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आपराधिक कानून
दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 311 के अंतर्गत प्रदत्त शक्ति का प्रयोग प्रतिरक्षा पक्ष की कमियों की पूर्ति हेतु नहीं किया जा सकता
30-May-2026
|
त्रिपुरा राज्य बनाम पन्ना अहमद "साक्षियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे बार-बार न्यायालय में पेश होने की कठिनाई का सामना करें, विशेषकर संवेदनशील मामलों में। यदि पीड़ितों को बार-बार न्यायालय में पेश होकर प्रतिपरीक्षा का सामना करना पड़े तो इससे उन्हें, विशेष रूप से जघन्य अपराधों के पीड़ितों को, अत्यधिक कठिनाई हो सकती है।" न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने त्रिपुरा राज्य बनाम पन्ना अहमद (2026) के मामले में त्रिपुरा उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें बलात्कार पीड़िता को आगे की प्रतिपरीक्षा के लिये पुनः बुलाने की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने कहा कि धारा 311 दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 348 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) का प्रयोग केवल प्रतिरक्षा पक्ष के मामले की कमियों को भरने के लिये नहीं किया जा सकता है, और चार वर्ष के विलंब के बाद पुनः बुलाने का निदेश पीड़िता को अनुचित रूप से कष्ट पहुँचाएगा, जिसकी पहले ही चार अलग-अलग मौकों पर परीक्षा हो चुकी है।
त्रिपुरा राज्य बनाम पन्ना अहमद (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अभियुक्त के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 342, 376(1) और 506 के अधीन अपराधों का आरोप लगाते हुए 2016 में एक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई थी।
- अभियोक्त्री से 2018 में विचारण न्यायालय के समक्ष परीक्षा और प्रतिपरीक्षा की गई थी।
- त्रिपुरा उच्च न्यायालय के पूर्व आदेश के अनुसार, उन्हें 2019 में पुन: बुलाया गया, उनकी पुन: परीक्षा की गई और उसकी पुन: प्रतिपरीक्षा की गई।
- दिसंबर 2023 में, उसकी प्रतिपरीक्षा पूरी होने के लगभग चार वर्ष बाद, अभियुक्त ने धारा 311 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन एक आवेदन दायर कर अभियोक्त्री को एक बार फिर से पेश करने की मांग की।
- आवेदन में साक्षी से पूछे जाने वाले 94 प्रश्नों का प्रस्ताव रखा गया था, जिसमें यह तर्क दिया गया था कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) से उत्पन्न होने वाले कुछ पहलुओं को चूक के कारण पहले उससे नहीं पूछा जा सका था।
- विचारण न्यायालय ने आवेदन को खारिज कर दिया, यह देखते हुए कि अभियोक्त्री की पहले ही व्यापक परीक्षा हो चुकी है और यह आवेदन 2017 से लंबित विचारण में विलंब करने की एक रणनीति प्रतीत होती है।
- त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने 14 मार्च, 2024 के अपने आदेश द्वारा विचारण न्यायालय के आदेश को पलट दिया और CDR के संदर्भ में आगे की प्रतिपरीक्षा की अनुमति दी।
- इससे व्यथित होकर त्रिपुरा राज्य ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 — इसका प्रयोग कम ही किया जाना चाहिये:
- न्यायालय ने दोहराया कि यद्यपि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 न्यायालय को किसी भी प्रक्रम पर किसी भी साक्षी को समन करने या पुन: बुलाने के लिये व्यापक शक्तियां प्रदान करती है, लेकिन ऐसी शक्तियों का प्रयोग संयम से किया जाना चाहिये।
- इस उपबंध का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब यह मामले के न्यायसंगत निर्णय के लिये आवश्यक हो, न कि नियमित रूप से।
- न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि धारा 311 दण्ड प्रक्रिया संहिता का प्रयोग केवल अभियोजन या प्रतिरक्षा पक्ष के मामले में कमियों को भरने के लिये नहीं किया जा सकता है।
पीड़िता को होने वाली कठिनाई — अधिकार और गरिमा:
- न्यायालय ने गंभीर अपराधों के पीड़ितों के अधिकारों और गरिमा पर बल दिया, विशेष रूप से संवेदनशील मामलों में।
- अभियोक्त्री को पहले ही विचारण न्यायालय के समक्ष चार अलग-अलग अवसरों पर कथन और प्रतिपरीक्षा का सामना करना पड़ा था, इसके अतिरिक्त अन्वेषण के दौरान और मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन उसका कथन अभिलिखित किया गया था।
