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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन लोक सेवक के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच अनिवार्य है

 17-Jun-2026

भूपेंद्र सिंह एवं अन्य. बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य 

"अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन कर्त्तव्य की उपेक्षा के लिये किसी लोक सेवक पर आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से पहलेप्रशासनिक जांच की सिफारिश एक अनिवार्य शर्त हैऔर इसके अभाव में न्यायालय कथित अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता।" 

न्यायमूर्ति आलोक महरा 

स्रोत: उत्तराखंड उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकल पीठ नेभूपेंद्र सिंह और अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें सेशन न्यायालय के उस निदेश को रद्द कर दियाजिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा के अधीन दो पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया गया था। पीठ ने यह माना कि अधिनियम की धारा 4(2) के परंतुक के अधीन प्रशासनिक जांच एक अनिवार्य शर्त हैजिसके अभाव में न्यायालय कथित कर्त्तव्य उल्लंघन का संज्ञान नहीं ले सकता। 

भूपेंद्र सिंह और अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी संख्या ने परिवाद दर्ज कराया जिसमें आरोप लगाया गया कि गिरीश चंद्र तिवारी ने जनवरी 2023 में उसके साथ जाति आधारित दुर्व्यवहार और शारीरिक मारपीट की थी। 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने की मांग करते हुए उनका प्रथम आवेदन व्यतिक्रम होने के कारण खारिज कर दिया गया था। 
  • द्वितीय आवेदन परनैनीताल के जिला एवं सेशन न्यायाधीश ने न केवल गिरीश चंद्र तिवारी के विरुद्ध अपितु एक सर्कल ऑफिसर और एक स्टेशन हाउस ऑफिसर के विरुद्ध भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा के अधीन FIR दर्ज करने का निदेश दियाइस आधार पर कि पुलिस अधिकारियों ने अपने आधिकारिक कर्त्तव्यों का पालन करने में असफल रहे थे। 
  • दो पुलिस अधिकारियों (आवेदकों) ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के समक्ष सेशन न्यायाधीश के 10 जून, 2024 के आदेश को चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि यह बिना विचार किये और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 4(2) के परंतुक की अवहेलना करते हुए पारित किया गया था। 
  • उन्होंने तर्क दिया कि विधि के अधीन यह निर्धारित करने के लिये एक प्रारंभिक प्रशासनिक जांच की आवश्यकता है कि कथित चूक कर्त्तव्य की जानबूझकर उपेक्षा थी या केवल निर्णय की त्रुटि थीऔर इसके लिये उन्होंने स्टेट ऑफ जी.एन.सी.टी. ऑफ दिल्ली और अन्य बनाम प्रवीण कुमार उर्फ प्रशांत के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय का हवाला दिया। 
  • राज्य ने याचिका का विरोध किया और तर्क दिया कि अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई करना उचित था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • प्रशासनिक जांच की अनिवार्यता के संबंध में:न्यायालय ने माना कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 4(2) का परंतुक लोक सेवक के विरुद्ध कर्त्तव्य की उपेक्षा के लिये कार्यवाही करने से पहले एक प्रशासनिक अनिवार्यता के रूप में कार्य करता है। इस उपबंध के अधीन लोक सेवक के विरुद्ध आरोप केवल प्रशासनिक जांच की सिफारिश पर ही दर्ज किये जा सकते हैंऔर ऐसी सिफारिश के अभाव में न्यायालय अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता। 
  • सुरक्षा उपाय के औचित्य पर:न्यायालय ने तर्क दिया कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन लोक सेवकों के लिये विभागीय परिणामों से संभावित कारावास की ओर बढ़ने से उपबंध के दुरुपयोग के विरुद्ध एक फिल्टर की आवश्यकता होती हैऔर अधीनस्थ न्यायालय का यह कर्त्तव्य था कि आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से पहले प्रशासनिक जांच द्वारा उपेक्षा के आरोप की जांच सुनिश्चित की जाए। 
  • पूर्व निर्णयों के आधार पर:बिजेंद्र सिंह बनाम राज्य और अन्य का हवाला देते हुएन्यायालय ने दोहराया कि लोक सेवक के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से पहले प्रशासनिक जांच रिपोर्ट प्राप्त की जानी चाहियेन कि केवल आरोप विरचित करने से पहले। 
  • सत्र न्यायालय के आदेश पर:न्यायालय ने पाया कि नैनीताल के जिला एवं सेशन न्यायाधीश ने सर्कल अधिकारी और स्टेशन हाउस अधिकारी के विरुद्ध कथित कर्त्तव्यहीनता के संबंध में किसी भी प्रशासनिक जांच रिपोर्ट को मंगवाए या उस पर विचार किये बिना FIR दर्ज करने का निदेश देकर त्रुटी की थी। 
  • तदनुसारदण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुएन्यायालय ने सेशन न्यायालय के दिनांक 10 जून, 2024 के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें दो पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही का निदेश दिया गया था। 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 1989 की धारा क्या है? 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के बारे में: 

