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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुलझे वैवाहिक विवादों में डी-इंडेक्सिंग याचिकाओं पर अधिकारिता की पुष्टि की

 07-Jul-2026

कोक्कंती वेंकट महेश्वर रेड्डी बनाम गूगल एलएलसी 

"विस्मृत होने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता के अधिकार का एक भाग है।" 

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा 

स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वराना कांता शर्मा नेकोक्कंती वेंकट महेश्वर रेड्डी बनाम गूगल एल.एल.सी. (2026) के मामलेमें यह अभिधारित किया कि निस्तारित वैवाहिक विवाद से संबंधित ऑनलाइन समाचार-प्रतिवेदनों एवं वीडियो के डी-इंडेक्सिंग (De-Indexing) की मांग करने वाली याचिका का विचारण करने की प्रादेशिक अधिकारिता न्यायालय को प्राप्त है। न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि विस्मृत होने का अधिकारभारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन प्रत्याभूत निजता के अधिकार का एक अभिन्न एवं अविभाज्य आयाम है।  

कोक्कंती वेंकटा महेश्वर रेड्डी बनाम गूगल एल.एल.सी. (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ताजो एक सेवारत IPS अधिकारी हैंअपनी पत्नी के साथ वैवाहिक विवाद से उत्पन्न व्यापक रूप से प्रसारित ऑनलाइन सामग्री का शिकार रहे थे। 
  • उनकी पत्नी के परिवाद के आधार पर पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थीलेकिन बाद में विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझ गयाजिसके बाद तेलंगाना उच्च न्यायालय ने 2024 में आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। 
  • समझौते और आरोपों को रद्द किये जाने के बावजूदकई समाचार आउटलेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म उन्हें IPS प्रशिक्षु के रूप में पहचानने वाली सामग्री को होस्ट और प्रसारित करना जारी रखते रहेजिसके बारे में उन्होंने दावा किया कि इससे उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत निजता को नुकसान पहुँचा है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने Google LLC, YouTube LLC और अन्य प्लेटफार्मों को विवादित URL को हटानेडिलीट करने और डी-इंडेक्स करने के निदेश देने की मांग कीऔर भविष्य में उसी सामग्री के पुन: प्रकाशन को रोकने के लिये हैश-मैचिंग तकनीक के उपयोग का भी प्रस्ताव दिया। 
  • Google LLC ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका की पोषणीयता पर आपत्ति जताते हुए तर्क दिया कि चूँकि याचिकाकर्त्ता तेलंगाना में रहता है और अधिकांश सामग्री तेलुगु में हैइसलिये केवल तेलंगाना उच्च न्यायालय के पास ही अधिकारिता है।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • प्रादेशिक अधिकारिता पर आक्षेप के संबंध में:न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि विवाद केवल तेलुगु भाषा के प्रकाशनों तक ही सीमित थायह देखते हुए कि राष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स - जिनमें द हिंदूटाइम्स ऑफ इंडिया, NDTV और न्यूज18 शामिल हैं - की कई अंग्रेजी भाषा की रिपोर्टें पूरे देश मेंजिनमें दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी शामिल हैजहाँ प्रत्यर्थी मध्यस्थ प्लेटफॉर्म भी मौजूद हैंउपलब्ध थीं। 
  • दिल्ली के भीतर उत्पन्न होने वाले वाद-हेतुक के संबंध में:न्यायालय ने माना कि चूँकि विवादित सामग्री सुलभ थी और प्रत्यर्थी प्लेटफॉर्म दिल्ली की क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर संचालित होते थेइसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि वाद का कोई भी भाग इसके अधिकारिता में उत्पन्न नहीं हुआ। 
  • अनुच्छेद 21 के अंतर्गत 'भूल जाने के अधिकारके संबंध में:न्यायालय ने लक्षवीर सिंह यादव बनाम भारत संघ के मामले में अपने पूर्व के निर्णय पर विश्वास करते हुए दोहराया कि 'विस्मृत होने का अधिकारअनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता के अधिकार से उत्पन्न होता हैऔर जिन व्यक्तियों को दोषमुक्त कर दिया गया हैजिनके वादों का निपटारा हो गया हैवे डिजिटल न्यायालय अभिलेखों और खोज इंजन परिणामों से अपने नाम हटानेछुपाने या डी-इंडेक्स करने की मांग करने के हकदार हैं। 
  • दिये गए अनुतोष के संबंध में:न्यायालय ने Google LLC और YouTube LLC सहित प्रत्यर्थियों को नोटिस जारी किया और उन्हें प्रति-शपथ पत्र दाखिल करने का निदेश दिया। मामले की अगली सुनवाई 21 अगस्त, 2026 को निर्धारित की गई। 

