9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से






करेंट अफेयर्स और संग्रह

होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह

आपराधिक कानून

प्रेम संबंधों में असहमति आधारित यौन संबंध का अपराधीकरण

 02-Apr-2026

हमीदुर इस्लाम उर्फ ​​हमीदुर इस्लाम बनाम असम राज्य और अन्य 

"भले ही एक पुरुष और एक महिला रिश्ते में होंलेकिन इससे पुरुष को लड़की के साथ बलात्संग करने का अधिकार नहीं मिल जाता। तथापि देश में वैवाहिक बलात्संग को अभी तक अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया हैलेकिन विवाह से पहले के प्रेम संबंध में भीमहिला की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ बलपूर्वक शारीरिक संबंध बनाना एक आपराधिक कृत्य होगा।" 

न्यायमूर्ति प्रांजल दास 

स्रोत: गुवाहाटी उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

गुवाहाटी उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रांजल दास नेहामेदुर इस्लाम उर्फ ​​हामिदुर इस्लाम बनाम असम राज्य और अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि पक्षकारों के बीच प्रेम संबंध का अस्तित्व बलात्संग के अपराध को कम नहीं करता हैऔर यहाँ तक ​​कि विवाहपूर्व संबंध में भीकिसी महिला की इच्छा के विरुद्ध कोई भी बलपूर्वक शारीरिक कृत्य एक आपराधिक अपराध है। 

  • न्यायालय ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिये अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करने से इंकार कर दियायह देखते हुए कि पीड़िता के कथनों से निरंतर यह पता चलता है कि बिना किसी सहमति के बलात्कार किया गया थाऔर इसमें शामिल अपराध गंभीर प्रकृति के थे - विशेष रूप से कथित घटना के समय पीड़िता की आयु को देखते हुए। 

हमीदुर इस्लाम बनाम असम राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय में एक आपराधिक याचिका दायर कर भारतीय न्याय संहिता, 2023 के प्रासंगिक प्रावधानों और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 की धारा के अधीन उसके विरुद्ध दायर आरोपपत्र से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की। 
  • पीड़िता के पिता ने शुरू में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि अभियुक्त उनके घर में घुस गएजब उनकी पुत्री अकेली थी तब उसके साथ बलात्संग किया और उसे घटना का प्रकटन न करने की धमकी दी। 
  • याचिकाकर्त्ताने तर्क दिया कि तब से इत्तिलाकर्त्ता (पिता) के साथ एक समझौता हो चुका थाकि पीड़िता बालिग हो चुकी थीकि कथित घटना के समय दोनों पक्ष प्रेम संबंध में थेऔर दोनों परिवारों ने उनके प्रस्तावित विवाह के लिये सहमति दे दी थी। 
  • इत्तिलाकर्त्ता ने न्यायालय के समक्ष एक शपथपत्र भी दाखिल किया जिसमें उसने कार्यवाही को रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई। 
  • अभियोजन पक्ष ने इस आधार पर याचिका का विरोध किया कि पीड़िता के कथनों से निरंतर यह साबित होता है कि अभियुक्त बलात्संग करने में शामिल थे और अपराध गंभीर प्रकृति के थे। 
  • न्यायालय ने गौर किया कि कथित घटना के समय पीड़िता की आयु प्रथम दृष्टया लगभग 17 वर्ष थीजिससे उस पर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण के प्रावधान लागू होते हैं। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी पुरुष और महिला के बीच प्रेम संबंध का अस्तित्व किसी भी तरह से बलात्कार को जायज नहीं ठहराता। यहाँ तक ​​कि विवाहपूर्व संबंध में भीमहिला की इच्छा के विरुद्ध कोई भी बलपूर्वक शारीरिक कृत्यविधिक आपराधिक अपराध है। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपिभारत में वैवाहिक बलात्संग को अभी भी अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया हैलेकिन यहविधिक स्थिति विवाहपूर्व संबंधों पर लागू नहीं होती हैऔर ऐसे संबंधों के भीतर कोई भी गैर-सहमतिपूर्ण शारीरिक कृत्य लागू विधि के अधीन आपराधिक दायित्त्व को आकर्षित करता है। 
  • समझौते के प्रश्न परन्यायालय ने कहा कि यद्यपि सूचना देने वाले (पीड़िता के पिता) ने समझौता कर लिया था और अनापत्ति का शपथपत्र दाखिल कर दिया थालेकिन पीड़िता ने स्वयं ऐसा कोई समझौता नहीं किया थाऔर उसकी राय और बयान कार्यवाही के लिये महत्त्वपूर्ण बने रहे। 
  • प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष और पुलिस अन्वेषण के दौरान अभिलिखित किये गए पीड़िता के कथनों की जांच करने परन्यायालय ने पाया कि उसने निरंतर बलात्संग किये जाने की बात स्वीकार की थीलेकिन अपनी ओर से किसी प्रकार की सहमति का संकेत नहीं दिया था - और यद्यपि उसने प्रेम संबंध को स्वीकार किया थालेकिन उसके कथनों में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह पता चले कि शारीरिक संबंध सहमति से था। 
  • न्यायालय ने माना किइसमें शामिल अपराधों की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए और गंभीर अपराधों को रद्द करने के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसारआपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिये अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करना उचित नहीं होगा। 
  • तदनुसारयाचिका खारिज कर दी गई। 

