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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सिविल कानून

प्रतिभूति निक्षेप पर ब्याज न देने वाली संविदा लोकनीति के विरुद्ध नहीं है

 14-Jul-2026

हरियाणा राज्य एवं अन्य बनाम मेसर्स जय दुर्गा फिनवेस्ट प्राइवेट लिमिटेड 

"लोकनीति का प्रयोग उस वाणिज्यिक संविदा को रद्द करने के लिये नहीं किया जा सकता है जो स्पष्ट रूप से प्रतिभूति निक्षेप पर ब्याज देने से इंकार करती है। ऐसा प्रावधान न तो अनैतिक हैन ही विधिविरुद्ध है और न ही इसे विधिक दृष्टि से अस्थिर माना जा सकता है।" 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने हरियाणा राज्य और अन्य बनाम मेसर्स जय दुर्गा फिनवेस्ट पी. लिमिटेड (2026) मेंयह निर्णय दिया कि किसी वाणिज्यिक संविदा में एक खंड को केवल इसलिये विधि और लोकनीति के विपरीत घोषित नहीं किया जा सकता है क्योंकि इसमें प्रतिभूति निक्षेप पर ब्याज के संदाय का प्रावधान नहीं हैऔर इस प्रकार पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के विपरीत निर्णय को अपास्त कर दिया। 

हरियाणा राज्य एवं अन्य बनाम मेसर्स जय दुर्गा फिनवेस्ट पी. लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?                                 

  • यह विवाद हरियाणा राज्य द्वारा बेगा मुरथल रेत क्षेत्र से यमुना की रेत निकालने के लिये दी गई खनन संविदा से उत्पन्न हुआ।   
  • अप्रैल 1998 में आयोजित नीलामी में मेसर्स जय दुर्गा फिनवेस्ट प्राइवेट लिमिटेड उच्चतम बोलीदाता के रूप में उभरी और 30 नवंबर, 1998 को राज्य के साथ तीन वर्ष का करार किया। 
  • सांविधिक फॉर्म-करार के खंड 19 में यह प्रावधान था कि ठेकेदार द्वारा निक्षेप की गई प्रतिभूति राशि पर कोई ब्याज नहीं लगेगा और संविदा की समाप्ति तिथि या उससे पहले समाप्ति की तिथि से तीन महीने के भीतर उसे वापस कर दिया जाएगा। 
  • ठेकेदार ने बाद में मासिक संदाय करने में व्यतिक्रम कियाकरार के अधीन नोटिस जारी करने के बादखान और भूविज्ञान निदेशक ने मार्च, 2000 को संविदा समाप्त कर दिया और प्रतिभूति निक्षेप राशि जब्त करने का आदेश दिया। 
  • पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने धारा 19 को "विधि में अस्थिर" घोषित किया और राज्य को निक्षेप की तारीख से 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित प्रतिभूति राशि वापस करने का निदेश दिया। 
  • राज्य ने इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • "बिना ब्याज" खंड की वैधता पर:न्यायालय ने माना कि लोक नीति का हवाला देकर किसी ऐसी वाणिज्यिक संविदा को रद्द नहीं किया जा सकता है जो स्पष्ट रूप से प्रतिभूति निक्षेप पर ब्याज देने से इंकार करती हैक्योंकि ऐसा प्रावधान न तो अनैतिक हैन ही विधिविरुद्ध है और न ही विधिक रूप से अस्थिर है। 
  • पक्षकारों के आचरण पर:न्यायालय ने कहा कि प्रत्यर्थीएक वाणिज्यिक इकाईने खुली नीलामी में भाग लिया थाउच्चतम बोलीदाता के रूप में उभरा थाऔर पूरी जानकारी के साथ मानक सांविधिक फॉर्म-पर हस्ताक्षर किये थेजिसमें इसके नियमों का पालन करने का वचन दिया गया था। 
  • संविदा की शर्तों को फिर से लिखने के संबंध में:न्यायालय ने दोहराया कि न्यायालयों को पक्षकारों के बीच हुए करार के विपरीत संविदा की शर्तों को फिर से लिखने का अधिकार नहीं हैऔर करार के विपरीत ब्याज देना उच्च न्यायालय द्वारा संविदा को फिर से लिखने के समान है। 
  • वाणिज्यिक संविदाओं की पवित्रता पर:न्यायालय ने टिप्पणी की कि जहाँ वाणिज्यिक संविदा के पक्षकार समान स्तर पर होते हैं और स्पष्ट शर्तों के लिये प्रतिबद्ध होते हैंवे संविदा की स्पष्ट भाषा से बंधे होते हैं और बाद में केवल इसलिये इससे पीछे नहीं हट सकते क्योंकि कोई शर्त बोझिल साबित होती है। 
  • धारा 19 की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 19 को समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिये - जबकि इसमें प्रतिभूति निक्षेप पर ब्याज शामिल नहीं हैयह राज्य को समाप्ति के तीन महीने के भीतर राशि वापस करने के लिये भी बाध्य करता हैजिसका अर्थ है कि राज्य बिना किसी परिणाम के जमा राशि को अनिश्चित काल तक अपने पास नहीं रख सकता है। 
  • अनुतोष प्रदान करने पर:चूँकि संविदा 9 मार्च, 2000 को समाप्त कर दी गई थीइसलिये न्यायालय ने माना कि ठेकेदार जून, 2000 (अर्थात् तीन महीने की वापसी अवधि के बाद) से लेकर निक्षेप राशि के समायोजन या वापसी तक 9% प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज का हकदार होगाऔर उच्च न्यायालय के उस निदेश को अपास्त कर दिया जिसमें निक्षेप राशि की तिथि से ही ब्याज देने का आदेश दिया गया था। 

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 23 क्या है? 

