9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से






करेंट अफेयर्स और संग्रह

होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह

सांविधानिक विधि

माता-पिता वयस्क पुत्रियों की स्वतंत्र पसंद के विरुद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट का आह्वान नहीं कर सकते

 18-Apr-2026

जोजू जॉर्ज और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य 

"ईश्वरीय आह्वान का जवाब देते हुए ब्रह्मचर्य का जीवन चुनने वाली अपनी वयस्क पुत्री के निर्णय से माता-पिता की मात्र असंतुष्टिबंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का आधार नहीं हो सकती।" 

न्यायमूर्ति ए.के. जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों?      

केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ए.के. जयशंकरन नाम्बियार और न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन की खंडपीठ नेजोजू जॉर्ज और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026)के मामले में तीन पिताओं द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन पिताओं ने आरोप लगाया था कि उनकी वयस्क पुत्रियों को होली रुआह मठ (MHR) की ननों द्वारा अवैध रूप से निरोध में रखा गया है। न्यायालय ने माना कि किसी धार्मिक समुदाय में ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करने के वयस्क पुत्री के निर्णय के प्रति माता-पिता की असहमति बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का वैध आधार नहीं हो सकती।  

जोजू जॉर्ज और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • तीनों याचिकाकर्त्ता ऐसे पिता थे जिनकी वयस्क पुत्रियाँ त्रिशूर के आर्चडायोसीस के अंतर्गत आने वाले एक धार्मिक समुदायहोली रुआह मठ (MHR) में शामिल हो गई थीं।  
  • जब आर्चडायोसीज द्वारा होली रुआह मठ (MHR) को विधिवत मान्यता दी गई थीतब पुत्रियाँ इसमें शामिल हुई थीं। 
  • तत्पश्चात्प्रत्यर्थी ननों द्वारा की गई कुछ कार्रवाइयों के मद्देनजरआर्चडायोसीज ने एक डिक्री जारी कर घोषणा की कि होली रुआह मठ (MHR) को अब वे अधिकारविशेषाधिकार और कर्त्तव्य प्राप्त नहीं होंगे जो उसकी अधिकारिता के अंतर्गत आने वाली मंडलियों को दिये जाते हैं। 
  • आर्चडायोसीज ने 2023 में औपचारिक रूप से होली रुआह मठ (MHR) को भंग कर दिया था।  
  • याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि इस विघटन के बादउनकी पुत्रियों का मंडली के साथ निरंतर जुड़ाव स्वैच्छिक नहीं थाअपितु प्रत्यर्थी ननों द्वारा किये गए प्रपीड़न और असम्यक् असर का परिणाम था। 
  • उन्होंने आगे आरोप लगाया कि पुत्रियों को ऐसे कठोर अनुष्ठानों का शिकार बनाया जा रहा था जो उनके और उनके परिवार के हित के विरुद्ध थे। याचिकाकर्त्ताओं ने पीठ और पूर्ण पीठों के निर्णयों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि माता-पिता को अपने व्यस्क बच्चों को भी सहायता और सलाह देने का अधिकार हैऔर व्यस्क बच्चों की सांविधानिक स्वतंत्रताएँ असीमित नहीं हैं। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने मामले के विशिष्ट तथ्यों पर विचार करने से पहले बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दायरे और प्रकृति की जांच की। इसने निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों को निर्धारित किया: 
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका एक असाधारण उपचार है और इसे तब तक जारी नहीं किया जाना चाहिये जब तक कि सामान्य उपचार पूरी तरह से कारगर साबित न हो जाएं। यह एकविवेकाधीन उपचारहैजिसका अर्थ है कि उच्च न्यायालय तथ्यों के आधार पर अधिकारिता का प्रयोग करने से इंकार कर सकता है। तथापिएक बार जब न्यायालय यह पाता है कि कथित निरोध अवैध हैतो बंदी को यह याचिका अधिकार के रूप में प्राप्त हो जाती है और न्यायालय के विवेक पर इसे रोका नहीं जा सकता। 
  • न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि व्यक्तिगत स्वायत्तताआत्मनिर्णय की स्वतंत्रता और स्वतंत्र इच्छाशक्ति सांविधानिक ढाँचे में केंद्रीय स्थान रखती हैं। किसी व्यक्ति के निजी क्षेत्र में राज्य का कोई भी हस्तक्षेप सांविधानिक स्वतंत्रताओं के प्रयोग पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।  
  • पुत्रियों द्वारा किसी धार्मिक संस्था में शामिल होने के विकल्प के विशिष्ट प्रश्न पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि ऐसा विकल्प पूरी तरह से व्यक्ति का निजी मामला है। केवल इस तथ्य से कि याचिकाकर्त्ताओं ने अपनी पुत्रियों के त्रिशूर आर्चडायोसीस से आध्यात्मिक रूप से संबद्ध न होने वाली संस्था में शामिल होने का विरोध कियाबंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का औचित्य सिद्ध नहीं हो सकता। 
  • न्यायालय ने कहा कि कथित बंदी शिक्षित वयस्क थेऔर अभिलेख में ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह संकेत मिले कि वे अपनी स्वतंत्र इच्छा से कार्य नहीं कर रहे थे। यह भी कहा गया कि जब पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ कीतो पुत्रियों ने कथन पर हस्ताक्षर करके पुष्टि की कि वे स्वेच्छा से होली रुआह मठ (MHR) का पालन कर रही हैं।  
  • यह साबित करने के लिये कोई सबूत नहीं मिलने पर कि याचिकाकर्त्ताओं की पुत्रियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध रखा जा रहा था या प्रत्यर्थी ननों का उन पर वास्तविक शारीरिक नियंत्रण थान्यायालय ने रिट जारी करने से इंकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। 

