9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से






करेंट अफेयर्स और संग्रह

होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह

आपराधिक कानून

अभियुक्त की संपत्ति की बिक्री को जमानत की शर्त के रूप में आदेशित नहीं किया जा सकता

 20-Apr-2026

फ़िरोज़ बाशा और अन्य. बनाम तमिलनाडु राज्य 

"न तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और न ही दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 किसी न्यायालय को जमानत या विचारण के प्रक्रम में अभियुक्त की अचल संपत्ति को कथित दावों के निपटारे के लिये बेचने का निदेश देने में सक्षम बनाती है।" 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ नेफिरोज बाशा एवं अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि न्यायालय जमानत आदेश के भाग के रूप में किसी अभियुक्त की अचल संपत्ति के विक्रय का निदेश देने वाली शर्त अधिरोपित नहीं कर सकता। मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त करते हुएजिसमें ऐसी शर्त अधिरोपित की गई थीन्यायालय ने दोहराया कि जमानत कार्यवाही को वसूली कार्यवाही में परिवर्तित नहीं किया जा सकता हैऔर जमानत की शर्तों का जमानत देने के उद्देश्य से सीधा संबंध होना चाहिये 

फ़िरोज़ बाशा और अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • जून, 2025 को छल और धन के दुर्विनियोग का आरोप लगाते हुए एक परिवाद दर्ज किया गयाजिसके परिणामस्वरूप अपीलकर्त्ता-अभियुक्त और एक अन्य व्यक्ति के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई।  
  • उन पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 406 (आपराधिक न्यासभंग), 409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात) और 420 (छल) के अधीन धारा 34 (सामान्य आशय) के साथ मामला दर्ज किया गया था। 
  • अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया और विचारण के दौरान वे 83 दिनों तक अभिरक्षा में रहा 
  • सेशन न्यायालय ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी। 
  • मद्रास उच्च न्यायालय ने जमानत तो दे दीलेकिन न्यायिक मजिस्ट्रेट को निदेश देते हुए एक शर्त अधिरोपित कि वह अभियुक्त की अचल संपत्तियों को बेचकर उससे प्राप्त राशि को परिवादकर्त्ता और इसी प्रकार की स्थिति वाले पीड़ितों के बीच वितरित करें। 
  • अभियुक्त ने इस शर्त को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

जमानत की शर्त के रूप में संपत्ति का विक्रय अस्वीकार्य है: 

  • न तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और न ही दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 किसी न्यायालय को जमानत या विचारण के प्रक्रम मेंकथित दावों के निपटारे के लिये किसी अभियुक्त से संबंधित अचल संपत्ति के विक्रय का निदेश देने का अधिकार देता है। 
  • जमानत की शर्त के रूप में संपत्ति के विक्रय का आदेश देना एक प्रकार की अंतिम सिविल अनुतोष प्रदान करने के समान हैजो संपत्ति के अधिकारों को प्रत्यक्षत प्रभावित करती है और इसे कायम नहीं रखा जा सकता है। 

जमानत की शर्तों का जमानत के उद्देश्य से संबंध होना चाहिये: 

  • किसी न्यायालय के लिये ऐसी जमानत शर्तें अधिरोपित करना अस्वीकार्य है जिनका जमानत देने के उद्देश्य से कोई संबंध न हो। 
  • जमानत की शर्तें दण्डात्मक या निर्णायक प्रकृति की नहीं होनी चाहियेऔर किसी अभियुक्त को अपनी संपत्ति का उपयोग करने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती हैं। 

जमानत की कार्यवाही वसूली की कार्यवाही नहीं बन सकती: 

  • उच्च न्यायालय ने विवादित शर्त अधिरोपित करते हुएप्रभावी रूप से अपनी जमानत संबंधी अधिकारिता से बाहर जाकर पक्षकारों के बीच एक सिविल विवाद का निपटारा किया - जबकि विचाराधीन संपत्ति स्वयं एक लंबित सिविल वाद का विषय है। 
  • महेश चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2006)पर विश्वास करते हुए , न्यायालय ने दोहराया कि जमानत देते समय न्यायालय की अधिकारिता सिविल अधिकारों या विवादों का निर्णय करने तक विस्तारित नहीं होता हैन ही ऐसी शर्तें अधिरोपित करने तक विस्तारित होता है जो वस्तुतः परिवादकार्त्त द्वारा मांगी गई अंतिम सिविल अनुतोष प्रदान करती हैं। 

आदेश अपास्त किया गया: 

  • अपील मंजूर कर ली गई और अपीलकर्त्ताओं की संपत्तियों के विक्रय का निदेश देने वाली विवादित शर्त को पूरी तरह से अनुचित मानते हुए अपास्त कर दिया गया। 

जमानत क्या है और इसके प्रकार क्या हैं? 

