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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35

 06-Apr-2026

श्री युगदेव आर. बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य 

"पुलिस विगत 40 दिनों से याचिकाकर्त्ता को धारा 35(3) के नोटिस की भौतिक प्रति तामील कराने हेतु उसकी तलाश कर रही है। यह परिस्थिति याचिकाकर्त्ता के असहयोगात्मक आचरण के आधार पर उसे अभिरक्षा में लेने के लिये पर्याप्त मानी जाएगी।" 

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना 

स्रोत: कर्नाटक उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने श्री युगदेव आर. बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य (2026)के मामले मेंयह निर्णय दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35(3) के अधीन इलेक्ट्रॉनिक साधनों - जिसमें व्हाट्सएप या ईमेल शामिल हैं - के माध्यम से पूर्व-गिरफ्तारी नोटिस की तामील विधि अमान्य है। न्यायालय ने आगे कहा कि यदि कोई अभियुक्त जानबूझकर लंबे समय तक ऐसे नोटिस की भौतिक तामील से बचता हैतो यह असहयोगात्मक आचरण माना जाएगाजिसके आधार पर गिरफ्तारी उचित है। 

श्री युगदेव आर. बनाम कर्नाटक राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता युगदेव और उनकी पत्नीयोग शिक्षक बनकरकथित तौर पर जय भैरवी देवी (JBD) नामक कंपनी चला रहे थे और आम जनता से निवेश एकत्र कर रहे थे। उन पर निवेशकों से लगभग 98 लाख रुपए की ठगी करने का आरोप है। 
  • याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध अडुगोडी पुलिस थाने में दिसंबर, 2025 को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66(), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66(घ) और भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) के अधीन अपराधों के लिये प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी। 
  • पुलिस ने याचिकाकर्त्ता को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के अधीन पूर्व-गिरफ्तारी नोटिस देने की कोशिश कीलेकिन वह 40 दिनों से अधिक समय तक लापता रहा और भौतिक तामील लेने से बचता रहा। 
  • 17 जनवरी 2026 को जब पुलिस ने आखिरकार याचिकाकर्त्ता से पूछताछ कीतो उसने नोटिस लेने से इंकार कर दिया। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया और संबंधित मजिस्ट्रेट ने उसकी गिरफ्तारी को मंजूरी दे दी। 
  • याचिकाकर्त्ता ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी जिसमें उसकी गिरफ्तारी को मंजूरी दी गई थीऔर अन्य बातों के अतिरिक्त यह तर्क दिया कि यदि पुलिस का आशय केवल उसे कार्यवाही के बारे में सूचित करना था तो वह तामील को इलेक्ट्रॉनिक रूप से भी भेज सकती थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) पुलिस को व्हाट्सएप या ईमेल जैसे इलेक्ट्रॉनिक साधनों से गिरफ्तारी पूर्व सूचना या प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) की प्रति भेजने का अधिकार नहीं देती है। विधायिका के आशय के अनुसारगिरफ्तारी पूर्व चरण में सूचना की भौतिक तामील अनिवार्य है। 
  • पीठ ने सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सी.बी.आई. (2026) के मामलेमें उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने माना कि धारा 35 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन नोटिस का इलेक्ट्रॉनिक संसूचना संविधि में "जानबूझकर किये गए लोप" के कारण अमान्य है - विधायिका ने जानबूझकर धारा 35 के नोटिस को इलेक्ट्रॉनिक संसूचना के माध्यम से अनुमत प्रक्रियाओं से अपवर्जित किया है। 
  • न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के इस अवलोकन को दोहराया कि वह धारा 35 में ऐसी कोई प्रक्रिया शामिल नहीं कर सकती जो विधायिका द्वारा अभिप्रेत नहीं हैऔर इलेक्ट्रॉनिक संसूचना के उपयोग पर लगाए गए प्रतिबंध - जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन केवल कुछ प्रक्रियाओं तक सीमित हैं - पूर्व-गिरफ्तारी नोटिस की तामील के लिये इसके उपयोग को रोकते हैं। 
  • गिरफ्तारी के प्रश्न पर न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्त्ता द्वारा लगभग 40 दिनों तक धारा 35(3) के नोटिस की भौतिक तामील से जानबूझकर बचना असहयोगी व्यवहार के समान था। यह उसे अभिरक्षा में लेने के लिये पर्याप्त परिस्थिति थी। 
  • न्यायालय ने आगे कहा कि चूँकि प्रत्यक्ष तामील कराने में विफलता पूरी तरह से स्वयं अभियुक्त की त्रुटी थी - जो फरार था और अंततः सामना किये जाने पर नोटिस स्वीकार करने से इंकार कर दिया  इसलिये पुलिस कार्रवाई द्वारा याचिकाकर्त्ता के किसी भी सांविधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ। 
  • तदनुसारन्यायालय ने गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया और गिरफ्तारी को मंजूरी देने वाले मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता2023 की धारा 35 एक ऐसा उपबंध है जो पुलिस अधिकारियों को संज्ञेय अपराधों से जुड़े विशिष्ट परिस्थितियों में मजिस्ट्रेट से वारण्ट प्राप्त किये बिना किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार देता है। 

