- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
करेंट अफेयर्स और संग्रह
होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह
सिविल कानून
उच्चतम न्यायालय ने विधि के अनुसार रेबीज़ग्रस्त, असाध्य रूप से बीमार एवं खतरनाक कुत्तों को इच्छामृत्यु (यूथेनेशिया) दिये जाने की अनुमति प्रदान की
20-May-2026
|
इन. री. 'सिटी हाउंडेड बाय स्ट्रेज़, किड्स पे प्राइस' (2026)' "जिन क्षेत्रों में आवारा कुत्तों का गंभीर खतरा है और कुत्तों के बार-बार हमले लोक सुरक्षा के लिये जोखिम उत्पन्न करते हैं, वहाँ अधिकारी उचित पशु चिकित्सा मूल्यांकन के बाद विधिक रूप से अनुमत उपाय कर सकते हैं। पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 के अनुसार, ऐसे उपायों में रेबीज से ग्रसित, असाध्य रूप से बीमार या स्पष्ट रूप से खतरनाक/आक्रामक कुत्तों का इच्छामृत्यु शामिल हो सकता है। इसका उद्देश्य मानव जीवन और लोक सुरक्षा की प्रभावी रूप से रक्षा करना है।" न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारी शामिल थे, ने इन. री. 'सिटी हाउंडेड बाय स्ट्रेज़, किड्स पे प्राइस' (2026) के मामले में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक के संबंध में स्वप्रेरणा से लिये गए संज्ञान (suo motu) प्रकरण में एक महत्त्वपूर्ण आदेश पारित किया। न्यायालय ने सक्षम प्राधिकारियों को उपयुक्त मामलों में रेबीज़ग्रस्त, असाध्य रूप से बीमार अथवा प्रत्यक्ष रूप से खतरनाक कुत्तों को इच्छामृत्यु (euthanasia) प्रदान करने की अनुमति दी, बशर्ते कि ऐसी कार्यवाही पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 तथा अन्य लागू सांविधिक प्रोटोकॉल के कठोर अनुपालन में की जाए।
- न्यायालय ने अपने पूर्व आदेशों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये अतिरिक्त निर्देशों का एक व्यापक सेट भी जारी किया, जिसमें पशु जन्म नियंत्रण (ABC) ढाँचे के अधीन बुनियादी ढाँचे में वृद्धि, रेबीज रोधी टीकों की उपलब्धता, अनुपालन करने वाले अधिकारियों को अभियोजन से सुरक्षा और उच्च न्यायालयों द्वारा स्वतः संज्ञान रिट याचिकाओं के माध्यम से निगरानी शामिल है।
इन. री. 'सिटी हाउंडेड बाय स्ट्रेज़, किड्स पे प्राइस' (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने देश भर में आवारा कुत्तों से संबंधित घटनाओं में खतरनाक वृद्धि, विशेष रूप से बालकों और बुजुर्गों पर कुत्तों के काटने के हमलों का स्वतः संज्ञान लिया था।
- इससे पहले दिये गए निर्देशों में, न्यायालय ने शैक्षणिक संस्थानों, बस स्टैंडों, रेलवे स्टेशनों, खेल परिसरों, अस्पतालों और इसी तरह के लोक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश दिया था।
- न्यायालय ने आगे निदेश दिया था कि लोक स्थानों से पकड़े गए कुत्तों को टीकाकरण या नसबंदी के बाद उसी स्थान पर वापस नहीं छोड़ा जाना चाहिये।
