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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

उच्चतम न्यायालय ने नागरिकता प्रमाण के रूप में आधार कार्ड के उपयोग की जांच की

 16-Jun-2026

अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ 

"आधार किसी भी प्रकार का नागरिकता या निवास का अधिकार प्रदान नहीं करता है और न ही इसके प्रमाण के रूप में कार्य करता है।" 

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एक रिट याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसमें नागरिकतानिवास स्थानपता और जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में आधार के उपयोग को प्रतिबंधित करने और यह सुनिश्चित करने के निदेश मांगे गए हैं कि इसका उपयोग केवल पहचान के प्रमाण के रूप में किया जाए। 

  • अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका में चिंता व्यक्त की गई है कि पहचान प्रमाण के अलावा अन्य प्रयोजनों के लिये आधार कार्ड की निरंतर स्वीकृति अवैध अप्रवासियों और घुसपैठियों को मतदाता पहचान पत्र सहित अन्य आधिकारिक दस्तावेज़ प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। 

अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि आधार अधिनियम, 2016 की धारा स्पष्ट रूप से यह स्पष्ट करती है कि आधार संख्या किसी भी प्रकार का नागरिकता या अधिवास का अधिकार प्रदान नहीं करती है और न ही इसके प्रमाण के रूप में कार्य करती है। 
  • याचिका में 22 अगस्त, 2023 की UIDAI अधिसूचना का हवाला दिया गया थाजिसमें इसी तरह स्पष्ट किया गया है कि आधार केवल पहचान का प्रमाण हैन कि नागरिकतापता या जन्मतिथि का प्रमाण। 
  • इन सांविधिक और प्रशासनिक स्पष्टीकरणों के होते हुए भीयाचिकाकर्त्ता ने बताया कि स्कूल में प्रवेशसंपत्ति के संव्यवहार और जन्म प्रमाण पत्रराशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने जैसे प्रयोजनों के लिये आधार को आयुनागरिकता और निवास के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है। 
  • याचिका में नए मतदाता रजिस्ट्रीकरण के आवेदन पत्र फॉर्म-में आधार कार्ड के उपयोग को भी चुनौती दी गई हैजहाँ इसे जन्म तिथि और निवास के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) आधार को केवल पहचान स्थापित करने के लिये उपयोग करने की अनुमति देती हैन कि आयु या निवास साबित करने के लिये 
  • इसके अतिरिक्त यह भी तर्क दिया गया कि भारत में एक वर्ष में 182 दिन रहने वाला कोई भी व्यक्ति आधार कार्ड प्राप्त करने के लिये पात्र हो जाता हैजिसमें किराए के करार और स्थानीय अधिकारियों की सिफारिशें जैसे दस्तावेज़ भी शामिल हैंजिससे अवैध अप्रवासियों के लिये आधार कार्ड और बाद में अन्य पहचान दस्तावेज़ प्राप्त करना संभव हो जाता है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने केंद्र सरकारराज्य सरकारों और भारत के निर्वाचन आयोग को निदेश देने की मांग की कि आधार का उपयोग केवल पहचान के प्रमाण के रूप में ही सीमित किया जाएसाथ ही यह घोषणा की जाए कि फॉर्म-में जन्म तिथि और निवास के प्रमाण के रूप में इसका उपयोग आधार अधिनियम की धारा 9, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 23(4) और संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत हैऔर इसलिये यह शून्य और अप्रभावी है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की गुण-दोष पर इस स्तर पर कोई निष्कर्ष अभिलिखित किये बिनायाचिकाकर्त्ता के तर्कों पर प्रतिक्रिया देने के लिये भारत सरकार और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया। 

आधार क्या है? 

