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आपराधिक कानून
लिंग-चयन निषेध संबंधी विधिक प्रतिबंधों के कठोर प्रवर्तन का उच्चतम न्यायालय का आह्वान
12-Jun-2026
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डॉ. रमेश बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य "काफी प्रगति हुई है, फिर भी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है। हुई प्रगति अधूरी और असमान है। इसलिये, व्यापक मानसिकता में परिवर्तन आने तक, गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम जैसे कल्याणकारी विधानों की अखंडता और कठोरता से प्रवर्तन के साथ-साथ निरंतर और गंभीर प्रयास करना आवश्यक है।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने डॉ. रमेश बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2026) के मामले में, पूर्व-गर्भाधान और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम, 1994 (PCPNDT Act) के अधीन उनके विरुद्ध शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देने वाले महाराष्ट्र के एक डॉक्टर की अपील को खारिज कर दिया।
- न्यायालय ने माना कि सोनोग्राफी केंद्र में रखे जाने वाले अनिवार्य सांविधिक अभिलेखों में कमियां महज तकनीकी या अनजाने में हुई चूक नहीं हैं, और भारत भर में लिंग-चयन प्रथाओं और पुरुष संतान के लिये पितृसत्तात्मक वरीयताओं की निरंतरता को देखते हुए, गर्भाधान और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम जैसे कल्याणकारी विधियों को कठोरता से लागू किया जाना चाहिये।
डॉ. रमेश बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता महाराष्ट्र में सोनोग्राफी केंद्र चलाने वाला एक डॉक्टर था।
- अधिकारियों को उनके केंद्र में गर्भाधान और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम के अधीन रखे गए अभिलेखों में कथित कमियां मिलीं, जिनमें फॉर्म ‘F’ में त्रुटियाँ और रिक्त प्रविष्टियां शामिल हैं - जो प्रत्येक प्रसवपूर्व निदान प्रक्रिया और अल्ट्रासाउंड परीक्षा के लिये गर्भाधान और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) नियमों के अधीन निर्धारित सांविधिक अभिलेख है, जिसमें रोगी का विवरण, गर्भावस्था का विवरण, चिकित्सा संकेत और भ्रूण के लिंग का प्रकटन न करने संबंधी घोषणाएं अभिलिखित की जाती हैं।
- प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट ने गर्भाधान और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम की धारा 23 के अधीन अधिनियम की धारा 4(3), 5, 6 और 29 के कथित उल्लंघन के साथ-साथ संबंधित नियमों के लिये अपराधों का संज्ञान लिया।
- बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष, डॉक्टर ने यह तर्क दिया कि कार्यवाही शुरू करने वाला सिविल सर्जन सक्षम "उपयुक्त प्राधिकारी" नहीं था, और फॉर्म ‘F’ में कमियां केवल तकनीकी और अनजाने में हुई थीं।
- उच्च न्यायालय ने दोनों दलीलों को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि राज्य सरकार ने अधिसूचना द्वारा जिला सिविल सर्जन को उपयुक्त प्राधिकारी के रूप में नामित किया था, और अभिलेख रखने में खामियां धारा 4(3) के प्रावधान के अधीन ठोस अपराध थे, जिनकी सीमा और प्रकृति की परीक्षा विचारण के दौरान की जाएगी।
