9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से






करेंट अफेयर्स और संग्रह

होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह

आपराधिक कानून

ल विवाह संबंधी मामलों में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम व्यक्तिगत विधि पर अधिभावी प्रभाव रखते हैं

 09-Jul-2026

रूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 

"हमारी राय मेंदेश के प्रत्येक नागरिक के लियेधर्म की परवाह किये बिनाविवाह की आयु वही है जोबाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम द्वारा निर्धारित की गई है।" 

न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और अचल सचदेव 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ नेरूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि व्यक्तिगत विधिबाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) के अधीन बाल विवाह पर सांविधिक प्रतिबंध और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के अधीन उपलब्ध सुरक्षा को रद्द नहीं कर सकती हैऔर उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक अवयस्क लड़की को विवाह से बचाने में कथित रूप से बाधा डालने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द करने से इंकार कर दिया। 

रूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • 15 फरवरी 2026 कोस्थानीय पुलिस ने चाइल्ड लाइन की एक टीम के साथ उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के एक गाँव का दौरा कियाक्योंकि उन्हें 16 वर्षीय लड़की के होने वाले विवाह के बारे में सूचना मिली थी। 
  • मौके पर पहुँचने पर अधिकारियों ने लड़की के माता-पिता को सूचित किया कि उसे बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया जाएगा। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने लगभग 50 लोगों की भीड़ के साथ कथित तौर पर हिंसक व्यवहार कियाबचाव दल को मौखिक रूप से गाली दी और धमकी दीऔर एक केस वर्कर की अभिरक्षा से लड़की को जबरदस्ती वापस ले लिया। 
  • अधिकारियों को अपनी सुरक्षा के लिये गाँव से पीछे हटना पड़ातथापि बाद में लड़की को बचा लिया गया। 
  • लोक सेवकों को उनके कर्त्तव्य निर्वहन में बाधा डालने के आरोप में 19 नामजद व्यक्तियों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। 
  • अभियुक्त ने FIR को रद्द करने की मांग करते हुए अनुच्छेद 226 के अधीन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। 
  • उच्च न्यायालय के समक्षयाचिकाकर्त्ताओं के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि मुस्लिम स्वीय विधि के अधीनएक लड़की जो यौवन प्राप्त कर चुकी है - जिसे सामान्यत: 15 वर्ष की आयु माना जाता है - विवाह के लिये सक्षम हैऔर उन्होंने वयस्कता अधिनियम के साथ-साथ मुस्लिम स्वीय विधि (शरीयत) अधिनियम, 1937 पर विश्वास करते हुए तर्क दिया कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) उन पर लागू नहीं होते हैं। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • व्यक्तिगत विधि और कल्याणकारी विधि के बीच टकराव पर:न्यायालय ने याचिकाकर्त्ताओं के इस तर्क को खारिज कर दिया कि मुस्लिम स्वीय विधि विवाह की सांविधिक आयु में अपवाद उत्पन्न कर सकता हैयह मानते हुए कि कोई भी व्यक्तिगत विधि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) के अधीन अधिनियमित बाल विवाह प्रतिषेध को रद्द नहीं कर सकता हैऔर यह प्रतिषेध लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के साथ मिलकर काम करता हैजो 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति के साथ लैंगिक संबंध को अपराध घोषित करता है। 
  • विवाह की आयु की एकसमान प्रयोज्यता पर:न्यायालय ने माना कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) के अधीन विहित आयु धार्मिक संबद्धता की परवाह किये बिना प्रत्येक नागरिक पर लागू होती हैऔर इस मानक से धर्म के आधार पर छूट देने की दलील को खारिज कर दिया। 
  • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के पीछे के तर्क पर:पीठ ने टिप्पणी की कि ये अधिनियम लोक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति के विचारों पर आधारित हैंवैज्ञानिक समझ पर आधारित हैंऔर व्यक्तिगत विधि या रीति-रिवाज के आधार पर छूट के लिये कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं। 
  • विवाह और 18 वर्ष से कम आयु के लैंगिक अपराध की अविभाज्यता पर:न्यायालय ने तर्क दिया कि 18 वर्ष से कम आयु में विवाह की अनुमति देने से पक्षकारों को अनिवार्य रूप से लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के अधीन अपराध के जोखिम में डाल दिया जाएगाक्योंकि लैंगिक संबंध सामान्यत: विवाह का एक हिस्सा होते हैं। 
  • व्यक्तिगत विधि और बाद के कल्याणकारी विधियों के बीच विधायी पदानुक्रम पर:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बालकों के संरक्षण के लिये अधिनियमित बाद की व्यापक विधि व्यक्तिगत विधि के अधीन बनाए गए पूर्व के अपवादों पर वरीयता रखते हैं। 
  • बचाव दल के आचरण पर:पीठ ने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) के अधीन अपने सांविधिक कर्त्तव्यों का निर्वहन करने के साथ-साथ लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के संभावित उल्लंघन को रोकने के लिये कार्यवाही करने के लिये पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम की सराहना की। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द करने से इंकार करने पर:लोक सेवकों के विरुद्ध बाधा डालने और मारपीट के आरोपों को संज्ञेय अपराध मानते हुएजिसका अन्वेषण आवश्यक हैन्यायालय ने प्रारंभिक चरण में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति दीसाथ ही पहले दी गई अंतरिम रोक को भी हटा दिया। 

