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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

व्यंग्य, राजद्रोह नहीं है

 19-May-2026

चोकलिंगम बनाम राज्य 

"एक लोकतंत्र आलोचना को अव्यवस्थाव्यंग्य को राजद्रोहअसहमति को खतरा या राय को अपराध के रूप में नहीं मान सकता।" 

न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी और न्यायमूर्ति एन. सेंथिलकुमार 

स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मद्रास उच्च न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी और न्यायमूर्ति एन. सेंथिलकुमार शामिल थेनेचोकलिंगम बनाम राज्य (2026) के मामलेमेंतमिलनाडु पुलिस की साइबर अपराध शाखा द्वारा मई को जारी किये गए उस नोटिस पर रोक लगा दीजिसमें X (पूर्व में ट्विटर) को विश्व हिंदू परिषद (VHP) की उत्तरी तमिलनाडु इकाई द्वारा अपलोड की गई कई पोस्टों को ब्लॉक करने का निदेश दिया गया था। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि राजनीतिक आलोचनाव्यंग्यअसहमति और सशक्त सार्वजनिक बहस संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन संरक्षित हैंऔर व्यक्तिगत कारणों के बिना और प्रभावित उपयोगकर्ताओं को सुनवाई का अवसर दिये बिना जारी किया गया एक व्यापक अवरोधक निदेश सांविधानिक रूप से दोषपूर्ण था। 
  • न्यायालय ने साइबर अपराध शाखा को X Corp से संपर्क करने और विवादित नोटिस में उल्लिखित सभी URL को अनब्लॉक और बहाल करने का निदेश दियासाथ ही यह स्पष्ट किया कि राज्य को अनुच्छेद 19(2) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अधीन विहित प्रक्रिया के अनुपालन के अधीनविशिष्ट सामग्री के विरुद्ध स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने की स्वतंत्रता है। 

