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आपराधिक कानून

द्वितीय प्रथम सूचना रिपोर्ट तभी पोषणीय होगी जब उससे व्यापक षड्यंत्र का खुलासा हो

 03-Apr-2026

काली दास एवं अन्य.बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य 

"द्वितीय प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को विधिक रूप से अग्राह्य नहीं कहा जा सकता... यह उस श्रेणी में आती है जहाँ पश्चात्वर्ती अन्वेषण में एक व्यापक षड्यंत्र का खुलासा होता हैजो क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर स्वतंत्र पंजीकरण को उचित ठहराता है।" 

न्यायमूर्ति संजय परिहार 

स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय परिहार नेकाली दास और अन्य बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि द्वितीय प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करना विधि के अधीन वर्जित नहीं हैजहाँ यह पूर्ववर्ती प्रथम सूचना रिपोर्ट के अन्वेषण के दौरान उजागर हुए एक व्यापक षड्यंत्र से संबंधित होबशर्ते कि दोनों प्रथम सूचना रिपोर्ट एक ही घटना या मामले से संबंधित न हों। 

  • न्यायालय ने टी.टी. एंटनी बनाम केरल राज्य (2001)और बाद के पूर्व निर्णयों पर विश्वास करते हुए, "समानता की कसौटी" को निर्णायक मानक के रूप में लागू कियाजिससे द्वितीय प्रथम सूचना रिपोर्ट की वैधता को बरकरार रखा जा सके और आरोप विरचित करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज किया जा सके।   

काली दास और अन्य बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • ये याचिकाएँ विचारण न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थींजिसमें याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध आरोप विरचित किये गए थे। याचिकाकर्त्ता सिविल सप्लाईज़ एवं उपभोक्ता मामले तथा लोक वितरण (CAPD) विभाग के अधिकारी थे। 
  • इससे पहले लोक वितरण प्रणाली के अधीन केरोसिन तेल की कालाबाजारी की एक विशिष्ट घटना के संबंध में एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (संख्या 91/2006) दर्ज की गई थीजो एक विशेष आवंटन आदेश से संबंधित अतिरिक्त केरोसिन स्टॉक का पता चलने के कारण हुई थीजिस पर फर्जी होने का संदेह था। 
  • उस मामले के अन्वेषण के दौरान यह पता चला कि बाजार में इसी तरह के कूटरचित आवंटन आदेश प्रसारित किये जा रहे थेजो एक बड़े रैकेट का संकेत था। इसके चलते एक द्वितीय प्रथम सूचना रिपोर्ट (संख्या 31/2006) दर्ज की गईजो कई कूटरचित आवंटन आदेशों को तैयार करने और प्रसारित करने से संबंधित एक व्यापक षड्यंत्र से जुड़ी थी। 
  • याचिकाकर्त्ताओं - सिविल सप्लाईज़ एवं उपभोक्ता मामले तथा लोक वितरण (CAPD) विभाग के अधिकारियों - को द्वितीय प्रथम सूचना रिपोर्ट में निजी व्यक्तियों के साथ मिलीभगत करके इन कूटरचित दस्तावेज़ों के प्रयोग को सुविधाजनक बनाने के आरोप में अभियुक्त बनाया गया था। उन्होंने मुख्य रूप से इस आधार पर आरोपों को विरचित करने को चुनौती दी कि द्वितीय प्रथम सूचना रिपोर्ट विधि द्वारा वर्जित थी क्योंकि यह उसी संव्यवहार से संबंधित थी जिसका जिक्र पहले ही पहली प्रथम सूचना रिपोर्ट में हो चुका था।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?   