बंदी प्रत्यक्षीकरण क्या है 

अर्थ और प्रकृति: 

  • हेबियस कॉर्पस एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है "आप व्यक्ति (शरीर) को प्रस्तुत करें।”  
  • यह एक विधिक प्रक्रिया है जो अवैध रूप से निरुद्ध व्यक्तियों के लिए एक उपचारात्मक उपाय के रूप में कार्य करती है 
  • इसका मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध निरोध या कारावास से मुक्त कराना है।  
  • यह न्यायालय द्वारा जारी किया जाने वाला एक आदेश हैजिसके माध्यम से निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का निदेश दिया जाता हैजिससे यह परीक्षण किया जा सके कि गिरफ्तारी विधिसम्मत है या नहीं 
  • यह रिट किसी व्यक्ति के स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अवधारण करती है। 

सांविधानिक उपबंध: 

  • अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार है। 
  • अनुच्छेद 32के अधीनउच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिये रिट जारी करता है। 
  • अनुच्छेद 226के अधीनउच्च न्यायालयों के पास विधिक और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन दोनों के लिये रिट जारी करने की व्यापक अधिकारिता है। 
  • भारत की राज्यक्षेत्रों की सीमा के भीतर और बाहर स्थित सभी प्राधिकारियों पर उच्चतम न्यायालय को अधिकारिता है। 
  • उच्च न्यायालय उन मामलों से निपटते हैं जब उस अधिकार पर उनका नियंत्रण होता है और वाद-हेतुक उनकी अधिकारिता के भीतर उत्पन्न होता है। 

कौन आवेदन कर सकता है: 

  • वह व्यक्ति जिसे अवैध रूप से कैद या निरुद्ध किया गया हो। 
  • कोई भी व्यक्ति जो इस मामले के लाभ से अवगत हो। 
  • मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित कोई भी व्यक्ति जो स्वेच्छा से अनुच्छेद 32 या 226 के अधीन आवेदन दाखिल करता है। 
  • जैसा कि शीला बारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1983)में निर्णय दिया गया है, यदि कोई निरोध में लिया गया व्यक्ति आवेदन दाखिल नहीं कर सकता हैतो कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से आवेदन दाखिल कर सकता है। 

कब याचिका खारिज हो जाती है: 

  • जब न्यायालय के पास बेदखली के मामले पर राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता का अभाव हो। 
  • जब निरोध किसी सक्षम न्यायालय के आदेश से संबंधित हो। 
  • जब निरोध में लिया गया व्यक्ति पहले ही छोड़ा जा चुका हो। 
  • जब दोषों को दूर करके परिरोध को वैध ठहराया गया हो। 
  • जब कोई सक्षम न्यायालय ुण-दोष के आधार पर याचिका खारिज कर देता है।  

प्रकृति और दायरा: 

  • यह एक प्रक्रियात्मक रिट हैन कि एक सारभूत रिटजैसा किकानू सान्याल बनाम जिला मजिस्ट्रेट दार्जिलिंग (1974) के मामले में कहा गया है। 
  • इस पद्धति में केवल शरीर को न्यायालय के समक्ष पेश करने के बजाय तथ्यों और परिस्थितियों की परीक्षा करके निरोध की वैधता पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। 
  • यह रिट याचिका न केवल सदोष परिरोध में रखने के लिये अपितु निरोध में लेने वाले अधिकारियों द्वारा दुर्व्यवहार और भेदभाव से सुरक्षा के लिये भी दायर की जा सकती हैजैसा किसुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) के मामले में कहा गया है। 
  • पूर्व-न्याय का सिद्धांत अवैध कारावास के मामलों पर लागू नहीं होतानए आधारों के साथ क्रमिक याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। 