- इसके बाद डॉक्टर ने विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- लिंग-चयन प्रथाओं की निरंतरता पर: न्यायालय ने पाया कि यद्यपि समग्र लिंग अनुपात सहित कई संकेतकों में वर्षों से सुधार हुआ है, फिर भी देश की प्रगति अधूरी और असमान बनी हुई है। न्यायालय ने उल्लेख किया कि जन्म के समय लिंग अनुपात केवल 929 महिलाएँ प्रति 1,000 पुरुष है, जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य सेवा प्रणाली (NFHS-5) के अनुसार समग्र लिंग अनुपात 1,020 महिलाएँ प्रति 1,000 पुरुष है। कई राज्य अभी भी जन्म के समय लिंग अनुपात राष्ट्रीय औसत से कम बता रहे हैं, जो पुरुष संतान के प्रति गहरी जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक प्राथमिकताओं की निरंतरता को दर्शाता है।
- लिंग अनुपात में गिरावट के ऐतिहासिक रुझान पर: न्यायालय ने जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 1991 में प्रति 1,000 लड़कों पर 945 लड़कियों की संख्या घटकर 2001 में 927 और 2011 में 919 हो गई। यद्यपि जन्म के समय लिंग अनुपात में 2015-17 के दौरान प्रति 1,000 पुरुषों पर 896 महिलाओं से बढ़कर 2022-24 के दौरान प्रति 1,000 पुरुषों पर 918 महिलाएँ हो गईं, न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि यह जैविक रूप से अपेक्षित स्तर लगभग 950 या उससे अधिक से कम ही रहा।
- भारत की वैश्विक लैंगिक समानता की स्थिति पर: न्यायालय ने विश्व आर्थिक मंच की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 का हवाला दिया, जिसमें 148 देशों के बीच भारत की समग्र लैंगिक समानता रैंकिंग 129 से गिरकर 131 हो गई है, जो इस बात को पुष्ट करता है कि लैंगिक समानता की लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है।
- सरकारी योजनाओं और उनके निरंतर प्रवर्तन की आवश्यकता पर: न्यायालय ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना और जननी सुरक्षा योजना जैसी केंद्र और राज्य सरकार की पहलों को बालिका के प्रति व्यवस्थागत भेदभाव को समाप्त करने के निरंतर प्रयासों का प्रतिबिंब माना। यद्यपि, न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध आंकड़े गर्भाधान और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम के प्रवर्तन में किसी भी प्रकार की ढील का समर्थन नहीं करते हैं।
- अभिलेखों के रखरखाव संबंधी विधिक स्थिति पर: न्यायालय ने फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में अपने पूर्व के निर्णय में स्थापित विधिक स्थिति को दोहराया, जिसमें यह माना गया था कि अभिलेखों का रखरखाव न करना केवल एक लिपिकीय चूक नहीं है, अपितु भ्रूणहत्या जैसे अपराध को अंजाम देने का आधार बन सकता है। उचित अभिलेख ही अक्सर एकमात्र ऐसा साधन होते हैं जिनके द्वारा अधिकारी यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि निदान सुविधाओं का उपयोग अवैध लिंग निर्धारण के लिये नहीं किया जा रहा है।
- कल्याणकारी विधानों के कठोर प्रवर्तन पर: न्यायालय ने माना कि भले ही लिंग अनुपात में सुधार हुआ हो, लेकिन गर्भाधान और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम के प्रावधानों को कमजोर करना या उल्लंघनों को बिना दण्ड के छोड़ देना स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय ने कहा कि जब तक मानसिकता में व्यापक परिवर्तन नहीं होता और सच्ची समानता प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक अधिनियम को कठोरता से लागू किया जाना चाहिये।
- मजिस्ट्रेट और उच्च न्यायालय के आदेशों में हस्तक्षेप करने का कोई कारण न पाते हुए, उच्चतम न्यायालय ने अपील खारिज कर दी।
गर्भाधान और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम, 1994 क्या है?