- किसी साक्षी को पुन:बुलाने का निदेश देने से अभियोक्त्री को और अधिक अनुचित कठिनाई उत्पन्न होगी।
- साक्षियों, विशेषकर जघन्य अपराधों के पीड़ितों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे बार-बार न्यायालय में पेश होकर प्रतिपरीक्षाका सामना करें।
CDR पर प्रतिपरीक्षा पक्ष की दलील खारिज:
- न्यायालय ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड के संबंध में अभियुक्त के तर्क को खारिज कर दिया, यह देखते हुए कि CDR अभियोजन पक्ष द्वारा आरोप पत्र के साथ दायर किये गए थे और पूरी कार्यवाही के दौरान विचारण के अभिलेख का भाग बने रहे।
- इसलिये, प्रतिरक्षा पक्ष को सामग्री की पूरी जानकारी थी और वह प्रतिपरीक्षा के शुरुआती दौर में अभियोक्त्री से सुसंगत प्रश्न पूछ सकता था।
- जब चूक पूरी तरह से अभियुक्त की त्रुटी के कारण हुई हो, तो प्रतिरक्षा पक्ष को CDR को पुन: बुलाने के आधार के रूप में प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
परिणाम:
- उच्चतम न्यायालय ने राज्य की अपील को मंजूर करते हुए त्रिपुरा उच्च न्यायालय के 14 मार्च, 2024 के आदेश को अपास्त कर दिया और विचारण न्यायालय के 6 फरवरी, 2024 के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें पुनः बुलाने के आवेदन को खारिज कर दिया गया था।
- न्यायालय ने आगे निदेश दिया कि विचारण न्यायालय की सुविधा के अनुसार, विचारण को वर्ष के अंत तक समाप्त कर दिया जाए।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 348 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 348 — आवश्यक साक्षी को समन करने या उपस्थित व्यक्ति की परिक्ष करने की शक्ति:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 348, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की पुरानी धारा 311 के अनुरूप उपबंध है, जिसमें विषयवस्तु में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया गया है।
मुख्य उपबंध:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत किसी भी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में कोई भी न्यायालय निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग कर सकता है:
- किसी भी व्यक्ति को साक्षी के तौर पर समन करना।
- न्यायालय में उपस्थित किसी भी व्यक्ति की परीक्षा करना, भले ही उसे औपचारिक रूप से साक्षी के रूप में समन न किया गया हो।
- जिन व्यक्तियों की पहले ही परीक्षा हो चुकी है, उन्हें पुन: बुलाकर उनकी पुनः परीक्षा करना।
- यदि किसी व्यक्ति का साक्ष्य मामले के न्यायसंगत निर्णय के लिये आवश्यक प्रतीत होता है, तो न्यायालय (अनिवार्य रूप से) ऐसे किसी भी व्यक्ति को समन करेगा, उसकी परीक्षा करेगा या उसे पुन: बुलाएगा।
दो-भाग संरचना:
- पहला भाग विवेकाधीन है - न्यायालय अपनी पहल पर इस शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
- दूसरा भाग अनिवार्य है - न्यायालय उस स्थिति में कार्रवाई करने के लिये बाध्य है जहाँ किसी व्यक्ति का साक्ष्य न्यायसंगत निर्णय के लिये आवश्यक हो।
न्यायिक निर्वचन (समानता के आधार पर धारा 348 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता पर लागू):
- इस शक्ति का प्रयोग संयमपूर्वक और सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिये।
- इसका प्रयोग केवल अभियोजन पक्ष या प्रतिरक्षा पक्ष के मामले में कमियों को भरने या त्रुटियों को सुधारने के लिये नहीं किया जा सकता है।
- इसका उद्देश्य न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति करना है, न कि किसी पक्षकार को अपनी त्रुटियों को सुधारने का दूसरा अवसर देना।
- संवेदनशील मामलों में, विशेष रूप से लैंगिक अपराधों के पीड़ितों से जुड़े मामलों में, न्यायालयों को साक्षी को पुन: पेश होने का आदेश देने से पहले बार-बार पेश होने से होने वाली कठिनाई पर विचार करना चाहिये।
सांविधानिक विधि
आघात चिकित्सा (ट्रॉमा केयर) का अधिकार, जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है
30-May-2026