  • आधार एक 12 अंकों का व्यक्तिगत पहचान नंबर है जिसे भारत सरकार की ओर से भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) द्वारा जारी किया जाता हैजो भारत में कहीं भी पहचान और पते के प्रमाण के रूप में कार्य करता है। 
  • यह एक बायोमेट्रिक दस्तावेज़ है जो किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी को सरकारी डेटाबेस में संग्रहीत करता है। 
  • पात्रता:कोई भी व्यक्तिजिसमें विदेशी नागरिक भी शामिल हैंजो नामांकन आवेदन से पहले के 12 महीनों में 182 दिन या उससे अधिक समय तक भारत में निवास कर चुका है, 18 अधिसूचित पहचान और पते के दस्तावेज़ों में से एक प्रस्तुत करने पर पात्र है। 
  • आधार कार्ड UIDAI द्वारा जारी किया जाता हैजो आधार अधिनियम, 2016 के अधीन गठित एक सांविधिक प्राधिकरण है। 
  • उपयोगिता:आधार प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), बैंकिंग सेवाओंमोबाइल कनेक्शन और विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी सेवाओं तक पहुँच को सुगम बनाता है। 
  • विधिक स्थिति:आधार कार्ड केवल पहचान और पते का प्रमाण है - यह नागरिकतानिवास स्थान या जन्मतिथि का प्रमाण नहीं हैऔर इसका उपयोग राष्ट्रीयता स्थापित करने के लिये नहीं किया जा सकता है। 
  • न्यायिक रुख:न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) के मामलेमें, उच्चतम न्यायालय ने आधार की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि आधार अधिनियम, 2016 की धारा के अधीनआधार संख्या नागरिकता या अधिवास प्रदान या साबित नहीं करती है। 
  • UIDAI ने "उदय" नामक एक निवासी-अनुकूल शुभंकर (जनवरी 2026 में लॉन्च किया गया) पेश किया हैजिसका उद्देश्य अपडेटप्रमाणीकरणऑफ़लाइन सत्यापन और चुनिंदा सूचना-साझाकरण पर आधार सेवाओं को जनता के लिये अधिक सुलभ बनाना है। 

सिविल कानून

लोकायुक्त विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन खुफिया या सुरक्षा निकाय होने के कारण छूट नहीं दी गई है

 16-Jun-2026

विशेष पुलिस स्थापन बनाम कामता प्रसाद मिश्रा एवं अन्य 

"विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को 'खुफिया और सुरक्षासंगठन नहीं कहा जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस निदेश को बरकरार रखा है जिसमें लोकायुक्त संगठन के विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के अधीन मांगी गई जानकारी का प्रकटन करने का निदेश दिया गया था। 

  • न्यायालय ने साथ ही 2011 की राज्य सरकार की अधिसूचना को रद्द कर दियाजिसमें विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को सूचना के अधिकार व्यवस्था से छूट देने का दावा किया गया थायह मानते हुए कि विशेष पुलिस स्थापन खुफिया या सुरक्षा कार्य नहीं करता है और इसलिये अधिनियम की धारा 24(4) के अधीन छूट का दावा नहीं कर सकता है। 