चोकलिंगम बनाम राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • विश्व हिंदू परिषद की उत्तर तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष पी. चोकलिंगम ने तमिलनाडु पुलिस की साइबर क्राइम विंग द्वारा मई, 2026 को जारी किये गए नोटिस को चुनौती देते हुए मद्रास उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की। 
  • नोटिस में X (पूर्व में ट्विटर) को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(ख) के अधीनसूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया नैतिकता संहिता) नियम, 2021 के नियम 3(1)(घ) के साथ पढ़ते हुएकई URL को हटाने या ब्लॉक करने का निर्देश दिया गया था। 
  • इस नोटिस में विभिन्न उपयोगकर्ताओं से संबंधित कई URL को एक ही सामान्य अवरोधन निदेश के अधीन एक साथ रखा गया थाजिसमें तीन घंटे के भीतर अनुपालन की आवश्यकता थी। 
  • चोकलिंगम ने तर्क दिया कि अधिकारियों ने प्रत्येक पद की सामग्रीसंदर्भ या सांविधानिक स्थिति की पृथक् से परीक्षा नहीं की थी।    
  • इसके अतिरिक्त यह तर्क दिया गया कि प्रभावित उपयोगकर्ताओं को न तो उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों के बारे में सूचित किया गया और न ही उन्हें ब्लॉक करने का निदेश जारी करने से पहले जवाब देने का कोई सार्थक अवसर दिया गया। 
  • राज्य ने तर्क दिया कि यह नोटिस विधि व्यवस्था और जन शांति के हित में जारी किया गया था। यद्यपितीन घंटे के भीतर निष्कासन की आवश्यकता के कारणों या आधार को स्पष्ट करने वाला कोई प्रतिवाद दाखिल नहीं किया गया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • ब्लॉकिंग (अवरोधननिदेश की प्रकृति पर:न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि विवादित सूचना प्रत्येक पोस्ट के संबंध में कारणों से रहित थी तथा उसमें स्वतंत्र एवं व्यक्तिगत मस्तिष्क-प्रयोग का प्रकटीकरण नहीं था। बिना कारणों केउसकी आनुपातिकता स्पष्ट किये बिना तथा विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किये बिना जारी किया गया व्यापक अवरोधन निदेश मात्र एक प्रशासनिक कार्यवाही नहीं माना जा सकताअपितु वह एक सांविधानिक चिंता का विषय बन जाता है 
  • अनुच्छेद 19(1)(क) और संरक्षित अभिव्यक्ति पर:न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 19(1)(क) न केवल शिष्ट या सुखद अभिव्यक्ति कोअपितु आलोचनाअसहमतिव्यंग्यराजनीतिक मतभेद और सशक्त सार्वजनिक बहस को भी संरक्षण प्रदान करता है। किसी राजनीतिक राय को केवल इसलिये नहीं हटाया जा सकता क्योंकि वह तीखीअसुविधाजनकव्यंग्यात्मकअसहमतिपूर्ण या अप्रिय है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सांविधानिक मूल्य की सबसे कठोर परीक्षा तब होती है जब विचाराधीन अभिव्यक्ति सत्ता के लिये असुविधाजनक हो। 
  • आलोचना के अधिकार पर:न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि सांविधानिक लोकतंत्र मेंसरकारउसके पदाधिकारियोंराजनीतिक अभिनेताओं और लोक नीतियों की आलोचना करने का अधिकार राज्य द्वारा दी गई कोई रियायत नहीं है - यह एक सांविधानिक प्रत्याभूति है। 
  • श्रेया सिंघल मामले पर आधारित समीक्षा:श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने चर्चासमर्थन और उकसावे के बीच अंतर स्पष्ट किया। न्यायालय ने माना कि चर्चा और समर्थनचाहे वे अलोकप्रिय या अप्रिय मुद्दों पर ही क्यों न होंसंरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आते हैंऔर राज्य का हस्तक्षेप तभी अनुमेय है जब अभिव्यक्ति उकसावे के स्तर तक पहुँच जाए। 
  • चिलिंग इफ़ेक्ट पर:न्यायालय ने चेतावनी दी कि ऑनलाइन अभिव्यक्ति पर अस्पष्ट और अनिश्चित प्रतिबंध चुपचाप काम करते हैंजिससे नागरिकों को स्वयं को नियंत्रित करने के लिये मजबूर होना पड़ता है  इसलिये नहीं कि विधि अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाती हैअपितु इसलिये कि बोलने के परिणाम अनिश्चितअचानक और अस्पष्ट होते हैं। 
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(ख) पर:न्यायालय ने माना कि धारा 79(3)(ख) मध्यस्थ सुरक्षित आश्रय से संबंधित है और अवरोधक शक्ति का एक स्वतंत्र स्रोत नहीं हैऔर वर्तमान नोटिस में इसके आह्वान के लिये गहन न्यायिक जांच की आवश्यकता है। 
  • तीन घंटे की समय सीमा पर:न्यायालय ने तीन घंटे की अनुपालन समय सीमा को असंगत बताते हुए उसकी आलोचना कीऔर कहा कि किसी भी प्रकट आपात स्थिति या आसन्न खतरे की अनुपस्थिति में ऐसी तात्कालिकता का कोई स्पष्टीकरण नहीं था। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) क्या है? 

  • अनुच्छेद 19(1)()में कहा गया है कि सभी नागरिकों कोबोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा। 
  • यह अधिकारकेवल भारत के नागरिक को ही प्राप्तहैविदेशी नागरिकों को नहीं। 
  • अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी भी विषय पर अपने विचारों एवं मतों को किसी भी माध्यम से व्यक्त करने का अधिकार सम्मिलित हैचाहे वह मौखिक शब्दोंलेखनमुद्रणचित्रचलचित्रफिल्म आदि के माध्यम से हो। 
  • यद्यपिइस अधिकार का प्रयोग, संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अधीन कुछ प्रयोजनों के लियेयुक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है। 
  • अनुच्छेद 19 (2) में कहा गया है कि खंड (1) के उपखंड (क) में कोई बात किसी भी विद्यमान विधि के संचालन को प्रभावित नहीं करेगीया राज्य को कोई विधि बनाने से नहीं रोकेगीजहाँ तक ऐसी विधि भारत की संप्रभुता और अखंडताराज्य की सुरक्षाविदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधलोक व्यवस्थाशालीनता या नैतिकता के हित में या न्यायालय की अवमाननामानहानि या अपराध के लिये उकसाने के संबंध में उक्त उपखंड द्वारा प्रदत्त अधिकार के प्रयोग पर युक्तियुक्त्त निर्बधन लगाता है। 

