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आपराधिक कानून
अभियुक्त की संपत्ति की बिक्री को जमानत की शर्त के रूप में आदेशित नहीं किया जा सकता
20-Apr-2026
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फ़िरोज़ बाशा और अन्य. बनाम तमिलनाडु राज्य "न तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और न ही दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 किसी न्यायालय को जमानत या विचारण के प्रक्रम में अभियुक्त की अचल संपत्ति को कथित दावों के निपटारे के लिये बेचने का निदेश देने में सक्षम बनाती है।" न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने फिरोज बाशा एवं अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि न्यायालय जमानत आदेश के भाग के रूप में किसी अभियुक्त की अचल संपत्ति के विक्रय का निदेश देने वाली शर्त अधिरोपित नहीं कर सकता। मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त करते हुए, जिसमें ऐसी शर्त अधिरोपित की गई थी, न्यायालय ने दोहराया कि जमानत कार्यवाही को वसूली कार्यवाही में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, और जमानत की शर्तों का जमानत देने के उद्देश्य से सीधा संबंध होना चाहिये।
फ़िरोज़ बाशा और अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 4 जून, 2025 को छल और धन के दुर्विनियोग का आरोप लगाते हुए एक परिवाद दर्ज किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अपीलकर्त्ता-अभियुक्त और एक अन्य व्यक्ति के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई।
- उन पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 406 (आपराधिक न्यासभंग), 409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात) और 420 (छल) के अधीन धारा 34 (सामान्य आशय) के साथ मामला दर्ज किया गया था।
- अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया और विचारण के दौरान वे 83 दिनों तक अभिरक्षा में रहा।
- सेशन न्यायालय ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने जमानत तो दे दी, लेकिन न्यायिक मजिस्ट्रेट को निदेश देते हुए एक शर्त अधिरोपित कि वह अभियुक्त की अचल संपत्तियों को बेचकर उससे प्राप्त राशि को परिवादकर्त्ता और इसी प्रकार की स्थिति वाले पीड़ितों के बीच वितरित करें।
- अभियुक्त ने इस शर्त को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
जमानत की शर्त के रूप में संपत्ति का विक्रय अस्वीकार्य है:
- न तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और न ही दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 किसी न्यायालय को जमानत या विचारण के प्रक्रम में, कथित दावों के निपटारे के लिये किसी अभियुक्त से संबंधित अचल संपत्ति के विक्रय का निदेश देने का अधिकार देता है।
- जमानत की शर्त के रूप में संपत्ति के विक्रय का आदेश देना एक प्रकार की अंतिम सिविल अनुतोष प्रदान करने के समान है, जो संपत्ति के अधिकारों को प्रत्यक्षत प्रभावित करती है और इसे कायम नहीं रखा जा सकता है।
जमानत की शर्तों का जमानत के उद्देश्य से संबंध होना चाहिये:
- किसी न्यायालय के लिये ऐसी जमानत शर्तें अधिरोपित करना अस्वीकार्य है जिनका जमानत देने के उद्देश्य से कोई संबंध न हो।
- जमानत की शर्तें दण्डात्मक या निर्णायक प्रकृति की नहीं होनी चाहिये, और किसी अभियुक्त को अपनी संपत्ति का उपयोग करने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती हैं।
जमानत की कार्यवाही वसूली की कार्यवाही नहीं बन सकती:
- उच्च न्यायालय ने विवादित शर्त अधिरोपित करते हुए, प्रभावी रूप से अपनी जमानत संबंधी अधिकारिता से बाहर जाकर पक्षकारों के बीच एक सिविल विवाद का निपटारा किया - जबकि विचाराधीन संपत्ति स्वयं एक लंबित सिविल वाद का विषय है।
- महेश चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2006) पर विश्वास करते हुए , न्यायालय ने दोहराया कि जमानत देते समय न्यायालय की अधिकारिता सिविल अधिकारों या विवादों का निर्णय करने तक विस्तारित नहीं होता है, न ही ऐसी शर्तें अधिरोपित करने तक विस्तारित होता है जो वस्तुतः परिवादकार्त्त द्वारा मांगी गई अंतिम सिविल अनुतोष प्रदान करती हैं।
आदेश अपास्त किया गया:
- अपील मंजूर कर ली गई और अपीलकर्त्ताओं की संपत्तियों के विक्रय का निदेश देने वाली विवादित शर्त को पूरी तरह से अनुचित मानते हुए अपास्त कर दिया गया।
जमानत क्या है और इसके प्रकार क्या हैं?
