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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223
29-May-2026
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विनय प्रताप सिंह बनाम पुष्पेंद्र सिंह "गंभीर आरोपों से जुड़े परिवाद को, मामले को गुण-दोष या प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की समग्र रूप से परीक्षा किये बिना, यांत्रिक रूप से खारिज कर देना न्याय का उल्लंघन है।" न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी |
स्रोत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की एकल पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी शामिल थे, ने विनय प्रताप सिंह बनाम पुष्पेंद्र सिंह (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 223(1) का परंतुक, जो यह अनिवार्य करता है कि मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने से पहले अभियुक्त को सुनवाई का अवसर दिया जाए, परिवादकर्त्ता पर संज्ञान कार्यवाही के प्रारंभिक प्रक्रम में अभियुक्त को संपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध कराने का दायित्त्व नहीं डालता है।
- न्यायालय ने विचारण न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया जिसमें परिवादकर्त्ता द्वारा प्रस्तावित अभियुक्त को दस्तावेज़ और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध कराने में असफल रहने के कारण ही निजी परिवाद को खारिज कर दिया गया था, और परिवाद को बहाल करते हुए विधि के अनुसार आगे बढ़ने का निदेश दिया।
विनय प्रताप सिंह बनाम पुष्पेंद्र सिंह (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- परिवादकर्त्ता विनय प्रकाश सिंह, हाइवा डंपरों के माध्यम से एक निर्माण कंपनी को बजरी की आपूर्ति करने का वैध व्यवसाय करते थे। 30 अक्टूबर, 2023 को, परिचालन उद्देश्यों के लिये लगभग 1800 लीटर डीजल खरीदा गया और पास में कोई ईंधन स्टेशन न होने के कारण इसे अस्थायी रूप से उनके फार्महाउस में संग्रहीत किया गया।
- परिवादकर्त्ता ने आरोप लगाया कि पुष्पेंद्र सिंह और दो अन्य सहित प्रत्यर्थियों ने पूर्व व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के कारण उस पर 1 करोड़ रुपए की अवैध अग्रिम राशि की व्यवस्था करने के लिये दबाव डाला और उसे मिथ्या आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी दी।
- उसी शाम, अभियुक्तों ने कथित तौर पर कुछ पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर विधिविरुद्ध रूप से फार्महाउस में प्रवेश किया, परिवादकर्त्ता पर हमला किया, उसे धमकाया और बिना किसी विधिक जब्ती प्रक्रिया का पालन किये जबरन ईंधन निकाल लिया।
- परिवादकर्त्ता ने यह भी आरोप लगाया कि मौगंज पुलिस स्टेशन में लूट के आरोप में दर्ज की गई पश्चात्वर्ती प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR), उसके विरुद्ध किये गए अवैध कृत्यों को छिपाने के लिये एक मनगढ़ंत जवाबी कार्रवाई थी। उसने अभियोजन पक्ष के कथन को चुनौती देने के लिये CCTV फुटेज सहित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का सहारा लिया।
- परिवादकर्त्ता ने स्वेच्छया से उपहति कारित करने (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 323), अश्लील कार्य और गाने (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 294), आपराधिक अभित्रास (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506), और सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किये गए कार्य (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34) के अपराधों का आरोप लगाते हुए एक निजी परिवाद दर्ज किया।