धारा 23. कौन से प्रतिफल और उद्देश्य विधिपूर्ण हैं और कौन से नहीं: 

  • सामान्य नियम:किसी करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिपूर्ण होता हैसिवाय जबकि- 
  • विधि द्वारा निषिद्ध:वह विधि द्वारा निषिद्ध होया 
  • विधि के उपबंधों का विफल करती है:वह ऐसी प्रकृति का है कि यदि अनुज्ञात किया जाए तो वह किसी विधि के उपबंधों को विफल कर देगाया 
  • कपटपूर्ण:वह कपटपूर्ण हैया 
  • व्यक्ति या संपत्ति को क्षति:इसमें किसी अन्य के शरीर या संपत्ति को क्षति अन्तर्वलित या विवक्षित होया 
  • अनैतिक या लोकनीति के विरुद्ध:न्यायालय इसे अनैतिक या लोकनीति के विरुद्ध मानता है। 
  • प्रभाव:इन सभी मामलों मेंकरार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिविरुद्ध माना जाता है। ऐसा प्रत्येक करार जिसका उद्देश्य या प्रतिफल विधिविरुद्ध होशून्य होता है। 

दृष्टांत: 

  • () ‘ अपना गृह 10,000 रुपए में  को बेचने का करार करता है। यहाँ 10,000 रुपए देने का  का वचन गृह बेचने के  के वचन के लिये प्रतिफल हैऔर गृह बेचने का  का वचन 10,000 रुपए देने के  के वचन के लिये प्रतिफल है। ये विधिपूर्ण प्रतिफल हैं 
  • (ख)  यह वचन देता है कि यदि ’, जिसे  को 1,000 रुपए देना है उसे देने में असफल रहा तो वह  को छः मास के बीतते ही 1,000 रुपए देगा।  तदनुसार  को समय देने का वचन देता है। यहाँ हर एक पक्षकार का वचन दूसरे पक्षकार के लिये प्रतिफल है और ये विधिपूर्ण प्रतिफल हैं 

सिविल कानून

सरोगेसी अधिनियम के अधीन जमे हुए भ्रूणों को आयु संबंधी प्रतिबंधों से छूट प्राप्त है

 14-Jul-2026

अंशु शुक्ला और अन्य बनाम भारत संघस्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय विभाग 

"इस अधिनियम के अधीन आयु प्रतिबंध का कठोर अनुप्रयोग प्रजनन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता हैजिसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के एक भाग के रूप में मान्यता प्राप्त है।" 

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी 

स्रोत: इलाहाबाद उच्चन्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति शेखर बीसराफ और न्यायमूर्ति अब्देश कुमार चौधरी शामिल थेनेअंशु शुक्ला और अन्य बनाम भारत संघ (2026)में निर्णय दिया कि जिन दंपतियों ने सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के लागू होने से पहले सरोगेसी प्रक्रिया शुरू कर दी थीवे अधिनियम की धारा 4(iii)(v)()(I) के अधीन विहित सांविधिक आयु सीमा से अधिक होते हुए भी सरोगेसी के साथ आगे बढ़ सकते हैं। 