- कुत्ते के काटने की बढ़ती घटनाओं की "बेहद चिंताजनक" रिपोर्टों के कारण यह मामला एक बार फिर पीठ के समक्ष आया, जिससे न्यायालय को यह विचार करने के लिये प्रेरित किया गया कि क्या लोक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये, जिसमें लगातार खतरा उत्पन्न करने वाले कुत्तों के इच्छामृत्यु का प्रश्न भी शामिल है, आगे के निदेशों की आवश्यकता है।
- न्यायालय ने अपने पूर्व निदेशों में संशोधन करने से इंकार कर दिया और इसके बजाय कार्यान्वयन ढाँचे को सुदृढ़ और विस्तारित करने के लिये अतिरिक्त निदेश जारी किये।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- खतरनाक कुत्तों के इच्छामृत्यु पर: न्यायालय ने माना कि जिन क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की आबादी खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है और कुत्ते के काटने या आक्रामक हमलों की घटनाएं लोक सुरक्षा के लिये निरंतर खतरा बनी हुई हैं, वहाँ अधिकारी - योग्य पशु चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा मूल्यांकन के अधीन और लागू सांविधिक प्रोटोकॉल के अनुसार - रेबीज से ग्रसित, असाध्य रूप से बीमार, या स्पष्ट रूप से खतरनाक या आक्रामक कुत्तों के मामलों में इच्छामृत्यु सहित विधिक रूप से अनुमत उपाय कर सकते हैं।
- आवारा कुत्तों को वापस न लौटाने के संबंध में: न्यायालय ने अपने पहले के उस निदेश में संशोधन करने से इंकार कर दिया जिसमें कहा गया था कि लोक स्थानों से पकड़े गए कुत्तों को टीकाकरण या नसबंदी के बाद उसी स्थान पर वापस नहीं छोड़ा जाना चाहिये, यह मानते हुए कि ऐसे निदेशों को बिना किसी विलंब या ढील के अक्षरशः और भावना के साथ लागू किया जाना चाहिये।
- पशु जन्म नियंत्रण (ABC) ढाँचे पर: न्यायालय ने पशु जन्म नियंत्रण ढाँचे के अधीन अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे पर चिंता व्यक्त की और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवश्यक बुनियादी ढाँचे को बढ़ाने के लिये निर्णायक, समन्वित और समयबद्ध कदम उठाने का निदेश दिया, जिसमें प्रत्येक जिले में कम से कम एक पूर्णतः कार्यात्मक ABC केंद्र की स्थापना शामिल है।
- अधिकारी संरक्षण के संबंध में: न्यायालय ने यह माना कि सद्भावनापूर्वक उसके निदेशों का पालन करने वाले अधिकारी उचित संरक्षण के हकदार होंगे, और न्यायालय के निदेशों के अनुपालन में सद्भावनापूर्वक की गई कार्रवाइयों के लिये उनके विरुद्ध सामान्यतः कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) या आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जाएगी, सिवाय इसके कि जब दुर्भावना या अधिकार के घोर दुरुपयोग का प्रथम दृष्टया मामला स्थापित हो जाए।
- उच्च न्यायालय की निगरानी के संबंध में: न्यायालय ने अधिकारिता वाले उच्च न्यायालयों को उच्चतम न्यायालय के निदेशों के अनुपालन हेतु स्वतः संज्ञान लेते हुए रिट याचिकाओं को निरंतर परमादेश के रूप में रजिस्ट्रीकृत करने का निदेश दिया, जिसमें उच्चतम न्यायालय के निदेशों के मूल भाव और आशय को कम किये बिना, स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निदेशों का विस्तार या उन्हें अनुकूलित करने की स्वतंत्रता होगी।
उच्चतम न्यायालय द्वारा क्या निदेश जारी किये गए?