सबूत का भार: 

  • निरोध में लेने वाले व्यक्ति या प्राधिकारी पर यह साबित करने का भार होता है कि निरोध विधिक आधार पर था 
  • यदि निरुद्ध व्यक्ति प्राधिकारी की अधिकारिता से बाहर विद्वेषपूर्ण परिरोध का आरोप लगाता हैतो सबूत का भार निरुद्ध व्यक्ति पर स्थानांतरित हो जाता है 

सिविल कानून

आदेश 7 नियम 11 के अधीन वादपत्र को नामंजूर नहीं किया जा सकता क्योंकि यह आदेश 2 नियम 2 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वर्जित है

 18-Apr-2026

वल्लिअम्मई और अन्य बनाम एस. रामनाथन और अन्य 

"आदेश नियम का आवेदन संहिता के आदेश नियम 11(के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने का आधार नहीं माना जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ नेएस. वल्लियामई एवं अन्य बनाम एस. रामनाथन एवं अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि वादपत्र सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11(के अधीन इस आधार पर नामंजूर नहीं किया जा सकता कि वाद सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम के अधीन वर्जित है। न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के वादपत्र नामंजूर करने के आदेश को अपास्त कर दिया और विचारण न्यायालय के वाद को आगे बढ़ाने के निर्णय को बहाल कर दिया। 