स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट बनाम कामता प्रसाद मिश्रा और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • कटनी में तैनात टाउन इंस्पेक्टर कामता प्रसाद मिश्रा 2017 में SPE द्वारा उनके खिलाफ दर्ज किये गए भ्रष्टाचार के एक मामले में फंस गए थे। 
  • राज्य सरकार ने 2020 में उनके अभियोजन के लिये मंजूरी दी थी। इसके बादमिश्रा ने मंजूरी आदेश और संबंधित संसूचना के पीछे की निर्णय लेने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी मांगने के लिये एक RTI आवेदन दायर किया। 
  • अधिकारियों ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दियाऔर राज्य सूचना आयोग ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(ज) का हवाला देते हुए अस्वीकृति को बरकरार रखाजो अन्वेषण या अभियोजन की प्रक्रिया में बाधा डालने की संभावना वाली जानकारी के प्रकटीकरण को छूट देता है। 
  • इसके बाद मिश्रा ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख कियाजिसने इस आधार पर उनके पक्ष में निर्णय दिया कि अन्वेषण पहले ही पूर्ण हो चूका था और आरोप पत्र दायर किया जा चुका थाऔर अधिकारियों को अनुरोधित जानकारी उपलब्ध कराने का निदेश दिया। 
  • SPE ने इस निदेश को उच्चतम न्यायालय के समक्ष चुनौती दीजिसमें मध्य प्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 25 अगस्त, 2011 को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 24(4) के अधीन जारी अधिसूचना पर विश्वास किया गया थाजिसमें SPE और राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो दोनों को अधिनियम के दायरे से बाहर करने की मांग की गई थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • धारा 24(4) के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 24(4) अधिनियम के प्रकटीकरण दायित्त्वों से छूट केवल उन संगठनों को देती है जो वास्तव में राज्य सरकार द्वारा स्थापित "खुफिया और सुरक्षा संगठनों" के रूप में कार्य करते हैंऔर यह छूट सामान्य अन्वेषण या विधि प्रवर्तन कार्यों को करने वाले निकायों तक विस्तारित नहीं की जा सकती है। 
  • SPE के कार्यों की प्रकृति पर:लोकायुक्त और SPE को नियंत्रित करने वाले सांविधिक ढाँचे का अन्वेषण करते हुएपीठ ने पाया कि SPE की अधिकारिता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन भ्रष्टाचार से संबंधित अपराधों और लोक सेवकों से जुड़े दण्ड संहिता के कुछ अपराधों के अन्वेषण तक ही सीमित है। न्यायालय ने माना कि ये कार्य जांच प्रकृति के हैं और धारा 24(4) के अधीन परिकल्पित खुफिया जानकारी जुटाने या सुरक्षा अभियानों के अंतर्गत नहीं आते हैं।  
  • 2011 की अधिसूचना की वैधता पर:न्यायालय ने माना कि 2011 की अधिसूचनाजहाँ तक ​​इसने विशेष पुलिस स्थापन (SPE) को सूचना का अधिकार अधिनियम से अपवर्जित किया हैमूल अधिनियम के अधीन प्रदत्त अधिकार का उल्लंघन करती है और इसलिये अमान्य है। अधिसूचना को विधायिका द्वारा निर्धारित सीमा से परे सांविधिक छूट का विस्तार करने का एक अनुचित प्रयास पाया गया। 
  • अपने निर्णय के सीमित दायरे के संबंध में:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने अधिसूचना का अन्वेषण केवल विशेष पुलिस स्थापन (SPE) से संबंधित संदर्भ में किया थाऔर राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के संबंध में इसकी वैधता पर कोई निर्णय नहीं दिया था। अधिसूचना को उस निकाय के संबंध में प्रभावी माना गया। 
  • अपील के निपटारे पर:विशेष पुलिस स्थापन (SPE) की अपील को खारिज करते हुएन्यायालय ने मिश्रा द्वारा मांगी गई जानकारी प्रदान करने के उच्च न्यायालय के निदेश को बरकरार रखाउच्च न्यायालय के इस तर्क में कोई खामी नहीं पाई कि अन्वेषण पूर्ण होने और आरोप पत्र दाखिल होने से धारा 8(1)(ज) के अधीन जानकारी को रोकने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। 

सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) क्या है? 

