9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से






करेंट अफेयर्स और संग्रह

होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह

आपराधिक कानून

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम महिलाओं द्वारा किये गए मिथ्या परिवादों को दण्डित करता है, न कि उन व्यक्तियों को जो ऐसा परिवाद करने के लिये उकसाते हैं

 23-Apr-2026

श्रीनिवास शिंदे बनाम कौशल विकास एवं उद्यमिता निदेशालय 

"विधि में आंतरिक परिवाद समिति (ICC) के समक्ष मिथ्या या विद्वेषपूर्ण परिवाद करने या मिथ्या साक्ष्य देने के लियेकिसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई/दण्ड का उपबंध नहीं है जिसने किसी महिला या परिवादकर्त्ता को उकसाया हो।" 

न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले 

स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

श्रीनिवास शिंदे बनाम कौशल विकास एवं उद्यमिता निदेशालय (2026)के मामले मेंगोवा स्थित बॉम्बे उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठजिसमें न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले शामिल थीं, ने निर्णय दिया कि महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारणप्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (POSH Act) की धारा 14 के अधीन दण्डात्मक कार्रवाई केवल उस महिला या व्यक्ति तक सीमित है जो मिथ्या और विद्वेषपूर्ण परिवाद दर्ज करता है - और यह दायित्त्व किसी पर-पक्षकार तक विस्तारित नहीं होता है जिसने उस परिवाद को उकसाया हो। 

  • यद्यपिन्यायालय ने आंतरिक परिवाद समिति (ICC) की रिपोर्ट में संशोधन करने का निदेश दिया जिससे उसमें उकसाने वाले व्यक्ति का नाम स्पष्ट रूप से बताया जा सकेऔर यह माना कि याचिकाकर्त्ता किसी सक्षम मंच के समक्ष उसके विरूद्ध उचित कार्यवाही शुरू करने के लिये स्वतंत्र है। 

श्रीनिवास शिंदे बनाम कौशल विकास एवं उद्यमिता निदेशालय (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • याचिकाकर्त्ता श्रीनिवास शिंदे (कौशल विकास एवं उद्यमिता निदेशालय में निम्न श्रेणी के क्लर्क) की एक महिला सहकर्मी ने आंतरिक परिवाद समिति (ICC) के समक्ष उनके विरुद्ध लैंगिक उत्पीड़न का परिवाद दर्ज कराया।          
  • आंतरिक परिवाद समिति ने परिवाद को बंद करते हुए पाया कि परिवादकर्त्ता को किसी 'अज्ञात व्यक्तिद्वारा मिथ्या परिवाद दर्ज करने के लिये 'उकसायागया था। 
  • आंतरिक परिवाद समिति के समक्षमहिला सहकर्मी ने स्वयं कहा था कि संस्थान के प्रिंसिपल दत्ताप्रसाद पलनी ने परिवाद का मसौदा तैयार किया था और उसे इस पर हस्ताक्षर करने के लिये विवश किया थाऔर इंकार करने पर भविष्य में उत्पीड़न की धमकी दी थी।   
  • शिंदे ने आंतरिक परिवाद समिति के आदेश को औद्योगिक न्यायालय में चुनौती दी और मिथ्या परिवाद को उकसाने के लिये पलनी के विरुद्ध कार्यवाही शुरू करने की मांग की। 
  • अंततः यह मामला एक रिट याचिका के माध्यम से बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष आया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

धारा 14 का दायरा शिकायतकर्ता तक ही सीमित है: 

  • महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम की धारा 14 आंतरिक परिवाद समिति कोकेवल महिलाया उस व्यक्ति के विरुद्ध दण्डात्मक कार्रवाई की सिफारिश करने का अधिकार देती है जिसने धारा 9(1) या 9(2) के अधीन परिवाद किया हैजैसा भी मामला हो। 
  • इस संविधि मेंकिसी पर-पक्षकार के लिये कोई दण्ड निर्धारित नहीं हैजो किसी महिला को मिथ्या और विद्वेषपूर्ण परिवाद दर्ज करने के लिये उकसाता हैया जो आंतरिक परिवाद समिति के समक्ष मिथ्या साक्ष्य देता है। 