  • न्यायालय ने माना कि टी. टी. एंटनी बनाम केरल राज्य (2001) के मामलेमें निर्धारित एकाधिक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने पर प्रतिबंधपूर्णतः लागू नहीं होता। यह केवल तभी लागू होता है जब बाद की प्रथम सूचना रिपोर्ट उसी घटना या मामले से संबंधित हो जो पूर्ववर्ती प्रथम सूचना रिपोर्ट का विषय है। न्यायालय ने दोहराया कि निर्णायक कसौटी "समानता की कसौटी" है।  
  • इस मानदंड को लागू करते हुएन्यायालय ने दोनों प्रथम सूचना रिपोर्ट में अंतर पाया — पहली प्रथम सूचना रिपोर्ट एक आवंटन आदेश के आधार पर कालाबाजारी के एक विशिष्ट मामले से संबंधित थीजबकि द्वितीय प्रथम सूचना रिपोर्ट एक व्यापक षड्यंत्र से संबंधित थी जिसमें समयावधि में कई जाली आवंटन आदेश तैयार करना और प्रसारित करना शामिल था। यद्यपि दोनों प्रथम सूचना रिपोर्ट आपस में जुड़ी हुई थींफिर भी उन्हें अपराध के अलग-अलग क्षेत्रों में पाया गया। 
  • न्यायालय नेबाबूभाई बनाम गुजरात राज्य (2010) के मामलेपर विश्वास करते हुए इस बात की पुष्टि की कि यदि संबंधित प्रथम सूचना रिपोर्ट "एक ही संव्यवहार" के बजाय "एक भिन्न षड्यंत्र" से संबंधित हैंतो वे विधिक रूप से मान्य हो सकती हैं। 
  • अभियोग निर्धारण के प्रश्न पर न्यायालय ने बिहारराज्यबनाम रमेश सिंह (1977)औरभारत संघ बनाम प्रफुल्ल कुमार सामल (1979) के मामलों काहवाला देते हुए दोहराया कि इस स्तर पर न्यायालय को साक्ष्यों का गहन मूल्यांकन करने की आवश्यकता नहीं है। अभिलेख में विद्यमान सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला या गंभीर संदेह का अस्तित्व ही पर्याप्त है।  
  • न्यायालय ने आगे कहा कि षड्यंत्र से जुड़े अपराध सामान्यत: परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के माध्यम से साबित होते हैंऔर प्रत्यक्ष साक्ष्य की अनुपस्थिति प्रारंभिक स्तर पर आरोपों को अविश्वसनीय नहीं बनाती है। 
  • याचिकाओं को खारिज करते हुएउच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय को विधि के अनुसार विचारण की कार्यवाही आगे बढ़ाने का निदेश दिया। 

एकाधिक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के संदर्भ में "समानता की कसौटी" क्या है? 

  • द्वितीय प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने पर विधिक वर्जन के लिये "समानता की कसौटी" ही सर्वोपरि विधिक सिद्धांत है। जैसा कि उच्चतम न्यायालय नेटी. टी. एंटनी बनाम केरल राज्य (2001) के मामले में स्पष्ट किया है, एकाधिक प्रथम सूचना रिपोर्ट पर वर्जन तभी लागू होता है जब दोनों प्रथम सूचना रिपोर्ट एक ही घटना या मामलेसे संबंधित हों – अर्थात्जब दोनों प्रथम सूचना रिपोर्ट का विषय एक जैसा या सारतः समान हो। 
  • जहाँ बाद में दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट किसीभिन्न संव्यवहारव्यापक षड्यंत्र या अपराध के एक पृथक् क्षेत्रसे संबंधित हो - भले ही वह तथ्यात्मक रूप से पूर्ववर्ती प्रथम सूचना रिपोर्ट से जुड़ी हो - वह इस प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं करती है और विधि में पोषणीय है।              
  • यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि अन्वेषण को कृत्रिम रूप से टुकड़ों में न बांटा जाएसाथ ही एक ही घटना से उत्पन्न होने वाली कई कार्यवाहियों के माध्यम से अभियुक्त व्यक्तियों को उत्पीड़न से भी बचाया जा सके। न्यायालय इस परीक्षा को लागू करने के लिये प्रत्येक प्रथम सूचना रिपोर्ट के सार और दायरे की परीक्षा करते हैंन कि केवल उनके तथ्यात्मक समानता की।               