- कार्यवाही के दौरान, परिवादकर्त्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223(1) के अधीन एक आवेदन प्रस्तुत किया। यद्यपि, 17 जनवरी, 2026 के आदेश द्वारा, मजिस्ट्रेट ने परिवादकर्त्ता को प्रस्तावित अभियुक्त को सभी दस्तावेज़ और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध कराने का निदेश दिया, यह मानते हुए कि ऐसे प्रकटन के बिना सार्थक सुनवाई संभव नहीं है, और आगे निदेश दिया कि अनुपालन न करने पर परिवाद खारिज कर दिया जाएगा।
- 22 जनवरी 2026 को उक्त निदेश का पालन न करने के कारण परिवाद खारिज कर दी गया। इससे व्यथित होकर आवेदक ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के दायरे पर: न्यायालय ने कहा कि धारा 528 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन हस्तक्षेप का दायरा विधि की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना है। इसकी प्रयोज्यता के लिये, न्यायालय को यह जांच करनी होगी कि क्या विवादित आदेश अवैधता, विकृति या महत्त्वपूर्ण अनियमितता से ग्रस्त है।
- धारा 223(1) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के परंतुक के प्रयोजन पर: न्यायालय ने माना कि धारा 223(1) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का परंतुक यह सुनिश्चित करने के लिये है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया जाए, जिसका अर्थ है कि संज्ञान लेने से पहले अभियुक्त को सुनवाई का अवसर दिया जाए। यद्यपि, ऐसा अवसर स्वतः ही संज्ञान कार्यवाही के प्रारंभिक प्रक्रम में अभियुक्त को संपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध कराने के दायित्त्व में परिणत नहीं होता है।
- विचारण न्यायालय की त्रुटी पर: न्यायालय ने माना कि विचारण न्यायालय ने विवादित निदेश के आंशिक अनुपालन की पर्याप्तता की जांच किये बिना या परिवाद के गुण-दोष और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता का समग्र मूल्यांकन किये बिना परिवाद को यांत्रिक रूप से खारिज करने में त्रुटी की। गंभीर आरोपों वाले परिवाद को इस तरह से यांत्रिक रूप से खारिज करना न्याय का उल्लंघन है।
- परिवाद की बहाली पर: न्यायालय ने याचिका मंजूर कर ली, दिनांक 22 जनवरी, 2026 के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया और परिवाद मामले को बहाल करते हुए विचारण न्यायालय को विधि के अनुसार आगे बढ़ने का निदेश दिया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 223 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) को 25 दिसंबर, 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई और यह 1 जुलाई, 2024 को लागू हुआ, जिसके परिणामस्वरूप दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 निरस्त हो गई।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 200 के अनुरूप है।
- धारा 223(1) में परंतुक जोड़ने से मजिस्ट्रेटों द्वारा निजी परिवादों से निपटने के तरीके में पूर्ण रूप से परिवर्तन आ गया है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 का पाठ:
धारा 223(1):
- किसी परिवाद पर अपराध का संज्ञान लेते समय, अधिकारिता रखने वाला मजिस्ट्रेट परिवादकर्त्ता और उपस्थित साक्षियों से शपथ पर परीक्षा करेगा, और ऐसी परीक्षा का सार लिखित रूप में अभिलिखित किया जाएगा और परिवादकर्त्ता, साक्षियों और मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षरित किया जाएगा।
प्रथम परंतुक (मुख्य परिवर्तन):
- अभियुक्त को सुनवाई का अवसर दिये बिना मजिस्ट्रेट द्वारा किसी अपराध का संज्ञान नहीं लिया जाएगा।
धारा 223(2):