याचिकाकर्त्ता का उपचार परिवादकर्त्ता के विरुद्ध हैन कि उकसाने वाले के विरुद्ध: 

  • चूँकि महिला सहकर्मी ने परिवाद दर्ज कराया थाइसलिये शिंदे विधिक तौर पर महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम की धारा 14 के अधीन उसके विरुद्ध दण्डात्मक कार्रवाई की मांग कर सकते थे। 
  • पलनी के विरुद्ध महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम के अधीन अनुशासनात्मक कार्रवाई का निदेश देने की उनकी प्रार्थना को अनुचित माना गया और तदनुसार खारिज कर दिया गया। 
  • न्यायालय ने कहा कि महिला को धमकियों के दबाव में ऐसा करने के लिये विवश किया गया होगालेकिन विधि में महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम के अधीन उकसाने वाले के विरुद्ध कार्रवाई करने का कोई तंत्र प्रदान नहीं किया गया है। 

आंतरिक परिवाद समितिA के लोप की आलोचना - रिपोर्ट में संशोधन के निदेश: 

  • न्यायालय ने आंतरिक परिवाद समिति की इस बात के लिये आलोचना की कि उसने उकसाने वाले व्यक्ति को 'अज्ञात व्यक्तिके रूप में दर्ज कियाजबकि पालनी का नाम परिवादकर्त्ता के अपने खंडन पत्र में भी था। 
  • आंतरिक परिवाद समिति पर चयनात्मक मौन साधने का आरोप लगाया गयाजिसे न्यायालय ने अस्वीकार्य पाया। 
  • तदनुसारआंतरिक परिवाद समिति की रिपोर्ट में संशोधन करने का निदेश दिया गया जिससे यह दर्ज किया जा सके कि पलनी ने परिवादकर्त्ता को याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध लैंगिक उत्पीड़न का मिथ्या मामला दर्ज करने के लिये उकसाया था। 

अन्य उपायों को अपनाने की स्वतंत्रता: 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शिंदे को विधि के अधीन अनुमति होने परपालनी के विरुद्ध किसी सक्षम मंच के समक्ष उचित कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता हैबशर्ते पालनी को सुनवाई का अवसर दिया जाए। 

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013 क्या है? 

 बारे में: 

  • महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम भारतीय सरकार द्वारा 2013 मेंकार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न से निपटने के लिये बनाया गया एक विधान है।  
  • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है किकार्यस्थल महिलाओं के लिये सुरक्षित हों औरउन्हें लैंगिक उत्पीड़न से बचाया जा सके। 
  • इस अधिनियम के अनुसारलैंगिक उत्पीड़न मेंअवांछित शारीरिक संपर्क या लैंगिक संबंध बनाने की कोशिशलैंगिक अनुग्रह मांगनाअनुचित लैंगिक टिप्पणी करनाअश्लील सामग्री दिखानाया लैंगिक प्रकृति का कोई भी अन्य अवांछित व्यवहार शामिल हो सकता हैचाहे वह मौखिक होलिखित हो या यहाँ तक ​​कि संकेत के माध्यम से हो। 
  • महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न से निपटने के लिये विधायी अधिनियम - कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारणप्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम 2013 (POSH ACT) का उपबंध है। 
  • जहाँ लैंगिक अपराध की पीड़िता अवयस्क होती हैवहाँ लागू होने वाला विधान लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO) है। 
  • इस अधिनियम में नियोक्ता के लिये दायित्त्व निर्धारित किये गए हैंजिसमें सेवा नियमों के अधीन लैंगिक उत्पीड़न को "दुराचार" के रूप में मान्यता देना और 10 या अधिक कर्मचारियों वाले कार्यस्थलों में एक आंतरिक परिवाद समिति (ICC) का गठन करना शामिल है। 

अधिनियम की पृष्ठभूमि: 