भारतीय न्याय संहिता के अधीन बलात्कार के अपराध क्या हैं? 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 = बलात्संग की परिभाषा 

कार्य 

विवरण  

() 

किसी महिला की योनिउसके मुंहमूत्रमार्ग या गुदा में अपना लिंग किसी भी सीमा तक प्रवेश करता है या उससे ऐसा अपने साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ कराता है।  

() 

किसी महिला की योनिमूत्रमार्ग या गुदा में ऐसी कोई वस्तु या शरीर का कोई भागजो लिंग न होकिसी भी सीमा तक अनुप्रविष्ट करता है या उससे ऐसा अपने साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ कराता है।  

() 

किसी महिला के शरीर के किसी भाग का इस प्रकार हस्तसाधन करता है जिससे कि उस महिला की योनिमूत्रमार्गगुदा या शरीर के किसी भाग में प्रवेशन कारित किया जा सके या उससे ऐसा अपने साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ कराता है 

() 

किसी महिला की योनिगुदामूत्रमार्ग पर अपना मुंह लगाता है या उससे ऐसा अपने साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ कराता है।  

उपरोक्त में से कोई भी कृत्य इन परिस्थितियों में किये जाने पर बलात्कार की श्रेणी में आता है: 

परिस्थिति 

विवरण 

(i) 

उस महिला की इच्छा के विरुद्ध 

(ii) 

उस महिला की सम्मति के बिना 

(iii) 

उस महिला की सम्मति से. जब उसकी सम्मति उसे या ऐसे किसी व्यक्ति कोजिससे वह हितबद्ध हैमृत्यु या उपहति के भय में डालकर अभिप्राप्त की गई है।  

(iv) 

उस महिला की सम्मति सेजब कि वह पुरुष यह जानता है कि वह उस महिला का पति नहीं है और उस महिला ने सम्मति इस कारण दी है कि वह यह विश्वास करती है कि वह ऐसा अन्य पुरुष है जिससे वह विधिपूर्वक विवाहित है या विवाहित होने का विश्वास करती है 

(v) 

उस महिला की सम्मति सेजब ऐसी सम्मति देने के समयवह चित्त-विकृत्ति या मत्तता के कारण या उस पुरुष द्वारा व्यक्तिगत रूप से या किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से कोई संज्ञाशून्यकारी या अस्वास्थ्यकर पदार्थ दिए जाने के कारणउस बात कीजिसके बारे में वह सम्मति देती हैप्रकृति और परिणामों को समझने में असमर्थ है 

(vi) 

उस महिला की सम्मति से या उसके बिनाजब वह अठारह वर्ष से कम आयु की है 

(vii) 

जब वह महिला सम्मति संसूचित करने में असमर्थ है 

स्पष्टीकरण और अपवाद: 

प्रकार 

विवरण  

स्पष्टीकरण 1 

इस धारा के प्रयोजनों के लिये, 'योनिके अंतर्गत वृहत् भगौष्ठ भी है 

स्पष्टीकरण 2 

सम्मति से कोई स्पष्ट स्वैच्छिक सहमति अभिप्रेत हैजब महिला शब्दोंसंकेतों या किसी प्रकार की मौखिक या अमौखिक संसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट लैंगिक कृत्य में भाग लेने की इच्छा व्यक्त करती है 