- लोक सेवकों के विरुद्ध परिवादों के संबंध में, मजिस्ट्रेट तब तक संज्ञान नहीं लेगा जब तक कि लोक सेवक को घटना के बारे में अपने विचार व्यक्त करने का अवसर न दिया जाए और वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त न हो जाए।
विधायी आशय एवं उद्देश्य:
विधानमंडल ने "audi alteram partem" के सिद्धांत का पालन करते हुए, दो उद्देश्यों के साथ इस सांविधिक सुरक्षा उपाय को लागू किया:
- निजी परवाद में प्रस्तावित अभियुक्त को संज्ञान लेने और समन जारी करने से पहले सुनवाई का अवसर प्रदान करना।
- छल-कपट, तथ्यों को छुपाने और दुर्व्यपदेशन से प्रस्तुत करने से भरी निजी आपराधिक परिवादों को दर्ज करने से हतोत्साहित करना।
वाणिज्यिक विधि
माध्यस्थम् द्वारा पारित धारा 16 के निर्णय को रिट अधिकारिता के अंतर्गत चुनौती नहीं दी जा सकती
29-May-2026
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मेसर्स तारिणी प्रसाद मोहंती बनाम मेसर्स सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड "केवल यह कहने मात्र से कि परिस्थितियाँ 'असाधारण' थीं, रिट याचिका के माध्यम से क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं किया जा सकता था।" न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर शामिल थे, ने मेसर्स तारिणी प्रसाद मोहंती बनाम मेसर्स सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 (A&C Act) की धारा 16 के अधीन पारित माध्यस्थम् अधिकरण के आदेश को चुनौती देने के लिये उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने पुष्टि की कि ऐसी कोई भी चुनौती अधिनियम की धारा 34 के अधीन माध्यस्थम् कार्यवाही की समाप्ति पर ही उठाई जानी चाहिये, जैसा कि धारा 16(6) के अंतर्गत परिकल्पित है।
मेसर्स तारिणी प्रसाद मोहंती बनाम मेसर्स सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 12 फरवरी, 2004 को तारिणी प्रसाद मोहंती (खदान स्वामी) और सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड (SISCO) के बीच लौह अयस्क के विक्रय का करार हुआ। विवाद उत्पन्न होने पर, मामले को एकल मध्यस्थ के पास भेजा गया।
- माध्यस्थम् कार्यवाही के दौरान, खदान स्वामी ने 5 फरवरी, 2024 को माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम की धारा 16 के अधीन एक आवेदन दायर किया, जिसमें यह तर्क दिया गया कि करार और पूरक करार पर अपर्याप्त स्टाम्प लगाया गया था।
- खान स्वामी ने तर्क दिया कि संविदा "हस्तांतरण" की प्रकृति का था, जिसके लिये भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 की अनुसूची I के अनुच्छेद 23 के अधीन स्टाम्प लगाना आवश्यक था, न कि अनुच्छेद 5(ग) के अधीन जैसा कि SISCO द्वारा दावा किया गया था।
- माध्यस्थम् ने 30 मई, 2024 को आपत्ति को खारिज कर दिया और कहा कि करार "विक्रय का करार" था, न कि "हस्तांतरण" और इस पर विधिवत स्टाम्प लगा हुआ था। मध्यस्थ ने माध्यस्थम् जारी रखने का निर्णय लिया।
- इस निर्णय से असंतुष्ट होकर खदान स्वामी ने उड़ीसा उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की। एकल न्यायाधीश ने मध्यस्थ के निर्णय में हस्तक्षेप किया, जिसके बाद SISCO ने खंडपीठ के समक्ष एक अंतर-न्यायालय अपील दायर की।
- खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को अपास्त कर दिया, यह मानते हुए कि रिट अधिकारिता के माध्यम से धारा 16 के अधीन मध्यस्थ के निर्णय को चुनौती देना अनुमेय नहीं था, और उचित उपचार कार्यवाही के समापन पर धारा 34 के अधीन एक आवेदन दाखिल करना था।