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) क्या है? 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अधीन दी गई जानकारी को सामान्यत: प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के रूप में जाना जाता हैतथापि इस शब्द का प्रयोग संहिता में नहीं किया गया है।    
  • यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 के अधीन प्रदान किया गया है। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के संबंध में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में शुरू की गई नई विशेषताएँ निम्नलिखित हैं: 
    • Zero FIR:भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अनुसारसंज्ञेय अपराध के घटित होने से संबंधित जानकारी को उस क्षेत्र की परवाह किये बिना दर्ज किया जाना चाहिये जहाँ अपराध किया गया हो।  
    • FIR इलेक्ट्रॉनिक रूप में दर्ज की जा सकती है:धारा 173 (1) में उपबंध है कि सूचना इलेक्ट्रॉनिक रूप में भी दी जा सकती है। इस स्थिति मेंप्रथम सूचना रिपोर्ट को सूचना देने वाले व्यक्ति द्वारा तीन दिनों के भीतर हस्ताक्षर किये जाने पर अभिलेख में दर्ज किया जाएगा।  
    • प्रारंभिक अन्वेषण का उपबंध:यदि संज्ञेय अपराध ऐसा है जिसके लिये वर्ष या उससे अधिक लेकिन वर्ष से कम के दण्ड का उपबंध हैतो पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारीपुलिस उप अधीक्षक की पूर्व अनुमति सेअपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुएनिम्नलिखित कार्य कर सकता है: 
      • चौदह दिनों की अवधि के भीतर इस बात का पता लगाने के लिये प्रारंभिक जांच करें कि क्या मामले में आगे बढ़ने के लिये प्रथम दृष्टया मामला बनता हैया 
      • प्रथम दृष्टया मामला बनने पर ही जांच आगे बढ़ाएं। 

सांविधानिक विधि

अपवादात्मक परिस्थितियों में कारण बताओ नोटिस को रिट अधिकारिता के अंतर्गत चुनौती दी जा है

 03-Apr-2026

श्री निशा बनाम विशेष निदेशकन्यायनिर्णय प्राधिकारीप्रवर्तन निदेशालय और अन्य 

"कारण बताओ नोटिस (SCN) के चरण पर हस्तक्षेप अपवादात्मक परिस्थितियों में अनुमेय हैजैसे कि जब उक्त नोटिस स्पष्ट रूप से अधिकारिता के अभाव से ग्रस्त होमस्तिष्क के अनुप्रयोग के अभाव को दर्शाता होपूर्व-निर्धारित या पूर्वनियोजित दृष्टिकोण के साथ जारी किया गया होविधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग करता होअथवा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन का परिणाम हो।" 

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ नेन्यायमूर्ति श्री निशा बनाम विशेष निदेशकन्यायनिर्णय प्राधिकारीप्रवर्तन निदेशालय और अन्य (2026)के मामले में दोहराया कि कारण बताओ नोटिसों (SCNs) को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं को हतोत्साहित करने वाला सामान्य नियम विवेक का नियम है - कोई अटूट निषेध नहीं - और उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन असाधारण परिस्थितियों में कारण बताओ नोटिस (SCN) चरण में हस्तक्षेप करने का अधिकार रखते हैं। 

न्यायमूर्ति श्री निशा बनाम विशेष निदेशकन्यायनिर्णय प्राधिकारीप्रवर्तन निदेशालय और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णय कार्यवाही में जारी कारण बताओ नोटिस को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी। 
  • उच्च न्यायालय ने इस आधार पर रिट याचिका पर विचार करने से इंकार कर दिया कि कारण बताओ नोटिस को चुनौती देना सामान्यत: नोटिस जारी करने के चरण में मंजूर नहीं होता हैक्योंकि कारण बताओ नोटिस जारी करने वाले प्राधिकरण को पहले अपनी न्यायिक प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति दी जानी चाहिये 
  • उच्च न्यायालय द्वारा रिट अधिकारिता का प्रयोग करने से इंकार करने से व्यथित होकरयाचिकाकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और यह प्रश्न उठाया कि क्या और किन परिस्थितियों में संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन कारण बताओ नोटिस के विरुद्ध रिट याचिका विचारणीय होगी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना कि यद्यपि सामान्य नियम कारण बताओ नोटिस के चरण में न्यायिक हस्तक्षेप को हतोत्साहित करता है – जिससे न्यायिक प्रक्रिया को बाधित या पटरी से न उतारा जा सके - यह सिद्धांतपूर्ण नहींहै और एक कठोर अधिकारिता संबंधी बाधा के रूप में कार्य नहीं करता है। 
  • पीठ ने इस बात की पुष्टि की कि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता का प्रयोग करने औरनिम्नलिखित असाधारण परिस्थितियों मेंकारण बताओ नोटिस (SCN) चरण में हस्तक्षेप करने के लिये सशक्त हैं: 
    • जहाँ नोटिस में अधिकारिता की स्पष्ट कमी हो।  
    • जहाँ यह जारी करने वाले प्राधिकरण द्वारा विवेक का प्रयोग न करने को दर्शाता है। 
    • जहाँ इसे पूर्व निर्धारित या सोची-समझी योजना के अधीन जारी किया जाता है। 
    • जहाँ यह विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाता है। 
    • जहाँ इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि ऐसी परिस्थितियों में, स्पष्ट अन्याय को रोकनेके लिये उच्च न्यायालय द्वारा अपनी रिट अधिकारिता का प्रयोग करना उचित होगाऔर कारण बताओ नोटिस (SCN) स्तर पर हस्तक्षेप करने में अनिच्छा न्यायिक विवेक का नियम है न कि सांविधानिक प्रतिषेध। 
  • भारत संघ बनाम VICCO लेबोरेटरीज (2007) केनिर्णय पर विश्वास जताया गयाजिसमें न्यायालय ने पहले ही यह टिप्पणी की थी कि जहाँ कारण बताओ नोटिस या तो अधिकारिता के बिना या विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हुए जारी किया जाता हैवहाँ एक रिट न्यायालय नोटिस के प्रक्रम में भी हस्तक्षेप करने में संकोच नहीं करेगा। 

