- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
होम / एडिटोरियल
सांविधानिक विधि
क्या मतदान एक मौलिक अधिकार होना चाहिये?
«28-Sep-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
हाल ही में, इंडियन एक्सप्रेस के एक अन्वेषण में भारत के तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग (EC) के भीतर अभूतपूर्व मतभेद का प्रकटन हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध 10 महीनों में 14 आपत्तियां दर्ज कराईं। ये आपत्तियां नियमों में एकतरफा परिवर्तन, मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने, और आयोग की पूर्ण स्वीकृति के बिना केंद्रीकृत डेटा एक्सेस से संबंधित थीं।
- रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि गोवा के 97 पात्र मतदाताओं को निर्वाचक नामावली से इसलिये बाहर कर दिया गया क्योंकि केंद्रीकृत ECINet सॉफ्टवेयर ने जमीनी स्तर पर कार्यरत निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (EROs) को किये गए विलोपन को वापस लेने की अनुमति नहीं दी।
- इसके परिणाम केवल मतदान के अधिकार की हानि तक सीमित नहीं हैं, क्योंकि कई राज्य योजनाएँ, जिनमें गोवा मेडिक्लेम योजना भी शामिल है, जो डायलिसिस (Dialysis), प्रत्यारोपण (Transplants) और कीमोथेरेपी (Chemotherapy) जैसी उपचार सेवाओं को आच्छादित करती है, पात्रता निर्धारित करने के लिये निर्वाचक नामावलियों का उपयोग करती हैं।
- इस घटनाक्रम ने मतदान के अधिकार की विधिक स्थिति तथा भारत की निर्वाचन व्यवस्था के कार्यकरण पर पुनः ध्यान आकर्षित किया है।
भारत में वयस्क मताधिकार को किन कारकों ने आकार दिया?
- कई पश्चिमी लोकतंत्रों ने मताधिकार को धीरे-धीरे बढ़ाया। इस मान्यता से प्रभावित होकर कि मतदान का अधिकार केवल "प्रबुद्ध" लोगों के लिये आरक्षित होना चाहिये, ब्रिटेन ने शुरू में मतदान को केवल पुरुष संपत्ति मालिकों तक ही सीमित रखा। सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार 1918 में ही प्राप्त हुआ, और महिलाओं को 1928 में मतदान का अधिकार मिला।
- अमेरिका में, 15वें और 19वें संशोधन ने अफ्रीकी अमेरिकियों (1870) और महिलाओं (1920) को मतदान का अधिकार दिया, फिर भी मतदान कर और साक्षरता परीक्षणों ने दशकों तक कई लोगों को मताधिकार से वंचित रखा।
- इसके विपरीत, भारत ने तत्काल सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाया। संविधान के अनुच्छेद 326 ने प्रत्येक वयस्क नागरिक को लिंग, जाति, धर्म, शिक्षा या संपत्ति की परवाह किये बिना मतदान का अधिकार प्रदान किया।
- इस प्रतिबद्धता को उच्चतम न्यायालय द्वारा, विशेष रूप से केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) के मामले में, और भी मजबूत किया गया, जिसने लोकतंत्र को संविधान की मूल संरचना के भाग के रूप में मान्यता दी।
- इस परिकल्पना को दो प्रमुख विधियों के माध्यम से क्रियान्वित किया गया:
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA, 1950), जो निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और पुनरीक्षण को विनियमित करता है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA, 1951), जो निर्वाचनों के संचालन, उम्मीदवारी और निर्वाचन संबंधी अपराधों को विनियमित करता है।
- प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त, सुकुमार सेन को 173 मिलियन मतदाताओं का नामांकन करने की चुनौती का सामना करना पड़ा, जिनमें से अधिकांश निरक्षर थे। उन्होंने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को व्यावहारिक रूप से सुलभ बनाने के लिये चुनाव चिह्नों की शुरुआत की।
मतदान के अधिकार की विधिक स्थिति क्या है?