विस्मृत होने (भूल जाने) का अधिकार क्या है? 

  • परिभाषा:भूल जाने का अधिकार व्यक्तियों को डिजिटल प्लेटफार्मों से अपने व्यक्तिगत डेटा को हटाने की मांग करने की अनुमति देता है जब ऐसा डेटा पुरानाअप्रासंगिक या उनकी निजता के लिये हानिकारक हो। 
  • यूरोपीय मूल:यह अधिकार यूरोपीय संघ के न्याय न्यायालय (CJEU) द्वारा 2014 में गूगल स्पेन मामले में स्थापित किया गया थाजिसमें खोज इंजनों को अनुरोध पर अपर्याप्तअप्रासंगिक या अत्यधिक व्यक्तिगत डेटा को हटाने की आवश्यकता थीविशेष रूप से जहाँ समय बीतने के साथ जानकारी अब प्रासंगिक नहीं रह जाती है। 
  • GDPR की मान्यता:यूरोपीय संघ मेंयह अधिकार सूचनात्मक आत्मनिर्णय और अपने व्यक्तिगत डेटा पर नियंत्रण के सिद्धांत पर आधारित सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR) के अनुच्छेद 17 के अधीन संहिताबद्ध है। 
  • वैश्विक स्वीकृति:कनाडायूनाइटेड किंगडमअर्जेंटीना और जापान में भी इसी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था अपनाई गई है; 2023 के एक कनाडाई न्यायालय के निर्णय ने व्यक्तिगत डेटा को खोज परिणामों से अवरुद्ध करने की मांग के अधिकार को बरकरार रखा। 
  • कैलिफोर्निया मॉडल: 2015 का ऑनलाइन इरेज़र कानून अवयस्कों को पोस्ट की गई जानकारी को हटाने की अनुमति देता हैजबकि 2023 का डिलीट एक्ट डेटा ब्रोकरों के विरुद्ध वयस्कों को भी इसी तरह का अधिकार प्रदान करता है। 
  • भारत में स्थिति — कोई स्वतंत्र संविधि नहीं:भारत में वर्तमान में विस्मृत होने के अधिकारके लिये कोई समर्पित विधायी ढाँचा नहीं हैतथापि यह अवधारणा निजता और डिजिटल अधिकारों के विधिशास्त्र के माध्यम से संदर्भित होती है। 
  • पुट्टास्वामी मान्यता (2017):के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ के मामले मेंउच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अधीन निजता को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दीजिसमें परोक्ष रूप से विस्मृत होने का अधिकार भी सम्मिलित हैजबकि यह स्पष्ट किया कि यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है और लोक हितलोक स्वास्थ्यअभिलेखनअनुसंधान या विधिक दावों से जुड़े मामलों में लागू नहीं होगा। 
  • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023: "मिटाने" के अधिकार को मान्यता देता हैतथापि न्यायालय रिकॉर्ड और अन्य सार्वजनिक डेटा पर इसकी प्रयोज्यता विधिक रूप से अनिश्चित बनी हुई है। 
  • सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021:मध्यस्थों को परिवाद प्राप्त होने के 24 घंटों के भीतर निजता का उल्लंघन करने वाली सामग्री को हटाने या उस तक पहुँच को अक्षम करने की आवश्यकता है। 
  • न्यायिक पूर्व निर्णय: 
    • राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य (1994) - "अकेले रहने के अधिकार" को मान्यता दी लेकिन यह माना कि प्रकाशित न्यायालय रिकॉर्ड सार्वजनिक टिप्पणी का एक वैध विषय बने रहते हैं। 
    • धर्मराज भानुशंकर दवे बनाम गुजरात राज्य (2017) - गुजरात उच्च न्यायालय ने सार्वजनिक अभिलेखों से दोषमुक्त होने के विवरण को हटाने से इंकार कर दियायह मानते हुए कि न्यायालय आदेश सुलभ बने रहने चाहिये 
    • ओडिशा उच्च न्यायालय (2020) - "रिवेंज पोर्न" से जुड़े एक मामले मेंइस अधिकार पर व्यापक बहस का आह्वान कियाऔर इसके कार्यान्वयन की जटिलता को रेखांकित किया। 
    • दिल्ली उच्च न्यायालय (2021) – याचिकाकर्त्ता की सामाजिक और कैरियर संबंधी संभावनाओं की रक्षा के लिये खोज परिणामों को हटाने की अनुमति देते हुएआपराधिक मामले में अधिकार का विस्तार किया। 
    • उच्चतम न्यायालय (जुलाई 2022) - रजिस्ट्री को वैवाहिक विवाद में शामिल दंपत्ति के व्यक्तिगत विवरण को सर्च इंजन से हटाने के लिये एक तंत्र विकसित करने का निदेश दिया। 
    • केरल उच्च न्यायालय (दिसंबर 2023) - ने खुले न्याय संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए यह माना कि इस अधिकार को चल रही कार्यवाही पर लागू नहीं किया जा सकता हैसाथ ही यह भी कहा कि विधायी स्पष्टता की आवश्यकता है। 
    • हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (जुलाई 2024) – बलात्संग के एक मामले में दोषमुक्त होने के बाद अभियुक्त और पीड़िता दोनों के नाम हटाने का निदेश दियायह मानते हुए कि आरोप का कलंक बना नहीं रहना चाहिये 

