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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

गिरफ्तारी के आधारों में जब्त की गई प्रतिबंधित वस्तु की स्पष्ट मात्रा का उल्लेख अनिवार्य नहीं है

 27-Mar-2026

अरुण कुमार पी. बनाम केरल राज्य और अन्य 

"मात्रा का उल्लेख करने का उद्देश्य अभियुक्त को यह पहचानने में सक्षम बनाना है कि अपराध जमानतीय है या अजमानतीयऔर क्या इसमें शामिल मात्रा छोटीमध्यम या वाणिज्यिक है।" 

डॉ. न्यायमूर्ति कौसर एडप्पागथ 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डॉ. कौसर एडप्पागथ नेअरुण कुमार पी. बनाम केरल राज्य और अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि गिरफ्तारी नोटिस के आधारों में प्रतिबंधित वस्तु की मात्रा की प्रकृति - चाहे वह छोटीमध्यम या वाणिज्यिक हो - का उल्लेख करना विधि के आदेश का पर्याप्त अनुपालन हैभले ही स्पष्ट मात्रा निर्दिष्ट न की गई हो। 

  • न्यायालय ने आगे कहा कि मात्रा का उल्लेख करने का एकमात्र उद्देश्य अभियुक्त को यह निर्धारित करने में सक्षम बनाना है कि अपराध जमानतीय है या अजमानतीयऔर मात्रा की प्रकृति को निर्दिष्ट करना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 47 और 48 के अधीन इस उद्देश्य की पर्याप्त रूप से पूर्ति करता है।  

अरुण कुमार पी. बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • न्यायालय के समक्ष मामला याचिकाकर्त्ता अरुण कुमार पी. द्वारा दायर जमानत याचिका से संबंधित थाजिसे लगभग 195 ग्राम MDMA के कब्जे में पाए जाने पर गिरफ्तार किया गया था। 
  • उसके विरुद्ध स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 की धारा 22(ग) के अधीन अपराध दर्ज किया गया था। 
  • याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 47 के अधीन निर्धारित गिरफ्तारी के आधारों को सूचित करने की अनिवार्य आवश्यकता का अनुपालन नहीं किया गयाजिससे उसकी गिरफ्तारी अवैध हो गई और वह जमानत का हकदार हो गया। 
  • अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि सभी विधिक औपचारिकताओं का विधिवत पालन किया गया था और कथित कृत्य एक साशय किया गया आपराधिक कृत्य था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने पाया कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्त्ता को अपराध से जोड़ने के लिये पर्याप्त सबूत विद्यमान हैं और उसने गिरफ्तारी के कारणों को संप्रेषित करने के आदेश के कथित गैर-अनुपालन के प्रश्न की परीक्षा शुरू की। 
  • याचिकाकर्त्ता ने बताया कि यद्यपि उसे और उसके रिश्तेदार को गिरफ्तारी के आधार और कारण बता दिये गए थेलेकिन नोटिस में जब्त की गई प्रतिबंधित वस्तु की मात्रा का कोई उल्लेख नहीं था। तथापिन्यायालय ने कहा कि नोटिस में जब्त की गई मात्रा को वाणिज्यिक मात्रा के रूप में निर्दिष्ट किया गया था।  
  • न्यायालय ने माना कि मात्रा का उल्लेख करने का उद्देश्य अभियुक्त को यह पहचानने में सक्षम बनाना है कि अपराध जमानतीय है या अजमानतीयऔर मात्रा की प्रकृति क्या है। यदि गिरफ्तारी के आधारों में यह कहा गया है कि मात्रा छोटीमध्यम या वाणिज्यिक हैतो यहभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 47 और 48 का पर्याप्त अनुपालन माना जाएगा - भले ही स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध न हो। 
  • यह पाते हुए कि याचिकाकर्त्ता और उसके रिश्तेदार को गिरफ्तारी के कारणों की उचित जानकारी दे दी गई थीन्यायालय ने जमानत याचिका खारिज कर दी। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 47 क्या है 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 47 - गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों और जमानत के अधिकार की इत्तिला दी जाना: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 47, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 50 के समान है। 
  • यह बिना वारण्ट के गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी या किसी भी व्यक्ति पर दो भिन्न दायित्त्व डालता है। 

उपधारा (1) — गिरफ्तारी के आधारों को संसूचित करना: 

  • गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को तुरंत - बिना किसी विलंब के - गिरफ्तार व्यक्ति को अपराध का पूरा विवरण या गिरफ्तारी के आधारों के बारे में संसूचित करना होगा। 
  • यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) का सांविधिक प्रतिबिंब हैजो प्रत्याभूत करता है कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी दिये बिना गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। 

उपधारा (2) — जमानत का अधिकार: 