एस. वल्लियामई और अन्य बनाम एस. रामनाथन और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद कई संपत्तियों से जुड़े एक पारिवारिक मामले से उत्पन्न हुआ था। मूल स्वामीस्वर्गीय एम. सोक्कलिंगम ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर प्रारंभ में अपने पुत्र के विरुद्ध व्यादेश की मांग करते हुए वाद दायर किया था। 
  • उनकी मृत्यु के बादविधवा और पुत्रियों ने कपटप्रपीड़न और असम्यक् असर के आधार परकिसी पर-पक्षकार के पक्ष में निष्पादित पावर ऑफ अटॉर्नी को शून्य घोषित करने की मांग करते हुए द्वितीय वाद दायर किया। 
  • प्रतिवादियों ने आदेश नियम 11 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन द्वितीय वादपत्र को नामंजूर करने की मांग कीयह तर्क देते हुए कि आदेश 2 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वाद वर्जित था क्योंकि अनुतोष पहले ही वाद में मांगा जाना चाहिये था 
  • विचारण न्यायालय ने इस अभिवचन को नामंजूर कर दिया और वाद को आगे बढ़ने की अनुमति दी। यद्यपिमद्रास उच्च न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका में हस्तक्षेप करते हुए दोनों वादों में दिये गए अभिवचनों की विस्तृत तुलना करने के बाद वादपत्र को नामंजूर कर दिया। इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने आदेश नियम के संचालन और आदेश नियम 11(सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने के आधारों के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। 
  • न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों पर बल दिया: 
    • वादपत्र नामंजूर करने के आवेदन पर निर्णय लेते समयजांच को कठोरता से वादपत्र में किये गए कथनों तक ही सीमित रखा जाना चाहिये। न्यायालय प्रारंभिक स्तर परपूर्ववर्ती वाद और पश्चात्वर्ती वाद के अभिवचनों की विस्तृत तुलना नहीं कर सकते। 
    • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम के अधीन वाद दायर करने को वर्जित नहीं करता है। यह केवल उन अनुतोषों या दावों को सीमित करता है जिन्हें पूर्ववर्ती वाद में शामिल किया जाना चाहिये था। क्या इसकी शर्तें लागू होती हैंयह केवल विचारणके दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही अवधारित किया जा सकता है। 
    • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11(के अंतर्गत वह स्थिति लागू होती है जब वाद दाखिल करने पर अभिव्यक्त या विवक्षित विधिक वर्जन हो। ऐसा वर्जन केवल वादपत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ने मात्र से ही स्पष्ट हो जाना चाहियेसाक्ष्य का सहारा लिये बिना—कुछ सीमित मामलों के सिवायजैसे कि परिसीमा काल या पूर्व-निर्णय। 
  • द्वितीय वाद में दिये गए कथनों का साक्ष्य मानकर उनका विश्लेषण करने और उनकी तुलना प्रथम वाद में दिये गए कथनों से करने का उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण पूरी तरह से अग्राह्य माना गया। 
  • तदनुसारअपील मंजूर कर ली गई और विचारण न्यायालय का आदेश बहाल कर दिया गया। 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11 में वादपत्र का नामंजूर किया जाना क्या है? 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश नियम 11 में उसके अंतर्गत सूचीबद्ध विनिर्दिष्ट परिस्थितियों में वादपत्र को नामंजूर करने का उपबंध है। 
    • खंड (क) के अनुसारयदि वाद-हेतुक प्रकट नहीं किया गया है तो वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा। 
    • खंड (ख) में जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन कम किया गया है और वादी मूल्यांकन को ठीक करने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर जो न्यायालय ने नियत किया हैऐसा करने में असफल रहता है, वहाँ वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा 
    • खंड (गजहाँ दाषाकृत अनुतोष का मूल्यांकन ठीक है किंतु वादपत्र अपर्याप्त स्टाम्प-पत्र पर लिखा गया है और वादी अपेक्षित स्टाम्प पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतरजो न्यायालय ने नियत किया हैऐसा करने में असफल रहता है, वहाँ वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा 
    • खंड (घ) के अनुसारजहाँ वादपत्र में के कथन से यह प्रतीत होता है कि बाद किसी विधि द्वारा वर्जित है, वहाँ वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा 
    • खंड (ङ) में यह उपबंध है कि यदि वादपत्र दो प्रतियों में दाखिल नहीं किया गया है वहाँ वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा।   
    • खंड (च) में नामंजूरी का उपबंध है जहाँ वादी नियम के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है। 
  • इसके परंतुक में यह कहा गया है कि मूल्यांकन में सुधार करने या स्टांप-पेपर उपलब्ध कराने के लिये समय सीमा तब तक नहीं बढ़ाई जाएगी जब तक कि न्यायालय संतुष्ट न हो जाए कि वादी असाधारण कारणों से ऐसा करने में असमर्थ था और इंकार करने से गंभीर अन्याय होगा। 
  • आदेश नियम 11 के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने की शक्ति एक असाधारण शक्ति है और इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिये 
  • खंड (घ) के अधीनन्यायालय को स्वयं वादपत्र में दिये गए कथनों से यह निर्धारित करना होगा कि क्या वाद किसी विधि द्वाराजिसमें परिसीमा विधि भी शामिल हैवर्जित है। 
  • आदेश नियम 11(के अधीन जांच का दायरा वादपत्र और उससे संलग्न या उसमें संदर्भित दस्तावेज़ों तक सीमित है। 
  • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VII नियम 11 के तहत आवेदन पर निर्णय लेते समय प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत बचाव पर विचार नहीं किया जा सकता है। 
  • इस शक्ति का प्रयोग केवल स्पष्ट और प्रत्यक्ष मामलों में ही किया जाना चाहिये जहाँ वादपत्र प्रथम दृष्टया वर्जित हो। 
  • जहाँ परिसीमा का अवधारण साक्ष्य की परीक्षा या विधि और तथ्य के मिश्रित प्रश्नों पर विचार करने की आवश्यकता होती हैवहाँ खंड (घ) के अधीन वादपत्र को नामंजूर नहीं किया जा सकता है। 
  • आदेश नियम 11 के अधीन नामंजूरी के लिये आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय वादपत्र के दायरे से बाहर नहीं जा सकता है। 
  • जहाँ कई अनुतोषों की मांग की जाती है और यहाँ तक ​​कि एक अनुतोष भी परिसीमा के भीतर हैवहाँ वादपत्र को विधि द्वारा वर्जित होने के कारण पूरी तरह से नामंजूर नहीं किया जा सकता है। 
  • इस उपबंध का प्रयोग केवल तकनीकी आधार परबिना पूर्ण रूप से मामले की सुनवाई कियेवास्तविक दावों को खारिज करने के लिये नहीं किया जाना चाहिये 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश II नियम 2 — वाद के अंतर्गत संपूर्ण दावा होगा  

  • इस नियम के अनुसारवादी कोएक ही वाद-हेतुक से उत्पन्न सभी दावों कोएक ही वाद में शामिल करना अनिवार्य है। वह अपने दावे को विभाजित नहीं कर सकता और उसी वाद-हेतुक पर कई वाद दायर नहीं कर सकता 
  • अपवाद:वादी किसी विशेष न्यायालय के आर्थिक अधिकारिता के अंतर्गत वाद लाने के लिये स्वेच्छया से अपने दावे के एक भाग को त्याग सकता है – किंतु एक बार त्याग किये दिए जाने के बादउस भाग पर बाद में दावा नहीं किया जा सकता है। 
  • उद्देश्य:मुकदमेबाजी की बहुलता और प्रतिवादी के उत्पीड़न को रोकना। 
  • विभाजन का परिणाम:यदि कोई वादी अपने दावे के किसी भाग को त्याग किये बिना छोड़ देता हैतो उसे पश्चात्वर्ती वाद में उस लोप किये गए भाग पर वाद करने से वर्जित किया दिया जाता है (नियम 2(3))।