  • उच्चतम न्यायालय नेविशाखा एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य मामले (1997) में एक ऐतिहासिक निर्णय में 'विशाखा दिशानिर्देशजारी किये।  
  • ये दिशानिर्देश कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारणप्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 काआधार बने। 
  • उच्चतम न्यायालय को संविधान के कई प्रावधानों से भी शक्ति प्राप्त होती हैजिनमें अनुच्छेद 15 (केवल धर्ममूलवंश, जातिलिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध के विरुद्ध) शामिल हैसाथ ही यह प्रासंगिक अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय और मानदंडों जैसे कि महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के विभेद के उन्मूलन पर कन्वेंशन (CEDAW) की सामान्य सिफारिशों से भी प्रेरणा लेता हैजिसकी भारत ने 1993 में पुष्टि की थी। 

अधिनियम की धारा 14: 

धारा 14: मिथ्या और विद्वेषपूर्ण परिवाद के लिये दण्ड: 

  • विद्वेषपूर्ण परिवादों के विरुद्ध कार्रवाई: 
    • धारा 14(1) मिथ्या या विद्वेषपूर्ण परिवादों के गंभीर विवाद्यक को संबोधित करती हैसाथ ही महत्त्वर्ण सुरक्षा उपायों को भी शामिल करती है: 
      • इसमें विद्वेषपूर्ण आशय का अवधारण करने के लिये मानदंड स्थापित किये गए हैंजिनमें साशय मिथ्या परिवाद और कूटरचित दस्तावेज़ शामिल हैं। 
      • इसमें यह उपबंधित है कि परिवाद को साबित करने में मात्र असमर्थता के आधार पर दण्ड नहीं दिया जाएगा 
      • कार्रवाई की सिफारिश करने से पहले उचित जांच प्रक्रियाओं के माध्यम से विद्वेषपूर्ण आशय को स्थापित करना आवश्यक है। 
  • मिथ्या साक्ष्यों के विरुद्ध कार्रवाई: 
    • धारा 14(2) समितियों को जांच प्रक्रिया की अखंडता बनाए रखते हुएमिथ्या साक्ष्य प्रदान करने वाले या भ्रामक दस्तावेज़ प्रस्तुत करने वाले साक्षियों के विरुद्ध कार्रवाई की सिफारिश करने का अधिकार देती है। 

आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225

 23-Apr-2026

राजीव मेहता उर्फ राजीव किशोर कीर्तिलाल मेहता बनाम परम बीर सिंह 

"यह मजिस्ट्रेट के लिये अनिवार्य है कि वह धारा 225 को लागू करेयदि वह इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति उस क्षेत्र से बाहर किसी स्थान पर रह रहा है जिसमें वह अधिकारिता का प्रयोग करता है।" 

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ नेराजीव मेहता उर्फ राजीव किशोर कीर्तिलाल मेहता बनाम परमबीर सिंह (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि जहाँ कोई अभियुक्त परिवाद का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट के राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर रहता हैवहाँ मजिस्ट्रेटप्रक्रिया जारी करने से पहले या तो स्वयं जांच करने याभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 225 के अधीन अन्वेषण का निदेश देने के लिये सांविधिक रूप से बाध्य है। 

  • न्यायालय ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दियाजिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का अनुपालन किये बिना अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के निर्णय को बरकरार रखा गया था। 

राजीव मेहता बनाम परमबीर सिंह (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • एक मजिस्ट्रेट के समक्ष अपीलकर्त्ता के विरुद्ध आपराधिक परिवाद दर्ज किया गया थाजिसमें कि स्वीकार किया गया था कि वह उस न्यायालय की राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर रह रहा था। 
  • अपीलकर्त्ता ने दो मुख्य आधारों पर कार्यवाही को चुनौती दी: पहलाकि मजिस्ट्रेट के पास राज्यक्षेत्रीय अधिकारिताका अभाव थाऔर दूसराकि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 223 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन परिवाद की परीक्षा करने की शक्ति का प्रयोग करने से पहले धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन विहित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। 
  • अधिकारिता संबंधी आपत्ति पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष उठाई गई थीलेकिन उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। 
  • उच्च न्यायालय ने धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अनुपालन पर बल दिये बिना कार्यवाही को बरकरार रखाजिसके कारण अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225 अनिवार्य हैनिर्देशात्मक नहीं: 