न्यायालय ने निम्नलिखित ग्यारह निदेश जारी किये:
- राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पशु जन्म नियंत्रण (ABC) ढाँचे के लिये आवश्यक बुनियादी ढाँचे को बढ़ाने और मजबूत करने के लिये निर्णायक और समन्वित समयबद्ध कदम उठाने होंगे।
- प्रत्येक जिले में कम से कम एक पूर्णतः कार्यशील पशु जन्म नियंत्रण (ABC) केंद्र की स्थापना, जो आवश्यक बुनियादी ढाँचे, प्रशिक्षित कर्मियों, शल्य चिकित्सा सुविधाओं और सहायक रसद से सुसज्जित हो।
- प्रत्येक जिले की जनसंख्या घनत्व और क्षेत्रीय विस्तार को ध्यान में रखते हुए, पशु जन्म नियंत्रण (ABC) केंद्रों की संख्या बढ़ाने के संबंध में निर्णय लिया जाना है।
- राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को लोक स्थानों से कुत्तों को हटाने के लिये पहले जारी किये गए निदेशों को अक्षरशः और भावना के अनुरूप, बिना किसी विलंब या संशोधन के लागू करना होगा।
- अधिकारियों को जमीनी हकीकत, लोक सुरक्षा के जोखिम और ऐसे स्थानों की कार्यात्मक प्रकृति का सावधानीपूर्वक आकलन करने के बाद, सार्वजनिक सुरक्षा स्थलों और परिवहन स्थलों सहित अन्य अधिक भीड़भाड़ वाले लोक स्थानों पर न्यायालय के निदेशों का विस्तार करने पर निर्णय लेना होगा।
- संबंधित विभागों के समन्वय से कर्मियों के प्रशिक्षण, पशु चिकित्सा सेवाओं में वृद्धि, आश्रय सुविधाओं को मजबूत करने और टीकाकरण अभियान सहित व्यापक क्षमता निर्माण उपाय किये जाएंगे।
- राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सभी सरकारी चिकित्सा सुविधाओं में रेबीज रोधी टीकों और इम्युनोग्लोबुलिन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी, और कुत्ते के काटने के मामलों के लिये एक प्रभावी लोक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया तंत्र स्थापित करना होगा।
- राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर आवारा और अन्य जानवरों की उपस्थिति से निपटने के लिये NHAI, संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के समन्वय से, एक व्यापक समयबद्ध तंत्र तैयार और कार्यान्वित करेगा, जिसमें विशेष परिवहन वाहनों की तैनाती, पशु आश्रय और आश्रय सुविधाओं का निर्माण और पशु कल्याण संगठनों के साथ व्यवस्था शामिल होगी।
- अधिकारी, पशु जन्म नियंत्रण नियमों और अन्य लागू सांविधिक प्रोटोकॉल के अनुसार, लाइलाज रूप से बीमार, रेबीज से ग्रसित, या स्पष्ट रूप से खतरनाक या आक्रामक कुत्तों के मामलों में, मानव जीवन और सुरक्षा के लिये उत्पन्न खतरे को प्रभावी ढंग से कम करने के लिये, इच्छामृत्यु सहित विधिक रूप से अनुमत उपाय कर सकते हैं।
- न्यायालय के निदेशों के कार्यान्वयन का दायित्व सौंपे गए अधिकारियों को आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में सद्भावनापूर्वक किये गए कार्यों के लिये उचित संरक्षण प्राप्त होगा। ऐसे अधिकारियों के विरुद्ध सामान्यतः कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) या आपराधिक कार्यवाही तब तक प्रारंभ नहीं की जाएगी जब तक कि दुर्भावना या अधिकार के घोर दुरुपयोग का प्रथम दृष्ट्या मामला सिद्ध न हो जाए।
- उच्च न्यायालयों को निदेश दिया जाता है कि वे उच्चतम न्यायालय के निदेशों के अनुपालन हेतु स्वतः संज्ञान लेते हुए दायर की गई रिट याचिकाओं को निरंतर परमादेश के रूप में दर्ज करें। प्रत्येक उच्च न्यायालय की संबंधित पीठ को उच्चतम न्यायालय के निदेशों के मूल भाव और आशय को प्रभावित किये बिना, स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप इन निदेशों के दायरे को विस्तारित या अनुकूलित करने की स्वतंत्रता होगी। संबंधित न्यायालयों को न्यायालय के निदेशों का अनुपालन न करने, निष्क्रियता बरतने या जानबूझकर अवहेलना करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना कार्यवाही सहित उचित कार्रवाई करने का अधिकार होगा।
पशु जन्म नियंत्रण (ABC) ढाँचा क्या है?