जमानत के बारे में: 

  • जमानतजो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अंतर्गत एक विधिक उपबंध है, प्रतिभूति जमा करने पर विचारण या अपील लंबित रहने के दौरान जेल से छोड़े जाने की सुविधा प्रदान करती है। 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 436 के अनुसारजमानतीय अपराध जमानत के अधिकार को प्रत्याभूत करता हैंजबकि अजमानतीय अपराध धारा 437 में उल्लिखित अनुसार न्यायालयों या नामित पुलिस अधिकारियों को विवेकाधिकार प्रदान करते हैं। 
  • राजस्थान राज्य बनाम बालचंद (1977)के मामले में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर नेयह निर्णय दिया किमूल नियम जमानत हैकारावास नहीं।उन्होंने इस अवधारणा का उल्लेख किया कि 'जमानत एक अधिकार है और कारावास एक अपवाद है'। 

जमानत के प्रकार: 

  • नियमित जमानत : यह न्यायालय (देश के किसी भी न्यायालय) द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को छोड़ने का निदेश है जो पहले से ही गिरफ्तार है और पुलिस अभिरक्षा में रखा गया है। 
  • अंतरिम जमानत:न्यायालय द्वारा दी गई जमानतजो कि अग्रिम जमानत या नियमित जमानत के लिये आवेदन न्यायालय में लंबित रहने के दौरान एक अस्थायी और अल्प अवधि के लिये होती है। 
  • अग्रिम जमानत:यह एक विधिक उपबंध है जो किसी अभियुक्त व्यक्ति को गिरफ्तारी से पहले जमानत के लिये आवेदन करने की अनुमति देता है। भारत मेंअग्रिम जमानत दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के अधीन दी जाती है। यह केवल सेशन न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाती है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अधीन जमानत से संबंधित उपबंध क्या हैं? 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अध्याय 35 में जमानत और बंधपत्र संबंधी उपबंध दिये गए हैं। 

धारा 478 

किन मामलों में जमानत ली जा जाएगी 

धारा 479 

अधिकतम अवधि, जिसके लिये विचाराधीन कैदी किया जा सकता है 

धारा 480 

अजमानतीय अपराध की दशा में कब जमानत ली जा सकेगी 

धारा 481 

अभियुक्त को अगले अपील न्यायालय के समक्ष उपसंजात होने की अपेक्षा के लिये जमानत 

धारा 482 

गिरफ्तारी की आशंका करने वाले व्यक्ति की जमानत मंजूर करने के लिये निदेश  

धारा 483 

जमानत के बारे में उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय की विशेष शक्तियां 

धारा 484 

जमानत की रकम और उसे घटाना 

धारा 485 

अभियुक्त और प्रतिभुओं बंधपत्र 

धारा 486 

प्रतिभुओं द्वारा घोषणा 

धारा 487 

अभिरक्षा से उन्मोचन 

धारा 488 

जब पहले ली गई जमानत अपर्याप्त है तब  पर्याप्त जमानत के लिये  आदेश देने की शक्ति 

धारा 489 

प्रतिभुओं का उन्मोचन  

धारा 490 

मुचलके के बजाय निक्षेप 

धारा 491 

प्रक्रियाजब बंधपत्र समपहृत कर लिया जाता है 

धारा 492 

बंधपत्र और जमानतपत्र का रद्दकरण 

भारत में जमानत की शर्तें क्या हैं? 