कारण बताओ नोटिस क्या होता है? 

  • कारण बताओ नोटिस एक औपचारिक संसूचना है जो किसी न्यायालयसरकारी अभिकरण या अन्य प्राधिकारी निकाय द्वारा किसी व्यक्ति या संस्था को जारी किया जाता हैजिसमें उनसे उनके कार्योंनिर्णयों या व्यवहार को स्पष्ट करने या उचित ठहराने के लिये कहा जाता है। 
  • कारण बताओ नोटिस का उद्देश्य प्राप्तकर्ता को विशिष्ट चिंताओं या कथित उल्लंघनों के संबंध में प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण प्रदान करने का अवसर देना है। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है? 

  • अनुच्छेद 226 संविधान के भाग के अंतर्गत निहित हैजो उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। 
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(1) मेंकहा गया है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और अन्य प्रयोजन के लिये किसी व्यक्ति या किसी सरकार को बंदी प्रत्यक्षीकरणपरमादेशप्रतिषेधअधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण रिट सहित आदेश या रिट जारी करने की शक्ति होगी। 
  • अनुच्छेद 226(2)में कहा गया है कि उच्च न्यायालय को किसी भी व्यक्तिसरकार या प्राधिकरण को रिट या आदेश जारी करने का अधिकार है। 
    • इसके अधिकारिता के भीतर स्थित या 
    • यदि वाद-हेतुक उत्पन्न होने वाली परिस्थितियाँ पूर्णत: या भागत: रूप से उसके क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर उत्पन्न होता हैंतो वह उसके स्थानीय अधिकारिता से बाहर हो जाती है। 
  • अनुच्छेद 226(3)में कहा गया है कि जब किसी पक्षकार के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा व्यादेशस्थगन या अन्य माध्यमों से अंतरिम आदेश पारित किया जाता हैतो वह पक्षकार न्यायालय में ऐसे आदेश को रद्द करने के लिये आवेदन कर सकता है और न्यायालय द्वारा ऐसे आवेदन का निपटारा दो सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाना चाहिये 
  • अनुच्छेद 226(4)कहता है कि इस अनुच्छेद द्वारा उच्च न्यायालय को दी गई शक्ति अनुच्छेद 32 के खंड (2) द्वारा उच्चतम न्यायालय को दी गई शक्ति को कम नहीं करेगी। 
  • यह अनुच्छेद सरकार सहित किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण के विरुद्ध जारी किया जा सकता है। 
  • यह मात्र एक सांविधानिक अधिकार हैमौलिक अधिकार नहींऔर आपातकाल के दौरान भी इसे निलंबित नहीं किया जा सकता है। 
  • अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों के मामले में अनिवार्य प्रकृति का है और जब इसे "किसी अन्य प्रयोजन" के लिये जारी किया जाता है तो विवेकाधीन प्रकृति का होता है। 
  • यह न केवल मौलिक अधिकारों को अपितु अन्य विधिक अधिकारों को भी लागू करता है।