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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

विवाह करने से इंकार करना मात्र आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरण के समान नहीं है

 17-Jul-2026

शार्दुल नेगी बनाम उत्तराखंड राज्य 

"पारस्परिक संवाद के दौरान प्रयुक्त अतिशयोक्तिपूर्ण कथनों कोमात्र उसी आधार पर और किसी अन्य पुष्टिकारक परिस्थिति के अभाव मेंआत्महत्या के लिये दुष्प्रेरण के रूप में महिमामंडित अथवा अभिलक्षित नहीं किया जा सकता।" 

न्यायमूर्ति आलोक महरा 

स्रोत: उत्तराखंड उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति आलोक महरा की पीठ नेशार्दुल नेगी बनाम उत्तराखंड राज्य (2026) के मामले मेंभारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 108) केअधीन आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया, यह मानते हुए कि विवाह से इंकार करना मात्र अपने आप में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 107 के अर्थ में आत्महत्या के लिये उकसाना नहीं माना जा सकता है। 

शार्दुल नेगी बनाम उत्तराखंड राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला सेशन विचारण संख्या 23/2020 से संबंधित हैजिसमें याचिकाकर्त्ताशार्दुल नेगी पर मृतकजो एक स्टाफ नर्स थीके साथ संबंध रखने का आरोप लगाया गया था। 
  • अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि जब याचिकाकर्त्ता ने संबंध समाप्त करने का निर्णय किया और उससे विवाह करने से इंकार कर दियातो मृतक अवसाद में चली गई और उसने मिडाज़ोलम नामक दवा की अधिक मात्रा का सेवन करके आत्महत्या कर ली। 
  • मृतक के पिता द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई गईजिसके बाद याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन आरोप पत्र दायर किया गया। 
  • टिहरी गढ़वाल के अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश ने याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध आरोप विरचित कियेजिसके बाद याचिकाकर्त्ता ने आरोप विरचित करने के आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अभियोजन पक्ष के मामले में अनुपस्थित तत्व्वों के संबंध में:याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के कथन को अक्षरशः स्वीकार करने पर भीधारा 306 भारतीय दण्ड संहिता के आवश्यक तत्त्व अनुपस्थित थेऔर विवाह से इंकार को धारा 107 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन परिभाषित उकसावे के समान नहीं माना जा सकता। 
  • राज्य के विरोध पर:राज्य और परिवादकर्त्ता ने तर्क दिया कि आरोप विरचित करने के प्रक्रम मेंन्यायलयों को साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन करने की आवश्यकता नहीं होती हैकि प्रथम दृष्टया मामला बनता हैऔर विचारण की उन्नत अवस्था को देखते हुए आरोप को अपास्त करना अनुचित था। 
  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन दुष्प्रेरण की सीमा पर:अमलेंदु पाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और प्रकाश बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामलों में उच्चतम न्यायालय के निर्णयों पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने माना कि किसी व्यक्ति को धारा 306 के अधीन उत्तरदायी ठहराए जाने से पहलेअभियोजन पक्ष को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उकसावे या भड़कावे के कृत्यों को साबित करना होगाजिससे मृतक के पास अपना जीवन समाप्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। 
  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के दुरुपयोग पर:न्यायालय ने पुलिस द्वारा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के नियमित और यांत्रिक प्रयोग पर असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि यद्यपि इस उपबंध के अंतर्गत आने वाले वास्तविक मामलों से कठोरता से निपटा जाना चाहियेलेकिन इस उपबंध का उपयोग केवल शोक संतप्त परिवार की तात्कालिक भावनाओं को शांत करने के लिये नहीं किया जाना चाहिये 
  • आचरण के आकलन के मानक पर:न्यायालय ने माना कि अभियुक्त और मृतक के आचरण का मूल्यांकन अलग-थलग रूप से करने के बजाय व्यावहारिकवास्तविक जीवन के परिप्रेक्ष्य से किया जाना चाहियेऔर यह कि अतिरंजित या अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा वाले सामान्य आदान-प्रदान कोबिना किसी और कारण केआत्महत्या के लिये उकसाने के स्तर तक नहीं उठाया जा सकता है।
  • विचारण न्यायालयों के कर्त्तव्य पर:न्यायालय ने विचारण न्यायालयों को चेतावनी दी कि वे अन्वेषण अभिकरणों द्वारा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के आवश्यक तत्त्वों की अनदेखी किये जाने पर भी यांत्रिक रूप से आरोप विरचित करने के "सुरक्षित दृष्टिकोण" को न अपनाएंऔर कहा कि विचरण न्यायालयों को आरोप विरचित करने के प्रक्रम में उचित सावधानी और विवेक का प्रयोग करना चाहिये 
  • वर्तमान मामले में उकसावे के अभाव पर:न्यायालय को याचिकाकर्त्ता की ओर से किसी भी प्रत्यक्ष कृत्यसक्रिय उकसावे या जानबूझकर सहायता का कोई सबूत नहीं मिलाजिससे मृतक को आत्महत्या करने के लिये प्रेरित किया जा सके। 
  • अनुतोष मिलने पर:पुनरीक्षण याचिका मंजूर कर ली गईविचरण न्यायालय द्वारा आरोप विरचित करने का आदेश अपास्त कर दिया गया और याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध कार्यवाही समाप्त कर दी गई। 