- मतदान का अधिकार सांविधिक, सांविधानिक या मौलिक अधिकार है या नहीं, यह इस बात को निर्धारित करता है कि इसे कितनी आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है, इसे कैसे लागू किया जाता है और इसे किस स्तर की विधिक सुरक्षा प्राप्त होती है।
- यद्यपि बी.आर. अंबेडकर और के.टी. शाह ने इसे मौलिक अधिकारों में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन संविधान सभा की सलाहकार समिति ने इस विचार को खारिज कर दिया था।
- कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006): एक संविधान पीठ ने माना कि निर्वाचन का अधिकार लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62 के अधीन एक सांविधिक अधिकार है, और यह न तो मौलिक अधिकार है और न ही सांविधानिक अधिकार है।
- राजबाला बनाम हरियाणा राज्य (2015): दो न्यायाधीशों की पीठ ने मतदान के अधिकार को सांविधानिक अधिकार बताया। हालांकि, कुलदीप नैयर मामले में बड़ी पीठ का मत ही मान्य है।
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023): उच्चतम न्यायालय ने कुलदीप नैयर द्वारा इस मुद्दे को सुलझा हुआ मानते हुए इस पर कोई निर्णय देने से इंकार कर दिया। अपने असहमति वाले मत में, न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी ने कहा कि मतदान का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(क) की अभिव्यक्ति है और अनुच्छेद 21 के सार को दर्शाता है। यह मत अल्पमत का है।
- इसके होते हुए भी, न्यायालयों ने मतदान के अधिकार को लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग माना है, क्योंकि यह नागरिकों को शासन को आकार देने में सक्षम बनाता है, और इसे "लोकतांत्रिक अनिवार्यता" के रूप में वर्णित किया है।
हमें सटीक निर्वाचक नामावलियों की आवश्यकता क्यों है?
- स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन सटीक निर्वाचक नामावलियों पर निर्भर करते हैं। बड़े पैमाने पर नामों का विलोपन, अपात्र व्यक्तियों का समावेशन, दोहराव अथवा गलत प्रविष्टियाँ “एक व्यक्ति, एक मत” (One Person, One Vote) के सिद्धांत को कमजोर करती हैं, क्योंकि इनके माध्यम से प्रतिरूपण, मताधिकार से वंचित करना अथवा मतों का तनुकरण (Vote Dilution) संभव हो सकता है।
- सांविधिक और सांविधानिक ढाँचा:
- अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों का सांविधानिक संरक्षक बनाता है, जिसके पास पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्तियां हैं।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 निर्वाचन आयोग को निर्वाचक नामावलियों को तैयार करने एवं उनका पुनरीक्षण करने के लिये सशक्त करती है। ।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 19 के अधीन, 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को, जो किसी निर्वाचन क्षेत्र में "सामान्य निवासी" है और अपात्र नहीं है, पंजीकरण का अधिकार है। सामान्य निवास का तात्पर्य वास्तविक, निरंतर उपस्थिति से है, न कि अस्थायी प्रवास से।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 निर्वाचन आयोग के कामकाज को नियंत्रित करता है। धारा 17 के अनुसार कामकाज अधिनियम के अनुरूप संचालित किया जाना अनिवार्य है, और धारा 18 सर्वसम्मति से निर्णय द्वारा प्रक्रिया एवं कार्य आवंटन को विनियमित करने की अनुमति देती है। जहाँ तक संभव हो, कामकाज सर्वसम्मति से किया जाना चाहिये, और जहाँ आयुक्तों के मत भिन्न हों, वहाँ बहुमत से किया जाना चाहिये।
- न्यायिक दृष्टिकोण: न्यायालयों ने यह माना है कि केवल वे गंभीर, प्रणालीगत त्रुटियाँ जो निर्वाचन परिणाम को "भौतिक रूप से प्रभावित" करती हैं, निर्वाचक नामावली की पवित्रता को खतरे में डालती हैं। मामूली गलतियाँ या छिटपुट मताधिकार से वंचित करना इसके लिये पर्याप्त नहीं है।
- लक्ष्मी चरण सेन बनाम ए.के.एम. हसन उज्जमान (1985): न्यायालय ने माना कि शामिल किये जाने या आपत्ति उठाने का अधिकार व्यक्तियों को दिया गया है, न कि राजनीतिक दलों को, लेकिन यह भी कहा कि दलों को यह सुनिश्चित करने में सहायता करनी चाहिये कि योग्य मतदाताओं को शामिल किया जाए और अयोग्य लोगों को हटा दिया जाए।
- गोवा प्रकरण: हटाए गए नाम न्यायालयों द्वारा प्रयोग किये जाने वाले "महत्त्वपूर्ण बनाम पृथक" द्वंद्व को जटिल बना देते हैं। 97 मतदाताओं के नाम कपट से नहीं हटाए गए, अपितु इसलिये हटाए गए क्योंकि ECINet सॉफ़्टवेयर ने EROs को गलत हटाए गए नामों को वापस लेने की शक्ति नहीं दी। यद्यपि EROs ने ईमेल के माध्यम से आयोग को इन अनियमितताओं की सूचना दी, लेकिन प्रविष्टियों को बहाल नहीं किया गया। यह सॉफ़्टवेयर के डिज़ाइन में अंतर्निहित प्रणालीगत विफलता और प्रशासनिक निष्क्रियता को दर्शाता है, न कि किसी लिपिकीय त्रुटि को।
आगे क्या राह है?