सांविधानिक विधि

विधायी संशोधन के बिना विवाह-विच्छेद अधिनियम की अधिकारिता का विस्तार नहीं किया जा सकता है

 07-Jul-2026

प्रिंसी एन.वी. बनाम भारत संघ 

"किसी विधि में शब्द जोड़ना एक विधायी कार्य है।" 

न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस नेप्रिंसी एन.वी. बनाम भारत संघ (2026)में विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 की धारा 3(3) में ऐसा कोई अतिरिक्त न्यायिक मंच न्यायिक निर्वचन के माध्यम से नहीं जोड़ा जा सकताजिसके आधार पर कोई ईसाई पत्नी अपने निवास-स्थान की अधिकारिता वाले न्यायालय में विवाह-विच्छेद की कार्यवाही संस्थित कर सके। न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि इस प्रकार का विधिक संशोधन केवल संसद द्वारा विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जा सकता हैन्यायालय अपने व्याख्यात्मक अधिकार का प्रयोग करते हुए ऐसा परिवर्तन नहीं कर सकता।  

प्रिंसी एन.वी. बनाम भारत संघ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता प्रिंसी एन.वी. ने केरल उच्च न्यायालय का रुख कियाजब कल्पेट्टा स्थित कुटुंब न्यायालय ने प्रादेशिक अधिकारिता के अभाव में उनकी तलाक याचिका को खारिज कर दिया। 
  • याचिकाकर्त्ता कथित तौर पर घरेलू हिंसा का शिकार हुई थी और कासरगोड स्थित अपने ससुराल से भागकर वायनाड में अपने माता-पिता के घर चली गई थी। कासरगोड में ही उनका विवाह संपन्न हुआ था और वह दंपति का अंतिम निवास स्थान भी था। 
  • विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 की धारा 3(3) के अधीन वह अपने वर्तमान निवास स्थान पर तलाक की कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती थीयह सुविधा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन पत्नियों को उपलब्ध है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि यह चूक धर्म और लिंग के आधार पर विभेद के समान हैसंविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के अधीन समता और गरिमा के उसके अधिकार का उल्लंघन करती हैऔर न्यायालय से आग्रह किया कि धारा 3(3) की निर्वचन पत्नी के निवास के मंच को शामिल करने के लिये किया जाए। 
  • भारत सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि प्रादेशिक अधिकारिता विधि का मामला हैन्यायालय अपने पद से विधि नहीं बना सकताऔर संसद ने 2003 के वैवाहिक विधि संशोधनों के दौरान जानबूझकर विवाह-विच्छेद अधिनियम को अपरिवर्तित छोड़ दिया था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायिक संयम और विधायी कार्य पर:न्यायालय ने माना कि किसी संविधि में शब्द जोड़ना एक विधायी कार्य है जिसे न्यायालयों को करने की अनुमति नहीं हैऔर पाया कि धारा 3(3) की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध थीजिससे न्यायिक निर्वचन की कोई गुंजाइश नहीं बची। 