भारतीय न्याय संहिता के अधीन आत्महत्या के दुष्प्रेरण के संबंध में विधिक स्थिति क्या है? 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 - आत्महत्या का दुष्प्रेरण: 

  • अध्याय:अध्याय 6 (मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराध) 
  • उपबंध:यदि कोई व्यक्तिआत्महत्या करता हैतो जो कोई ऐसी आत्महत्या का दष्प्रेरण करता हैवह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से और जुर्माने का भी दायी होगा 
  • सजा: 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना। 
  • संज्ञेयता:संज्ञेय अपराध। 
  • जमानतीय:अजमानतीय अपराध। 
  • न्यायालयद्वारा विचारणीय। 

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 306 से तुलना: 

  • शाब्दिक निरंतरता:धारा 108 भारतीय न्याय संहिता धारा 306 भारतीय दण्ड संहिता को सार रूप में यथावत् पुन: प्रस्तुत करती है - इसमें निहित तत्त्व (दुष्प्रेरणआत्महत्यादण्ड) और विहित दण्ड (10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना) भी यथावत् रखा गया हैं। 
  • वर्गीकरण:दोनों उपबंध संज्ञेयअजमानतीय और केवल सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय हैंप्रक्रियात्मक वर्गीकरण में कोई परिवर्तन नहीं है। 
  • क्रमांकन में बदलाव:एकमात्र महत्त्वपूर्ण परिवर्तन पुन: क्रमांकन है – भारतीय दण्ड संहिता के अधीन धारा 306 से भारतीय न्याय संहिता के अधीन धारा 108 में - जो नए आपराधिक संहिताओं में व्यापक पुन: क्रमांकन अभ्यास के अनुरूप है। 
  • अध्याय में स्थान:भारतीय दण्ड संहिता के अधीनयह उपबंध अध्याय 16(मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराध) के अंतर्गत आता था। भारतीय न्याय संहिता के अधीनइसे संबंधित अध्याय में बरकरार रखा गया हैजो मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराधों को समेकित करता हैऔर हत्या और उपहति से संबंधित अपराधों के साथ इसके मूल स्थान को संरक्षित करता है।
  • न्यायिक निर्वचन में कोई परिवर्तन नहीं:चूँकि धारा 108 भारतीय न्याय संहिता की भाषा धारा 306 भारतीय दण्ड संहिता के समान हैइसलिये आत्महत्या के दुष्प्रेरण पर उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के मौजूदा पूर्व निर्णय - जिसमें धारा 107 भारतीय दण्ड संहिता (अब धारा 45 भारतीय न्याय संहिता) के अधीन उकसानेषड्यंत्र करने या जानबूझकर सहायता करने के सकारात्मक कृत्य की आवश्यकता सम्मिलित है - बिना किसी संशोधन के लागू होते रहेंगे। 