बारे में:
- भारत की संसद द्वारा पारित एक अधिनियम जिसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या को रोकना और भारत में घटते लिंग अनुपात को नियंत्रित करना है।
- इस अधिनियम के अधीन प्रसवपूर्व लिंग निर्धारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
उद्देश्य:
- गर्भाधान से पहले या बाद में लिंग चयन तकनीकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना।
- लिंग-चयनात्मक गर्भपात के लिये प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग को रोकना।
उपबंध:
- यह विधेयक अल्ट्रासाउंड जैसी प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के उपयोग को विनियमित करता है, और इनके उपयोग की अनुमति केवल आनुवंशिक असामान्यताओं, चयापचय संबंधी विकारों, गुणसूत्र संबंधी असामान्यताओं, कुछ जन्मजात विकृतियों, हीमोग्लोबिनोपैथी और लिंग-संबंधी विकारों का पता लगाने के लिये देता है।
- कोई भी प्रयोगशाला, केंद्र या क्लिनिक भ्रूण का लिंग निर्धारण करने के उद्देश्य से अल्ट्रासोनोग्राफी सहित कोई भी परीक्षण नहीं करेगा।
- कोई भी व्यक्ति शब्दों, संकेतों या किसी अन्य विधि से गर्भवती महिला या उसके रिश्तेदारों को भ्रूण के लिंग के बारे में सूचित नहीं करेगा।
- किसी भी माध्यम से - प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, होर्डिंग, दीवार पेंटिंग या अन्य किसी भी माध्यम से - प्रसवपूर्व और गर्भाधान पूर्व लिंग निर्धारण सुविधाओं का विज्ञापन करना तीन वर्ष तक के कारावास और ₹10,000 के जुर्माने से दण्डनीय है।
इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध:
- अरजिस्ट्रीकृत संस्थानों में प्रसवपूर्व निदान तकनीकों का संचालन करना या उसमें सहायता करना।
- किसी पुरुष या महिला के लिंग का चयन।
- अधिनियम में निर्दिष्ट उद्देश्यों के अतिरिक्त किसी अन्य प्रयोजन के लिये प्रसवपूर्व निदान तकनीक का प्रदर्शन करना।
- भ्रूण के लिंग का पता लगाने में सक्षम किसी भी अल्ट्रासाउंड मशीन या उपकरण की बिक्री, वितरण, आपूर्ति, किराए पर देना या अन्यथा उपलब्ध कराना।
सिविल कानून
प्रोबेट प्रतिसंहरण करने का अधिकार परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 137 के अंतर्गत आता है
12-Jun-2026
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धीरज दत्ता बनाम अनिर्बान सेन और अन्य "भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में प्रोबेट प्रदान करने या उसका प्रतिसंहरण करने के लिये आवेदन करने हेतु कोई परिसीमा निर्धारित नहीं है और इसलिये परिसीमा अधिनियम 1963 के अनुच्छेद 137 का सहारा लेना होगा।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने धीरज दत्ता बनाम अनिर्बन सेन और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि चूँकि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (ISA) किसी वसीयत के प्रोबेट की मांग करने या पहले से दिये गए प्रोबेट का प्रतिसंहरण करने के लिये आवेदन दाखिल करने के लिये कोई परिसीमा काल विहित नहीं करता है, इसलिये ऐसी कार्यवाही परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 137 द्वारा शासित होती है, जो तीन वर्ष का अवशिष्ट परिसीमा काल प्रदान करता है।
- न्यायालय ने आगे कहा कि प्रोबेट से उत्पन्न होने वाली नामांतरण कार्यवाही की रचनात्मक सूचना परिसीमा की अवधि शुरू करने के लिये पर्याप्त है, और जिस पक्षकार को ऐसी सूचना थी वह समय पर आवेदन करने के लिये अज्ञानता का दावा नहीं कर सकता है।
धीरज दत्ता बनाम अनिर्बन सेन और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद गौरीप्रोवा सेन को उनके पति से विरासत में मिली संपत्तियों से संबंधित था।
- अक्टूबर 1989 में अपनी मृत्यु से पहले, गौरीप्रोवा सेन ने 9 जुलाई, 1989 को एक वसीयत निष्पादित की, जिसमें उन्होंने अपने भतीजे धीरज दत्ता को एकमात्र निष्पादक और लाभार्थी नियुक्त किया।