भारत में आवारा कुत्तों की आबादी के प्रबंधन के लिये पशु जन्म नियंत्रण ढाँचा प्राथमिक सांविधिक और नियामक तंत्र है। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:
पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960:
- भारत में पशुओं के उपचार और कल्याण को नियंत्रित करने वाला मूल विधान।
- यह विधान पशुओं के प्रति क्रूरता को प्रतिबंधित करता है और उन परिस्थितियों को विनियमित करता है जिनमें पशुओं को इच्छामृत्यु सहित प्रक्रियाओं के अधीन किया जा सकता है।
- इच्छामृत्यु केवल असाध्य बीमारी, रेबीज या स्पष्ट खतरे की स्थिति में ही अनुमेय है, और इसे एक रजिस्ट्रीकृत पशु चिकित्सक द्वारा मानवीय तरीके से किया जाना चाहिये।
पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023:
- इसे पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत तैयार किया गया है, जो पहले के एबीसी (कुत्ते) नियम, 2001 का स्थान लेता है।
- आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के प्राथमिक तरीके के रूप में उनकी नसबंदी और टीकाकरण को अनिवार्य किया जाए।
- नियमों के अधीन अनुमत मामलों को छोड़कर, आवारा कुत्तों को स्थानांतरित करना या मारना प्रतिबंधित है।
- प्रत्येक स्थानीय निकाय को प्रशिक्षित कर्मचारियों, शल्य चिकित्सा सुविधाओं और पुनर्वास क्षेत्रों से युक्त ABC केंद्र स्थापित करने और बनाए रखने की आवश्यकता होगी।
- जिला स्तर पर पशु जन्म नियंत्रण निगरानी समितियों के गठन का प्रावधान करें।
- किसी योग्य पशुचिकित्सक द्वारा प्रमाणित किये जाने पर, असाध्य रूप से बीमार, गंभीर रूप से घायल या रेबीज से ग्रसित कुत्तों के मामलों में ही इच्छामृत्यु की अनुमति दी जानी चाहिये।
उच्चतम न्यायालय के निदेश का महत्त्व:
- न्यायालय का आदेश ABC ढाँचे को रद्द नहीं करता है, अपितु इसके भीतर ही काम करता है, और केवल विधि द्वारा पहले से मान्यता प्राप्त श्रेणियों - रेबीज से ग्रसित, लाइलाज बीमारी से ग्रसित या स्पष्ट रूप से खतरनाक कुत्तों - में ही इच्छामृत्यु की अनुमति देता है, बशर्ते पशु चिकित्सा प्रमाणन और सांविधिक प्रोटोकॉल का अनुपालन आवश्यक हो।
- इन निदेशों में इस बात पर बल दिया गया है कि नसबंदी और टीकाकरण प्राथमिक दृष्टिकोण बने हुए हैं, जबकि इच्छामृत्यु कुछ निश्चित परिस्थितियों में अंतिम उपाय है।
- जिला स्तर पर ABC केंद्रों की स्थापना और उच्च न्यायालयों को सौंपी गई निगरानी भूमिका का उद्देश्य कार्यान्वयन में संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
पारिवारिक कानून
पति की जानकारी एवं सहमति के बिना पत्नी द्वारा गुप्त रूप से पुत्री के विवाह की योजना बनाना वैवाहिक क्रूरता के अंतर्गत आता है
20-May-2026
|
जी. श्रीधर बनाम एस. कोमला कुमारी "एक पिता के रूप में अपीलकर्त्ता (पति) के दर्द को हम समझ सकते हैं। उन्हें कभी पता ही नहीं चला कि प्रत्यर्थी (पत्नी) और पुत्री उनसे दूर चली गई हैं। पुत्री के विवाह के समय, एक संरक्षक के रूप में उन्हें अत्यधिक मानसिक पीड़ा, दर्द और कष्ट सहना पड़ा होगा, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।" न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति के. राजशेखर |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति के. राजशेखर शामिल थे, ने जी. श्रीधर बनाम एस. कोमला कुमारी (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि पति की जानकारी के बिना पत्नी द्वारा अपनी पुत्री का गुप्त विवाह करना वैवाहिक क्रूरता है, जिसके आधार पर विवाह-विच्छेद किया जा सकता है। न्यायालय ने आगे कहा कि निरंतर मानसिक क्रूरता के कृत्य—जिनमें सार्वजनिक रूप से अपमान करना, अपशब्द बोलना और पुलिस तथा पति के वरिष्ठ अधिकारियों के पास परिवाद दर्ज कराना शामिल है—व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से पर्याप्त मानसिक पीड़ा का कारण बनते हैं, जिससे विवाह को जारी रखना असंभव हो जाता है।