धारा 24 – अधिनियम कुछ संगठनों पर लागू नहीं होगा 

  • उपधारा (1): अधिनियम द्वितीय अनुसूची में निर्दिष्ट खुफिया एवं सुरक्षा संगठनों पर लागू नहीं होता हैजो केंद्र सरकार द्वारा स्थापित संगठन हैंऔर न ही ऐसे संगठनों द्वारा केंद्र सरकार को दी गई किसी सूचना पर लागू होता है। 
  • उपधारा (1) का प्रथम परंतुक: यह अपवर्जन भ्रष्टाचार या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से संबंधित जानकारी पर लागू नहीं होताऐसी जानकारी प्रकट करने योग्य बनी रहती है। 
  • उपधारा (1) का द्वितीय परंतुक: जहाँ मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के संबंध में सूचना मांगी जाती हैवह केवल केंद्रीय सूचना आयोग की स्वीकृति के बाद ही प्रदान की जा सकती हैऔर धारा के अधीन विहित समय सीमा के होते हुए भीअनुरोध के पैंतालीस दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जानी चाहिये 
  • उपधारा (2): केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा द्वितीय अनुसूची में अपने द्वारा स्थापित किसी खुफिया या सुरक्षा संगठन को जोड़कर या हटाकर संशोधन कर सकती हैऐसा जोड़ या हटाना अधिसूचना के प्रकाशन पर प्रभावी होगा। 
  • उपधारा (3): उपधारा (2) के अंतर्गत जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी। 
  • उपधारा (4): अधिनियम राज्य सरकार द्वारा स्थापित खुफिया और सुरक्षा संगठनों पर भी लागू नहीं होता हैजहाँ वह सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे संगठनों को निर्दिष्ट करती है। 
  • उपधारा (4) का प्रथम परंतुक: केंद्रीय अपवर्जन की तरहभ्रष्टाचार या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से संबंधित जानकारी प्रकटीकरण से बाहर नहीं रखी गई है। 
  • उपधारा (4) का द्वितीय परंतुक: मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के संबंध में मांगी गई जानकारी केवल राज्य सूचना आयोग की मंजूरी के बादअनुरोध के पैंतालीस दिनों के भीतर जारी की जा सकती हैधारा के होते हुए भी 
  • उपधारा (5): उपधारा (4) के अंतर्गत जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाएगी। 

लोकायुक्त – मुख्य बिंदु 

  • अर्थ:लोकायुक्त भारतीय संसदीय लोकपाल हैजिसकी स्थापना व्यक्तिगत राज्य सरकारों द्वारा और उनके लिये की जाती हैजो लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों और आरोपों का अन्वेषण करने के लिये एक भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है। 
  • मूल: 
    • इसकी जड़ें स्कैंडिनेवियाई देशों में प्रचलित लोकपाल प्रणाली में निहित हैं। 
    • प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70) ने केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों के सृजन की सिफारिश की थी। 
    • लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के पारित होने से पहले ही कई राज्यों ने लोकायुक्त विधि लागू कर दी थीमहाराष्ट्र ऐसा करने वाला प्रथम राज्य थाजिसने 1971 में अपने लोकायुक्त की स्थापना की थी। 
  • नियुक्ति: 
    • लोकायुक्त और उपलोकायुक्त की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है। 
    • अधिकांश राज्यों में राज्यपाल नियुक्ति से पहले राज्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता से परामर्श करते हैं। 
  • कार्यकाल: 
    • सामान्यत: यह अवधि वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक निर्धारित की जाती हैजो भी पहले हो। 
    • दूसरे कार्यकाल के लिये पुनर्नियुक्ति की कोई पात्रता नहीं है। 
  • प्रमुख मुद्दे: 
    • एकसमान विधि का अभाव:लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 में लोकायुक्त पर केवल एक ही धारा हैजो राज्यों को एक वर्ष के भीतर अपने स्वयं के लोकायुक्त विधि पारित करने का निदेश देता हैबिना संरचनाशक्तियों या कार्यप्रणाली को निर्धारित कियेइन पहलुओं पर राज्यों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है। 
    • मामलों के निस्तारण में विलंब:शिकायतों की जांच तथा उनके अंतिम निस्तारण की प्रक्रिया प्रायः विलंबग्रस्त रहती हैजिससे शिकायत निवारण की प्रभावशीलता प्रभावित होती है 
    • राज्य सरकार पर निर्भरता:वित्तीय संसाधनों एवं आधारभूत संरचना के लिए राज्य सरकार पर निर्भरता लोकायुक्त संस्था की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है तथा इसके कार्यों में बाह्य हस्तक्षेप की संभावना उत्पन्न कर सकती है 

पारिवारिक कानून

बाल अभिरक्षा संबंधी मामलों में बालकों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण केवल आवश्यकता होने पर ही कराया जाना चाहिये

