- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
करेंट अफेयर्स और संग्रह
होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह
आपराधिक कानून
अनेक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होना ही संगठित अपराध का आरोप साबित करने के लिये पर्याप्त नहीं है
11-May-2026
|
"अभियोजन पक्ष द्वारा भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 111(4) लागू करने के लिये बताए गए कारण अधिक से अधिक यह दर्शाते हैं कि दर्ज किये गए परिवाद या अपराध अन्वेषण के अधीन हैं। वे मानक को पूरा नहीं करते... भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 111(4) के अधीन याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध आरोप टिकाऊ नहीं हैं।" न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह |
स्रोत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की एकल पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह शामिल थे, ने हीरालाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 111(4) के अधीन लगाए गए आरोपों को अपास्त कर दिया। न्यायालय ने यह माना कि किसी अभियुक्त के विरुद्ध विभिन्न राज्यों में कई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) या परिवाद दर्ज होना संगठित अपराध से संबंधित उपबंध को लागू करने के लिये पर्याप्त नहीं है। न्यायालय ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 के अधीन आरोप को विधिक रूप से मान्य रखने के लिये कुछ बुनियादी मापदंडों का पूरा होना आवश्यक है।
हीरालाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2025) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला अमित द्वारा 30 अक्टूबर, 2024 को दायर की गई एक परिवाद से उत्पन्न हुआ, जिसमें आरोप लगाया गया था कि "यू.एस.बी. सिक्योरिटीज" नामक एक व्हाट्सएप समूह के सदस्यों ने उन्हें लाभ का वचन करके शेयर बाजार में निवेश करने के लिये प्रेरित किया, जिसके बाद उन्होंने 26.55 लाख रुपए विभिन्न बैंक खातों में स्थानांतरित कर दिये।
- विनय यादव, राहुल यादव और हीरालाल समेत अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। अन्वेषण के दौरान पता चला कि याचिकाकर्त्ता (हीरालाल) का राहुल और विनय से 2023 में संपर्क हुआ था और उसे 1 लाख रुपए के भुगतान के लिये बैंक खाते खुलवाने को कहा गया था।
- याचिकाकर्त्ता ने इसके बाद राहुल यादव से संपर्क किया और प्रति खाता 5,000 रुपए का भुगतान किया। इस तरह चार खाते प्राप्त किये गए और विजय मेवाड़ा को भेज दिये गए। सभी अभियुक्त सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से संवाद करते पाए गए और नियमित रूप से अपनी चैट हिस्ट्री डिलीट करते थे।
- विचारण न्यायालय ने धारा 111(4) भारतीय न्याय संहिता (संगठित अपराध) के अधीन आरोप विरचित किये थे। पुनरीक्षण याचिकाकर्त्ता ने आरोपों को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि:
- सह-अभियुक्तों के साथ उसके संबंधों को दर्शाने वाले कोई कॉल रिकॉर्ड नहीं मिले।
- उसके पास से कोई भी आपत्तिजनक सामग्री जब्त नहीं की गई थी।
- वह विधि का स्नातक था और उसके विरुद्ध दर्ज किया गया यह पहला अपराध था।
- इसलिये, भारतीय न्याय संहिता की धारा 111(4) उनके मामले पर लागू नहीं होती।
- यद्यपि, राज्य ने धारा 111 लागू करने को इस आधार पर उचित ठहराया कि याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध विभिन्न राज्यों में कई मामले दर्ज किये गए थे - एक ठाणे जिले (महाराष्ट्र) में, दो तेलंगाना में (जिसमें साइबर क्राइम पुलिस के पास एक मामला शामिल है), और एक जालंधर जिले (पंजाब) में।
- इससे पहले उच्च न्यायालय ने राज्य से यह स्पष्ट करने को कहा था कि धारा 111 इस मामले पर कैसे लागू होती है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 के प्राथमिक आशय पर: न्यायालय ने पाया कि धारा 111 को लागू करने का प्राथमिक आशय संगठित अपराध सिंडिकेट को ध्वस्त करने के लिये एक लक्षित और प्रभावी तंत्र प्रदान करना है। यह उपबंध एक सामान्य अपराध-विरोधी उपकरण नहीं है और इसका प्रयोग किसी भी ऐसे अभियुक्त के विरुद्ध मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता जिसके विरुद्ध कई परिवाद दर्ज हों।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 लागू करने के लिये बुनियादी मापदंडों पर: न्यायालय ने निर्धारित किया कि धारा 111 भारतीय न्याय संहिता लागू होने के लिये, कुछ बुनियादी मापदंडों को एक साथ पूरा किया जाना चाहिये:
- इस धारा के अंतर्गत सूचीबद्ध अपराध किये गए होने चाहिये।
- आरोपी किसी संगठित अपराध सिंडिकेट का सदस्य होना चाहिये।
- यह अपराध ऐसे सिंडिकेट के सदस्य के रूप में या उसकी ओर से किया गया होना चाहिये।
- अभियुक्त के विरुद्ध पिछले दस वर्षों के भीतर किसी सक्षम न्यायालय के समक्ष एक से अधिक बार संज्ञेय अपराध के लिये आरोप पत्र दायर किया गया हो, जिसके लिये तीन वर्ष या उससे अधिक के कारावास का दण्ड हो, और न्यायालय ने ऐसे अपराध का संज्ञान लिया हो - जिसमें आर्थिक अपराध भी शामिल हैं।
- यह अपराध हिंसा की धमकी, अभित्रास, प्रपीड़न या किसी अन्य विधिविरुद्ध साधनों से किया गया होना चाहिये।
- राज्य के औचित्य पर: न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष द्वारा दिये गए कारण—अर्थात् विभिन्न राज्यों में कई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होना—अधिक से अधिक यह दर्शाते हैं कि परिवाद अभी भी अन्वेषण के अधीन हैं। वे धारा 111(4) भारतीय न्याय संहिता लागू करने के लिये आवश्यक मानदंड को पूरा नहीं करते। इसलिये, विचारण न्यायालय ने उक्त उपबंध के अधीन आरोप विरचित करने में त्रुटी की है।
- पूर्व निर्णय की प्रयोज्यता पर: आमिर बशीर मगरे बनाम राज्य (2025) के मामले का हवाला देते हुए न्यायालय ने दोहराया कि धारा 111 के अधीन दायित्त्व के लिये यह सिद्ध होना आवश्यक है कि व्यक्ति निरंतर विधिविरुद्ध क्रियाकलाप में संलग्न रहा हो - जिसमें आर्थिक अपराध भी शामिल हो सकते हैं - और पिछले दस वर्षों में सक्षम न्यायालय के समक्ष उस व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक बार आरोप पत्र दायर किया गया हो। चूँकि तथ्यों के आधार पर इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई, इसलिये आरोप टिकने लायक नहीं था।
- अन्य प्रावधानों के अधीन आरोपों पर: न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 318(4) (छल) और धारा 316(5) (आपराधिक न्यासभंग) के अधीन आरोपों को बनाए रखने के लिये प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत पाए, याचिकाकर्त्ता का कपट में प्रयोग किये गए बैंक खातों को प्राप्त करने और आगे भेजने में भूमिका को देखते हुए।
- अभियोजन की स्वतंत्रता पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि अभियोजन पक्ष बाद में धारा 111 भारतीय न्याय संहिता को लागू करने के लिये पर्याप्त सामग्री एकत्र करता है, तो वह उस स्तर पर एक पूरक अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर सकता है और अतिरिक्त आरोप के लिये प्रार्थना कर सकता है।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 111 क्या है?
बारे में:
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 111 संगठित अपराध से संबंधित है और विशिष्ट राज्यों पर लागू विशेष संविधि के अधीन विद्यमान समान प्रावधानों का स्थान लेती है।
धारा 111 — मुख्य उपबंध:
- धारा (1) "संगठित अपराध" को किसी भी सतत् विधिविरुद्ध क्रियाकलाप के रूप में परिभाषित करती है - जिसमें व्यपहरण, डकैती. यान डोरी, उद्दापन, भूमि हथियाना, संविदा पर हत्या करना, आर्थिक अपराध, साइबर अपराध, व्यक्तियों, प्रऔषधियों, हथियारों, अवैध माल या सेवाओं का दुर्व्यापार, वेश्यावृत्ति या फिरौती के लिये मानव दुर्व्यापार शामिल है, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तात्विक फायदा, जिसके अंतर्गत वित्तीय फायदा भी प्राप्त करने के लिये हिंसा, हिंसा की धमकी, अभित्रास, उत्पीड़न या अन्य विधिविरूद्ध साधनों द्वारा संगठित अपराध का गठन है।
- संगठित अपराध सिंडिकेट का अर्थ है दो या दो से अधिक व्यक्तियों का एक समूह जो एकल रूप से या संयुक्त रूप से एक सिंडिकेट या समूह के रूप में सतत् विधिविरुद्ध क्रियाकलाप में संलग्न होता है।