- कुटुंब न्यायालय द्वारा विवाह-विच्छेद की याचिका खारिज करने के आदेश को अपास्त करते हुए, न्यायालय ने पति को तलाक दे दिया और माना कि पत्नी द्वारा किये गए क्रूरतापूर्ण कृत्यों का मूल्यांकन और विश्लेषण करने में विचारण न्यायालय का दृष्टिकोण अपर्याप्त था।
जी. श्रीधर बनाम एस. कोमला कुमारी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पति-पत्नी का विवाह 1997 में हुआ था और उनकी एक पुत्री और एक पुत्र था।
- पत्नी ने गुपचुप तरीके से अपनी 18 वर्षीय पुत्री का विवाह अपने ही भाई – जो लड़की का मामा था - से तय कर दिया था, जो 32 वर्षीय तलाकशुदा व्यक्ति था।
- पत्नी के भाई की पहले पति की भतीजी से विवाह हुआ था; वह विवाह टूट गया था, और भतीजी ने उसके विरुद्ध पुलिस में परिवाद दर्ज कराया था।
- पत्नी ने बिना पति या पुत्र को बताए, पुत्री को विवाह कराने के लिये एक सप्ताह के लिये बैंगलोर ले गई।
- वापस लौटने पर पत्नी ने पति को सूचित किया कि विवाह एक यथार्थ प्रक्रिया के रूप में संपन्न हो चूका है।
- पति ने क्रूरता के आधार पर विवाह-विच्छेद की मांग करते हुए कुटुंब न्यायालय में याचिका दायर की।
- पत्नी ने तथ्यों पर विवाद नहीं किया, लेकिन यह तर्क दिया कि उसने पुत्री के हित में विवाह का इंतजाम किया था, क्योंकि पुत्री और उसके चाचा पहले ही रिश्ते में आ चुके थे।
- पत्नी ने आगे आरोप लगाया कि विवाह के बाद उसे वैवाहिक घर में दोबारा प्रवेश करने से रोका गया और पति ने उसकी कीमती चीजें और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ छिपा दिये थे, जिसके कारण उसने पति के विरुद्ध पुलिस में परिवाद दर्ज कराया।
- कुटुंब न्यायालय ने पति के विवाह-विच्छेद की याचिका खारिज कर दी और पत्नी के दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के आवेदन को मंजूर कर लिया।
- पति ने इस आदेश को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- पुत्री के गुप्त विवाह को क्रूरता मानते हुए: न्यायालय ने माना कि पत्नी द्वारा पति की जानकारी के बिना पुत्री का गुप्त विवाह करना एक क्रूरतापूर्ण कृत्य था, जिससे पति को एक पिता के रूप में अत्यधिक मानसिक पीड़ा हुई। न्यायालय ने कहा कि एक बार विवाह हो जाने के बाद, पति के पास कोई विकल्प नहीं बचा था, और उसे हुई पीड़ा और कष्ट की भरपाई कभी नहीं हो सकती।
- क्रूरता जांच में पुत्री के कल्याण की सुसंगतता न होने पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विवाह पुत्री के लिये लाभकारी था या नहीं, यह विवाद्यक नहीं है। मामले को विशुद्ध रूप से पति के पिता के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिये, जिसकी 18 वर्षीय पुत्री का विवाह 32 वर्षीय तलाकशुदा व्यक्ति से हुआ था, जिसके विरुद्ध उसकी पूर्व पत्नी ने पुलिस में परिवाद दर्ज कराया था।
- मानसिक क्रूरता के निरंतर कृत्यों पर: न्यायालय ने पाया कि पत्नी ने सार्वजनिक रूप से पति के विरुद्ध निरंतर क्रूरतापूर्ण कृत्य किये, उसके बारे में अपमानजनक बातें कहीं और पुलिस तथा वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष उसका परिवाद दर्ज कराया। इन कृत्यों, व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से, ने पति को मानसिक पीड़ा पहुँचाई जिससे उसके लिये वैवाहिक जीवन जारी रखना असंभव हो गया।
- विचारण न्यायालय की त्रुटि पर: न्यायालय ने माना कि क्रूरता के कृत्यों का मूल्यांकन और विश्लेषण करने के लिये विचारण न्यायालय का दृष्टिकोण अपर्याप्त था और विवाह-विच्छेद की याचिका को खारिज करने और पत्नी के दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के आवेदन को मंजूर करने में उसने त्रुटी की थी।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 क्या है?