 16-Jun-2026

बनाम Y 

"कुटुंब न्यायालयों को पहले दोनों माता-पिताविशेष रूप से बच्चे की वर्तमान अभिरक्षा रखने वाले माता-पिता की मनोवैज्ञानिक स्थिति का आकलन करने के लिये एक मनोवैज्ञानिक नियुक्त करना होगाइससे पहले कि यह तय किया जाए कि बच्चे के किसी मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन की आवश्यकता है या नहीं।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने माता-पिता की अभिरक्षा संबंधी विवादों में शामिल बच्चों के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिये विस्तृत दिशानिर्देश जारी किये। न्यायालय ने कहा कि कुटुंब न्यायालयों को बच्चों का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन तब तक नहीं करना चाहिये जब तक कि यह अत्यंत आवश्यक न होऔर बच्चे के किसी भी मूल्यांकन का आदेश देने से पहले माता-पिता की मनोवैज्ञानिक स्थिति का आकलन किया जाना चाहिये। न्यायालय ने यह भी निदेश दिया कि यदि बच्चे का मूल्यांकन अनावश्यक या अवांछनीय पाया जाता हैतो इसे नहीं किया जाना चाहिये 

इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला अभिरक्षा संबंधी विवाद से उत्पन्न हुआजिसमें बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक अवयस्क के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन का निदेश दिया था। 
  • पिता और अवयस्क के बीच संपर्क बहाल करने में सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य सेबच्चे और माता-पिता दोनों का मूल्यांकन करने के लिये उच्च न्यायालय के आदेश पर विशेषज्ञों का एक पैनल गठित किया गया था। 
  • उच्च न्यायालय ने इस संबंध में 27 अप्रैल, 2023 और दिसंबर, 2023 को आदेश पारित किये 
  • इन आदेशों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गईजिसने दोनों आदेशों में संशोधन किया और मामले को कुटुंब न्यायालय को नए सिरे से विचार करने के लिये वापस भेज दियाजिससे अब जारी किये गए दिशानिर्देशों को ध्यान में रखा जा सके। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • बच्चे के मूल्यांकन से पहले माता-पिता के मूल्यांकन के संबंध में:न्यायालय ने निर्णय दिया कि कुटुंब न्यायालयों को पहले दोनों माता-पिताविशेष रूप से बच्चे की वर्तमान अभिरक्षा वाले माता-पिताकी मनोवैज्ञानिक स्थिति का आकलन करने के लिये एक मनोवैज्ञानिक नियुक्त करना होगाइससे पहले कि वे यह तय करें कि बच्चे का कोई मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है या नहीं। बच्चे का मूल्यांकन तभी आदेशित किया जाएगा जब माता-पिता पर मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट इसकी आवश्यकता दर्शाती हो। 
  • बच्चे के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन को समाप्त करने के संबंध में:न्यायालय ने निदेश दिया कि यदि कुटुंब न्यायालयमाता-पिता के संबंध में मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट के आधार परऐसे मूल्यांकन को अनावश्यक या अवांछनीय पाता हैतो बच्चे का कोई मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिये 
  • बाल मूल्यांकन के तरीके के संबंध में:यदि बाल मूल्यांकन आवश्यक पाया जाता हैतो यह मूल्यांकन किसी स्वतंत्र बाल मनोवैज्ञानिक द्वाराबाल का पहले से उपचार कर रहे मनोवैज्ञानिक के परामर्श से किया जाना चाहिये। मूल्यांकन में न्यूनतम संपर्क होना चाहिये जिससे बाल की मानसिक स्थिति में कोई व्यवधान न आए। 
  • बच्चे की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की बदलती प्रकृति पर:न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि कुटुंब न्यायालयों को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि बच्चे की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ आयु के साथ बदलती हैं और इसके लिये समय-समय पर समीक्षा और मूल्यांकन की आवश्यकता हो सकती है। 
  • माता-पिता से अलगाव और मिथ्या स्मृति के संबंध में:न्यायालय ने कुटुंब न्यायालयों को माता-पिता से अलगाव और मिथ्या स्मृति निर्माण के जोखिम जैसी चिंताओं की जांच करने और यह सुनिश्चित करने का निदेश दिया कि बच्चे को ऐसे किसी भी प्रभाव के संपर्क में न लाया जाए जो इस तरह की प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे सकता है। 
  • अभिरक्षा विवादों की निरंतरता पर:संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका पर प्रकाश डालते हुएन्यायालय ने कहा कि बच्चों से जुड़े अभिरक्षा और मुलाक़ात के विवाद स्वाभाविक रूप से गतिशील होते हैं और निरंतर विधिक कार्यवाही का आधार बनते हैं। समय के साथ परिस्थितियों में परिवर्तन होने पर माता-पिता अभिरक्षा या मुलाक़ात की व्यवस्था में संशोधन की मांग करने के लिये स्वतंत्र हैं। 
  • लंबित लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) कार्यवाही के संबंध में:न्यायालय ने निदेश दिया कि पक्षकारों को कुटुंब न्यायालय को प्रत्यर्थी के विरुद्ध लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के अधीन लंबित किसी भी कार्यवाही की स्थिति से अवगत कराना होगाक्योंकि ऐसी कार्यवाही मुलाक़ात और अभिरक्षा अधिकारों से संबंधित निर्णयों को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकती है। 
  • विशेषज्ञ सामग्री पर आधारित:न्यायालय का तर्क राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS) और बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा विभाग की एक रिपोर्ट पर आधारित थाजिसमें माता-पिता के विवादों में फंसे बच्चों द्वारा सामना की जाने वाली जटिल मनोवैज्ञानिक चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया था - जिसमें माता-पिता-बच्चे के संबंधों में तनावमाता-पिता के बीच संघर्षमानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँकुसमायोजनस्कूल से संबंधित मुद्दे और माता-पिता द्वारा विद्वेषपूर्ण आचरण के उदाहरण शामिल हैं।  