- सतत् विधिविरुद्ध क्रियाकलाप को जारी रखना एक संज्ञेय अपराध है जिसके लिये तीन वर्ष या उससे अधिक कारावास का दण्ड हो सकता है, जिसके संबंध में पिछले दस वर्षों के भीतर एक सक्षम न्यायालय के समक्ष एक से अधिक आरोपपत्र दायर किये गए हैं और संज्ञान लिया गया है - जिसमें आर्थिक अपराध भी शामिल हैं।
- आर्थिक अपराध में आपराधिक न्यासभंग, कूटरचना, मुद्रा/बैंक नोट/सरकारी स्टाम्प का कूटकरण, हवाला संव्यवहार, सामूहिक विपणन कपट, या मौद्रिक लाभ के लिये बैंकों, वित्तीय संस्थानों या अन्य संगठनों को कपट करने की कोई भी योजना शामिल है।
- खंड (2) संगठित अपराध करने के लिये दण्ड विहित करता है:
- यदि इसके परिणामस्वरूप मृत्यु होती है तो मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास, साथ ही 10 लाख रुपए से कम का जुर्माना नहीं।
- अन्य किसी भी मामले में — कम से कम 5 वर्ष का कारावास, जिसे आजीवन कारावास में परिवर्तित किया जा सकता है, और कम से कम 5 लाख रुपए का जुर्माना।
- खंड (3) संगठित अपराध का दुष्प्रेरण, प्रयत्न करने, षड्यंत्र रचने या जानबूझकर सुविधा प्रदान करने, या किसी भी तैयारी संबंधी कार्य के लिये दण्ड देता है - कम से कम 5 वर्ष का कारावास, जिसे आजीवन कारावास में बढ़ाया जा सकता है, और कम से कम 5 लाख रुपए का जुर्माना।
- धारा (4) संगठित अपराध सिंडिकेट की मात्र सदस्यता को दण्डित करती है - कम से कम 5 वर्ष का कारावास, जिसे आजीवन कारावास में परिवर्तित किया जा सकता है, और कम से कम 5 लाख रुपए का जुर्माना।
- धारा (5) संगठित अपराध करने वाले व्यक्ति को साशयपूर्वक संश्रय देने या छुपाने के लिये दण्ड का उपबंध करती है — कम से कम 3 वर्ष का कारावास, जिसे आजीवन कारावास में परिवर्तित किया जा सकता है, और कम से कम ₹5 लाख का जुर्माना। (अपवाद: यह अपराधी के पति-पत्नी पर लागू नहीं होता।)
- धारा (6) संगठित अपराध से प्राप्त संपत्ति या उसके आगम पर कब्ज़ा करने को दण्डित करती है - कम से कम 3 वर्ष का कारावास, जिसे आजीवन कारावास में परिवर्तित किया जा सकता है, और कम से कम 2 लाख रुपए का जुर्माना।
- धारा (7) किसी सिंडिकेट सदस्य की ओर से कार्य करने वाले किसी व्यक्ति को, जिसके पास चल या अचल संपत्ति पाई जाती है जिसका समाधानप्रद लेखा नहीं दिया जा सकता, उसे कम से कम 3 वर्ष की कारावास, जिसे 10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, और कम से कम 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा।
पारिवारिक कानून
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25
11-May-2026
|
"हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अधीन निहित निषेध निर्वसीयत उत्तराधिकार तथा वसीयती उत्तराधिकार — दोनों पर समान रूप से लागू होता है। जिस व्यक्ति पर उस व्यक्ति की हत्या का आरोप हो, जिससे उत्तराधिकार का दावा किया जा रहा है, वह न केवल धारा 25 के अधीन, अपितु न्याय, निष्पक्षता एवं समता के सिद्धांतों के आधार पर भी अपने अधिकारों का दावा करने से वंचित हो जाता है।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन शामिल थे, ने मंजुला और अन्य बनाम डी.ए. श्रीनिवास (2026) के मामले में उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और प्रारंभिक प्रक्रम में ही वादी की याचिका को खारिज करने के विचारण न्यायालय के निर्णय को बहाल कर दिया, यह मानते हुए कि वादी - जिसे मृतक की हत्या में अभियुक्त बनाया गया था - हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (HSA) की धारा 25 के अधीन मृतक की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा करने के लिये निरर्हत था।
- न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि हत्या के लिये वास्तविक दोषसिद्धि, धारा 25 हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अधीन निरर्हित लागू होने के लिये एक पूर्व शर्त नहीं है, और सिविल कार्यवाही में, इस विवाद्यक की जांच संभावनाओं की प्रबलता के मानक पर की जा सकती है।