बिना वारण्ट के गिरफ्तारी के आधार: 

  • तत्काल गिरफ्तारी की स्थितियाँ: 
    • जब कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी की उपस्थिति में संज्ञेय अपराध करता है। 
    • जब विश्वसनीय सूचना प्राप्त होती है कि किसी व्यक्ति ने संज्ञेय अपराध किया है जिसके लिये सात वर्ष से अधिक की कारावास का दण्डजुर्माने के साथ या बिना जुर्माने केया मृत्युदण्ड का दण्ड हो सकता है। 
    • जब किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन या राज्य सरकार के आदेश द्वारा अपराधी उद्घोषित किया गया हो। 
    • जब किसी व्यक्ति के पास चोरी की संपत्ति पाई जाती है और उस पर उससे संबंधित अपराध करने का उचित संदेह होता है। 
    • जब कोई व्यक्ति कर्त्तव्य निर्वहन में पुलिस अधिकारी को बाधा पहुँचाता है या विधिक अभिरक्षा से भाग जाता है या भागने का प्रयास करता है। 
    • जब किसी व्यक्ति पर सशस्त्र बलों में से किसी अभित्याजक होने का उचित संदेह हो। 
    • जब कोई व्यक्ति भारत के बाहर किये गए किसी ऐसे कृत्य में शामिल होता है जो भारत में किये जाने पर अपराध के रूप में दण्डनीय होता है। 
    • जब कोई छोड़ा गया सिद्धदोष होते हुए धारा 394(5) के अधीन बनाए गए किसी नियम को भंग करता हैं। 
    • जब किसी अन्य पुलिस अधिकारी से गिरफ्तारी का अनुरोध प्राप्त होता है। 

सात वर्ष तक के अपराधों के लिये सशर्त गिरफ्तारी: 