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सेवलाइफ फाउंडेशन बनाम भारत संघ "चिकित्सीय हस्तक्षेप अथवा त्वरित आपातकालीन उपचार के अभाव में व्यतीत होने वाला प्रत्येक मिनट जीवित रहने की संभावना को उल्लेखनीय रूप से कम कर देता है। शीघ्रता, वस्तुतः, औषधि के समान जीवनरक्षक सिद्ध होती है।" न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने सेवलाइफ फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2026) के मामले में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भारत के ट्रॉमा केयर और आपातकालीन प्रतिक्रिया ढाँचे को मजबूत करने के लिये व्यापक अंतरिम निदेश जारी किये, जिसमें कहा गया कि सड़क दुर्घटनाओं के बाद समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन प्रदत्त जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है। ये निदेश 26 मई, 2026 को एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पारित किये गए, जिसमें ट्रॉमा केयर को सांविधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देने और देश भर में एक समान आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया प्रणाली लागू करने की मांग की गई थी।
सेवलाइफ फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह याचिका एक सामाजिक प्रभाव संगठन और उसके संस्थापक द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर की गई थी।
- याचिकाकर्त्ताओं ने कई निदेशों की मांग की, जिनमें सभी आपातकालीन हेल्पलाइन नंबरों को सार्वभौमिक आपातकालीन नंबर 112 में एकीकृत करना, गुड समैरिटन' (नेक मददगार) सुरक्षा उपायों को लागू करना, एम्बुलेंस सेवाओं का मानकीकरण करना, ट्रॉमा रजिस्ट्री बनाना और सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिये कैशलेस उपचार योजनाओं को चालू करना शामिल है।
- न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार पहले ही पी.एम. राहत कैशलेस उपचार योजना, गुड समैरिटन रूल्स, नेशनल एम्बुलेंस कोड और ERSS-112 फ्रेमवर्क सहित कई योजनाएँ और नीतियाँ लागू कर चुकी है।
- यद्यपि, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इसका कार्यान्वयन "कम और खंडित" पाया गया।
- न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमानी द्वारा प्रस्तुत सुझावों को स्वीकार कर लिया और व्यापक अंतरिम निदेश जारी करने की कार्यवाही शुरू की।
- इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और अधिवक्ता मालविका कपिला ने भी सहायता की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
अनुच्छेद 21 के भाग के रूप में ट्रॉमा केयर:
- न्यायालय ने माना कि सड़क दुर्घटनाओं के बाद समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है।
- इसमें इस बात पर बल दिया गया कि "चिकित्सा हस्तक्षेप या आपातकालीन देखरेख के बिना बिताया गया हर मिनट जीवित रहने की संभावना को काफी कम कर देता है," और "तेजी से इलाज करना, सचमुच, दवा की तरह है।"
- एक समान और सुदृढ़ ट्रॉमा केयर प्रणाली, निरंतर जन जागरूकता के साथ मिलकर, सड़क दुर्घटनाओं और अन्य दर्दनाक घटनाओं के कारण होने वाली रोकी जा सकने वाली मृत्यु को काफी हद तक कम कर सकती है।
आपातकालीन हेल्पलाइनों का एकीकरण:
- न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निदेश दिया कि वे आपातकालीन और एम्बुलेंस हेल्पलाइन नंबर जैसे 100, 101, 102, 108, 1033 और 1091 को तीन महीने के भीतर एकीकृत हेल्पलाइन नंबर 112 में शामिल करें।
- राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एकीकृत आपातकालीन नंबर का प्रचार करने के लिये जनसंचार अभियान चलाने का भी निदेश दिया गया था।
सद्भावी सहायक (Good Samaritan) द्वारा प्रदान की जाने वाली सुरक्षाएँ:
- न्यायालय ने पाया कि पुलिस या विधिक कार्यवाही के भय से राहगीर अक्सर दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने में हिचकिचाते हैं।
- इसमें कहा गया है कि मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 134क के अधीन गुड समैरिटन सुरक्षा को मजबूत करने के लिये व्यवस्थित हस्तक्षेप और जन जागरूकता आवश्यक हैं।
- राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर भौतिक और डिजिटल स्तर पर सद्भावनापूर्ण शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करने का निदेश दिया गया था, जिसमें जिला और राज्य स्तर पर नामित नोडल अधिकारी होंगे।
एम्बुलेंस मानक और प्रतिक्रिया प्रणाली:
- न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को AIS-125 एम्बुलेंस मानकों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने का निदेश दिया।