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 क्या है? 

धारा 79 — कुछ मामलों में मध्यस्थ को दायित्त्व से छूट: 

  • मुख्य विचार:कोई मध्यस्थ (जैसे कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या इंटरनेट सेवा प्रदाता) सामान्यत: अपने द्वारा होस्ट या प्रसारित की गई तृतीय-पक्ष सामग्री के लिये उत्तरदायी नहीं होता हैबशर्ते कुछ शर्तें पूरी हों। 
  • उप-धारा (1) - सुरक्षित आश्रय नियम:उप-धारा (2) और (3) के अधीनकोई मध्यस्थ किसी तृतीय-पक्ष सूचनाडेटा या संसूचना लिंक के लिये उत्तरदायी नहीं होगा जो उसके द्वारा उपलब्ध कराया गया हो या होस्ट किया गया हो। 
  • उपधारा (2) — सेफ हार्बर (Safe Harbour) कब लागू होता है:यह संरक्षण तभी उपलब्ध होगा जब निम्नलिखित तीनों शर्तें पूरी हों: 
    • मध्यस्थ केवल एक संसूचना प्रणाली तक पहुँच प्रदान करता है जिसके माध्यम से तृतीय-पक्ष की जानकारी प्रसारितअस्थायी रूप से संग्रहीत या होस्ट की जाती है। 
    • मध्यस्थ न तो संसूचना की शुरुआत करता हैन ही प्राप्तकर्ता का चयन करता हैऔर न ही प्रेषित जानकारी का चयन या संशोधन करता है। 
    • मध्यस्थ अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करते समय उचित सावधानी बरतता है और केंद्र सरकार द्वारा विहित दिशानिर्देशों का पालन करता है। 
  • उपधारा (3) — जब सेफ हार्बर लागू नहीं होता:सुरक्षा समाप्त हो जाती है यदि: 
    • मध्यस्थ ने किसी विधिविरुद्ध कृत्य को अंजाम देने में षड्यंत्र किया हैउकसाया हैसहायता की है या प्रेरित किया है (चाहे धमकीवचन या किसी अन्य रीति से)या 
    • जब मध्यस्थ को वास्तविक जानकारी प्राप्त होती हैया जब उसे उपयुक्त सरकार या उसकी एजेंसी द्वारा सूचित किया जाता है कि उसके द्वारा नियंत्रित किसी कंप्यूटर संसाधन में विद्यमान या उससे संबंधित किसी भी जानकारी का उपयोग विधिविरुद्ध कार्य करने के लिये किया जा रहा हैतो वह साक्ष्य को नष्ट किये बिना ऐसी सामग्री को शीघ्रता से हटाने या उस तक पहुँच को अक्षम करने में विफल रहता है। 
  • स्पष्टीकरण — "तृतीय-पक्ष सूचना":इसका अर्थ है किसी मध्यस्थ द्वारा मध्यस्थ के रूप में दी गई कोई भी जानकारी (अर्थात्उपयोगकर्ताओं/पर-पक्षकारों से प्राप्त सामग्रीन कि स्वयं मध्यस्थ से)। 
  • निर्णय विधि - श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2015):उच्चतम न्यायालय ने धारा 79(3)(ख) को कम करके यह माना कि मध्यस्थ केवल न्यायालय के आदेश या हटाने का निदेश देने वाली विशिष्ट सरकारी अधिसूचना प्राप्त होने पर ही कार्य करने के लिये बाध्य है - न कि केवल कथित आपत्तिजनक सामग्री के सामान्य ज्ञान के आधार पर। 