- इसके बाद खदान स्वामी ने उच्चतम न्यायालय में अपील की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- धारा 16 के अधीन रिट अधिकारिता की अस्वीकार्यता पर: न्यायालय ने माना कि रिट अधिकारिता का प्रयोग करते हुए एकल न्यायाधीश के लिये माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम की धारा 16 के अधीन पारित आदेश को चुनौती देने के मामले में विवाद के गुण-दोषों में प्रवेश करना उचित नहीं है। रिट अधिकारिता का प्रयोग केवल उन मामलों में ही अनुमेय होगा जिनमें मध्यस्थ के पास अंतर्निहित अधिकारिता का पूर्ण अभाव हो, जो कि इस मामले में नहीं था।
- दस्तावेज़ पर मुहर लगाने संबंधी मामलों पर निर्णय लेने के लिये माध्यस्थम् की सक्षमता पर: इन री इंटरप्ले मामले में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ के निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने पुष्टि की कि दस्तावेज़ पर मुहर लगाने का विवाद्यक माध्यस्थम् अधिकरण की अधिकारिता में आता है। अतः धारा 16 के अंतर्गत माध्यस्थम् का निर्णय अधिकारिता में था, और किसी परिस्थिति को मात्र "असाधारण" करार देना रिट याचिका की अधिकारिता के प्रयोग को उचित नहीं ठहरा सकता।
- उचित उपचार पर: न्यायालय ने माना कि यदि यह मान भी लिया जाए कि धारा 16 के अधीन मध्यस्थ का आदेश विधि में त्रुटिपूर्ण था, तो पीड़ित पक्षकार के लिये उपलब्ध उचित उपचार माध्यस्थम् कार्यवाही के समापन माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम की धारा 34 के अधीन इसे चुनौती देना था, जैसा कि धारा 16(6) के अधीन स्पष्ट रूप से प्रदान किया गया है।
- असाधारण अधिकारिता के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि पक्षकारों के बीच विभिन्न करारों के निर्वचन के लिये विस्तृत प्रक्रिया की आवश्यकता थी, जिसे असाधारण अधिकारिता के प्रयोग में नहीं किया जाना चाहिये था। एकल न्यायाधीश ने रिट अधिकारिता का प्रयोग करते हुए करारों की प्रकृति से संबंधित विवाद के गुण-दोषों में प्रवेश करने में त्रुटि की।
माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 16 क्या है?
माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 16 — माध्यस्थम् अधिकरण की अपनी अधिकारिता के बारे में विनिर्णय करने की सक्षमता
- उपधारा (1): माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी अधिकारिता पर निर्णय लेने का अधिकार है, जिसमें माध्यस्थम् करार के अस्तित्व या वैधता के संबंध में आपत्तियां भी शामिल हैं। इस प्रयोजन के लिये:
- किसी संविदा का भाग बनने वाला माध्यस्थम् खंड, संविदा की अन्य शर्तों से स्वतंत्र एक करार के रूप में माना जाता है।
- अधिकरण द्वारा संविदा को अकृत और शून्य घोषित करने का निर्णय स्वतः ही माध्यस्थम् खंड को अविधिमान्य नहीं कर देता है।
- उपधारा (2): अधिकरण की अधिकारिता को चुनौती देने वाले अभिवाक् प्रतिरक्षा का कथन प्रस्तुत करने के बाद नहीं उठाए जाने चाहिये। केवल माध्यस्थम् की नियुक्ति करने या उसकी नियुक्ति में भाग लेने से कोई पक्षकार ऐसा अभिवाक् उठाने से वंचित नहीं हो जाता।
- उपधारा (3): यह अभिवाक् कि माध्यस्थम् अधिकरण अपने प्राधिकरण की परिधि का अतिक्रमण कर रहा है, यथाशीघ्र जैसे ही मामला, उसके प्राधिकार की परिधि से परे अधिकथित किया जाता है, माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान किया जाएगा
- उपधारा (4): अधिकरण उपधारा (2) या (3) के अधीन देर से दायर याचिका को स्वीकार कर सकता है यदि वह विलंब को न्यायोचित समझता है।
- उपधारा (5): अधिकरण ऐसे किसी अभिवाक् पर निर्णय लेगा और यदि अभिवाक् खारिज कर दिया जाता है, तो माध्यस्थम् कार्यवाही जारी रखेगा और एक माध्यस्थम् पंचाट देगा।
- उपधारा (6): ऐसे माध्यस्थम् पंचाट से पीड़ित पक्षकार धारा 34 के अधीन आवेदन करके इसे अपास्त करने की मांग कर सकता है।