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) क्या है? 

  • उद्देश्य:इस अधिनियम का उद्देश्य निर्दिष्ट कृत्यों को दण्डित करके और उनकी रोकथाम और प्रतिषेध के लिये उत्तरदायी अधिकारियों को नामित करके बाल विवाह को रोकना है। 
  • प्रमुख परिभाषाएँ: 
    • बालक:एक पुरुष जिसकी आयु 21 वर्ष पूरी नहीं हुई होया एक महिला जिसकी आयु 18 वर्ष पूरी नहीं हुई हो। 
    • बाल विवाह:ऐसा विवाह जिसमें विवाह करने वाले दोनों पक्षकारों में से कोई एक बालक हो। 
    • अवयस्क:वह व्यक्ति जिसने वयस्कता अधिनियम, 1875 के अधीन वयस्कता प्राप्त नहीं की है - अर्थात्भारत में रहने वाला वह व्यक्ति जिसने 18 वर्ष पूरे नहीं किये हैं। 
  • दण्ड:बाल विवाह के लिये 2 वर्ष तक का कठोर कारावास, 1 लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों दण्ड दिये जा सकते हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध संज्ञेय और अजमानतीय हैं। 
  • उत्तरदायी व्यक्ति: 
    • कोई भी व्यक्ति जो बाल विवाह का आयोजन करता हैउसका संचालन करता हैउसका निर्देशन करता है या उसमें सहायता करता है। 
    • 18 वर्ष से अधिक आयु का वयस्क पुरुष जो किसी बालक से विवाह करता है (धारा 9)। 
    • बच्चे की देखरेख करने वाले व्यक्ति — जिनमें माता-पितासंरक्षक या किसी संगठन/संघ के सदस्य शामिल हैं — जो बाल विवाह को बढ़ावा देते हैंइसकी अनुमति देते हैं या इसमें भाग लेते हैं। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act), 2012 क्या है? 

  • संक्षिप्त विवरण:लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act), 2012 एक ऐतिहासिक विधान है जिसे बालकों को लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार से बचानेउनकी अंतर्निहित संवेदनशीलता को दूर करने और उनकी सुरक्षा एवं कल्याण सुनिश्चित करने के लिये अधिनियमित किया गया है। यह संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय के अधीन भारत के दायित्त्वों को प्रभावी बनाता हैजिसमें भारत 11 दिसंबर 1992 को शामिल हुआ था। 
  • प्रस्तावना:यह अधिनियम लैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य के अपराधों से बालकों का संरक्षण करने और ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना तथा उनसे संबंधित  या आनुषंगिक विषयों के लिये उपबंध करने के लिये अधिनियम करता है। 
  • महत्वपूर्ण तिथियाँ:यह अधिनियम 19 जून 2012 को अधिनियमित किया गया था और 14 नवंबर 2012 से लागू हुआ। 
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम संशोधन अधिनियम, 2019: 
    • यह 16 अगस्त 2019 से लागू हुआ। 
    • इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों के लिये अधिक कठोर दण्ड का प्रावधान किया गया है। 
    • धारा 2(1) में खंड (घकसम्मिलित किया गया हैजो "बालक संबंधी अश्लील सामग्री" को परिभाषित करता है। 
    • धारा में संशोधन करके 16 वर्ष से कम आयु के बालक पर किये गए गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमले के मामले को विशेष रूप से संबोधित किया गया है। 