सिविल कानून

यदि प्रारंभिक डिक्री में नीलामी का विकल्प शामिल है तो अंतिम डिक्री के लिये आवेदन की आवश्यकता नहीं है

 19-May-2026

जेनिफर मेसियस बनाम लियोनार्ड जी. लोबो 

"अंतिम निर्णय पारित होने के बाद नया आवेदन दाखिल करने का निदेश पूरी तरह से अनुचित है। इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुएन्याय के हित मेंनिर्णय की व्याख्या ऊपर बताए अनुसार ही की जानी चाहिये।" 

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी शामिल थेनेजेनिफर मेसियस बनाम लियोनार्ड जी. लोबो (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि विभाजन के वाद में प्रारंभिक डिक्री केवल इसलिये अप्रवर्तनीय नहीं हो जाती क्योंकि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 20  नियम 18 के अधीन अंतिम डिक्री पारित करने के लिये कोई पृथक् आवेदन दायर नहीं किया गया थाजहाँ डिक्री में ही यह प्रावधान किया गया था कि यदि सीमांकन द्वारा विभाजन संभव नहीं है तो संपत्ति की नीलामी की जानी चाहिये 

  • न्यायालय ने माना कि ऐसी परिस्थितियों मेंएडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर प्रारंभिक डिक्री अंतिम डिक्री का स्वरूप प्राप्त कर लेती हैजिसमें यह स्थापित किया गया है कि भौतिक विभाजन अव्यावहारिक थाऔर इसलिये निष्पादन न्यायालय द्वारा संपत्ति की सार्वजनिक नीलामी का निदेश वैध और निष्पादन योग्य था। 

जेनिफर मेसियस बनाम लियोनार्ड जी. लोबो (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद एक आवासीय फ्लैट से संबंधित विभाजन वाद से उत्पन्न हुआजिसमें अपीलकर्त्ता के पक्ष में प्रारंभिक डिक्री पारित की गई थी। 
  • प्रारंभिक डिक्री में एडवोकेट कमिश्नर को यह परीक्षा करने का निदेश दिया गया था कि क्या वाद संपत्ति को पक्षकारों के बीच सीमांकन द्वारा भौतिक रूप से विभाजित किया जा सकता है। 
  • प्रारंभिक आदेश में यह भी प्रावधान किया गया था कि यदि इस प्रकार का भौतिक विभाजन अव्यवहार्य पाया जाता हैतो उचित प्रतिकर या संपत्ति के विक्रय का सहारा लिया जा सकता है। 
  • आयुक्त की रिपोर्ट के आधार परजिसमें इस बात की पुष्टि की गई थी कि भौतिक विभाजन की अव्यवहार्यता के कारण फ्लैट का सीमांकन करके विभाजन नहीं किया जा सकता हैनिष्पादन न्यायालय ने संपत्ति की सार्वजनिक नीलामी का आदेश दिया। 
  • मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने निष्पादन कार्यवाही में हस्तक्षेप किया और यह माना कि डिक्री केवल एक प्रारंभिक डिक्री थी और जब तक पहले एक पृथक् अंतिम डिक्री तैयार नहीं की जातीतब तक इसे निष्पादित नहीं किया जा सकता था। 
  • उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ता के वाद पर पारित विभाजन डिक्री के निष्पादन में दो पृथक् अवसरों पर हस्तक्षेप किया। 
  • उच्च न्यायालय के आदेशों से असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • प्रारंभिक डिक्री की निष्पादनीयता पर:न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने डिक्री के निष्पादन में हस्तक्षेप करके त्रुटी की है। आयुक्त की रिपोर्ट में यह पुष्टि होने पर कि परिवादित संपत्ति का सीमांकन द्वारा विभाजन अव्यावहारिक हैप्रारंभिक डिक्री अंतिम डिक्री का दर्जा प्राप्त कर लेती हैक्योंकि पक्षकारों को उनके संबंधित अंश प्रदान करने के लिये संपत्ति की खुली नीलामी ही एकमात्र विकल्प बचता था। 
  • प्रारंभिक डिक्री के स्वरूप पर:न्यायालय ने पाया कि चूँकि प्रारंभिक डिक्री में पक्षकारों के बीच अधिकारों और हित का निर्धारण पहले ही हो चुका थाजिसमें अंत: कालीन लाभ भी शामिल थेइसलिये उच्च न्यायालय के लिये अंतिम डिक्री हेतु पृथक् से आवेदन की मांग करना अनुचित था। प्रारंभिक डिक्री में हककब्जे का अधिकारअंत: कालीन लाभ और व्यतिक्रम की स्थिति में हिस्सेदारी के अवधारण के कारणइसे निष्पादन के उद्देश्य से अंतिम डिक्री माना जाना चाहिये 
  • उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण पर:न्यायालय ने माना कि अंतिम निर्णय पारित होने के बाद नया आवेदन दाखिल करने का उच्च न्यायालय का निदेश मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के संदर्भ में पूरी तरह अनुचित था। नया आवेदन दाखिल करने की आवश्यकता इस वास्तविकता की अनदेखी थी कि सीमांकन द्वारा विभाजन न हो पाने के कारण प्रारंभिक निर्णय अंतिम हो चुका था। 
  • न्याय के उद्देश्यों पर:न्यायालय ने पाया कि न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लियेदिनांक 13.04.2012 के डिक्री को हकदारीकब्जे के अधिकारअंत: कालीन लाभ और विषय वस्तु की विक्रय में व्यतिक्रम की स्थिति में अंशो की गणना के तरीके और ढंग के संबंध में पहले विकल्प को निर्धारित करने के रूप में समझा जाना आवश्यक था। 