  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्यअनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों केसदस्यों के विरुद्ध विभेद को रोकना और उनके विरुद्ध अत्याचारों को रोकना है। 
  • यह अधिनियम भारत की संसद में 11 सितंबर 1989 को पारित हुआ और 30 जनवरी 1990 को अधिसूचित किया गया। 
  • यह अधिनियम इस दुखद वास्तविकता की भी स्वीकृति है कि कई उपाय करने के बावजूदअनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लोग उच्च जातियों के हाथों विभिन्न अत्याचारों के शिकार होते रहते हैं। 
  • यह अधिनियम भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 15, 17 और 21 में उल्लिखित स्पष्ट सांविधानिक सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है, जिसका दोहरा उद्देश्य इन कमजोर समुदायों के सदस्यों की रक्षा करना और साथ ही जाति-आधारित अत्याचारों के पीड़ितों को अनुतोष और पुनर्वास प्रदान करना है। 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (संशोधन) अधिनियम, 2015: 

  • इस अधिनियम को वर्ष 2015 में निम्नलिखित प्रावधानों के साथ और अधिक कठोर बनाने के उद्देश्य से संशोधित किया गया था: 
    • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध अपराधों के रूप में अत्याचार के अधिक मामलों कोमान्यता दी गई। 
    • इसमेंधारा में कई नए अपराधजोड़े गए और पूरी धारा को पुनः क्रमांकित किया गया क्योंकि मान्यता प्राप्त अपराध लगभग दोगुना हो गया था। 
    • इस अधिनियम नेअध्याय 4क की धारा 15 (पीड़ितों और साक्षियों के अधिकार) को जोड़ा और अधिकारियों द्वारा कर्त्तव्य की उपेक्षा और जवाबदेही तंत्र को अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित किया। 
    • इसमेंअनन्य विशेष न्यायालयों और विशेष लोक अभियोजकों कीस्थापना का प्रावधान किया गया था। 
    • सभी स्तरों पर लोक सेवकों के संदर्भ मेंइस अधिनियम नेजानबूझकर की गई उपेक्षा शब्द को परिभाषित किया है। 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (संशोधन) अधिनियम, 2018: 

  • पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने  अत्याचार निवारण अधिनियम में संसद द्वारा 2018 में किये गए संशोधन की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखा। इस संशोधन अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं: 
    • इसनेमूल अधिनियम मेंधारा 18क को जोड़ा। 
    • इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विरुद्धविशिष्ट अपराधों कोअत्याचार के रूप में परिभाषित किया गया है और इन कृत्यों का मुकाबला करने के लिये रणनीतियों का वर्णन किया गया है तथा दण्ड निर्धारित किया गया हैं। 
    • इसमें यह परिभाषित किया गया है कि किनकृत्यों को “अत्याचार ” माना जाता है और अधिनियम में सूचीबद्ध सभी अपराध संज्ञेय हैं। पुलिस बिना वारण्ट के अपराधी को गिरफ्तार कर सकती है और न्यायालय से कोई आदेश लिये बिना मामले का अन्वेषण शुरू कर सकती है। 
    • इस अधिनियम में सभी राज्यों सेप्रत्येक जिले में मौजूदा सेशन न्यायालय को एक विशेष न्यायालय में परिवर्तित करनेका आह्वान किया गया है जिससे उसके अंतर्गत पंजीकृत मामलों की सुनवाई की जा सके और विशेष न्यायालयों में मामलों के विचारण के लिये लोक अभियोजकों/विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। 
    • इसमें राज्यों कोजातिगत हिंसा के उच्च स्तर वाले क्षेत्रोंको "अत्याचार-प्रवण" घोषित करने और विधि एवं व्यवस्था की निगरानी और रखरखाव के लिये योग्य अधिकारियों को नियुक्त करने के प्रावधान किये गए हैं। 
    • इसमेंगैर-अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लोक सेवकों द्वाराजानबूझकर कर्त्तव्यों की उपेक्षा करने पर दण्ड का प्रावधान है। 
    • इसका कार्यान्वयनराज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनोंद्वारा किया जाता है जिन्हें उचित केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है। 