अपवाद 1 

किसी चिकित्सीय प्रक्रिया या अंतःप्रवेशन से बलात्संग गठित नहीं होगा 

अपवाद 2 

किसी पुरुष का अपनी स्वयं की पत्नी के साथ मैथुन या लैंगिक कृत्ययदि पत्नी अठारह वर्ष से कम आयु की न होबलात्संग नहीं है 

  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 (1) = बलात्संग के अपराध के लिये दण्ड 
    • इस उपबंध में बलात्संग के अपराध के लिये दण्ड का उपबंध हैजो कठोर कारावास हैजो 10 वर्ष से कम नहीं होगाकिंतु आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है और साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। 
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 (2) = विशिष्ट परिस्थितियों में बलात्संग के अपराध के लिये दण्ड 
    • इसमें विशिष्ट परिस्थितियों में बलात्संग के अपराध का उपबंध है। 
    • यहाँ दिया गया दण्ड कम से कम दस वर्ष का कठोर कारावास हैजिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता हैजिसका अर्थ है उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिये कारावासऔर साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। 
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 65 = कतिपय मामलों में बलात्संग के लिये दण्ड (अवयस्कों के साथ)  

उपधारा 

पीड़िता की आयु 

दण्ड 

जुर्माना 

अतिरिक्त उपबंध 

(1) 

बलात्संग की घटना में पीड़िता की आयुसोलहवर्ष से कम होनी चाहिये।  

कम से कमबीस वर्ष केकठोर कारावास का दण्डजिसेआजीवन कारावास (शेष प्राकृत जीवनकाल) तक बढ़ाया जा सकता है। 

जुर्माना के लिये दायी होगा 

1. पीड़ित के चिकित्सा खर्च और पुनर्वास के लिये जुर्माना न्यायोचित और युक्तियुक्त होना चाहिये 

2. लगाया गया कोई भी जुर्माना पीड़ित को अदा किया जाएगा। 

(2) 

बलात्संग की घटना में पीड़िता कीआयुबारह वर्ष से कम होनी चाहिये 

कम से कमबीस वर्ष की कठोर कारावास का दण्ड, जिसेआजीवन कारावास (शेष प्राकृत जीवनकाल) यामृत्युदण्ड तक बढ़ाया जा सकता है। 

जुर्माने सहित 

1. पीड़ित के चिकित्सा खर्च और पुनर्वास के लिये जुर्माना युक्तियुक्त और न्यायोचित होना चाहिये 

2. अधिरोपित किया गया कोई भी जुर्माना पीड़ित को अदा किया जाएगा। 

  •  धारा 66 = पीड़िता की मृत्यु या सतत् विकृतशील दशा कारित करने के लिये दण्ड 
  • कम से कम 20 वर्ष काकठोर कारावासजिसेआजीवन कारावासतक बढ़ाया जा सकता है या इसके साथ 
  • धारा 70 = सामूहिक बलात्संग  

उपधारा 

पीड़िता की श्रेणी 

विवरण 

दण्ड 

जुर्माना 

अतिरिक्त उपबंध 

(1) 

वयस्क महिला 

जहाँ किसी महिला के साथ एक या अधिक व्यक्तियों द्वाराजो समूह बनाकर या समान आशय से कार्य करते हुएबलात्संग किया जाता है 

कठोर कारावासजिसकी अवधि बीस वर्ष से कम नहीं होगीजो आजीवन कारावास (अर्थात् शेष प्राकृत जीवनकाल) तक विस्तारित हो सकती है  

जुर्माने सहित 

1. जुर्माना न्यायसंगत एवं युक्तियुक्त होगाजिससे पीड़िता के चिकित्सा व्यय एवं पुनर्वास की पूर्ति हो सके। 
2. अधिरोपित कोई भी जुर्माना पीड़िता को अदा किया जाएगा। 

(2) 

अठारह वर्ष से कम आयु की महिला 

जहाँ अठारह वर्ष से कम आयु की महिला के साथ एक या अधिक व्यक्तियों द्वाराजो समूह बनाकर या समान आशय से कार्य करते हुएबलात्संग किया जाता है 