  • ऐसे संज्ञेय अपराधों के लिये जिनमें सात वर्ष से कम या सात वर्ष तक की कारावास के दण्ड का उपबंध हैगिरफ्तारी केवल तभी अनुमत है जब विशिष्ट शर्तें पूरी हों: 
    • पुलिस अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि व्यक्ति ने युक्तियुक्त परिवादविश्वसनीय जानकारी या उचित संदेह के आधार पर अपराध किया है। 
    • पुलिस अधिकारी इस बात से संतुष्ट है कि आगे के अपराधों को रोकनेउचित अन्वेषण करनेसबूतों से छेड़छाड़ को रोकनेसाक्षियों को प्रलोभन या धमकी देने से रोकने या न्यायालय में पेशी सुनिश्चित करने के लिये गिरफ्तारी आवश्यक है। 
    • गिरफ्तारी करते समय पुलिस अधिकारी को कारणों को लिखित रूप में अभिलिखित करना होगा। 
  • नोटिस प्रक्रिया (गिरफ्तारी का विकल्प): 
    • जब उपरोक्त उपबंधों के अधीन गिरफ्तारी आवश्यक न होतो पुलिस अधिकारी को एक नोटिस जारी करना होगा जिसमें व्यक्ति को उसके समक्ष या किसी निर्दिष्ट स्थान पर उपस्थित होने का निदेश दिया गया हो। 
    • संबंधित व्यक्ति का यह कर्त्तव है कि वह नोटिस की शर्तों का पालन करेऔर जब तक वह इनका पालन करता हैतब तक उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकताजब तक कि पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की आवश्यकता के विनिर्दिष्ट कारणों को अभिलिखित न कर ले। 
  • परिणाम और सुरक्षा उपाय: 
    • यदि कोई व्यक्ति नोटिस का पालन करने में विफल रहता है या अपनी पहचान बताने से इंकार करता हैतो पुलिस अधिकारी सक्षम न्यायालय द्वारा पारित किसी भी आदेश के अधीननोटिस में उल्लिखित अपराध के लिये उसे गिरफ्तार कर सकता है। 
    • तीन वर्ष से कम कारावास के दण्ड वाले अपराधों के लियेकमजोर व्यक्तियों या साठ वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों को गिरफ्तार करने से पहले पुलिस उप अधीक्षक से कम रैंक के अधिकारी से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। 
    • इस उपबंध में एक अनिवार्य सुरक्षा उपाय शामिल है जिसके अधीन पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तारी न किये जाने पर लिखित रूप में कारण अभिलिखित करना आवश्यक हैजिससे जवाबदेही सुनिश्चित होती है और मनमानी गिरफ्तारियों को रोका जा सकता हैसाथ ही विधि प्रवर्तन की आवश्यकताओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के बीच संतुलन बना रहता है। 

सिविल कानून

भूमिदार की स्थिति में संशोधन नहीं किया जा सकता

 06-Apr-2026

साहब दास बनाम अतिरिक्त आयुक्त न्यायिकलखनऊ डिवीजन और अन्य का मामला 

"उपधारा (4-च) न केवल अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित पात्र कृषि मजदूर के कब्जे की रक्षा करती हैअपितु एक सांविधिक अनुमानित प्रावधान के आधार पर ऐसे व्यक्ति को गैर-अंतरणीय अधिकारों के साथ भूमिधर का दर्जा भी प्रदान करती है।" 

न्यायमूर्ति इरशाद अली 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक पीठ नेसाहब दास ऑब्जेक्शन फाइल्ड बनाम एडिशनल कमिश्नर ज्यूडिशियललखनऊ डिवीजन और अन्य (2026)के मामले में दोहराया कि यदि उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 की धारा 122- (4-F) के अधीन विहित शर्तें पूरी होती हैंतो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित कृषि मजदूर को गैर-अंतररणीय अधिकारों वाला भूमिधर माना जाएगा और ऐसी भूमिधरी स्थिति को किसी भी प्राधिकरणचाहे कार्यकारी हो या पुनरीक्षण प्राधिकरण द्वारा पुनरीक्षण के अधीन नहीं किया जा सकता है। 