  • स्पष्ट अर्थ के नियम पर:न्यायालय ने निर्वचन के मूलभूत सिद्धांत को दोहराया कि जहाँ किसी संविधि के शब्द स्पष्ट हों और केवल एक ही अर्थ के लिये उत्तरदायी होंवहाँ न्यायालयों को उस अर्थ को प्रभावी करना होगाचाहे इसके परिणाम कुछ भी हों। 
  • उपलब्ध उपचार के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ता के पास उपाय उपलब्ध थेक्योंकि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 24 किसी पक्षकार को एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में मामले के अंतरण की मांग करने की अनुमति देती हैऔर यदि अंतरिती न्यायालय संतुष्ट हो तो ऐसा अंतरण स्वीकृत किया जा सकता है। 
  • विधायी अंतर पर:याचिका को खारिज करते हुएन्यायालय ने वैवाहिक विधि में संरचनात्मक असंतुलन को स्वीकार किया और विधायिका को अंतिम टिप्पणी देते हुए इसे "अजीब" और "दुर्भाग्यपूर्ण" बताया कि विवाह-विच्छेद अधिनियम हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम जैसे अधिक प्रगतिशील वैयक्तिक विधि संविधि के अनुरूप नहीं है। 
  • अनुतोष और विधायिका को संदर्भ:न्यायालय ने पाया कि पत्नियों को उनके निवास स्थान पर तलाक के लिये आवेदन करने की अनुमति देने वाले प्रावधान का अभाव उचित नहीं था और संसद से संशोधन पर विचार करने का आग्रह किया। रजिस्ट्री को निदेश दिया गया कि वह निर्णय को विधि एवं न्याय मंत्रालय को विचार के लिये अग्रेषित करे। तदनुसार याचिका खारिज कर दी गई। 

विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 क्या है? 

  • अधिनियम के बारे में: 
  • यह अधिनियम भारत में ईसाई धर्म का पालन करने वाले व्यक्तियों पर लागू होने वाले विवाह-विच्छेद विधि को निर्धारित करता हैजिसमें अलगावविवाह-विच्छेद और पति-पत्नी के अधिकारों जैसे मामले सम्मिलित हैं। 
  • इसे ब्रिटिश शासन के अधीन अधिनियमित किया गया था और यह अप्रैल 1869 को लागू हुआ थाऔर तब से इसे निष्पक्षता के आधुनिक मानकों के करीब लाने के लिये संशोधित किया गया है। 
  • यह भारत भर के ईसाइयों पर लागू होता है (जम्मू और कश्मीर को पहले इससे बाहर रखा गया था)। 
  • भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिये अलग-अलग विवाह और विवाह-विच्छेद विधि हैं - हिंदुओं के लिये हिंदू विवाह अधिनियम, 1955; मुस्लिमों के लिये मुस्लिम वैयक्तिक विधिपारसियों के लिये पारसी विवाह और विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1936; और अंतरधार्मिक जोड़ों के लिये विशेष विवाह अधिनियम, 1954। ईसाइयों के लिये विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 लागू होता है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य विवाह टूटने की स्थिति में न्याय सुनिश्चित करना और पति-पत्नी के अधिकारों की रक्षा करना है। 

विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 की धारा 3(3): 

विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 की धारा 3(3) – वैवाहिक याचिकाओं के लिये प्रादेशिक अधिकारिता: 

  • यह अधिनियम भारत में ईसाई धर्म मानने वाले व्यक्तियों के बीच विवाह-विच्छेद और वैवाहिक अनुतोष से संबंधित प्रावधानों को नियंत्रित करता है। 
  • धारा 3(3) के अधीनवैवाहिक याचिका जिला न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है जिसकी अधिकारिता में विवाह अनुष्ठित हुआ थाया जिसकी अधिकारिता में पति और पत्नी निवास करते हैं या अंतिम बार एक साथ निवास करते थे। 
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के विपरीतविवाह-विच्छेद अधिनियम वर्तमान में उस स्थान पर याचिका दायर करने की अनुमति नहीं देता है जहाँ याचिका दायर करने के समय पत्नी पृथक् रहती है। 
  • पत्नी के वर्तमान निवास स्थान जैसे किसी अन्य मंच को शामिल करने के लिये प्रावधान में विधायी संशोधन की आवश्यकता होगी। 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 – अंतरण और प्रत्याहरण की साधारण शक्ति: 

  • उपधारा (1): किसी पक्षकार के आवेदन पर (उन लोगों को नोटिस और सुनवाई के बाद जो सुनवाई के इच्छुक हैं)या बिना नोटिस के स्वयं हीउच्च न्यायालय या जिला न्यायालय किसी भी प्रक्रम पर— 
    (क) अपने समक्ष लंबित किसी वादअपील या अन्य कार्यवाही को किसी ऐसे अधीनस्थ न्यायालय को अंतरित कर सकता है जो उस पर विचारण या निपटारा करने में सक्षम होया 
     (ख) किसी अधीनस्थ न्यायालय में लंबित किसी वादअपील या अन्य कार्यवाही का प्रत्याहरण कर सकता हैऔर या तो स्वयं उस का विचारण/निपटा कर सकता हैउसे किसी सक्षम अधीनस्थ न्यायालय को अंतरित कर सकता हैया उसे उस न्यायालय को पुनः अंतरित कर सकता है जहाँ से उसका प्रत्याहरण किया गया था। 
  • उपधारा (2): जहाँ उपधारा (1) के अधीन कोई वाद या कार्यवाही अंतरित या प्रत्याह्रत की गई होतो उसके बाद न्यायालयअंतरण आदेश में दिये गए किसी विशेष निदेश के अधीन रहते हुएया तो उस पर पुनः विचारण कर सकता है या उस बिंदु से जारी रख सकता है जहाँ से उसे अंतरित या प्रत्याह्रत किया गया था। 
  • उपधारा (3): इस धारा के प्रयोजनों के लिये — 
    (क) अतिरिक्त और सहायक न्यायाधीशों के न्यायालय जिला न्यायालय के अधीनस्थ माने जाते हैं; 
     (ख) "कार्यवाही" में किसी डिक्री या आदेश के निष्पादन की कार्यवाही शामिल है। 
  • उपधारा (4): लघुवाद न्यायालय से अंतरित या प्रत्याहृत किसी वाद का विचारण करने वाला न्यायालयउस वाद के लिये लघुवाद न्यायालय माना जाएगा। 
  • उपधारा (5): इस धारा के अंतर्गत किसी वाद या कार्यवाही को उस न्यायालय से भी अंतरित किया जा सकता है जिसे उस पर विचारण करने की अधिकारिता नहीं है।