सिविल कानून

धनवापसी का खंड विनिर्दिष्ट पालन को वर्जित नहीं करता है

 17-Jul-2026

जसपाल सिंह बनाम अश्वनी कुमार 

"वापसी की शर्त पालन करने के दायित्त्व को सुदृढ़ करने वाले एक निवारक के रूप में कार्य करती हैन कि इसके विकल्प के रूप में।" 

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ नेजसपाल सिंह बनाम अश्वनी कुमार (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि संविदा में व्यतिक्रम की स्थिति में बयाना राशि की वापसी का प्रावधान करने वाला खंडअपने आप मेंकिसी न्यायालय को विक्रय के करार के विनिर्दिष्ट पालन को प्रदान करने से नहीं रोकता है। 

जसपाल सिंह बनाम अश्वनी कुमार (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • 22 जून, 2003 को एक विक्रय करार निष्पादित किया गया था जिसके अधीन वादी ने प्रतिवादी के 12 मरला भूमि में आधे अंश को ₹12.50 लाख में खरीदने पर सहमति व्यक्त की थी। 
  • अपीलकर्त्ता (वादी) ने बयाना राशि के रूप में लाख रुपए का संदाय कियाऔर बाद में पक्षकारों ने विक्रय विलेख के निष्पादन की समय सीमा को दो बार बढ़ायाजिसमें प्रतिवादी को अतिरिक्त 60,000 रुपए प्राप्त हुए। 
  • यह आरोप लगाते हुए कि प्रतिवादी संव्यवहार को पूरा करने के लिये अपनी तत्परता और इच्छा के होते हुए भी विक्रय विलेख को निष्पादित करने में असफल रहाअपीलकर्त्ता ने 2006 में विनिर्दिष्ट पालन के लिये एक वाद दायर किया। 
  • प्रत्यर्थी ने करार से इंकार करते हुए दावा किया कि दस्तावेज़ों पर विदेश यात्रा से संबंधित एक पृथक् वित्तीय व्यवस्था के लिये सुरक्षा के तौर पर हस्ताक्षर किये गए थे। 
  • विचारण न्यायालय ने केवल बयाना राशि की वापसी का आदेश दिया। प्रथम अपील न्यायालय ने निष्पादन का आदेश दिया। उच्च न्यायालय ने द्वितीय अपील में विचारण न्यायालय के निर्णय को बहाल कर दियाजिसके बाद वादी ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • वापसी संबंधी प्रावधान के पालन के दायित्त्व पर प्रभाव के संबंध में:न्यायालय ने यह माना कि विक्रय विलेख निष्पादित न हो पाने की स्थिति में अग्रिम राशि की वापसी का प्रावधान मात्र विक्रेता को सौदे को निष्पादित करने के बजाय उस राशि का संदाय करके अपनी इच्छानुसार सौदा पूरा करने का विकल्प या शर्त नहीं देता है। ऐसा प्रावधान निष्पादन न होने के परिणामस्वरूप होने वाले सीधे-सादे परिणाम को ही अभिलिखित करता हैपालन के दायित्त्व को सुदृढ़ करने वाले निवारक के रूप में कार्य करता हैन कि उसके विकल्प के रूप मेंऔर क्रेता के पालन पर बल देने के अधिकार को कम किये बिना उसके न्यूनतम हक की रक्षा करता है। 
  • विचारण न्यायालय के निर्णय को बहाल करने में उच्च न्यायालय की त्रुटी पर:कोर्ट ने माना कि उच्च न्यायालय ने प्रथम अपील न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप करके त्रुटी की हैक्योंकि उसने वापसी का प्रावधान करने वाला खंड की गलत व्याख्या करते हुए विक्रेता को विनिर्दिष्ट पालन के दायित्त्व से मुक्त कर दिया था। 
  • विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 23 के उद्देश्य पर:न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय के निर्वचन को स्वीकार करने से उस विक्रेता को लाभ होगा जिसने विक्रय राशि का एक बड़ा भाग पहले ही प्राप्त कर लिया है और विक्रय विलेख के निष्पादन के लिये दो बार समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया हैऔर ऐसी व्याख्या धारा 23 के उद्देश्य की पूर्ति करने के बजाय उसे विफल कर देगी। न्यायालय ने आगे कहा कि किसी संविदा में क्षतिपूर्ति या जुर्माने के रूप में किसी राशि का उल्लेख मात्र ही दोषी पक्ष को उस राशि का संदाय करके विनिर्दिष्ट पालन से बचने का अधिकार नहीं देता हैऔर इसके विपरीत व्याख्या धारा 23 को अर्थहीन बना देगी। 
  • धारा 100 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन द्वितीय अपील अधिकारिता के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने धारा 100 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन अपनी अधिकारिता के सीमित दायरे का उल्लंघन किया हैऔर दोहराया कि द्वितीय अपील की सुनवाई करने वाला उच्च न्यायालय साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता है या तथ्यों के समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है जब तक कि ऐसे निष्कर्ष विकृत या साक्ष्य द्वारा समर्थित न हों। 
  • प्रत्यर्थी के मनगढ़ंत दावों की प्रतिरक्षा पर:न्यायालय ने पाया कि प्रत्यर्थी यह साबित करने में विफल रहा कि करार हस्ताक्षरित खाली कागजों से मनगढ़ंत थायह देखते हुए कि उसने तीनों करारों पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार किये और कपट के आरोप का समर्थन करने के लिये कोई विशेषज्ञ साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। 
  • संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्ति में अविभाजित अंश के विक्रय और सहमति से समय विस्तार के संबंध में:न्यायालय ने माना कि संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्ति में अविभाजित अंश का विक्रय विधिक रूप से अनुमेय है और यह स्वयं किसी संव्यवहार की प्रामाणिकता के बारे में संदेह उत्पन्न नहीं कर सकती हैऔर विक्रय विलेख के निष्पादन के लिये समय के सहमतिपूर्ण विस्तार से यह संकेत नहीं मिलता है कि करार एक दिखावा था। 
  • अनुतोष मिलने पर:अपील मंजूर कर ली गई और प्रथम अपील न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट पालन का आदेश बहाल कर दिया गया। 