साहब दास बनाम अतिरिक्त आयुक्त न्यायिकलखनऊ डिवीजन और अन्य (2026) मामले में दायर आपत्ति की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ताजो अनुसूचित जाति का कृषि मजदूर है, 3 जून 1995 से पहले से ही ग्राम लगलेसरापरगना आसीवान रसूलबादतहसील हसनगंजजिला उन्नाव में स्थित भूखंड संख्या 147/2 M (क्षेत्रफल 0.400 हेक्टेयर) पर कब्जा किये हुए था। 
  • अधिनियम की धारा 122-ख के अधीन कार्यवाही मेंउचित जांच के बादयाचिकाकर्त्ता को धारा 122- (4-च) के अधीन लाभ प्रदान किया गया और उसे गैर-अंतररणीय अधिकारों के साथ भूमिधर घोषित किया गया। 
  • विपक्षी पक्ष - जो गाँव का पूर्व प्रधान और उच्च जाति का सदस्य था - ने इस आदेश को अपास्त करने के लिये आवेदन दिया। याचिकाकर्त्ता को भूमिधर घोषित करने वाला आदेश याचिकाकर्त्ता को बिना सूचना दिये एकपक्षीय रद्द कर दिया गया। 
  • याचिकाकर्त्ता ने एक वापसी याचिका दायर कीजिसे परगना अधिकारी ने मंजूर कर लियाजिससे एकपक्षीय आदेश बहाल हो गया और याचिकाकर्त्ता के सुनवाई के अधिकार को पुनः प्राप्त कर लिया गया। 
  • इसके बाद विपक्षी पक्ष ने लखनऊ डिवीजन के कमिश्नर के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की। कमिश्नर ने पुनरीक्षण याचिका मंजूर करते हुए परगना अधिकारी के वापस बुलाने के आदेश को अपास्त कर दिया। 
  • इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया और यह प्रश्न उठाया कि क्या पुनरीक्षण प्राधिकारी किसी ऐसे आदेश को विधिक रूप से रद्द कर सकता है जिसने किसी भी मौलिक अधिकार का निर्णय किये बिना केवल प्राकृतिक न्याय को बहाल किया हो। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना कि परगना अधिकारी का आदेश - जिसे आयुक्त द्वारा अपास्त कर दिया गया था  याचिकाकर्त्ता के किसी भी महत्त्वपूर्ण अधिकार का निर्णय नहीं करता हैइसने केवल याचिकाकर्त्ता को सुनवाई का अवसर देकर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को बहाल किया है। 
  • एकपक्षीय आदेश को बहाल करकेपुनरीक्षण प्राधिकारी ने प्रभावी रूप से याचिकाकर्त्ता के आत्मरक्षा के अधिकार को छीन लियाजिसे न्यायालय ने अग्राह्य पाया। 
  • न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि धारा 122- (4-च) एक सांविधिक अनुमानित प्रावधान के रूप में कार्य करती है - एक बार विहित शर्तें पूरी हो जाने परश्रमिक को स्वतः ही गैर-अंतरणीय अधिकारों के साथ भूमिधर का दर्जा प्रदान कर दिया जाता हैऔर ऐसे अधिकारों की घोषणा के लिये कोई वाद आवश्यक नहीं है। 
  • मनोरे उर्फ मनोहर बनाम बोर्ड ऑफ रेवेन्यूउत्तर प्रदेश के मामलेमें उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुए , न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि यह प्रावधान सामाजिक-आर्थिक न्याय प्राप्त करने के उद्देश्य से कृषि सुधार का एक साधन हैऔर इसके लाभ को संकीर्ण या तकनीकी दृष्टिकोण से कम नहीं किया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने माना कि धारा 122-(4-च) के अधीन अधिकार संविधि से प्राप्त होते हैं और एक बार घोषित होने के बाद उन्हें संशोधित नहीं किया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने आयुक्त के पुनरीक्षण आदेश को अपास्त कर दियापरगना अधिकारी के वापस बुलाने के आदेश को बहाल कर दिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार मामले में नए सिरे से निर्णय लेने का निदेश दिया।

उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 की धारा 122-बी(4-F) क्या है? 