आपराधिक कानून

धारा 31 दण्ड प्रक्रिया संहिता/ धारा 25 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता

 09-Jul-2026

रमेश चंद्र बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य     

"जो व्यक्ति प्रौद्योगिकी के उपयोग में दक्ष नहीं हैंउन्हें मात्र तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण दण्ड का भागी नहीं बनाया जा सकता।" 

न्यायमूर्ति वी. नरसिंह 

स्रोत: ओडिशा उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वी. नरसिंह नेरमेश चंद्र बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि जहाँ किसी अभियुक्त को एक ही संव्यवहार में किये गए दो या अधिक अपराधों के लिये दोषी ठहराया जाता हैवहाँ विचारण न्यायालय परिणामी दण्ड को निरंतर चलाने का आदेश नहीं दे सकता हैऔर उसने दण्ड को एक साथ चलाने के लिये संशोधित किया और साथ ही याचिकाकर्त्ता को परिवीक्षा लाभ भी प्रदान किया। 

रमेश चंद्र बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • 17.03.2023 कोजब पीड़िता घर पर अकेली थीतब याचिकाकर्त्ता कथित तौर पर उसके घर में घुस गया और उसके साथ बलात्संग करने का प्रयत्न किया। 
  • पीड़िता की चीख सुनकर उसका पुत्र मौके पर पहुँचा और याचिकाकर्त्ता का विरोध कियाजिसने कथित तौर पर पीड़िता के सिर और पुत्र के हाथ पर चोटें पहुँचाई 
  • इसके अलावा यह भी आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्त्ता ने पहले पीड़ित को जान से मारने की धमकी दी थी। 
  • याचिकाकर्त्ता पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 451, 341, 323, 354 और 506 के अधीन मामला दर्ज किया गया था और विचारण न्यायालय ने उसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 451 (अपराध करने के आशय से गृह अतिचार) और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 323 (स्वेच्छा से उपहति कारित करना) के अधीन दोषी ठहराया था। 
  • विचारण न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता की अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 के अधीन छोड़े जाने की प्रार्थना को खारिज कर दिया और उसे धारा 451 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन एक वर्ष के साधारण कारावास और धारा 323 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन छह महीने के साधारण कारावास का दण्ड सुनायासाथ ही यह निदेश दिया कि दण्ड निरंतर चलेंगे 
  • अपील परसेशन न्यायालय ने धारा 451 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दण्ड को एक वर्ष से घटाकर छह महीने कर दियालेकिन आदेश के शेष भाग में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। 
  • इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने उड़ीसा उच्च न्यायालय में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर कीजिसमें मुख्य रूप से अपराधी परिवीक्षा अधिनियम के अधीन लाभ से वंचित किये जाने को चुनौती दी गई थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दण्ड के लिये एकल संव्यवहार के नियम पर:न्यायालय ने कहा कि यद्यपि दोषसिद्धि एक ही संव्यवहार से उत्पन्न अपराधों के लिये दर्ज की गई थीफिर भी विचारण न्यायालय और अपील न्यायालय दोनों ने दण्डों को क्रमिक रूप से चलाने का निदेश दिया था। .एम. चेरियन उर्फ ​​थैंकचन बनाम केरल राज्य और अन्य (2014) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने दोहराया कि जब कोई अभियोग दो या दो से अधिक अपराधों से गठित एक ही संव्यवहार से उत्पन्न होता हैतो दण्डों को एक साथ चलना चाहियेऔर ऐसा कोई नियम नहीं है कि क्रमिक दण्ड देना सामान्य नियम हो और एक साथ दण्ड देना अपवाद हो। 
  • मोहम्मद अख्तर हुसैन के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर:न्यायालय ने मोहम्मद अख्तर हुसैन बनाम कलेक्टर ऑफ कस्टम्स (1988) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास कियाजिसमें समवर्ती दण्ड के लिये एकल संव्यवहार नियम निर्धारित किया गया था - कि जहाँ एक ही संव्यवहार दो अधिनियमों के अधीन दो अपराधों का गठन करता हैवहाँ निरंतर दण्ड अनुचित हैतथापि यह नियम वहाँ लागू नहीं होता जहाँ अपराध पृथक् संव्यवहार या भिन्न तथ्यों से उत्पन्न होते हैं। 
  • दण्ड सुनाते समय कम करने वाले कारकों पर विचार करते हुए:ऑस्कर वाइल्ड के इस कथन का हवाला देते हुए कि "हर संत का एक अतीत होता है और हर पापी का एक भविष्य"न्यायालय ने कहा कि दण्ड सुनाते समय कम करने वाले कारकों पर विचार किया जाना चाहिये। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 235(2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 258(2) का हवाला देते हुएजिनमें दण्ड सुनाने से पहले अभियुक्त को सुनवाई का अवसर दिया जाता हैन्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि न्यायालयों को यांत्रिक रूप से दण्ड के आदेश पारित नहीं करने चाहियेअपितु अपराध की परिस्थितियों और किसी भी कम करने वाले कारकों को ध्यान में रखना चाहिये 
  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 451 के अधीन अधिरोपित किये गए जुर्माने पर:न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 451 के अधीन अधिरोपित किये गए जुर्माने को अपास्त कर दिया और इसके बजाय निदेश दिया कि यह राशि अपराधी परिवीक्षा अधिनियम की धारा के अधीन पीड़ित को प्रतिकर के रूप में दी जाए। 
  • अपराधी परिवीक्षा अधिनियम के अधीन लाभ से इंकार के संबंध में:न्यायालय ने आश्चर्य व्यक्त किया कि अधीनस्थ न्यायालयों ने इस मामले को अपराधी परिवीक्षा अधिनियम के उदार प्रावधानों के लिये उपयुक्त नहीं माना। उच्चतम न्यायालय द्वारा चेल्लमल बनाम राज्य (पुलिस निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व) मामले में हाल ही में दिये गए अवलोकनों (2025) पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने कहा कि यदि न्यायालय किसी मामले में अपराधी परिवीक्षा अधिनियम लागू करने से इंकार करते हैं तो उन्हें इसके कारण अभिलिखित करना अनिवार्य है। 
  • अनुतोष मिलने पर:न्यायालय ने दण्ड को क्रमिक के बजाय समवर्ती चलाने के लिये संशोधित कियाअपराधी परिवीक्षा अधिनियम की धारा के अधीन परिवीक्षा का लाभ बढ़ाया और याचिकाकर्त्ता को छह महीने के भीतर 1,000 रुपए का प्रतिकर जमा करने का निदेश दिया। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 25 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 25 - एक ही विचारण में कई अपराधों के लिये दोषसिद्ध होने के मामलों में दण्डादेश: 