मंजुला और अन्य बनाम डी.ए. श्रीनिवास (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- वादी ने दावा किया कि वह मृतक के. रघुनाथ के नाम पर खरीदी गई संपत्ति का वास्तविक स्वामी है। के. रघुनाथ द्वारा अपने पक्ष में निष्पादित कथित वसीयत पर विश्वास करते हुए, वादी ने वसीयती उत्तराधिकार के माध्यम से स्वामित्व और स्वामित्व की घोषणा की मांग करते हुए वाद दायर किया।
- प्रतिवादी ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11(घ) के अधीन एक आवेदन दाखिल करके वाद का विरोध किया, जिसमें वाद को इस आधार पर खारिज करने की मांग की गई कि यह विधि द्वारा, विशेष रूप से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 द्वारा वर्जित है, क्योंकि वादी को के. रघुनाथ की हत्या के मामले में अभियुक्त के रूप में नामित किया गया था - वही व्यक्ति जिसकी संपत्ति से वह उत्तराधिकार प्राप्त करना चाहता था।
- विचारण न्यायालय ने प्रतिवादी की अर्जी मंजूर कर ली और वादपत्र नामंजूर कर दिया। तथापि, उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के इस आदेश को पलट दिया, जिसके बाद प्रतिवादियों ने अपील में उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि धारा 25 के अंतर्गत वर्जन निर्वसयती और वसीयत के साथ दोनों प्रकार के उत्तराधिकार पर लागू होता है। मृतक की हत्या के अभियुक्त व्यक्ति को, जिससे उत्तराधिकार का दावा किया जा रहा है, ऐसे किसी भी अधिकार का दावा करने से निरर्हित घोषित कर दिया जाता है - न केवल सांविधिक प्रावधान के अधीन अपितु न्याय, निष्पक्षता और समानता के व्यापक सिद्धांतों के आधार पर भी।
- Ex Turpi Causa की सूक्ति पर : न्यायालय ने तर्क दिया कि किसी व्यक्ति को अपने ही सदोष कार्य से लाभ उठाने या उसका फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये। यह सिद्धांत 'ex turpi causa non oritur actio' (गलत काम से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता) और इस नियम में निहित है कि कोई भी व्यक्ति अपने ही सदोष कार्य से लाभ नहीं उठा सकता।
- दोषसिद्धि की आवश्यकता के संबंध में: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 के अधीन निरर्हित होने के लिये वास्तविक दोषसिद्धि को पूर्व शर्त नहीं बनाया गया है। चूँकि यह उपबंध सिविल परिणाम लागू करता है, इसलिये इस विवाद्यक की परीक्षा आपराधिक अभियोग में लागू होने वाले कठोर सबूत मानक से स्वतंत्र रूप से, संभावनाओं की प्रबलता के मानक के आधार पर की जा सकती है।
- महत्त्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि वादी ने अपने अभियोग में के. रघुनाथ की हत्या के आरोप से संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य को छिपाया था, और CBI अन्वेषण लंबित होने का उल्लेख किया था। न्यायालय ने माना कि महत्त्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का दोषी व्यक्ति सुनवाई का हकदार नहीं है, और इस आधार पर भी वादपत्र नामंजूर किया जा सकता है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 25 क्या है?
के बारे में:
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (HSA) में उत्तराधिकार शब्द को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है ।
- सामान्य तौर पर, उत्तराधिकार को किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति में अधिकारों और दायित्त्वों के उसके उत्तराधिकारी या उत्तराधिकारियों को हस्तांतरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
- यह अधिनियम हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों पर लागू होता है, लेकिन मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों या यहूदियों पर लागू नहीं होता है।
धारा 25 — हत्यारा करने वाला निरर्हित होना:
- हत्या करने वाला या हत्या में सहायता करने वाला व्यक्ति दो स्थितियों में संपत्ति विरासत में पाने के लिये निरर्हित हो जाता है:
- मृतक व्यक्ति की संपत्ति , और
- कोई अन्य संपत्ति जिसके उत्तराधिकार को आगे बढ़ाने के लिये हत्या या हत्या में सहायता की गई हो।
- इस प्रकार, निरर्हित न केवल पीड़ित से प्राप्त प्रत्यक्ष विरासत को अपितु हत्या के पीछे के हेतु के रूप में प्राप्त किसी भी अप्रत्यक्ष संपत्ति लाभ की भी बात करती करती है।