आजीवन कारावास (अर्थात् शेष प्राकृत जीवनकाल) या मृत्युदण्ड 

जुर्माने सहित 

1. जुर्माना न्यायसंगत एवं युक्तियुक्त होगाजिससे पीड़िता के चिकित्सा व्यय एवं पुनर्वास की पूर्ति हो सके। 
2. अधिरोपित कोई भी जुर्माना पीड़िता को अदा किया जाएगा।  


सिविल कानून

सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 9 नियम 13

 02-Apr-2026

दीपेश माहेश्वरी एवं अन्य। वी. रेनू महेश्वरी और अन्य 

"सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश नियम 13 व्यापक अधिकारिता प्रदान करता हैजिससे आवेदक को गैर-उपस्थिति के लिये पर्याप्त कारण प्रदर्शित करने और एकपक्षीय डिक्री को अपास्त करने की मांग करने में सक्षम बनाया जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ नेदीपेश माहेश्वरी और अन्य बनाम रेनू माहेश्वरी और अन्य (2026)के मामले में यह निर्णयन दिया कि एकपक्षीय डिक्री के विरुद्ध धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर की गई असफल अपील पीड़ित पक्ष को बाद में उस डिक्री को अपास्त करने के लिये आदेश नियम 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन आवेदन दाखिल करने से नहीं रोकती है। 

  • न्यायालय ने आगे कहा कि किसी अवयस्क से लोक सूचनाओं का जवाब देने या स्वतंत्र विधिक कदम उठाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती हैऔर सह-उत्तराधिकारियों द्वारा महत्त्वपूर्ण तथ्यों को लंबे समय तक छिपाने से भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 383 के अधीन उत्तराधिकार प्रमाण पत्र को रद्द किया जा सकता है। 

दीपेश माहेश्वरी बनाम रेनू माहेश्वरी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद ओमप्रकाश माहेश्वरी की मृत्यु के बाद शुरू हुई उत्तराधिकार कार्यवाही से उत्पन्न हुआ। मृतक की प्रथम विवाह से हुई पुत्रियों ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिये आवेदन किया और स्वयं को एकमात्र विधिक उत्तराधिकारी बताते हुएजानबूझकर उसकी द्वितीय पत्नी और उससे जन्मे एक अवयस्क पुत्र के अस्तित्व को छिपाया। 
  • अवयस्क पुत्र — अपीलकर्त्ता संख्या 1 — को कार्यवाही में पक्षकार के रूप में कभी शामिल नहीं किया गयाजबकि प्रत्यर्थी पुत्रियों को उसके अस्तित्व की पूरी जानकारी थी। विधि के अनुसार उसके हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिये कोई संरक्षक नियुक्त नहीं किया गया। परिणामस्वरूपउत्तराधिकार प्रमाण पत्र एकपक्षीय जारी कर दिया गया। 
  • व्यस्क होने परअपीलकर्त्ता नंबर ने अपनी माता और मृतक की द्वितीय पत्नी  अपीलकर्त्ता नंबर 2, मालती माहेश्वरी - के साथ मिलकर आदेश नियम 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन एक आवेदन दाखिल करके एकपक्षीय आदेश को चुनौती दी। 
  • विचारण न्यायालयप्रथम अपीलीय न्यायालय और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (ग्वालियर पीठ) सभी ने इस आधार पर आवेदन खारिज कर दिया कि माता पहले ही पिछली अपीलीय कार्यवाही में भाग ले चुकी थीजिससे दोनों अपीलकर्त्ता आदेश नियम 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन सहारा लेने के हकदार नहीं रह गए थे। 
  • इससे व्यथित होकर पुत्र और द्वितीय पत्नी ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना कि धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता और आदेश नियम 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कार्यवाही का दायरा पूरी तरह से भिन्न है। जबकि धारा 96 डिक्री के गुण-दोष पर अपील से संबंधित हैआदेश नियम 13 आवेदक को गैर-उपस्थिति के लिये पर्याप्त कारण प्रस्तुत करने और एकपक्षीय डिक्री को अपास्त करने की मांग करने में सक्षम बनाता है - यह एक व्यापक उपचार है जो स्वतंत्र आधारों पर कार्य करता है। 
  • न्यायालय ने आगे कहा कि अपीलकर्त्ता संख्या द्वारा धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर अपील को मात्र खारिज कर देनाउस समय जब अपीलकर्त्ता संख्या अभी भी अवयस्क थाउसके द्वारा आदेश नियम 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन एकपक्षीय उत्तराधिकार प्रमाण पत्र को अपास्त करने की संयुक्त रूप से मांग करने में बाधा नहीं बनेगा। 
  • अवयस्क की अनुपस्थिति के प्रश्न परन्यायालय ने अपर जिला न्यायाधीश के इस निष्कर्ष को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया कि लोक सूचना प्रकाशित होने पर अवयस्क स्वयं को प्रत्यर्थी बना सकता थाऔर इसे "पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण और अनुचित" करार दिया। न्यायालय ने माना कि संबंधित समय पर अवयस्क होने के कारणअपीलकर्त्ता संख्या विधिक रूप से अक्षम था और इस प्रकार के स्वतंत्र विधिक कदम उठाने में पूरी तरह असमर्थ था। व्यस्क होने पर ही उसने कार्यवाही को चुनौती देने की विधिक क्षमता प्राप्त की।   
  • न्यायालय ने यह भी पाया कि अभिलेख में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे अवयस्क और उसकी माता के बीच किसी तरह की मिलीभगत का संकेत मिलेऔर प्रत्यर्थियों ने अवयस्क का प्रतिनिधित्व करने के लिये एक वैध संरक्षक की नियुक्ति सुनिश्चित करने के लिये कोई कदम नहीं उठाया - जो कि एक विधिक दायित्त्व था जिसे पूरा करना उनका कर्त्तव्य था। 
  • उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की वैधता के संबंध मेंन्यायालय ने यह माना कि यदि आवेदन दोषपूर्ण है या महत्त्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया गया है या गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया हैतो उसके आधार पर जारी किया गया प्रमाण पत्र भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 383 के अधीन रद्द किया जा सकता है। 
  • तदनुसारन्यायालय ने एकपक्षीय उत्तराधिकार प्रमाण पत्र को अपास्त कर दिया और नए सिरे से निर्णय के लिये कार्यवाही बहाल कर दीसाथ ही संबंधित न्यायालय को मामले का शीघ्रता सेअधिमानतः एक वर्ष के भीतरनिर्णय लेने का निदेश दिया। 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 13 क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 13 - प्रतिवादी के विरुद्ध एकपक्षीय डिक्री को अपास्त करना: 