- वसीयत की वैधता सितंबर 1995 में स्वीकृत की गई थी।
- इसके बाद, दत्ता ने राजस्व अभिलेखों के संबंध में नामांतरण की कार्यवाही शुरू की। इन कार्यवाहियों के नोटिस 2013 में प्रत्यर्थियों के पूर्ववर्तियों को तामील कराए गए थे।
- प्रत्यर्थियों ने दावा किया कि उन्हें प्रोबेट के बारे में केवल 2019 में पता चला, और उसके बाद उन्होंने संपत्ति के संबंध में वाद दायर किया।
- 2022 में, प्रत्यर्थियों ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 263 के अधीन प्रोबेट का प्रतिसंहरण करने की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया।
- एक एकल न्यायाधीश ने प्रतिसंहरण आवेदन को कालवर्जित होने के कारण खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इस निर्णय को पलट दिया, जिसके परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की गई।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- परिसीमा अधिनियम की धारा 137 की प्रयोज्यता के संबंध में: न्यायालय ने यह माना कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 वसीयत के प्रोबेट हेतु आवेदन करने या पहले से स्वीकृत प्रोबेट का प्रतिसंहरण करने हेतु कोई परिसीमा काल विहित नहीं करता है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (ISA) के अंतर्गत किसी विनिर्दिष्ट अवधि के अभाव में परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 137 का सहारा लिया जाना चाहिये, जो अन्यत्र शामिल न होने वाले आवेदनों के लिये तीन वर्ष की अवशिष्ट परिसीमा अवधि प्रदान करती है।
- रचनात्मक सूचना और परिसीमा की शुरुआत: न्यायालय ने माना कि जिस पक्षकार को प्रोबेट से उत्पन्न नामांतरण कार्यवाही की रचनात्मक सूचना प्राप्त मानी जाती है, वह बाद में अनभिज्ञता के आधार पर प्रोबेट को चुनौती नहीं दे सकता। प्रत्यर्थियों को 2013 में नामांतरण कार्यवाही की सूचना दी गई थी, और उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे कम से कम यह पता करें कि ऐसी सूचना क्यों जारी की गई थी और इस संबंध में उन्हें क्या कदम उठाने थे।
- नोटिस प्राप्त होने पर जांच-पड़ताल के कर्त्तव्य के संबंध में: न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब कोई न्यायालय किसी पक्षकार को नोटिस भेजता है, तो उससे कम से कम यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह पक्षकार यह जानने का प्रयास करे कि नोटिस क्यों भेजा गया है और उसे इसके जवाब में क्या करना चाहिये। ऐसा करने में असफल रहने पर पक्षकार के पक्ष में परिसीमा काल को बढ़ाया नहीं जा सकता।
- परिसीमा की शुरुआत के संबंध में: न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 137 के अंतर्गत तीन वर्ष की परिसीमा काल उस तिथि से प्रारंभ होगी जब प्रत्यर्थियों को उचित जाँच-पड़ताल करने पर यह पता चल जाता कि नामांतरण कार्यवाही अपीलकर्त्ता को दी गई वसीयत के प्रोबेट पर आधारित है। यह जानकारी 2013 में नोटिस दिये जाने के बाद ही प्राप्त हो जानी चाहिये थी, न कि 2019 में जैसा कि प्रत्यर्थियों ने दावा किया है। तदनुसार, 2022 में दायर प्रोबेट का प्रतिसंहरण करने का आवेदन कालवर्जित माना गया।
- परिणामस्वरूप, अपील मंजूर कर ली गई, खंडपीठ का आदेश अपास्त कर दिया गया और एकल न्यायाधीश द्वारा प्रतिसंहरण आवेदन को कालवर्जित होने के कारण खारिज करने का आदेश बहाल कर दिया गया।
परिसीमा अधिनियम, 1963 का अनुच्छेद 137 क्या है?
- यह उन सभी आवेदनों पर लागू होता है जिनके लिये अनुसूची के तीसरे खंड में कहीं और कोई परिसीमा निर्धारित नहीं की गई है।
- समय सीमा: 3 वर्ष।
- आवेदन करने का अधिकार प्राप्त होने की तिथि से समय की गणना शुरू होती है ।
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 क्या है?