जमानत के बारे में:
- जमानत, जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अंतर्गत एक विधिक उपबंध है, प्रतिभूति जमा करने पर विचारण या अपील लंबित रहने के दौरान जेल से छोड़े जाने की सुविधा प्रदान करती है।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 436 के अनुसार, जमानतीय अपराध जमानत के अधिकार को प्रत्याभूत करता हैं, जबकि अजमानतीय अपराध धारा 437 में उल्लिखित अनुसार न्यायालयों या नामित पुलिस अधिकारियों को विवेकाधिकार प्रदान करते हैं।
- राजस्थान राज्य बनाम बालचंद (1977) के मामले में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने यह निर्णय दिया कि मूल नियम जमानत है, कारावास नहीं। उन्होंने इस अवधारणा का उल्लेख किया कि 'जमानत एक अधिकार है और कारावास एक अपवाद है'।
जमानत के प्रकार:
- नियमित जमानत : यह न्यायालय (देश के किसी भी न्यायालय) द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को छोड़ने का निदेश है जो पहले से ही गिरफ्तार है और पुलिस अभिरक्षा में रखा गया है।
- अंतरिम जमानत: न्यायालय द्वारा दी गई जमानत, जो कि अग्रिम जमानत या नियमित जमानत के लिये आवेदन न्यायालय में लंबित रहने के दौरान एक अस्थायी और अल्प अवधि के लिये होती है।
- अग्रिम जमानत: यह एक विधिक उपबंध है जो किसी अभियुक्त व्यक्ति को गिरफ्तारी से पहले जमानत के लिये आवेदन करने की अनुमति देता है। भारत में, अग्रिम जमानत दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के अधीन दी जाती है। यह केवल सेशन न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अधीन जमानत से संबंधित उपबंध क्या हैं?
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अध्याय 35 में जमानत और बंधपत्र संबंधी उपबंध दिये गए हैं।
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धारा 478 |
किन मामलों में जमानत ली जा जाएगी |
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धारा 479 |
अधिकतम अवधि, जिसके लिये विचाराधीन कैदी किया जा सकता है |
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धारा 480 |
अजमानतीय अपराध की दशा में कब जमानत ली जा सकेगी |
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धारा 481 |
अभियुक्त को अगले अपील न्यायालय के समक्ष उपसंजात होने की अपेक्षा के लिये जमानत |
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धारा 482 |
गिरफ्तारी की आशंका करने वाले व्यक्ति की जमानत मंजूर करने के लिये निदेश |
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धारा 483 |
जमानत के बारे में उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय की विशेष शक्तियां |
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धारा 484 |
जमानत की रकम और उसे घटाना |
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धारा 485 |
अभियुक्त और प्रतिभुओं बंधपत्र |
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धारा 486 |
प्रतिभुओं द्वारा घोषणा |
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धारा 487 |
अभिरक्षा से उन्मोचन |
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धारा 488 |
जब पहले ली गई जमानत अपर्याप्त है तब पर्याप्त जमानत के लिये आदेश देने की शक्ति |
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धारा 489 |
प्रतिभुओं का उन्मोचन |
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धारा 490 |
मुचलके के बजाय निक्षेप |
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धारा 491 |
प्रक्रिया, जब बंधपत्र समपहृत कर लिया जाता है |
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धारा 492 |
बंधपत्र और जमानतपत्र का रद्दकरण |
भारत में जमानत की शर्तें क्या हैं?