  • यदि गिरफ्तारी किसी जमानतीय अपराध के संबंध में की जाती हैतो गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को गिरफ्तार व्यक्ति को संसूचित करना होगा कि वह जमानत पर छोड़े जाने का हकदार है और वह उसकी ओर से प्रतिभूओं की व्यवस्था कर सकता है। 
  • यह दायित्त्व अजमानतीय अपराधों से जुड़े मामलों में लागू नहीं होता है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48 — गिरफ्तारी करने वाले व्यक्ति की, गिरफ्तारी आदि की बारे में, नातेदार या मित्र को जानकारी देने की बाध्यता की: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 48, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 50क के समान है। 
  • यह गिरफ्तार करने वाले अधिकारी पर यह अनिवार्य बाध्यता डालती है कि वह गिरफ्तार व्यक्ति के किसी नातेदार या मित्र को गिरफ्तारी और निरोध के स्थान के बारे में इत्तिला करे। 

उपधारा (1) — नातेदार या मित्रों को इत्तिला करने का कर्त्तव्य: 

  • गिरफ्तारी करने वाले प्रत्येक पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति को तुरंत—बिना किसी विलंब के—निम्नलिखित के संबंध में जानकारी देनी होगी: 
    • गिरफ्तारी का तथ्यऔर 
    • वह स्थान जहाँ गिरफ्तार व्यक्ति को रखा गया है। 
  • यह जानकारी गिरफ्तार व्यक्ति के किसी भी नातेदारमित्र या ऐसे अन्य व्यक्तियों को दी जानी चाहिये जिनका नाम गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा बताया गया हो या जिन्हें गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा नामित किया गया हो। 
  • इसके अतिरिक्तजिले के नामित पुलिस अधिकारी को भी इत्तिला देनी होगी। 

उपधारा (2) — गिरफ्तार व्यक्ति को उसके अधिकारों की सूचना देना: 

  • जैसे ही गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस थाने लाया जाता हैपुलिस अधिकारी को उसे उपधारा (1) के अधीन उसके अधिकारों के बारे में सूचित करना चाहिये – अर्थात्उसके किसी नातेदार या मित्र को उसकी गिरफ्तारी के बारे में सूचित करने का अधिकार। 

उपधारा (3) — थाने के अभिलेख में प्रविष्टि: 

  • पुलिस थाने में रखी गई एक पुस्तिका में इस तथ्य की प्रविष्टि को अभिलिखित किया जाना चाहिये कि गिरफ्तारी की सूचना किसे दी गई है। 
  • ऐसी पुस्तक का प्ररूप राज्य सरकार द्वारा नियमों के माध्यम से विहित किया जाएगा। 

उपधारा (4) — मजिस्ट्रेट का कर्त्तव्य: 

  • जब गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाता हैतो मजिस्ट्रेट का यह कर्त्तव्य है कि वह स्वयं को संतुष्ट करे कि उपधारा (2) और (3) की आवश्यकताओं का विधिवत अनुपालन किया गया है। 
  • इससे मजिस्ट्रेट पर एक सक्रिय पर्यवेक्षण दायित्त्व आ जाता है - न कि केवल एक निष्क्रिय दायित्त्व 

आपराधिक कानून

यदि अभियुक्त को आरोप पढ़कर सुनाए जाएं तो बिना हस्ताक्षर वाली आरोपपत्र घातक नहीं होती

 27-Mar-2026

संदीप यादव बनाम सतीश और अन्य 

"आरोपपत्र पर हस्ताक्षर न होने से संबंधित दोष किसी प्रकार अवैध नहीं है। यह अधिक से अधिकदण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 215 और 464 के अंतर्गत एक सुधरने योग्य प्रक्रियात्मक अनियमितता है। न्याय में किसी प्रकार की विफलता सिद्ध न होने की स्थिति मेंऐसा दोष कार्यवाही को अमान्य नहीं कर सकता।" 

न्यायमूर्ति आर. महादेवन और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ नेसंदीप यादव बनाम सतीश और अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि आरोप विरचित करने के आदेश पत्र पर हस्ताक्षर न करने से विचारण अमान्य नहीं होता हैजहाँ अभियुक्तों को आरोप विधिवत पढ़कर सुनाए गए थेउन्होंने आरोपों की प्रकृति को समझा था और विचारण की कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लिया था। 

  • न्यायालय ने आगे कहा कि निर्णायक कसौटी प्रक्रियात्मक दोष का अस्तित्व नहीं हैअपितु यह है कि क्या अभियुक्त को अपनी प्रतिरक्षा के संचालन में गुमराह किया गया था और क्या वास्तव में न्याय की विफलता हुई है। 