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 4: 

धारा 4— कर्त्तव्यों की उपेक्षा के लिये दण्ड 

उपधारा (1) – जानबूझकर उपेक्षा के लिये दण्ड: 
कोई लोक सेवक जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है और जानबूझकर अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन किये जाने वाले कर्त्तव्यों की उपेक्षा करता हैउसे कम से कम छह महीने के कारावास का दण्ड दिया जाएगाजिसे एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। 

उपधारा (2) – लोक सेवक के कर्त्तव्य: 

  • सूचना देने वाले के हस्ताक्षर लेने से पहलेपुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा मौखिक रूप से दी गई और लिखित रूप में दर्ज की गई जानकारी को सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाएं। 
  • अधिनियम और अन्य संबंधित प्रावधानों के अधीन उचित धाराओं के अंतर्गत परिवाद या FIR दर्ज करें। 
  • दर्ज की गई जानकारी की एक प्रति सूचना देने वाले को तुरंत उपलब्ध कराएं। 
  • पीड़ितों या साक्षियों के कथन अभिलिखित करें। 
  • अन्वेषण संपन्न करें और विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय में साठ दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल करेंऔर विलंब होने पर लिखित रूप में स्पष्टीकरण दें। 
  • किसी भी दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को सही ढंग से तैयार करनाप्रारूपित करना और अनुवाद करें 
  • अधिनियम या उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों में निर्दिष्ट किसी अन्य कर्त्तव्य का पालन करें। 

परंतु:इस संबंध में लोक सेवक के विरुद्ध आरोप केवल प्रशासनिक जांच की सिफारिश पर ही अभिलिखित किये जाएंगे। 

उपधारा (3) – संज्ञान एवं दण्डात्मक कार्यवाही: 
उपधारा (2) में निर्दिष्ट कर्त्तव्य की किसी भी अवहेलना का संज्ञान किसी लोक सेवक द्वारा विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय द्वारा लिया जाएगाजो ऐसे लोक सेवक के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही के लिये निदेश देगा। 


सांविधानिक विधि

उच्चतम न्यायालय ने दृष्टिबाधित व्यक्ति और उसकी वृद्ध माता के कल्याण के लिये ओडिशा सरकार को निदेश जारी किये

 17-Jun-2026

विषय: अत्यधिक गरीबी में जी रहे दिव्यांग नागरिकों के लिये बुनियादी मानवीय गरिमा और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना और अन्य संबंधित मुद्दे 

"हम जन्म से दृष्टिबाधित जपा भुए तथा उनकी माता श्रीमती राधिका भुए के भरण-पोषण एवं गरिमापूर्ण जीवन को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं। अतः ओडिशा राज्य तथा उसके संबंधित प्राधिकारियों को निर्देशित किया जाता है कि आगामी आदेशों तक उन्हें सभी आवश्यक मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें।" 

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने ओडिशा के सुबर्णपुर जिले के बगड़िया गाँव में रहने वाले दृष्टिहीन जापा भुए और उनकी 80 वर्षीय माता राधिका भुए की दयनीय स्थिति को उजागर करने वाली मीडिया रिपोर्टों का स्वतः संज्ञान लिया। बताया गया कि ये दोनों बेहद गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं। न्यायालय ने मामले को स्वतः संज्ञान में लेते हुए दर्ज किया और ओडिशा सरकार को नोटिस जारी कर निदेश दिया कि वह परिवार को सभी सामाजिक सुरक्षा लाभ और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराए। 

किस कारण से स्वतः संज्ञान लिया गया? 

  • मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि जन्म से दृष्टिहीन जापा भुए और उनकी वृद्ध माता राधिका भुए जर्जर मकान में रह रहे थे और कल्याणकारी लाभों के पात्र होने के बावजूद संघर्ष कर रहे थे। 
  • रिपोर्टों से पता चला कि दोनों को कुछ पेंशन और अनाज सहायता मिल रही थीलेकिन उन्हें सरकारी योजनाओं के अधीन उपलब्ध सामाजिक सुरक्षा उपायों का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा था। 
  • इन रिपोर्टों के बादस्थानीय अधिकारियों ने परिवार के आवास और अन्य कल्याणकारी लाभों के हक के संबंध में जांच शुरू कीऔर उच्चतम न्यायालय ने "अत्यधिक गरीबी में रहने वाले दिव्यांग नागरिकों के लिये बुनियादी मानवीय गरिमा और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना और अन्य सहायक मुद्दे" शीर्षक से एक स्वतः संज्ञान मामला दर्ज किया। 
  • सुनवाई के दौरानओडिशा राज्य के अधिवक्ता ने न्यायालय को सूचित किया कि राधिका भुए को एक आवासीय इकाई आवंटित की गई हैऔर जपा भुए के भाइयों को भी आवासीय इकाइयाँ आवंटित की गई हैं। अधिवक्ता ने आगे बताया कि राधिका भुए को 3,500 रुपए मासिक पेंशन मिल रही हैजपा भुए को 3,500 रुपए दिव्यांगजन पेंशन मिल रही हैऔर परिवार को सरकारी योजना के अधीन मुफ्त चावल मिल रहा है। न्यायालय ने इन दलीलों को अभिलिखित कर लियालेकिन अधिकारियों को दावों की पुष्टि करने का निदेश दिया।  

न्यायालय के निदेश क्या थे? 

  • राधिका भुए के हकों के संबंध में शपथपत्र पर:न्यायालय ने ओडिशा राज्य को अतिरिक्त मुख्य सचिव से कम रैंक के अधिकारी के माध्यम से एक शपथपत्र दाखिल करने का निदेश दियाजिसमें यह बताया जाए कि क्या राधिका भुए को वृद्धावस्था पेंशन दी गई हैभुगतान की जा रही राशि क्या हैक्या सभी बकाया राशि जारी कर दी गई हैऔर केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के अधीन वह किन अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभों और कल्याणकारी योजनाओं की हकदार हैं। 
  • जापा भुए के हकों के संबंध में शपथपत्र पर:न्यायालय ने जापा भुए की दिव्यांगजन पेंशन की पात्रताक्या ऐसी पेंशन प्रदान की गई हैऔर उन्हें उपलब्ध अन्य कल्याणकारी लाभों का प्रकटन करने और क्या वे वास्तव में प्रदान किये गए हैंके बारे में विवरण मांगा।  
  • ओडिशा राज्य विधि सेवा प्राधिकरण द्वारा व्यक्तिगत रूप से बातचीत करने के संबंध में:न्यायालय ने ओडिशा राज्य विधि सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव अरविंद पटनायक को परिवार से व्यक्तिगत रूप से बातचीत करने का निदेश दिया। 
  • चिकित्सा सहायता के संबंध में:न्यायालय ने निदेश दिया कि यदि राधिका भुए या जपा भुए को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होतो जिला विधि सेवा प्राधिकरण को मुख्य चिकित्सा अधिकारी के साथ समन्वय करके आवश्यक व्यवस्था करनी चाहिये 
  • पैरा-लीगल स्वयंसेवक के रूप में नियुक्ति:न्यायालय ने निदेश दिया कि जापा भुए को पैरा-लीगल स्वयंसेवक के रूप में नियुक्त किया जाए जिससे वे विशेष रूप से सक्षम व्यक्तियों को उनके अधिकारों और विभिन्न केंद्रीय और राज्य कल्याणकारी योजनाओं के अधीन उपलब्ध लाभों के बारे में जागरूक कर सकेंऔर उन्हें न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के अधीन ओडिशा राज्य द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी से कम मानदेय का भुगतान न किया जाए। 
  • पृथक् आवास के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि प्रथम दृष्टया जापा भुए एक पृथक् आवास के हकदार प्रतीत होते हैं और उसने विधि सेवा प्राधिकरण को लागू सरकारी योजनाओं के अधीन इसकी जांच करने और पात्र पाए जाने पर उचित अनुतोष के लिये राज्य सरकार के साथ इस मामले को उठाने का निदेश दिया। 
  • अनुपालन रिपोर्टिंग पर:न्यायालय ने ओडिशा राज्य विधि सेवा प्राधिकरण को परिवार को प्रदान किये गए सामाजिक सुरक्षा उपायोंजिसमें किसी भी आवास इकाई का आवंटन शामिल हैपर एक अलग रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निदेश दिया और राज्य को दिये गए लाभों के पूर्ण विवरण के साथ एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निदेश दियाऔर इस मामले को जुलाई 2026 के तीसरे सप्ताह के लिये सूचीबद्ध किया। 