  • जिस प्रतिवादी के विरुद्ध एकपक्षीय डिक्री पारित की गई हैवह डिक्री पारित करने वाले न्यायालय में इसे अपास्त करने के लिये आवेदन कर सकता है। 
  • अभियुक्त को न्यायालय को दो आधारों में से किसी एक पर संतुष्ट करना होगा: कि समन विधिवत तामील नहीं किया गया थाया कि वह पर्याप्त हेतुक से सुनवाई में उपस्थित होने से रोका गया था। 
  • यदि न्यायालय संतुष्ट हो जाता हैतो वह खर्चोंन्यायालय में संदाय या अन्य किसी भी प्रकार से उचित शर्तों पर निर्णय को अपास्त कर देगा। 
  • निर्णय को अपास्त करने पर न्यायालय वाद की कार्यवाही के लिये एक दिन निर्धारित करेगा। 
  • जहां किसी निर्णय को केवल आवेदक प्रतिवादी के विरुद्ध ही अपास्त नहीं किया जा सकता हैवहाँ उसे सभी या किसी अन्य प्रतिवादियों के विरुद्ध भी अपास्त किया जा सकता है। 
  • यदि प्रतिवादी को सुनवाई की तारीख की सूचना थी और उपस्थित होने के लिये पर्याप्त समय दिया गया थातो कोई भी न्यायालय केवल समन की तामील में अनियमितता के आधार पर एकपक्षीय डिक्री को अपास्त नहीं करेगा। 
  • जहाँ किसी एकपक्षीय डिक्री के विरुद्ध अपील को वापसी के अलावा किसी अन्य आधार पर निपटाया गया होवहाँ उस डिक्री को अपास्त करने के लिये इस नियम के अधीन कोई आवेदन नहीं किया जाएगा। 
  • यह नियम न्यायालय को न्याय के हितों को संतुलित करने और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है।