  • उपधारा (1):जब कोई व्यक्ति एक ही विचारण में दो या अधिक अपराधों के लिये दोषसिद्ध किया जाता है तबन्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुएउसे ऐसे अपराधों के लिये विहित विभिन्न दण्डों में से उन दण्डों के लियेजिन्हें देने के लिये ऐसा न्यायालय सक्षम हैदण्डादेश दे सकेगाऔर न्यायालयअपराधों की गंभीरता पर विचार करते हुएऐसे दण्डादेश साथ-साथ या क्रमवर्ती रूप से भोगने का आदेश देगा।  
  • उपधारा (2):दण्डादेशों के क्रमवर्ती होने की दशा मेंकेवल इस कारण से कि कई अपराधों के लिये संकलित दण्ड उस दण्ड से अधिक है जो वह न्यायालय एक अपराध के लिये दोषसिद्धि पर देने के लिये सक्षम हैन्यायालय के लिये यह आवश्यक नहीं होगा कि अपराधी को उच्चतर न्यायालय के समक्ष विचारण के लिये भेजे; परंतु इसके लिये दो शर्तें हैं: 
  • (क)किसी भी दशा में, ऐसा व्यक्ति बीस वर्ष से अधिक की अवधि के लिये कारावास के लिये दण्डादिष्ट नहीं किया जाएगा 
  • (ख)संकलित दण्ड, उस दण्ड की मात्रा के दुगुने से अधिक नहीं होगा जिसे एक अपराध में देने के लिये वह न्यायालय सक्षम है 
  • उपधारा (3):किसी सिद्धदोष व्यक्ति द्वारा अपील के प्रयोजन के लियेएक दण्डादेश उन क्रमवर्ती दण्डादेशों का योग, जो इस धारा के अधीन उसके विरुद्ध दिये गए है, एक दण्डादेश समझा जाएगा। 
  • विधायी आधार:भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 25 पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 31 के अनुरूप है और सार रूप में उससे मिलती-जुलती है।