- GPS ट्रैकिंग और एम्बुलेंस का 112 आपातकालीन प्रणाली के साथ वास्तविक समय में एकीकरण अनिवार्य कर दिया गया।
- एम्बुलेंस की प्रतिक्रिया समय, देखरेख की गुणवत्ता और उपकरण मानकों के आवधिक ऑडिट के भी निदेश दिये गए।
मानकीकृत ट्रॉमा प्रोटोकॉल और राष्ट्रीय ट्रॉमा रजिस्ट्री:
- केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर ट्रॉमा के मामलों के लिये एक मानकीकृत चिकित्सा बचाव प्रोटोकॉल जारी करने का निदेश दिया गया था, जिसके बाद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसे लागू करने का आदेश दिया गया था।
- केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को आठ सप्ताह के भीतर राष्ट्रीय ट्रॉमा रजिस्ट्री के लिये दिशानिर्देश जारी करने का निदेश दिया गया था।
- इसके बाद सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सार्वजनिक और निजी चिकित्सा सुविधाओं दोनों को कवर करने वाले राज्य स्तरीय ट्रॉमा रजिस्ट्री स्थापित करने की आवश्यकता थी।
पी.एम. राहत कैशलेस उपचार योजना:
- राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निदेश दिया गया था कि वे सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिये पी.एम. राहत कैशलेस उपचार योजना को तीन महीने के भीतर पूरी तरह से लागू करें।
- न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि इसे लागू नहीं किया गया तो यह मोटर यान अधिनियम का उल्लंघन होगा।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 क्या है?
बारे में:
- अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता की सुरक्षा से संबंधित है । इसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार हे वंचित नहीं किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
- जीवन का अधिकार केवल पशुवत अस्तित्व या जीवित रहने तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार और जीवन के वे सभी पहलू शामिल हैं जो मनुष्य के जीवन को सार्थक, पूर्ण और जीने लायक बनाते हैं।
- अनुच्छेद 21 दो अधिकारों की सुरक्षा करता है:
- प्राण का अधिकार
- दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार
- इस अनुच्छेद को जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले प्रक्रियात्मक मैग्ना कार्टा के रूप में वर्णित किया गया है।
- यह मौलिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी, को समान रूप से प्राप्त है।
- भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस अधिकार को मौलिक अधिकारों का हृदय बताया है ।
- यह अधिकार केवल राज्य के विरुद्ध ही प्रदान किया गया है।
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अधिकार:
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आने वाले अधिकार निम्नलिखित हैं:
- निजता का अधिकार
- विदेश जाने का अधिकार
- आश्रय का अधिकार
- एकांत कारावास (Solitary Confinement) के विरुद्ध अधिकार
- सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण का अधिकार
- हथकड़ी लगाए जाने के विरुद्ध अधिकार
- अभिरक्षात्मक मृत्यु (Custodial Death) के विरुद्ध अधिकार
- दण्डादेश के विलंबित निष्पादन के विरुद्ध अधिकार
- सार्वजनिक फाँसी के विरुद्ध अधिकार
- सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का अधिकार
- प्रदूषण-मुक्त जल एवं वायु का अधिकार
- प्रत्येक बालक के सर्वांगीण विकास का अधिकार
- स्वास्थ्य एवं चिकित्सीय सहायता का अधिकार
- शिक्षा का अधिकार
- विचाराधीन बंदियों (Under-trials) के संरक्षण का अधिकार।
विधिक मामले:
- फ्रांसिस कोराली मुलिन बनाम प्रशासक (1981) के मामले में न्यायमूर्ति पी. भगवती ने कहा था कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 एक लोकतांत्रिक समाज में सर्वोच्च महत्त्व के सांविधानिक मूल्य को समाहित करता है।
- खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1963) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि जीवन शब्द से केवल पशुवत अस्तित्व का ही अर्थ नहीं है। इसके हनन पर रोक उन सभी अंगों और इंद्रियों पर लागू होती है जिनके द्वारा जीवन का आनंद लिया जाता है। यह प्रावधान शरीर को विकृत करने, जैसे कि कवचधारी पैर काटना, आँख निकालना या शरीर के किसी अन्य अंग को नष्ट करना जिसके माध्यम से आत्मा बाह्य जगत से संपर्क स्थापित करती है, पर भी समान रूप से प्रतिबंध लगाता है।