  • जमानत:अभियुक्त द्वारा विचारण में पेश होने और जमानत की शर्तों का पालन करने का लिखित वचन। इसमें सामान्यत:नकद रकम जमाकरनी होती है (रकम अपराध और आर्थिक स्थिति पर आधारित होती है)। 
    • जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर जमा की गई नकद रकम समपहृत की जा सकती है। तथापिविचारण के अंत मेंपरिणाम चाहे जो भी होयह राशि वापस कर दी जाएगी। 
    • यदि अभियुक्त तुरंत संदाय करने में असमर्थ हैतो न्यायालय व्यक्तिगत जमानत (PR) बंधपत्र पर छोड़ने की अनुमति दे सकता हैऔर उसे नकदी की व्यवस्था करने के लिये समय दिया जा सकता है। 
  • जमानत बंधपत्र:जमानत बंधपत्र किसी पर-पक्षकार (परिवारमित्र या नियोक्ता) द्वारा दी गई प्रत्याभूति होती है जो यह सुनिश्चित करती है कि अभियुक्त जमानत की शर्तों का पालन करेगा और विचारण के लिये उपसंजात होगा। 
    • यदि अभियक्त फरार हो जाता है तो प्रतिभू एक निश्चित रकम जमा कर सकता है जिसे समपहृत कर लिया जाएगा। न्यायालय प्रतिभू के दस्तावेज़ोंवित्तीय स्थिति और निवास स्थान का सत्यापन करते हैंऔर कुछ न्यायालय दिवालियापन प्रमाण पत्र की भी मांग करते हैं। 

सिविल कानून

लोक अदालत की अधिकारिता: कोई आर्थिक सीमा नहीं, केवल क्षेत्रीय सीमाएँ लागू होती हैं

 20-Apr-2026

प्रशांत पी. ​​कुमार और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य 

"चूँकि धारा 19(5) में किसी 'आर्थिक अधिकारिताके बारे में बात नहीं की गई है और केवल 'क्षेत्रीय अधिकारिताके बारे में बात की गई हैइसलिये याचिकाकर्त्ता सफल होने के हकदार नहीं हैं।" 

न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

केरल उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन की पीठ नेप्रशांत पी. ​​कुमार और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026)के मामले में निर्णय दिया कि लोक अदालत अपने क्षेत्रीय अधिकारिता में आने वाले किसी भी मौद्रिक मूल्य के विवादों का निपटारा कर सकती हैक्योंकि विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 19(5) लोक अदालतों पर कोई आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाती है। 

  • न्यायालय ने कपट और अधिकारिता की कमी के आधार पर अदूर तालुक विधिक सेवा समिति द्वारा पारित एक पंचाट को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया। 

प्रशांत पी. ​​कुमार और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ताओं और प्रत्यर्थी पक्ष के बीच विक्रय का एक करार हुआ थाजिसके अधीन प्रत्यर्थी ने 98 लाख रुपए से अधिक की अग्रिम राशि का संदाय किया था। 
  • यह सौदा पूरा नहीं हो सका और याचिकाकर्त्ता अग्रिम राशि वापस करने में विफल रहेजिसके कारण प्रत्यर्थी को तालुक विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष परिवाद दर्ज करना पड़ा 
  • याचिकाकर्त्ताओं को टेलीफोन के माध्यम से उपस्थित होने का निदेश दिया गया और वे एक अधिवक्ता के साथ उपस्थित हुए। तत्पश्चात्विवादित पंचाट पारित किया गयाजिसमें याचिकाकर्त्ताओं द्वारा अग्रिम राशि वापस करने का वचन अभिलिखित किया गयाऔर प्रत्यर्थी को पोस्ट-डेटेड चेक सौंप दिये गए। 
  • पश्चात्वर्ती चेक अनादरण हो गयाऔर प्रत्यर्थी ने पंचाट को लागू कराने के लिये एक निष्पादन याचिका दायर की। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने निष्पादन याचिका पर आपत्ति जताई और कपट और अधिकारिता की कमी के आधार पर पंचाट को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

कपट के आरोप पर: 

  • न्यायालय ने कपट के आरोप को नामंजूर कर दियायह देखते हुए कि याचिकाकर्त्ताओं ने स्वयं स्वीकार किया था कि उनकी उपस्थिति के लिये कोई प्रपीड़न नहीं था।  
  • याचिकाकर्त्ता लोक अदालत के समक्ष एक अधिवक्ता के साथ पेश हुए थेजिससे असम्यक् दबाव या दुर्व्यपदेशन के किसी भी दावे का खंडन होता है। 
  • मात्र कम समय के नोटिस पर उपस्थित होने का निदेश देना और उसके बाद समझौते में भाग लेना कपट नहीं माना जा सकता। 

लोक अदालतों की आर्थिक अधिकारिता पर: 

  • याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि अदूर तालुक विधिक सेवा समिति के पास अधिकारिता नहीं थी क्योंकि अदूर तालुक में कोई उप-न्यायालय नहीं थाऔर इसलिये प्रासंगिक आर्थिक मूल्य का कोई भी वाद वहाँ संस्थित नहीं किया जा सकता था। 
  • न्यायालय ने इस तर्क को नामंजूर करते हुए कहा कि विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 19(5) लोक अदालतों के लिये केवलक्षेत्रीय अधिकारिता निर्धारित करती है औरआर्थिक अधिकारिताका कोई संदर्भ नहीं देती है । 
  • इसलियेलोक अदालत किसी भी आर्थिक मूल्य के विवादों का निपटारा कर सकती हैबशर्ते मामला उसकी क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर आता हो। 
  • न्यायालय ने आंध्र प्रदेश और केरल उच्च न्यायालयों द्वारा पूर्व के निर्णयों में निर्धारित विधि की समान स्थितियों का भी उल्लेख किया। 

लोक अदालतें क्या हैं? 

परिचय 

  • लोक अदालत” का अभिप्राय “जनता का न्यायालय” है। 
  • यह गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है। 
  • उच्चतम न्यायालय के अनुसारयह प्राचीन भारत में प्रचलित न्याय प्रणाली का एक पुराना रूप है। 
  • यह वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। 
  • यह सामान्य जन को अनौपचारिकसस्ता एवं त्वरित न्याय प्रदान करता है।  

 प्रथम लोक अदालत 

 

    • प्रथम लोक अदालत शिविर 1982 में गुजरात में एक स्वैच्छिक और सुलहकारी संस्था के रूप में आयोजित किया गया थाजिसे कोई सांविधिक समर्थन प्राप्त नहीं था। 

    सांविधिक मान्यता 

    • इसे विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अधीन सांविधिक दर्जा दिया गया था। 
    • उक्त अधिनियम में लोक अदालतों के संगठन एवं कार्यप्रणाली से संबंधित प्रावधान निहित हैं।  

    संगठन 

    • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) अन्य विधिक सेवा संस्थानों के साथ मिलकर लोक अदालतों के आयोजन का कार्य करता है।   
    • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की स्थापना विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत की गईजो नवम्बर 1995 से प्रभावी हुआ। 

    संरचना 

    • सामान्यतःलोक अदालत में एक न्यायिक अधिकारी अध्यक्ष के रूप में तथा एक अधिवक्ता एवं एक समाजसेवी सदस्य के रूप में सम्मिलित होते हैं। 

    अधिकारिता 

    • लोक अदालत को निम्नलिखित मामलों में विवादों का निपटारा करने एवं पक्षकारों के मध्य समझौता कराने का अधिकारिता प्राप्त होती है: 
    • किसी भी न्यायालय में लंबित वाद। 
    • ऐसे मामले जो किसी न्यायालय के अधिकारिता में आते हैंपरंतु वहाँ प्रस्तुत नहीं किये गए हैं। 
    • न्यायालय में लंबित किसी भी वाद कोयदि पक्षकार सहमत होंतो निपटारे हेतु लोक अदालत को संदर्भित किया जा सकता है। 

    कार्यवाही 

    • लोक अदालत के समक्ष होने वाली सभी कार्यवाहियों को 'भारतीय न्याय संहिता, 2023' (BNS) के अर्थ के भीतर न्यायिक कार्यवाही माना जाएगाऔर सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908' (CPC) के प्रयोजन के लिये प्रत्येक लोक अदालत को एक सिविल न्यायालय माना जाएगा। 

    पंचाट 

    • लोक अदालत द्वारा दिया गया पंचाट संबंधित पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है और इसे एक सिविल न्यायालय की डिक्री का दर्जा प्राप्त होता हैसाथ हीइसके विरुद्ध अपील नहीं की जा सकतीजिससे विवादों के अंतिम निपटारे में किसी प्रकार की देरी नहीं होती। 

    लाभ 

    • कोई न्यायालय फीस नहीं है और यदि न्यायालय फीस पहले ही संदाय कर दी गई हैतो विवाद लोक अदालत में सुलझने पर राशि वापस कर दी जाएगी।    
    • विवादों के निपटारे में प्रक्रियात्मक लचीलापन और त्वरित विचारण की सुविधा उपलब्ध है।