धन वापसी संबंधी प्रावधानों और विनिर्दिष्ट पालन पर विधिक स्थिति क्या है? 

विक्रय करारों में धनवापसी संबंधी खंड: 

  • विक्रय विलेख के निष्पादन न होने पर बयाना राशि की वापसी का प्रावधान करने वाला खंडअपने आप मेंविक्रेता की संविदा को पूरा करने के दायित्त्व से उसे मुक्त नहीं करता है। 
  • इस प्रकार के खंड में चुनाव की स्पष्ट भाषा या विक्रेता को संदाय द्वारा पालन से बाहर निकलने की अनुमति देने वाला प्रावधान होना चाहियेतभी इसे विनिर्दिष्ट पालन के विकल्प के रूप में पढ़ा जा सकता है। 
  • इस प्रक्रार की भाषा के अभाव मेंयह खंड केवल एक निवारक के रूप में और क्रेता के न्यूनतम हक की रक्षा करने वाले आधार के रूप में कार्य करता है। 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 23: 

  • यह उपबंध संविदा के भंग के लिये क्षतिपूर्ति या शास्ति के रूप में किसी राशि का उल्लेख करने वाले खंडों की व्याख्या को नियंत्रित करता है। 
  • ऐसे खंड के होते हुए भी संविदा विशेष रूप से लागू करने योग्य बनी रहती हैजब तक कि खंड स्पष्ट रूप से संदाय द्वारा पालन को प्रतिस्थापित करने की अनुमति देने का आशय न दर्शाता हो। 
  • ऐसे खंडों को पालन से स्वतः बचने के मार्ग के रूप में पढ़ने से धारा 23 निरर्थक हो जाएगी। 

 सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 100 (द्वितीय अपील): 

  • द्वितीय अपील केवल विधि के किसी सारवान् प्रश्न पर ही की जा सकती है। 
  • उच्च न्यायालय साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता या अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा दिये गए समवर्ती तथ्यात्मक निष्कर्षों को चुनौती नहीं दे सकता। 
  • हस्तक्षेप केवल तभी अनुमेय है जब ऐसे निष्कर्ष विकृत या साक्ष्य द्वारा पूरी तरह से असमर्थित साबित हों।