हिंदू विवाह आधिनियम की धारा 13— तलाक:
धारा 13(1) — दोनों पक्षकारों के लिये उपलब्ध आधार:
विवाह के दोनों पक्षकारों में से कोई भी निम्नलिखित आधारों पर तलाक की डिक्री द्वारा विवाह विच्छेद के लिये याचिका प्रस्तुत कर सकता है:
- विवाह अनुष्ठित होने के पश्चात् दूसरे पक्षकार ने अपने पति या पत्नी के सिवाय किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वेच्छया से मैथुन किया है हैं (व्यभिचार)।
- विवाह संपन्न होने के पश्चात् दूसरे पक्षकार ने याचिकाकर्त्ता के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया है।
- दूसरे पक्ष ने याचिका प्रस्तुत करने से ठीक पहले लगातार कम से कम दो वर्षों की अवधि के लिए याचिकाकर्ता को छोड़ दिया है।
- दूसरे पक्षकार ने धर्म परिवर्तन कर लिया है और अब वह हिंदू नहीं रहा।
- दूसरा पक्षकार असाध्य रूप से विकृत-चित्त रहा है, या लगातार या आंतरायिक रूप से इस प्रकार के और इस हद तक मानसिक विकार से पीड़ित है कि याचिकाकर्त्ता से यह आशा करना उचित नहीं है कि वह दूसरे पक्षकार के साथ रहे।
- दूसरे पक्षकार को कुष्ठ रोग का एक घातक और लाइलाज रूप हो गया है।
- दूसरे पक्षकार को संक्रामक रूप में यौन रोग है।
- दूसरे पक्षकार ने किसी धार्मिक संप्रदाय में प्रवेश करके संसार का त्याग कर दिया है।
- दूसरे पक्षकार के बारे में उन लोगों को सात वर्ष या उससे अधिक समय से कोई जानकारी नहीं मिली है, जिन्हें स्वाभाविक रूप से उस पक्षकार के बारे में पता होना चाहिये था।
धारा 13(1क) — अतिरिक्त आधार (किसी भी पक्षकार द्वारा):
- न्यायिक पृथक्करण का आदेश पारित होने के बाद एक वर्ष या उससे अधिक की अवधि तक दोनों पक्षकारों के बीच सहवास की पुनः शुरुआत नहीं हुई है।
- दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के लिये डिक्री पारित होने के बाद एक वर्ष या उससे अधिक की अवधि तक दोनों पक्षकारों के बीच दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन नहीं हुआ है।
धारा 13(2) — केवल पत्नी के लिये उपलब्ध आधार:
- विवाह संपन्न होने के समय पति की एक पत्नी जीवित थी (द्विविवाह), बशर्ते कि याचिका दायर करने के समय दूसरी पत्नी जीवित हो।
- विवाह अनुष्ठित होने के पश्चात् से ही पति बलात्संग, अप्राकृतिक यौन संबंध या पशुगमन का दोषी रहा है।
- पति के विरुद्ध प्रासंगिक विधिक उपबंधों के अधीन भरण-पोषण संबंधी डिक्री अथवा आदेश पारित किया गया हो तथा ऐसी डिक्री/आदेश पारित होने के पश्चात् एक वर्ष या उससे अधिक अवधि तक दाम्पत्य सहवास पुनः स्थापित न हुआ हो।
- विवाह पत्नी के पंद्रह वर्ष की आयु प्राप्त करने से पूर्व संपन्न किया गया हो (चाहे उसका सहवास संपन्न हुआ हो अथवा नहीं), तथा पत्नी ने पंद्रह वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् किंतु अठारह वर्ष की आयु प्राप्त करने से पूर्व उस विवाह का परित्याग कर दिया हो।