संदीप यादव बनाम सतीश और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अभियुक्तों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 147, 148, 149, 307, 302 और 120ख के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। 
  • आरोप पत्र दाखिल होने के बादमामले को विचारण के लिये सेशन न्यायालय को सौंप दिया गया। 
  • विचारण न्यायालय ने एक को छोड़कर बाकी सभी अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप पत्र विरचित करने की कार्यवाही शुरू कीउस एक अभियुक्त ने स्वयं को निर्दोष बताया। 
  • अभियुक्तों को आरोप पढ़कर सुनाए गए और समझाए गए। तथापिआरोप पत्र विरचित करने वाली आदेश पुस्तिका पर विचारण न्यायालय के हस्ताक्षर नहीं थे। 
  • अभियुक्तों ने आरोप विरचित होने के बाद विचारण की कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लियाजिसमें अभियोजन पक्ष के साक्षियों से व्यापक प्रतिपरीक्षा भी शामिल थीऔर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं उठाई। 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अधीन परीक्षा के प्रक्रम में ही अभियुक्त को यह अहसास हुआ कि आरोप पत्र विरचित करने वाले आदेश पर हस्ताक्षर नहीं थे। 
  • इस आधार पर नए सिरे से विचारण की मांग करते हुएअभियुक्त ने धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया। 
  • उच्च न्यायालय ने आवेदन मंजूर कर लिया और नए सिरे से विचारण करने का निदेश दिया। इस आदेश से असंतुष्ट होकर परिवादकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त करते हुए कहा कि आरोप-विरचित करने के आदेश पत्र पर हस्ताक्षर का न होना धारा 215 और 464 दण्ड प्रक्रिया संहिता के दायरे में आने वाली एक उपचार योग्य प्रक्रियात्मक अनियमितता है और यहविचारण को अमान्य करने वाली अवैधता नहीं है। 
  • न्यायालय ने पाया कि जहाँ अभियुक्त आरोपों की प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझता था और उसे प्रतिरक्षा करने का पूरा अवसर मिला थावहाँ आरोप में खामियों को निर्णायक नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने तर्क दिया किऔपचारिक रूप से आरोप विरचित न होना भी कार्यवाही को अमान्य नहीं करता - निर्णायक कसौटी यह है कि क्या अभियुक्त को अपनी प्रतिरक्षा के संचालन में गुमराह किया गया था और क्या इससे न्याय में विफलता हुई है। 
  • न्यायालय ने कहा कि प्रतिरक्षा पक्ष ने कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लिया और अभियोजन पक्ष के साक्षियों से विस्तृत प्रतिपरीक्षा की। प्रतिपरीक्षा की प्रकृति से स्पष्ट होता है कि अभियुक्त अभियोजन पक्ष के मामले से पूरी तरह अवगत थेजिसमें उनकी कथित भूमिकाएँअपराध करने का तरीका और प्रतिरक्षा पक्ष द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले तर्कजिनमें ‘plea of alibi’ (घटनास्थल पर मौजूद न होने का दावा) भी शामिल थासभी शामिल थे। 
  • न्यायालय ने माना कि विचारण की पूरी कार्यवाही के दौरान अभियुक्तों की निरंतर सहभागिता और कथित त्रुटि पर कोई आपत्ति न उठाने से यह और पुष्ट होता है कि उन्हें न तो गुमराह किया गया और न ही किसी भी प्रकार से उनके साथ विभेद किया गया। यद्यपि आरोप पत्र पर हस्ताक्षर न होना एक प्रक्रियात्मक लोप हैलेकिन इससे कार्यवाही अमान्य नहीं हो जातीक्योंकि आरोप पत्र वास्तव में न्यायालय और संबंधित पक्षकारों द्वारा तैयार किया गयादर्ज किया गयापढ़ा गया और उस पर कार्रवाई की गई थी। 
  • तदनुसारन्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय द्वारा पर्याप्त प्रगति होने और साक्ष्य अभिलिखित किये जाने के बाद नए सिरे से विचारण का निदेश देना उचित नहीं था। अपील मंजूर करते हुए विचारण न्यायालय को आदेश दिया गया कि वह मामले को विवादित आदेश से पूर्व की स्थिति से आगे बढ़ाए और विधि के अनुसार कार्यवाही को शीघ्रता से समाप्त करे। 

आदेश-पत्र (Order Sheet) क्या है? 

  • आदेश-पत्र (Order Sheet) एक आधिकारिक अभिलेख है जिसे न्यायालय द्वारा प्रत्येक मामले में रखा जाता हैजिसमें पीठासीन न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट सुनवाई की प्रत्येक तिथि पर पारित सभी आदेशोंनिर्देशों और कार्यवाही को अभिलिखित करते हैं। 
  • साधारण शब्दों में कहें तोयह मामले की दैनिक डायरी की तरह है - जब भी मामला न्यायालय के सामने आता हैन्यायाधीश उस दिन हुई घटना और अगले कदम को लिख लेते हैंऔर फिर प्रविष्टि को प्रमाणित करने के लिये उस पर हस्ताक्षर कर देते हैं। 

इसमें सामान्यत: क्या शामिल होता है: 

  • सुनवाई की तिथि 
  • उपस्थित पक्षकारों या उनके अधिवक्ताओं के नाम 
  • उस दिन न्यायालय में जो कुछ घटित हुआ उसका संक्षिप्त सारांश 
  • न्यायालय द्वारा पारित आदेश या निदेश 
  • अगली सुनवाई की तारीख 
  • न्यायाधीश के हस्ताक्षर - जो सबसे महत्त्वपूर्ण भाग हैक्योंकि यह आदेश को प्रमाणित करता है।