  • जहाँ मजिस्ट्रेट को परिवाद प्राप्त होने पर यह संतुष्टि हो जाती है कि अभुयुक्त उसके राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता के बाहर रहता हैतो उसे अनिवार्य रूप से धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू करनी होगी। 
  • मजिस्ट्रेट धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन आवश्यक जांच किये बिना या अन्वेषण का निदेश दिये बिना सीधे धारा 223 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन प्रक्रिया जारी नहीं कर सकता या कार्यवाही नहीं कर सकता। 

उच्च न्यायालय ने गैर-अनुपालन को बरकरार रखने में त्रुटी की: 

  • उच्चतम न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225 के अनुपालन न करने की अनदेखी करने में त्रुटी कीजबकि यह स्वीकार किया गया था कि अभियुक्त मजिस्ट्रेट के राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर रह रहा था।  
  • उच्च न्यायालय के तर्क को स्वीकार करने से धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता निरर्थक और अनावश्यक हो जाएगी - जो कि सांविधिक निर्वचन में अस्वीकार्य परिणाम है।  

अधिकारिता पर निर्णय हेतु पुनर्विचार हेतु मामला वापस भेजा जाए: 

  • अपील मंजूर कर ली गई और मामले को उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया गया जिससे मजिस्ट्रेट के राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता के अनसुलझे मुद्दे पर नए सिरे से निर्णय लिया जा सके। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225— आदेशिका के जारी किये जाने को मुल्तवी करना : 

इस शक्ति का प्रयोग कौन कर सकता है: 

  • अपराध का संज्ञान लेने के लिये अधिकृत कोई भी मजिस्ट्रेट। 
  • यह नियम उन मामलों में भी लागू होता है जहाँ धारा 212 के अधीन उनके समक्ष परिवाद दर्ज कराया गया हो। 

मूल शक्ति — प्रक्रिया का मुल्तवी करना: 

  • परिवाद प्राप्त होने परमजिस्ट्रेट अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही शुरू करने को मुल्तवी कर सकता है। 
  • सामान्य मामलों में मुल्तवी विवेकाधीन होता है। 
  • यदि अभियुक्त मजिस्ट्रेट के राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर रहता है तो सुनवाई मुल्तवी करना अनिवार्य है।  

मुल्तवी के बादमजिस्ट्रेट निम्न में से कोई एक कार्य कर सकता है: 

  • वह स्वयं मामले की जांच करेया 
  • पुलिस अधिकारी या किसी अन्य उपयुक्त व्यक्ति द्वारा अन्वेषण का निदेश दे सकता है 

उद्देश्य:यह तय करना कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये पर्याप्त आधार विद्यमान है या नहीं। 

परंतुक — अन्वेषण निर्देशित करने पर रोक: 

दो स्थितियों में अन्वेषण निर्देशित नहीं किया जा सकता: 

  • जहाँ अपराध की सुनवाई केवल सेशन न्यायालय द्वारा ही की जा सकता है। 
  • जहाँ न्यायालय द्वारा परिवाद नहीं किया जाता हैसिवाय इसके कि: 
    • परिवादकर्त्ता से धारा 223 के अधीन शपथ पर पूछताछ की गई हैऔर 
    • उपस्थित साक्षियों (यदि कोई हों) से भी शपथ पर पूछताछ की गई है। 

जांच के दौरान साक्ष्य लेना (उपधारा 2): 

  • मजिस्ट्रेट साक्षियों के कथन शपथ पर ले सकता है - यह विवेकाधीन है। 
  • अपवाद (अनिवार्य): यदि अपराध केवल सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है  मजिस्ट्रेट परिवादकर्त्ता के सभी साक्षियों को बुलाएगा और शपथ पर उनसे पूछताछ करेगा। 