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 20 नियम 18 क्या है 

सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 20 नियम 18— संपत्ति के विभाजन के लिये या उनमें के अंश पर पृथक् कब्जे के लिये वाद में डिक्री: 

  • जहाँ न्यायालय संपत्ति के विभाजन या उसमें किसी अंश के पृथक् कब्जे के लिये कोई डिक्री पारित करता है — 

उप-नियम (1) — राजस्व-निर्धारित संपदाएँ: 

  • यह उस स्थिति में लागू होता है जब आदेश किसी ऐसी संपत्ति से संबंधित हो जिसका मूल्यांकन सरकार को राजस्व भुगतान के लिये किया गया हो। 
  • ऐसे मामलों मेंडिक्री में संपत्ति में रुचि रखने वाले विभिन्न पक्षकारों के अधिकारों की घोषणा की जाएगी। 
  • आदेश में कलेक्टर या कलेक्टर द्वारा इस संबंध में नियुक्त किये गए किसी राजपत्रित अधीनस्थ अधिकारी को विभाजन या पृथक्करण करने का निदेश दिया जाएगा। 
  • ऐसा विभाजन या पृथक्करण डिक्री में की गई घोषणा और धारा 54 सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा। 

उप-नियम (2) — अन्य स्थावर संपत्ति या जंगम संपत्ति: 

  • यह वहाँ लागू होता है जहाँ डिक्री किसी ऐसी स्थावर संपत्ति से संबंधित हो जिसका सरकारी राजस्व के लिये मूल्यांकन नहीं किया गया होया किसी जंगम संपत्ति से संबंधित हो 
  • जहाँ आगे की जांच के बिना विभाजन या पृथक्करण सुविधाजनक रूप से नहीं किया जा सकता हैवहाँ न्यायालय प्रारंभिक डिक्री पारित कर सकता है। 
  • प्रारंभिक आदेश में संपत्ति में हित रखने वाले विभिन्न पक्षकारों के अधिकारों की घोषणा की जाएगी। 
  • इसमें विभाजन या पृथक्करण को प्रभावी बनाने के लिये आवश्यक अन्य निदेश भी दिये जाएंगे।