज (2024) मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि आयु का निर्धारण स्कूल छोड़ने के प्रमाण पत्र में दर्ज जन्म तिथि से किया जा सकता है, न कि आधार कार्ड से। 

आय: आय का अर्थ है वास्तविक आय में से अदा किया गया आयकर घटा दिया गया (प्रणय सेठी)। 

  • रश्मिरेखा त्रिपाठी (2026) मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि वेतनभोगी व्यक्तियों के लिये, तत्काल पूर्ववर्ती मूल्यांकन वर्ष के आयकर रिटर्न पर सामान्यतः विचार किया जाना चाहिये। 
  • स्वरोजगार प्राप्त व्यक्तियों या व्यवसाय स्वामियों के मामले में, अधिकरण को परिस्थितियों के अधीन रहते हुए, पिछले तीन वर्षों के आयकर विवरण में दर्शाई गई औसत आय को ध्यान में रखना चाहिये। 
  • जहाँ आय साबित नहीं की जा सकती, वहाँ संबंधित अवधि और कौशल श्रेणी (अकुशल, अर्ध-कुशल या कुशल) के लिये राज्य द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी लागू होती है। 

दावेदार: जितेंद्र कुमार (2025) मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह तय किया कि मृतक पर वित्तीय निर्भरता की परवाह किये बिना, विवाहित और कमाने वाले पुत्र और पुत्री सहित सभी विधिक वारिस प्रतिकर का दावा कर सकते हैं। 

चरण 2: प्रतिकर के चार शीर्षों को लागू करना   

इसके बाद तथ्यों को चार शीर्षों पर लागू किया जाता है: (A) आश्रितता की हानि (आय की हानि), (B) संपत्ति की हानि, (C) अंतिम संस्कार व्यय और (D) वैवाहिक संबंधों की हानि। 

चरण 

 

प्रतिकर की मद 

 

सूत्र 

परिणाम 

1 

आश्रितता की हानि (आय की हानि) 

[(वार्षिक आय + भावी संभावनाएँ) − कटौती] × गुणक 

(A) 

2 

संपदा की हानि 

परंपरागत राशि : ₹15,000; वर्तमान में प्रत्येक 3 वर्ष में 10% वृद्धि के पश्चात् ₹18,150 

(B) 

3 

अंत्येष्टि व्यय 

परंपरागत राशि: ₹15,000; वर्तमान में प्रत्येक 3 वर्ष में 10% वृद्धि के पश्चात् ₹18,150  

(C) 

4 

सहचारिता की हानि 

परंपरागत राशि : ₹40,000; वर्तमान में प्रत्येक 3 वर्ष में 10% वृद्धि के पश्चात् ₹48,400 × सहचारिता के हकदार दावेदारों की संख्या 

(D) 

 

कुल प्रतिकर 

 

(A) + (B) + (C) + (D) 

 

(A) आश्रितता की हानि (Loss of Dependency): प्रमुख मद  

  • आय की हानि उस वित्तीय क्षति को दर्शाती है, जो मृतक की मृत्यु के कारण आश्रितों को होती है। भावी संभावनाओं (Future Prospects) के लिए निर्धारित प्रतिशत को वार्षिक आय में जोड़ा जाता है, व्यक्तिगत व्ययों के लिए की जाने वाली कटौती को घटाया जाता है, तथा शेष राशि को लागू गुणक से गुणा किया जाता है। 

भावी संभावनाएँ : यह उस कैरियरगत वृद्धि को ध्यान में रखता है, जो मृतक को युक्तियुक्त रूप से प्राप्त हो सकती थी। इसे प्रणय सेठी के निर्णय के पैरा 61 में निम्नानुसार निर्धारित किया गया है: 

मृतक की आयु 

स्थायी नौकरी / सुनिश्चित पदोन्नति सहित वेतनभोगी 

स्व-नियोजित / नियत वेतन  

40 वर्ष से कम 

50% 

40% 

40 से 50 वर्ष 

30% 

25% 

50 से 60 वर्ष 

15% 

10% 

60 वर्ष से अधिक 

शून्य (Nil)  

शून्य (Nil) 

 

व्यक्तिगत खर्चों के लिये कटौती:  यह इस बात को मान्यता देता है कि मृतक की कमाई का एक भाग उनके अपने जीवन-यापन के खर्चों में खर्च होता।  सरला वर्मा के अनुसार : 

मृतक की स्थिति 

कटौती 

विवाहित, 2 से 3 आश्रित 

एक-तिहाई (33%) 

विवाहित, 4 से 6 आश्रित 

एक-चौथाई (25%) 

विवाहित, 7 या अधिक आश्रित 

एक-पाँचवाँ (20%) 

अविवाहित/कुंवारा (माता-पिता या अन्य आश्रित द्वारा दावा किये जाने पर) 

एक-आधा (50%) 

 