बारे में:
- भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 भारत में उत्तराधिकार और विरासत को नियंत्रित करने वाला एक व्यापक विधान है।
- यह ईसाई, पारसी, यहूदी और अन्य समुदायों पर लागू होता है, जबकि हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध अपने-अपने व्यक्तिगत विधियों द्वारा शासित होते हैं।
दायरा:
- यह अधिनियम उत्तराधिकार के दो रूपों की बात करता करता है:
- वसीयती उत्तराधिकार — वैध वसीयत के माध्यम से संपत्ति का वितरण।
- निर्वसीयती के उत्तराधिकार — वितरण जहाँ कोई वसीयत विद्यमान नहीं है, पूर्वनिर्धारित नियमों द्वारा शासित होता है।
प्रमुख उद्देश्य:
- संबंधित समुदायों में उत्तराधिकार के लिये एक समान विधिक ढाँचा प्रदान करना।
- संपत्ति का वैधानिक उत्तराधिकारियों और लाभार्थियों के बीच समान वितरण सुनिश्चित करना।
- आश्रितों और उत्तराधिकारियों के अधिकारों की रक्षा के लिये।
वसीयती उत्तराधिकार:
- वसीयत लिखित रूप में होनी चाहिये, जिस पर वसीयतकर्त्ता द्वारा कम से कम दो साक्षियों के समक्ष हस्ताक्षर किये जाने चाहिये, और उन दो साक्षियों द्वारा इसकी पुष्टि की जानी चाहिये।
- वसीयतकर्त्ता का मानसिक रूप से स्वस्थ और कम से कम 18 वर्ष का होना आवश्यक है, और वसीयत कपट, प्रपीड़न या असम्यक् असर से मुक्त होनी चाहिये।
- वसीयतकर्त्ता के जीवनकाल में ही किसी अन्य वसीयत या औपचारिक घोषणा के माध्यम से वसीयत का प्रतिसंहरण या संशोधित किया जा सकता है।
- वसीयत के निष्पादक संपत्ति का प्रबंधन करते हैं, देनदारियों का निपटान करते हैं और लाभार्थियों को संपत्ति वितरित करते हैं।
निर्वसीयती के उत्तराधिकार:
- पति या पत्नी संपत्ति को बच्चों या माता-पिता के साथ साझा करते हैं।
- बच्चों को समान अंश विरासत में मिलते हैं; किसी मृत उत्तराधिकारी के बच्चों को उस उत्तराधिकारी का अंश विरासत में मिलता है।
- जीवनसाथी या संतान की अनुपस्थिति में माता-पिता और भाई-बहन संपत्ति के उत्तराधिकारी होते हैं।
- इस अधिनियम के अधीन दत्तक और अधर्मज संतानें उत्तराधिकार के अधिकारों की हकदार हैं।
- ईसाई उत्तराधिकार के अधीन, पति या पत्नी को एक तिहाई अंश मिलता है और बच्चे शेष दो तिहाई अंश को बराबर-बराबर बांट लेते हैं।
- पारसी उत्तराधिकार प्रणाली के अधीन, पति-पत्नी, बच्चों और माता-पिता के बीच समान वितरण होता है।
प्रोबेट :
- प्रोबेट की प्रामाणिकता की पुष्टि करने के लिये न्यायालय द्वारा वसीयत का विधिक सत्यापन ही प्रोबेट कहलाता है।
- मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे कुछ क्षेत्रों में यह अनिवार्य है।
- कार्यकारी या प्रशासक न्यायालय की देखरेख में संपत्ति का प्रबंधन करते हैं, ऋण चुकाते हैं और परिसंपत्तियों का वितरण करते हैं।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 से तुलना:
- भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम केवल स्व-अर्जित संपत्ति की ही बात करता है, जबकि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम पैतृक/सहदायिकी संपत्ति की भी बात करता है।
- दोनों अधिनियम पुत्रों और पुत्रियों को समान उत्तराधिकार अधिकार प्रदान करते हैं।
- पति-पत्नी के अधिकार अलग-अलग होते हैं: भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम पति या पत्नी को एक निश्चित अंश प्रदान करता है, जबकि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम विधवा के अधिकारों को पारिवारिक संरचना पर निर्भर करता है।
महत्त्व:
यह अधिनियम समान उत्तराधिकार अधिकारों के माध्यम से लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है, स्पष्ट विधिक प्रावधान प्रदान करके पारिवारिक विवादों को कम करता है, और पारंपरिक मूल्यों को आधुनिक विधिक सिद्धांतों के साथ संतुलित करता है। अधिनियम के अधीन उचित वसीयतनामा, निष्पादकों की नियुक्ति, और न्यास या दान विलेखों के उपयोग के माध्यम से सुदृढ़ संपत्ति नियोजन स्पष्टता सुनिश्चित करता है, आश्रितों की सुरक्षा करता है, और उत्तराधिकारियों के लिये विधिक जटिलताओं को कम करता है।