पैरेंस पैट्रिया (Parens Patriae) का सिद्धांत क्या है? 

पैरेन्स पेट्रिया (लैटिन: "राष्ट्र का संरक्षक") का सिद्धांत राज्य की अंतर्निहित शक्ति और अधिकार को संदर्भित करता है कि वह उन लोगों के संरक्षक के रूप में कार्य करे जो अपने हितों की रक्षा करने में असमर्थ हैंजिनमें अवयस्क और विकृतचित्त व्यक्ति शामिल हैं। 

अभिरक्षा संबंधी मामलों में आवेदन: 

  • बालकों की अभिरक्षा संबंधी विवादों मेंन्यायालय संरक्षक के रूप में अधिकारिता का प्रयोग करती हैंजिसका अर्थ है कि बालक का कल्याण और सर्वोत्तम हित सर्वोपरि हैं और दोनों माता-पिता के परस्पर विरोधी दावों पर हावी होते हैं। 
  • भारतीय न्यायालयों ने निरंतर यह माना है कि अभिरक्षा संबंधी मामलों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि हैन कि माता-पिता के विधिक अधिकार। 

सांविधिक आधार: 

  • संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890, विशेष रूप से धारा 17, के अनुसार किसी न्यायालय द्वारा संरक्षक की नियुक्ति करते समय मुख्य रूप से अवयस्क के कल्याण को ध्यान में रखना आवश्यक है।  
  • हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 के अंतर्गत अधिकारिता का प्रयोग करने वाले न्यायालय भी इसी प्रकार कल्याणकारी सिद्धांत से बंधे होते हैं। 

प्रमुख सिद्धांत: 

  • राज्यअपने न्यायालयों के माध्यम सेनिजी पारिवारिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप कर सकता है जहाँ किसी अवयस्क का कल्याण दांव पर लगा हो। 
  • अभिरक्षा और मुलाक़ात संबंधी आदेश अंतिम नहीं होते हैं और समय के साथ बच्चे और माता-पिता की परिस्थितियों में परिवर्तन आने पर इन्हें संशोधित किया जा सकता है। 
  • बच्चे का शारीरिकभावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्यकल्याण का निर्धारण करने में सभी महत्त्वपूर्ण कारक हैं।