धारा 122-ख — भूमि प्रबंधन समिति और कलेक्टर की शक्तियां 

उपधारा (1) — रिपोर्टिंग की बाध्यता: 

  • यदि ग्राम सभा/स्थानीय प्राधिकरण की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता हैउसका दुरुपयोग किया जाता है या उस पर अवैध रूप से कब्जा किया जाता हैतो भूमि प्रबंधन समिति या स्थानीय प्राधिकरण को संबंधित सहायक कलेक्टर को सूचित करना होगा। 

उपधारा (2) — कारण बताओ नोटिस: 

  • ऐसी सूचना प्राप्त होने परयदि सहायक कलेक्टर अवैध कब्जे/क्षति/दुरुपयोग से संतुष्ट हो जाते हैंतो वे संबंधित व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस (SCN) जारी करेंगे और उनसे पूछेंगे कि प्रतिकर क्यों नहीं वसूला जाना चाहिये या बेदखली क्यों नहीं की जानी चाहिये 

उपधारा (3) — बेदखली का आदेश: 

  • यदि व्यक्ति निर्धारित समय सीमा (जिसे 30 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है) के भीतर जवाब देने में असफल रहता हैया बताया गया कारण अपर्याप्त हैतो सहायक कलेक्टर बेदखली का आदेश दे सकता है और भू-राजस्व के बकाया के रूप में प्रतिकर की वसूली कर सकता है। 

उपधारा (4) — नोटिस की समाप्ति: 

  • यदि सहायक कलेक्टर उस व्यक्ति को निर्दोष पाता हैतो वह नोटिस रद्द कर देगा। 

उपधारा (4-क) — संशोधन: 

  • पीड़ित व्यक्ति सहायक कलेक्टर के आदेश के 30 दिनों के भीतर कलेक्टर के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर कर सकता है। 

उपधारा (4-ख) — प्रक्रिया: 

  • अपनाई जाने वाली प्रक्रिया नियमों में निर्धारित अनुसार होगी। 

उपधारा (4-ग) — आदेशों की अंतिम प्रकृति: 

  • सहायक कलेक्टर के आदेश अंतिम होते हैं (धारा 4-क के अधीन संशोधन और धारा 4-घ के अधीन वाद के अधीन)। 
  • कलेक्टर के आदेश अंतिम होते हैं (केवल 4-घ के अंतर्गत आने वाले वाद के अधीन)। 

उपधारा (4-) — सिविल वाद: 

  • कोई भी पीड़ित व्यक्ति संपत्ति पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिये सक्षम न्यायालय में वाद दायर कर सकता है। 

उपधारा (4-ङ) — वाद का वर्जन: 

  • यदि धारा 4-क के अंतर्गत कलेक्टर के समक्ष पुनरीक्षण याचिका पहले ही दायर की जा चुकी हैतो धारा 4-घ के अंतर्गत सहायक कलेक्टर के आदेश के विरुद्ध कोई वाद दायर नहीं किया जा सकता है। 

उपधारा (4-च) — अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के कृषि श्रमिकों के लिये संरक्षण: 

  • उपरोक्त सभी उपधाराओं के होते हुए भीअनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के कृषि श्रमिक के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी यदि निम्नलिखित सभी शर्तें पूरी होती हैं: 
    • श्रमिक धारा 117 के अंतर्गत निहित ग्राम सभा की भूमि पर कब्जा किये हुए है। 
    • यह कब्जा 13 मई 2007 से पहले से विद्यमान था। 
    • कुल भूमि (कब्जे वाली + पूर्व में भूमिधर/सरदार/असामी के रूप में धारित) 1.26 हेक्टेयर (3.125 एकड़) से अधिक नहीं है। 
  • इन शर्तों को पूरा करने पर: 
    • श्रमिक को धारा 195 के तहत गैर-अंतरणीय अधिकारों के साथ भूमिधर के रूप में भर्ती किया जाएगा। 
    • ऐसे अधिकारों की घोषणा के लिये कोई वाद दायर करना आवश्यक नहीं है। 
  • "कृषि मजदूर" कावही अर्थ है जो धारा 198 के अंतर्गत दिया गया है। 

उपधारा (5) — नियमों का संरक्षण: 

  • उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था नियम, 1952 के नियम 115-ग से 115-ज को हमेशा से वैध माना जाएगा और जब तक इसमें परिवर्तननिरसन या संशोधन नहीं किया जाता तब तक यह लागू रहेगा।