गैर-पुलिस अन्वेषणकर्त्ता की शक्तियां (उपधारा 3): 

  • अन्वेषण करने के लिये निर्देशित एक गैर-पुलिस व्यक्ति को पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के सभी अधिकार प्राप्त होते हैं। 
  • एक अपवाद:बिना वारण्ट के गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं। 

दण्ड प्रक्रिया संहिता के समतुल्य: 

  • धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता = धारा 202 दण्ड प्रकिया संहिता 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में प्रमुख संशोधन:जब अभियुक्त राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर हो तो अनिवार्य मुल्तवी को एक स्पष्ट सांविधिक दायित्त्व बना दिया गया है। 

सिविल कानून

कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक

 23-Apr-2026

परिचय 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 203 कंपनियों में प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) की नियुक्ति और विनियमन को नियंत्रित करने वाले सांविधिक ढाँचे को निर्धारित करती है। प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) से तात्पर्य उन वरिष्ठ कार्यकारी अधिकारियों से है जो कंपनी की प्रबंधन संरचना के भीतर महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने के अधिकार वाले पदों पर आसीन होते हैं।  

  • प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (मुख्य कार्यकारी अधिकारी/प्रबंध निदेशक/प्रबंधक) श्रेणी में मुख्य कार्यकारी अधिकारी या प्रबंध निदेशक/प्रबंधकपूर्णकालिक निदेशककंपनी सचिवमुख्य वित्तीय अधिकारीऔर ऐसे अन्य अधिकारी शामिल हैं जिन्हें निर्धारित किया जा सकता है। नियमों के अधीन अभी तक किसी अतिरिक्त अधिकारी को विहित नहीं किया गया है। 

नियुक्ति के लिये न्यूनतम सीमा 

पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) की नियुक्ति का दायित्त्व सार्वभौमिक नहीं है - यह कंपनी के वर्ग और आकार के आधार पर चुनिंदा रूप से लागू होता है: 

  • पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) (कंपनी सचिव के अलावा):प्रत्येक सूचीबद्ध कंपनी और प्रत्येक सार्वजनिक कंपनी जिसकी चुकता शेयर पूंजी (PSC) ₹10 करोड़ या उससे अधिक हैके लिये पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों नियुक्त करना अनिवार्य है। 
  • कंपनी सचिव: 5 करोड़ रुपए या उससे अधिक के PSC वाली प्रत्येक कंपनी के लिये पूर्णकालिक कंपनी सचिव नियुक्त करना अनिवार्य है। 

नियुक्ति 

  • विहित श्रेणी से संबंधित प्रत्येक कंपनी को एक प्रबंध निदेशकमुख्य कार्यकारी अधिकारी या प्रबंधक नियुक्त करना होगाऔर उनकी अनुपस्थिति मेंएक पूर्णकालिक निदेशकसाथ ही एक कंपनी सचिव और मुख्य वित्तीय अधिकारी नियुक्त करना होगा। 
  • प्रत्येक पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) की नियुक्तिबोर्ड के एक प्रस्तावके माध्यम से की जाएगी जिसमें पारिश्रमिक सहित नियुक्ति की शर्तें और नियम निर्दिष्ट होंगे। यदि किसी पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों का पद रिक्त हो जाता हैतो बोर्ड कोरिक्ति की तिथि सेछह महीने के भीतर बोर्ड की बैठक में उस पद को भरना अनिवार्य है।   
  • प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) की नियुक्ति का विवरणनियुक्तिकी तारीख से 30 दिनों के भीतरकंपनी रजिस्ट्रार (ROC) के पास दाखिल करना होगा । 

एक से अधिक कंपनियों में प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) 

यह अधिनियम किसी प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों के एक साथ कई पद धारण करने पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाता है: 

  • पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) एक ही समय में एक से अधिक कंपनी में पद धारण नहीं करेगासिवाय उसकीसहायक कंपनी के। 
  • यदि कोई पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) अधिनियम के प्रारंभ होने के समय एक से अधिक कंपनियों में पद धारण कर रहा थातो उसे अधिनियम के प्रारंभ होने के छह महीने के भीतर एक कंपनी का चयन करना आवश्यक था।  
  • एक से अधिक कंपनियों में प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) का दर्जा रखने से कोई व्यक्ति किसी भी कंपनी मेंनिदेशकबनने के लिये अयोग्य नहीं हो जाताबशर्ते कि बोर्ड से अनुमति प्राप्त हो।  
  • कोई कंपनी किसी ऐसे व्यक्ति को अपना प्रबंध निदेशक नियुक्त कर सकती है जो पहले से ही किसी अन्य कंपनी में प्रबंध निदेशक या प्रबंधक होबशर्ते: (क) वह एक से अधिक अन्य कंपनी में ऐसा पद धारण न करता हो; (ख) नियुक्ति कोबोर्ड के सर्वसम्मत प्रस्तावद्वारा अनुमोदित किया गया हो और (ग) ऐसी बैठक की विशिष्ट सूचना भारत में सभी निदेशकों को भेजी गई हो। 

हितों का प्रकटीकरण 

  • किसी विशेष व्यवसायिक मामले मेंजिस पर बैठक में चर्चा होने वाली होउसमें अपनी रुचि या हित का प्रकटन करना एक सांविधिक दायित्त्व हैजिसे सामान्यत: बैठक की सूचना के साथ संलग्न किया जाता है। इसके अतिरिक्तउसे उस कंपनी में अपनीशेयरधारिता काभी प्रकटन करना होगा जिससे प्रस्तावित संव्यवहार जुड़ा हुआ हैबशर्ते कि ऐसी हितउस कंपनी कीकुल शेयर पूंजी के 2% से अधिक हो। 
  • किसी भी हितधारक संव्यवहार के संबंध में अपर्याप्त या गैर-प्रकटन के कारण केएमपी को प्राप्त होने वाला कोई भी लाभकंपनी के लिएकेएमपी द्वारा ट्रस्ट के रूप में रखा जाएगा। 

केएमपी का रजिस्टर 

  • प्रत्येक कंपनी को अपने पंजीकृत कार्यालय मेंकेएमपी काएक रजिस्टर बनाए रखना अनिवार्य है । 
  • इस रजिस्टर में प्रत्येक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) द्वारा कंपनी या उसकी होल्डिंग कंपनीसहायक कंपनीहोल्डिंग कंपनी की सहायक कंपनी या सहयोगी कंपनियों में धारित प्रतिभूतियों का विवरण शामिल होगा।  

प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) पर प्रतिबंध 

यह अधिनियम बाजार की अखंडता की रक्षा के लिये प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) पर दो महत्त्वपूर्ण प्रतिबंध अधिरोपित करता है:  

  • फॉरवर्ड डीलिंग:एक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) को कंपनी की प्रतिभूतियों में फॉरवर्ड डीलिंग में संलग्न होने से प्रतिबंधित किया गया है। 
  • इनसाइडर ट्रेडिंग:एक प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMP) को इनसाइडर ट्रेडिंग करने की मनाही है। इस प्रतिषेध का उल्लंघन करने पर अधिनियम के प्रावधानों के अधीन भारी शास्ति का प्रावधान है।  

निष्कर्ष 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 203 के अंतर्गत प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों के लिये सांविधिक ढाँचा कॉर्पोरेट प्रबंधन के उच्चतम स्तरों पर जवाबदेही को संस्थागत रूप देने के विधायिका के आशय को दर्शाता है। नियुक्ति सीमाप्रकटीकरण दायित्त्वों और आचरण प्रतिबंधों को विनियमित करकेअधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि प्रबंधकीय अधिकार प्राप्त व्यक्ति कंपनी और उसके हितधारकों के सर्वोत्तम हितों में कार्य करें।