अंशु शुक्ला और अन्य बनाम भारत संघ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ताजो 17 वर्ष से अधिक समय से विवाहित एक दंपति हैंव्यापक प्रजनन उपचार कराते हुए भी स्वाभाविक रूप से गर्भधारण करने में असमर्थ थे। 
  • उन्होंने कई IVF प्रक्रियाएं करवाईंलेकिन निरंतर भ्रूण स्थानांतरण से प्राकृतिक गर्भाधान में सफलता नहीं मिली। 
  • चिकित्सकीय सलाह परउनकी नाजुक चिकित्सा स्थिति को देखते हुएउन्हें सरोगेसी का विकल्प चुनने के लिये कहा गया और उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया। 
  • दंपति ने सरोगेसी अधिनियम की धारा 2(द) के अधीन "इच्छुक दंपति" के रूप में अर्हता प्राप्त करने का दावा किया। 
  • यद्यपिपत्नी की आयु 50 वर्ष से थोड़ी अधिक थीइसलिये वह अधिनियम की धारा 4(iii)(v)()(I) के अधीन निर्धारित आयु सीमा से अधिक हो गईजिससे वह सरोगेसी का लाभ उठाने के लिये अपात्र हो गई। 
  • यह प्रस्तुत किया गया कि दंपति ने 18 जुलाई, 2015 को तीन भ्रूणों को संरक्षित किया थाजो कि सरोगेसी अधिनियम के 25 जनवरी, 2022 को लागू होने से काफी पहले की बात है। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने तापस कुमार मल्लिक बनाम भारत संघ (2026) में दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशशोभिनी माला बनाम भारत संघ (2026) में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश और अरुण मुथुवेल बनाम भारत संघ (2025) में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • प्रजनन स्वायत्तता और अनुच्छेद 21 पर:पीठ ने माना कि धारा 4(iii)(v)()(I) के अधीन आयु प्रतिबंध का कठोर अनुप्रयोग भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के एक भाग के रूप में मान्यता प्राप्त प्रजनन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। 
  • सरोगेसी प्रक्रिया कब शुरू मानी जाती है:अरुण मुथुवेल (उपरोक्त) पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने दोहराया कि आयु पात्रता निर्धारित करने के सीमित उद्देश्य के लियेसरोगेसी प्रक्रिया उस क्षण शुरू होती है जब इच्छुक दंपत्ति गैमीट निकालने और फर्टिलाइज़ेशन की प्रक्रिया पूरा कर लेते हैं और भ्रूण को सरोगेट माता में स्थानांतरित करने के स्पष्ट आशय से फ्रीज कर देते हैं। 
  • आयु सीमा के भूतलक्षी रूप से लागू न होने पर:न्यायालय ने माना कि दंपति का सरोगेसी का अधिकार उस समय के प्रचलित विधि के अधीन उनके भ्रूणों को फ्रीज किये जाने पर ही स्पष्ट हो गया थाजब कोई आयु सीमा विद्यमान नहीं थीऔर 2021 अधिनियम के अधीन आयु प्रतिबंध को इस अधिकार को समाप्त करने के लिये भूतलक्षी रूप से लागू नहीं किया जा सकता है। 
  • भूतलक्षी प्रभाव न होने के सांविधानिक आधार पर:पीठ ने आगे इस बात पर बल दिया कि जहाँ भ्रूण निर्माण के चरण में कोई सांविधिक आयु प्रतिबंध विद्यमान नहीं थावहाँ नियमों को भूतलक्षी रूप से लागू करने की अनुमति नहीं दी जा सकतीक्योंकि ऐसा करने से अनुच्छेद 21 के अधीन इच्छुक दंपत्ति के पितृत्व के सांविधानिक अधिकार का उल्लंघन होगा। 
  • अनुतोष प्रदान करने पर:उच्चतम न्यायालय के निर्णय को लागू करते हुएपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 4(iii)(v)()(I) के अधीन सांविधिक आयु सीमा याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध कायम नहीं रखी जा सकती है और दंपति को परोपकारी सरोगेसी प्रक्रिया के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी।        

सरोगेसी क्या है? 

  • परिचय:सरोगेसी एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक महिला (सरोगेट) किसी अन्य व्यक्ति या दंपत्ति (इच्छुक माता-पिता) की ओर से बच्चे को गर्भ धारण करने और जन्म देने के लिये सहमत होती है। सरोगेटजिसे जेस्टेशनल कैरियर भी कहा जाता हैवह महिला होती है जो इच्छित माता-पिता के लिये गर्भधारण करती हैबच्चे को पालती है और उसे जन्म देती है 
  • परोपकारी सरोगेसी:इसमें गर्भावस्था के दौरान चिकित्सा खर्च और बीमा कवरेज के अलावा सरोगेट माता को कोई मौद्रिक प्रतिकर नहीं दिया जाता है। 
  • वाणिज्यिक सरोगेसी:इसमें मौद्रिक लाभ या पुरस्कार (नकद या वस्तु के रूप में) के लिये की जाने वाली सरोगेसी या संबंधित प्रक्रियाएं शामिल हैंजो बुनियादी चिकित्सा खर्चों और बीमा कवरेज से अधिक होती हैं। 

सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 क्या है? 

  • पात्र व्यक्ति: 35 से 45 वर्ष की आयु की विधवा या तलाकशुदा महिलाया एक दंपत्ति (विधिक रूप से विवाहित महिला और पुरुष के रूप में परिभाषित)सरोगेसी का लाभ उठा सकते हैं यदि उन्हें कोई ऐसी चिकित्सीय स्थिति है जिसके कारण यह विकल्प आवश्यक हो। 
  • इच्छुक दंपत्ति की पात्रता:इच्छुक दंपत्ति का विधिक रूप से विवाहित भारतीय पुरुष और महिला होना आवश्यक हैपुरुष की आयु 26-55 वर्ष और महिला की आयु 25-50 वर्ष के बीच होनी चाहियेऔर दोनों में से किसी का भी पहले से कोई जैविकदत्तक लिया हुआ या सरोगेट बच्चा नहीं होना चाहिये 
  • व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध:यह अधिनियम व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाता हैजिसके लिये 10 वर्ष तक का कारावास और 10 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। 
  • केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति:विधि केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देती हैजिसमें पैसों का लेन-देन नहीं होता है और सरोगेट माता का इच्छुक दंपत्ति से आनुवंशिक संबंध होना आवश्यक है।