- जमानत: अभियुक्त द्वारा विचारण में पेश होने और जमानत की शर्तों का पालन करने का लिखित वचन। इसमें सामान्यत: नकद रकम जमा करनी होती है (रकम अपराध और आर्थिक स्थिति पर आधारित होती है)।
- जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर जमा की गई नकद रकम समपहृत की जा सकती है। तथापि, विचारण के अंत में, परिणाम चाहे जो भी हो, यह राशि वापस कर दी जाएगी।
- यदि अभियुक्त तुरंत संदाय करने में असमर्थ है, तो न्यायालय व्यक्तिगत जमानत (PR) बंधपत्र पर छोड़ने की अनुमति दे सकता है, और उसे नकदी की व्यवस्था करने के लिये समय दिया जा सकता है।
- जमानत बंधपत्र: जमानत बंधपत्र किसी पर-पक्षकार (परिवार, मित्र या नियोक्ता) द्वारा दी गई प्रत्याभूति होती है जो यह सुनिश्चित करती है कि अभियुक्त जमानत की शर्तों का पालन करेगा और विचारण के लिये उपसंजात होगा।
- यदि अभियक्त फरार हो जाता है तो प्रतिभू एक निश्चित रकम जमा कर सकता है जिसे समपहृत कर लिया जाएगा। न्यायालय प्रतिभू के दस्तावेज़ों, वित्तीय स्थिति और निवास स्थान का सत्यापन करते हैं, और कुछ न्यायालय दिवालियापन प्रमाण पत्र की भी मांग करते हैं।
सिविल कानून
लोक अदालत की अधिकारिता: कोई आर्थिक सीमा नहीं, केवल क्षेत्रीय सीमाएँ लागू होती हैं
20-Apr-2026
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प्रशांत पी. कुमार और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य "चूँकि धारा 19(5) में किसी 'आर्थिक अधिकारिता' के बारे में बात नहीं की गई है और केवल 'क्षेत्रीय अधिकारिता' के बारे में बात की गई है, इसलिये याचिकाकर्त्ता सफल होने के हकदार नहीं हैं।" न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन |
स्रोत: केरल उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन की पीठ ने प्रशांत पी. कुमार और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया कि लोक अदालत अपने क्षेत्रीय अधिकारिता में आने वाले किसी भी मौद्रिक मूल्य के विवादों का निपटारा कर सकती है, क्योंकि विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 19(5) लोक अदालतों पर कोई आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाती है।
- न्यायालय ने कपट और अधिकारिता की कमी के आधार पर अदूर तालुक विधिक सेवा समिति द्वारा पारित एक पंचाट को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया।
प्रशांत पी. कुमार और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ताओं और प्रत्यर्थी पक्ष के बीच विक्रय का एक करार हुआ था, जिसके अधीन प्रत्यर्थी ने 98 लाख रुपए से अधिक की अग्रिम राशि का संदाय किया था।
- यह सौदा पूरा नहीं हो सका और याचिकाकर्त्ता अग्रिम राशि वापस करने में विफल रहे, जिसके कारण प्रत्यर्थी को तालुक विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष परिवाद दर्ज करना पड़ा।
- याचिकाकर्त्ताओं को टेलीफोन के माध्यम से उपस्थित होने का निदेश दिया गया और वे एक अधिवक्ता के साथ उपस्थित हुए। तत्पश्चात्, विवादित पंचाट पारित किया गया, जिसमें याचिकाकर्त्ताओं द्वारा अग्रिम राशि वापस करने का वचन अभिलिखित किया गया, और प्रत्यर्थी को पोस्ट-डेटेड चेक सौंप दिये गए।
- पश्चात्वर्ती चेक अनादरण हो गया, और प्रत्यर्थी ने पंचाट को लागू कराने के लिये एक निष्पादन याचिका दायर की।
- याचिकाकर्त्ताओं ने निष्पादन याचिका पर आपत्ति जताई और कपट और अधिकारिता की कमी के आधार पर पंचाट को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
कपट के आरोप पर:
- न्यायालय ने कपट के आरोप को नामंजूर कर दिया, यह देखते हुए कि याचिकाकर्त्ताओं ने स्वयं स्वीकार किया था कि उनकी उपस्थिति के लिये कोई प्रपीड़न नहीं था।
- याचिकाकर्त्ता लोक अदालत के समक्ष एक अधिवक्ता के साथ पेश हुए थे, जिससे असम्यक् दबाव या दुर्व्यपदेशन के किसी भी दावे का खंडन होता है।
- मात्र कम समय के नोटिस पर उपस्थित होने का निदेश देना और उसके बाद समझौते में भाग लेना कपट नहीं माना जा सकता।
लोक अदालतों की आर्थिक अधिकारिता पर:
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि अदूर तालुक विधिक सेवा समिति के पास अधिकारिता नहीं थी क्योंकि अदूर तालुक में कोई उप-न्यायालय नहीं था, और इसलिये प्रासंगिक आर्थिक मूल्य का कोई भी वाद वहाँ संस्थित नहीं किया जा सकता था।
- न्यायालय ने इस तर्क को नामंजूर करते हुए कहा कि विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 19(5) लोक अदालतों के लिये केवल क्षेत्रीय अधिकारिता निर्धारित करती है और आर्थिक अधिकारिता का कोई संदर्भ नहीं देती है ।
- इसलिये, लोक अदालत किसी भी आर्थिक मूल्य के विवादों का निपटारा कर सकती है, बशर्ते मामला उसकी क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर आता हो।
- न्यायालय ने आंध्र प्रदेश और केरल उच्च न्यायालयों द्वारा पूर्व के निर्णयों में निर्धारित विधि की समान स्थितियों का भी उल्लेख किया।
लोक अदालतें क्या हैं?
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परिचय |
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प्रथम लोक अदालत
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सांविधिक मान्यता |
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संगठन |
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संरचना |
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अधिकारिता |
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कार्यवाही |
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पंचाट |
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लाभ |
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