अविवाहित मृतक के मामले में, यदि आश्रितों की संख्या विशेष रूप से अधिक हो तो न्यायालय कटौती को कम कर सकते हैं। 

गुणक: गुणक मृतक के शेष सक्रिय कार्य जीवन को दर्शाता है और पूरी तरह से आयु पर निर्भर करता है। सरला वर्मा के अधीन : 

मृतक की आयु 

गुणक 

15 से 20 तथा 21 से 25 वर्ष 

18 

26 से 30 वर्ष 

17 

31 से 35 वर्ष 

16 

36 से 40 वर्ष 

15 

41 से 45 वर्ष 

14 

46 से 50 वर्ष 

13 

51 से 55 वर्ष 

11 

56 से 60 वर्ष 

9 

61 से 65 वर्ष 

7 

66 से 70 वर्ष 

5 

 

(B), (C) और (D) पारंपरिक मदें  

आय की हानि के विपरीत, शेष तीन मद मृतक के पेशे या आय पर निर्भर नहीं करते हैं। प्रणय सेठी के अनुसार : 

  • संपत्ति की हानि ₹15,000 निर्धारित की गई थी। यह मृतक की बचत, निवेश और परिसंपत्तियों का प्रतिनिधित्व करती है जो वह उचित रूप से अर्जित कर सकता था और अपने उत्तराधिकारियों के लिये छोड़ सकता था। 
  • अंतिम संस्कार का खर्च 15,000 रुपए तय किया गया था। 
  • परिवार के प्रत्येक पात्र सदस्य के लिये वैवाहिक संबंधों के नुकसान की राशि ₹40,000 निर्धारित की गई है। इसमें भावनात्मक आघात और साथ, प्रेम, देखरेख और मार्गदर्शन के नुकसान को शामिल किया गया है। 

परिवार के सदस्यों के लिये निर्धारित राशि में जीवित पति या पत्नी के लिये वैवाहिक सहायता, जीवित बच्चों के लिये माता-पिता के लिये वैवाहिक सहायता और बच्चे को खोने वाले माता-पिता के लिये संतान सहायता शामिल है। परिवार का प्रत्येक पात्र सदस्य आधार राशि का स्वतंत्र रूप से हकदार है, इसलिये इसे पात्र दावेदारों की संख्या से गुणा किया जाता है। 

प्रणय सेठी के अनुच्छेद 61 में दिये गए निर्देशानुसार, तीनों पारंपरिक राशियों में हर तीन वर्ष में 10% की वृद्धि की जानी है। 

चरण 3: राशियों का एकत्रीकरण: 

  • चारों मदों को जोड़कर देय कुल प्रतिकर की राशि निकाली जाती है। 
  • अधिकरण मामले के तथ्यों के आधार पर, धारा 171 के अधीन ब्याज भी दे सकता है, जो सामान्यतः 6% और 9% के बीच होता है। 

"घरेलू देखरेख की हानि" की नई मद क्या है? 

  • शिशु पाल (2026) मामले में, जिसमें एक गृहिणी की आकस्मिक मृत्यु शामिल थी, उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि खाना पकाने, सफाई करने और देखरेख करने सहित घरेलू काम, वेतनभोगी कार्यबल का समर्थन करता है। 
  • न्यायालय ने "घरेलू देखरेख की हानि" नामक एक नए मद के अधीन न्यूनतम काल्पनिक आय ₹30,000 प्रति माह निर्धारित की, जिसमें हर तीन वर्ष में 10% की संचयी वृद्धि होगी। 

निष्कर्ष 

मोटर यान अधिनियम मोटर दुर्घटना दावों के लिये एक व्यापक सांविधिक योजना प्रदान करता है, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) प्रतिकर की राशि और भुगतान के लिये उत्तरदायी पक्ष का निर्धारण करते हैं। बीमाकर्ता सामान्यतः सीमित सांविधिक प्रतिरक्षा और भुगतान एवं वसूली सिद्धांत के अधीन रहते हुए प्रतिकर का भुगतान करते हैं। 

सरला वर्मा और प्रणय सेठी के मामलों के माध्यम से, उच्चतम न्यायालय ने "उचित" प्रतिकर के अनिश्चित दायरे को मृतक की आयु, आय और आश्रितों पर आधारित एक संरचित, पूर्वानुमानित सूत्र में बदल दिया है। हाल के निर्णयों ने इसे और परिष्कृत किया है: आयु और आय को साबित करने के तरीके को निर्धारित किया है, सभी विधिक प्रतिनिधियों को दावे का अधिकार दिया है, और गृहिणी के काम के आर्थिक मूल्य को मान्यता दी है। 

भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु की व्यापकता को देखते हुए, मृतकों के परिवारों पर पड़ने वाले वित्तीय भार को कम करने के लिये एक स्पष्ट और सुसंगत प्रतिकर ढाँचा आवश्यक बना हुआ है।