स्वप्रेरणा से अधिकारिता क्या है? 

परिभाषा:भारत में स्वप्रेरणा से अधिकारिता (Suo Motu Jurisdiction) न्यायिक सक्रियता का एक महत्त्वपूर्ण स्वरूप हैजिसके अंतर्गत न्यायालय किसी मामले में औपचारिक याचिका या आवेदन की प्रतीक्षा किये बिना स्वयं संज्ञान लेकर कार्यवाही प्रारंभ कर सकता है। इस अधिकारिता का प्रयोग विशेष रूप से ऐसे मामलों में किया जाता है जो व्यापक लोकहित से संबंधित होंअथवा जिनमें मानवाधिकारों के उल्लंघनपर्यावरण संरक्षणसामाजिक न्यायसांविधानिक अधिकारों के संरक्षण या अन्य गंभीर सार्वजनिक महत्त्व के प्रश्न सम्मिलित हों 

उद्देश्य: 

  • यह उन वंचित समूहों के लिये न्याय सुनिश्चित करता है जो स्वयं न्यायालयों तक पहुँचने में असमर्थ हैं। 
  • आलोचकों का तर्क है कि इससे शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन हो सकता है। 

विधिक ढाँचा: 

  • स्वप्रेरणा से अधिकारिता के लिये कोई विशिष्ट विधि नहीं हैलेकिन इसे उच्चतम न्यायालय के नियमों (2014) के अधीन मान्यता प्राप्त है। 
  • मौलिक अधिकारों से जुड़े मामलों मेंऐसा संज्ञान अनुच्छेद 32 के अधीन न्यायालय की अधिकारिता और पूर्ण न्याय करने के लिये आवश्यक आदेश पारित करने के लिये अनुच्छेद 142 के अधीन उसकी शक्तियों के साथ मिलकर लिया जाता है। 
  • ऐसे मामलों को सामान्यत: एक अलग मामले के रूप में पंजीकृत किया जाता है (प्राय: "इन रे:" शीर्षक से)जिसमें राज्य या संबंधित प्राधिकरण को एक पक्ष के रूप में शामिल किया जाता हैजैसा कि वर्तमान मामले में है। 

महत्त्वपूर्ण मामले: 

  • साइलेंट वैली मामला:पर्यावरण संबंधी विवाद्यकों में लोकहित वाद (PIL) आंदोलन की शुरुआत की। 
  • सरिन मेमोरियल लीगल एड फाउंडेशन बनाम पंजाब राज्य (2017):सुखना झील के जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमणों से संबंधित मामले। 
  • दून घाटी मामला:उच्चतम न्यायालय ने एक पत्र को अनुच्छेद 32 के अधीन रिट याचिका के रूप में मानाजिसके परिणामस्वरूप देहरादून में खनन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।