- यदि मताधिकार की सांविधानिक रूप से सुरक्षा करने के लिये उत्तरदायी निकाय स्वयं एकपक्षीय कार्रवाई के संबंध में विभाजित है, और नागरिकों को केवल निर्वाचन आयोग (EC) की आंतरिक सुधार तंत्र अथवा ऐसे सांविधिक अधिकार पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसकी सीमा संसद द्वारा कम की जा सकती है, तो मतदान का अधिकार अभी भी असुरक्षित बना रहता है।
- कई विद्वानों का तर्क है कि मतदान का अधिकार केवल सांविधिक नहीं हो सकता, जैसा कि यह अनुच्छेद 326 से प्राप्त होता है, और किसी भी नियामक विधि को अनुच्छेद 325 और 326 के अनुरूप होना चाहिये। चूँकि "स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन" और "लोकतंत्र" संविधान की मूलभूत विशेषताएं हैं, इसलिये विधायिका इस पर तर्कहीन या अनुचित प्रतिबंध नहीं लगा सकती है।
- अनूप बरनवाल मामले में न्यायमूर्ति रस्तोगी की असहमति एक बड़ी पीठ के लिये कुलदीप नैयर मामले में सुलझाए गए प्रश्न पर पुनर्विचार करने का सैद्धांतिक आधार प्रदान करती है।
- मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान करने से निर्वाचक नामावलियों को शुद्ध एवं परिशोधित करने की निर्वाचन आयोग (EC) की शक्ति कम नहीं होगी। इसके बजाय, यह उस शक्ति को मौलिक अधिकारों पर लागू होने वाले उच्चतर न्यायिक पुनर्विलोकन के मानदंड के अधीन कर देगा, जिससे निर्वाचन प्रशासन के केंद्रीकरण को नागरिक के निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किए जाने के दावे के साथ संतुलित किया जा सके ।
निष्कर्ष
निर्वाचन आयोग के भीतर रिपोर्ट किये गए मतभेद तथा गोवा में पात्र मतदाताओं के सदोष विलोपन ने ऐसे अधिकार की संवेदनशीलता को उजागर किया है, जो भारतीय लोकतंत्र के लिए केंद्रीय महत्त्व रखने के बावजूद विधि में अभी भी केवल सांविधिक अधिकार है। यद्यपि कुलदीप नैयर का निर्णय अभी भी क्षेत्राधिकार में प्रभावी है, तथापि निर्वाचन प्रशासन में केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर की बढ़ती भूमिका तथा अनूप बरनवाल मामले में अल्पमत मत पुनर्विचार के पक्ष को सुदृढ़ करते हैं। ऐसे लोकतंत्र में, जहाँ प्रौद्योगिकी मतदाता और मतपत्र के मध्य संबंध को निरंतर प्रभावित कर रही है, मतदान के अधिकार की सांविधानिक स्थिति अब केवल विधायिका की कृपा पर निर्भर नहीं रह सकती।
चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद और गोवा में योग्य मतदाताओं को गलत तरीके से मतदान से बाहर किए जाने से एक ऐसे अधिकार की कमजोरी उजागर होती है, जो भारतीय लोकतंत्र का केंद्र होने के बावजूद, केवल विधिक रूप से ही मान्य है। कुलदीप नैयर का दबदबा अभी भी कायम है, लेकिन चुनावी प्रशासन में केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर की बढ़ती भूमिका और अनूप बरनवाल के अल्पमत के दृष्टिकोण से इस अधिकार पर पुनर्विचार की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। एक ऐसे लोकतंत्र में जहां प्रौद्योगिकी मतदाता और मतपत्र के बीच संबंध को तेजी से प्रभावित कर रही है, मतदान के अधिकार की संवैधानिक स्थिति अब केवल विधायी अनुग्रह पर निर्भर नहीं रह सकती।